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विवाहित-जीवन में सुख और शान्ति को नष्ट करने में अपनी मनमानी चाल या स्वेच्छाचार भी एक बड़ा कारण है | एक युवा जोड़े का विवाह हुआ | दूल्हा और दुल्हन, दोनों धनी परिवारों से सम्बंधित थे | ब्रिटिश राज के समय शिक्षित धनिक परिवार अपने योग्य लड़कों की उच्च शिक्षा के लिए उन्हें परदेस में भेज देते थे | उपर्युक्त दूल्हा के मां-बाप भी अपने उन्नतशील पुत्र के सम्बन्ध में ऐसा ही विचार रखते थे | जब लड़के के लिए यात्रा का प्रबन्ध किया गया तो उलझन खड़ी हो गई | दुल्हन भी विदेश जाने    का हठ करने लगी | पति को उसे ऐसे निश्चय से रोकने के लिए बड़ी मुश्किल पेश आने लगी | पत्नी ने अपने युवा पति से स्पष्ट कह दिया कि उसे उसके व्यवहार पर रोक लगाने का कोई अधिकार नहीं, क्योंकि वह अपनी देख-भाल स्वयं करने योग्य वयस्क हो चुकी है | दोनों के बीच निम्न बातचीत हुई :–

प्रिये, तुम्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि तुम मेरी पत्नी हो | तुम्हारा जीवन मेरी देख-रेख पर छोड़ा गया है | तुम जानती हो कि मैं तुमसे अधिक शिक्षित हूँ | अत: तुम्हारे लिए यही उचित है कि तुम मेरा अनुकरण करो इसी में गृहस्थी की शान्ति और संगठन बना रह सकता है |

प्रिय, तुम भी यह मत भूलो कि मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, दासी नहीं | हिन्दू-संस्कारों के अनुसार मैं तुम्हारे सुख-दुःख की साथिन हूँ | यदि तुम विदेश जाकर अपने भविष्य को उन्नत करना चाहते हो, तो मुझे भी अपनी उन्नति का उतना ही अधिकार है | तुम अधिक से अधिक यह कह सकते हो कि तुम्हारे पास दोनों के निर्वाह के लिए साधनों का अभाव है | मेरे माता-पिता की कृपा से मुझे अच्छी विरासत मिली हुई है | मैं अपना खर्च आप बरदाश्त कर सकती हूँ |

आर्थिक-स्वतन्त्रता अच्छी चीज़ है | अच्छा है कि तुम विदेश में उच्च शिक्षा पाने के लिए मेरी आश्रित नहीं | परन्तु कल दूसरे देश में तुम यह भी दावा करने लगोगी कि  तुम अपने धन पर निर्वाह करने के कारण कहीं भी रहने और स्वेच्छा से कैसा भी आचरण करने की अधिकारिणी हो | पति और पत्नी की स्वतन्त्रता न तो उनके विवाहित जीवन के लिए ही उत्तम है, न उनके बच्चों के लिए यह श्रेष्ठ है |

तुमने जीवन के इस पहलू पर चर्चा चला कर अच्छा ही किया | हाँ, निश्चय ही मैं अपनी इच्छा और पसंद के अनुसार जीवन बिताना चाहती हूँ | विदेश में भी मैं तुम्हारे साथ एक ही शर्त पर रह सकती हूँ कि तुम मेरे आचरण में हस्ताक्षेप नहीं करोगे | तुम अपनी ख़ुशी से कहीं भी जाओ और मैं अपनी मर्ज़ी से कहीं भी जाऊं |

यदि पत्नी पति की कोई भी बात न माने और पूर्णत: स्वेच्छाचार से रहे तो संगठित गृहस्थ-जीवन की सम्भावना ही क्योंकर रहेगी ? मान लो, मैं भी ऐसा ही करने लगूं, तुम्हारी और बच्चों के जन्म पर उनकी भी उपेक्षा करूं – तो यह लापरवाही और  उपेक्षा तुम्हें कैसी लगेगी ? मान लो तुम मेरे लिए घर बनाती हो और मैं अपनी इच्छा और सनक के अनुसार कभी भी समय-कुसमय घर लौटूं, तुम्हें भोजन की मेज़ पर अनावश्यक प्रतीक्षा करनी पड़े, और इस प्रकार सुख और मेल सब नष्ट होने लगें, तो ?

मूल्य कुछ भी चुकाना पड़े, परन्तु मैं स्वेच्छाचार का त्याग नहीं कर सकती | मैंने पहले ही अपने पिता और भाइयों को कह दिया है कि वे आरम्भ से ही मेरे अध्ययन, खान-पान और रहने का तुमसे जुदा प्रबन्ध करें |

सो, प्रिये, तुम मेरे साथ गृहस्थ जीवन में रहना ही नहीं चाहतीं | तुम मेरे लिए घर भी बसाना नहीं चाहतीं | यह भी नहीं चाहतीं कि मैं तुम्हारे आचरण पर कोई रोकथाम रखूँ | मुझे प्रसन्नता है कि तुमने आज अपने दिल की बात मुझसे कह दी | मैं ऐसे स्वतन्त्र आचरणवाद और अभ्यास को जिसमे एक-दूसरे के लिए कोई ख्याल नहीं, मानने को तैयार नहीं |

दोनों विदेश गए | मुझे बताया गया कि वहां वे एक-दूसरे की रोकथाम के बिना पूर्ण स्वतंत्रता का जीवन व्यतीत करते रहे | जव वे वापिस लौटे तो लगभग जुदा हो चुके  थे | भारतीय समाज में इस प्रकार सामाजिक बन्धनों और शासनों से मुक्त स्वतंत्र व्यवहार को सहन नहीं किया जाता | कहते हैं वे सचमुच बाद में जुदा हो गए | एक-दूसरे से पूर्णत: स्वतंत्र होने के कारण पत्नी ने पर-पुरुष के साथ स्वतंत्र प्रेम का महा-नाटक आरम्भ कर दिया | शायद वह यह कहा करती थी, यदि मेरा पति दूसरा विवाह कर सकता है, तो मैं किसी अन्य पुरुष के साथ स्वतंत्र वासनापूर्वक जीवन क्यों नहीं बिता सकती ?

उसके आचरण ने सबको ही रोष से भर दिया | कुछ लोग साहसपूर्वक उसके मुँह  पर भी यह कह दिया करते थे कि उसके द्वारा नैतिक-सिद्धांत और सामाजिक बन्धनों का उल्लन्घन उसकी बदनामी का कारण बन रहा है | वे यह भी कह देते थे कि कोई भला व्यक्ति उसे अपने घर आने या अपनी औरतों और लड़कियों को उससे मिलने-जुलने की छूट देने के लिए कभी तैयार न होगा | कुछ तो इतने साहसी थे कि कह देते, तुम्हारी ज़िन्दगी समाज में विवाहित-जीवन के लिए प्लेग के सामान है |

परन्तु उस स्वेच्छाचारिणी स्त्री ने यह कभी अनुभव ही नहीं किया कि वह समाज का एक अंग है और समाज निर्माण और नीति के अधीन है | उसने कभी यह स्वीकार  नहीं किया कि एक शिक्षित पति और प्रेमिल-पिता के सरंक्षण में परिवार अधिक सुरक्षित रह सकता है | वह यह कभी न समझ पाई कि विवाह-बन्धन के अन्तर्गत पत्नी को पति पर अनेक अधिकार प्राप्त हो जाते हैं | वह नहीं समझी कि विवाह पत्नी को सुशोभित स्थिति प्रदान करता है | पत्नी के रूप में क़ानून और समाज उसके साथ थे, वह यह भी महसूस नहीं कर सकी | उसने यह भी कभी महसूस नहीं किया कि बड़े-से-बड़े शक्तिशाली व्यक्ति की रखैल बनने पर भी उसे स्त्रीत्व या पत्नीत्व का गौरव प्राप्त नहीं हो सकता, बल्कि इस प्रकार उसने पत्नी के विशेषाधिकारों को, जो उसे पति द्वारा प्राप्त होते हैं, खोया ही है |

मुझे बताया गया कि उसने यह सब अनुभव तो किया, परन्तु बहुत देर बाद |  जिनके साथ वह रखैल बनकर रही थी, उन्होंने ही उसे बरबाद कर दिया | धीरे-धीरे उसने अपने को बिलकुल अकेला पायामित्रहीन और परित्यक्त | पति के घर तथा उसकी समादृत दूसरी पत्नी को देखकर वह आहें भरती थी | उसे अपने पति से संतान भी थी | उन्होंने उसकी ओर देखना भी स्वीकार नहीं किया | अत: पत्नी और माता दोनों रूपों में उसे बड़ा मूल्य चुकाना पड़ा और वह त्याज्त पत्नी और त्याज्य माता बनी रहकर घृणा ही झेलती रही | अब उसे समझ आया कि पत्नी और माता दोनों स्थितियों में स्त्री को हठ करने से कुछ हाथ नहीं आता, उल्टा वह बहुत कुछ गंवा बैठती है | अपने तथा अपने बच्चों के हित के लिए स्त्री का यह मुख्य कर्त्तव्य है कि वह हर प्रकार के अनमेल से दूर रहे और पति का मन जीत कर बच्चों के लिए सुख और एकता के वातावरण का निर्माण करे | जब तक घर में संतान न हो, तब तक भले ही यह परस्पर के झगड़े और अनमेल कुछ सीमा तक मुआफ किये जा सकते हैं, क्योंकि इनका प्रभाव मुख्य रूप से माता-पिता पर ही पड़ता है| परन्तु जब परिवार में बच्चे आ जाते हैं, तो स्थिति गंभीर हो जाती है |

एक सभा में, जहाँ मैं भी उपस्थित था, लगभग तेरह वर्ष की एक लड़की उठ खड़ी हुई | आंसू बहाते हुए उसने बताया कि उसके बचपन में जब उसने अपने माता-पिता को एक-साथ होने पर जब कभी हँसते न पाया तो उसका नन्हा दिल टुकड़े-टुकड़े हो गया | उसने आगे बताया कि उसका पिता स्वेच्छाचार के नाते क्योंकर उसकी माता का निरादर ही न करता था, बल्कि कभी-कभी दूसरा विवाह कर लेने की धमकी भी देता था | वह बोली कि वह देवात्मा की आभारी है, जिन्होंने उसके माता-पिता के घर में शान्ति और मेल पैदा कर दिया तथा वह भी इतने प्रभावशाली ढंग से कि उसके पिता उसकी माता के प्रति किये हुए अन्याय पर पछतावा भी करने लगे हैं| पिता भी उस सभा में मौजूद था | उसने भी खड़े होकर सिसकियाँ लेते हुए बताया कि वह स्वेच्छाचार में इतना भूला हुआ था कि पत्नी की शुभ इच्छाओं को प्राय: ठुकरा दिया करता था |

स्वेच्छाचार उन ख़तरनाक इच्छाओं में से एक है, जो लोगों के हृदय को निर्मम बनाती है और न केवल अन्याय और बुरा व्यवहार भी करवाती है, बल्कि घरों को तबाह और बरबाद भी कर देती है |

मैंने एक ऐसे सफल व्यक्ति की कहानी पढ़ी थी, जो अपनी भली पत्नी और मासूम बच्चों पर अत्याचार किया करता था | वह अपने बच्चों को क्रूरता से पीटता था | उसके बड़े बेटों में से एक तो उसका परिवार छोड़ कर भाग गया और उसका फिर कभी पता न  चला | उसकी पत्नी बेटे के भाग जाने के कारण अति-पीड़ित जीवन बिता रही थी | परन्तु बाप कठोर था, उसने बच्चों को मारना बंद नहीं किया | उसकी पत्नी निराश हो गई | भेड़ की तरह मिस्कीन (निरीह) होते हुए भी, एक दिन वह धमकी देते हुए उस पर शेरनी की तरह ग़रज़ उठी, यदि तुम मेरे बच्चों को फिर कभी मारोगे, तो मैं यहाँ से चली जाऊंगी और फिर कभी तुम्हारी सूरत भी न देखूंगी | पति को पत्नी के चरित्र का यह नया पहलू देखकर बड़ी हैरानी हुई | परन्तु उसे पत्नी की पति-भक्ति का इतना विश्वास था कि उसने धमकी की ओर कोई धयान न दिया | एक बार फिर उसने उस लड़के को पीटा, जो अभी मां-बाप के साथ रहता था | उसी शाम जब वह आफ़िस से लौटा तो यह देख कर स्तब्ध रह गया कि उसकी भली पत्नी अपने बेटे को लेकर वहां से जा चुकी थी |

पत्नी के इस प्रकार घर से चली जाने से उसे बड़ा सदमा पहुंचा, परन्तु अब क्या हो सकता था ? उसने उसे बहुत खोजा, परन्तु कोई लाभ न हुआ | वर्षों बीत गए, भाग्य ने उस दु:खी हृदय पति को रौंद डाला | उसका व्यापार नष्ट हो गया | उसके जीवन से सब खुशियाँ छूट गईं | एक दिन उसे अपने बेटे का पत्र मिला, जिसमे उसने मां की गंभीर दशा की सूचना दी थी और उसकी ओर से प्रार्थना की थी कि वह मृत्यु-शैय्या पर उसे दर्शन देकर संतोषपूर्वक मरने में सहायक हो| वह आया और उससे (पत्नी से) मिला | उसकी देवी समान पत्नी ने उसके आ जाने पर धन्यवाद दिया और अपने पुत्र को पिता  का ध्यान रखने की प्रार्थना की | स्वेच्छाचारी पति पत्नी की मृत्यु के बाद भी बहुत समय तक जीता रहा और अपनी पत्नी और बच्चों के प्रति दुर्व्यवहार पर पछताता रहा | परन्तु जहाँ तक पत्नी का सम्बन्ध था, वह पति के वास्तविक और शुभकर परिवर्तन का फल न भोग सकी, क्योंकि अब वह जीवित न थी | उसका बेटा जो मां को बहुत चाहता था, बहुत त्याग के साथ अपने पिता की देखभाल करता रहा | अपने  कृतज्ञ व्यवहार से उसने अपने पिता के आखिर के दिन शांतिपूर्वक बिताने में उसकी बड़ी सहायता की |

स्वेच्छाचार का यह नाटक स्वयं चीख-चीख कर कह रहा है कि स्वेच्छाचारी सदैव भाग्यहीन होता है | संसार के प्रत्येक दम्पत्ति को निश्चित रूप से यह समझ लेना चाहिए कि विवाहित-सम्बन्ध पारस्परिक आदर, पारस्परिक सम्मान, कृतज्ञता और प्रेम से ही सुदृढ़ बनता है |

कुछ वर्ष पहले की बात है कि वृद्ध आयु की मेरी एक परिचित ने एक सन्देश भिजवाया कि मैं अवकाश मिलने पर शाम को उसके घर पर मिलूँ | जब मैं वहां पहुंचा तो मैंने उसे बड़ी चिंतित अवस्था में एक कमरे में बैठे देखा | वह बोली, मैं आप से कुछ प्रार्थना करना चाहती हूँ, आशा है कि आप मेरी तसल्ली कर सकेंगे | मैंने कहा, यदि मैं आपके कुछ काम आ सकूं तो मेरा सौभाग्य होगा, और साथ ही मैंने उसे बिना हिचक अपने मन की बात कह डालने की प्रार्थना की | वह कहने लगी, मेरे पति से कहिये कि वह खाना घर पर ही खाएं |”  यह सुन कर मुझे कुछ हैरानी सी हुई, अत: मैंने पूछा, क्या वे आप से नाराज़ है ? उत्तर मिला, कदापि नहीं; आप तो उनका स्वभाव जानते ही हैं | वह मेरे प्रति बहुत दयालु हैं | वे घर पर इस विचार से भोजन नहीं करते कि मैं बहुत बूढ़ी हो गई हूँ और भोजन आदि बनाने के लिए मुझ पर अब वे बोझ डालना ठीक नहीं समझते | मने कहा, ये तो उनका श्रेठ विचार है, आपको उनके भावों के विरुद्ध क्या आपत्ति है ? यह सुनते ही उसकी आँखों में आँसू आ गए और वह सिसकते हुए बोली, श्रीमानजी, आज से पच्चास वर्ष पूर्व मेरे माता-पिता ने मेरा विवाह उनसे किया था | तब से प्राय पच्चास वर्ष तक वह मेरा ध्यान और सन्मान ही नहीं करते रहे, बल्कि मेरे जीवन का सहारा भी बने रहे | मैंने उन्हीं की छत्र-छाया में सुखपूर्वक अपना जीवन बिताया है | क्या मुझे यह शोभा देता है कि मैं उनकी वृद्ध आयु में उन्हें दो रोटी भी पका कर न दे सकूं ?

मैं उसके भावों से बहुत प्रभावित हुआ | पति के प्रति उसकी कृतज्ञता ने मेरे मन को हिला दिया | मैं तुरन्त उसके वृद्ध पति से मिला और मैंने उसको उसकी पत्नी की भावनाएं बताईं | पति ने कहा, श्रीमानजी, मैं उसके भावों के प्रति आभारी हूँ | काश, कि मैं कोई नौकर रख सकता, जो हम दोनों के लिए भोजन बना देता | परन्तु यदि यह मेरे लिए सम्भव नहीं तो कम-से-कम मुझे अपने भोजन और अन्य आवश्यकताओं का बोझ तो उसके वृद्ध शरीर पर नहीं डालना चाहिए | उसे गृह-कार्य के बोझ से दबा देखना मेरे लिए बड़ी कठिन समस्या हो जाएगी और मेरे लिए शान्ति से भोजन करना भी दूभर हो जाएगा | मैंने उससे अपनी पत्नी से मिलने और उसे प्रसन्न करने की प्रार्थना की |

यह दो कृतज्ञ आत्माओं का, एक-दूसरे के प्रति, कितना उत्तम व्यवहार था | क्या ऐसे दम्पत्ति का परस्पर सम्बन्ध कड़वा हो सकता है ? निस्वार्थ होने पर वे एक-दूसरे के विरुद्ध मन में कोई शिकायत ही नहीं रख सकते | ऐसे माता-पिता अपने बच्चों के लिए भी परस्पर विश्वास, आशा, सेवा और त्याग का वातावरण निर्माण करते हैं | श्रेठ माता-पिता अच्छा परिवार बनाते हैं और अच्छे परिवारों पर ही अच्छे समाज का निर्माण होता है |

कृतज्ञता से पारस्परिक विश्वास, वफादारी और प्रेम की उत्पत्ति होती है, जबकि कृतघ्नता दुखमय घर और नारकीय परिवार का कारण बनती है |

एक सुशिक्षित तथा धनवान घराने की मेरी परिचित स्त्री ने, जो एक उच्च राज्य-पदाधिकारी से ब्याही गई थी, एक बार मुझसे मिलने का समय माँगा | इसके लिए एक दिन निश्चित कर लिया गया | उसने प्रार्थना की कि मुझे उसके लिए कम-से-कम दो घंटे का समय देना होगा | मैं बहुत ही निजी विषयों पर आपसे बातचीत करना चाहती हूँ तथा आपसे कुछ सलाह लेना चाहती हूँ, उसने कहा | नियत समय पर वह मेरे पास आई और उसने अपने जीवन की कुछ ऐसी घटनाएं मुझे बताईं, जिनसे मुझे हैरानी भी हुई और दुःख भी | वह बोली, हम दोनों पति-पत्नी आज से पच्चीस वर्ष पूर्व विवाह-बंधन में बंधे थे, और इन पच्चीस वर्षों में, पिछले २३ वर्षों से, हम आपस में बहुत अनमेल का जीवन बिता रहे हैं | हम बाहर से दिखावा बनाए रखते हैं | अपने सामजिक दायरे में भी हम एक कुशल जोड़ी समझे जाते हैं, परन्तु घर पर शायद ही कभी हम दिल खोलकर बातचीत करते अथवा परस्पर प्रेम और सन्मान का व्यवहार करते हैं | हममें जो वार्तालाप हुआ, वह यह था —

            “क्या ये 25 वर्ष तुम दोनों एक ही घर में रहे और एक ही मेज़ पर इक्कठे खाना खाते रहे ?  जी हाँ, हम 25 वर्ष एक ही घर में रहे | हमने सुंदर और स्वस्थ् बच्चों को जन्म दिया | सामाजिक उत्सवों में हम साथ साथ जाते हैं | हम मित्रों और रिश्तेदारों को मिलने के लिए इक्कठे जाते हैं | जहाँ तक संभव था हमने दुनिया को यह पता नहीं चलने दिया कि हम कलह और अनमेल की ज़िन्दगी बिता रहे हैं |

क्या अपने नौकरों आदि से भी इस अवस्था को तुम छिपाकर रख सके हो ?

जहाँ तक नौकरों का सम्बन्ध है, कुछ तो उनमे से बहुत पुराने हैं और हमारे जीवन को पूरी तरह पहचानते हैं | परन्तु इतना मैं जानती हूँ कि वे परिवार से बाहर किसी से इस सम्बन्ध में बात नहीं करते |

            “तुम्हारे इस परस्पर अनमेल का मूल कारण क्या है ?

            “हमारी सब तकलीफों का मूल कारण हमारे होनहार बच्चे हैं, यद्यपी हमारे इस अनमेल को पैदा करने में उनका कोई साक्षात हाथ नहीं | हाँ, अप्रत्यक्ष रूप में भी मैं कहूंगी कि वह हमारे इस झगड़े के लिए जिम्मेवार नहीं हैं |

            “इस पहेली को ज़रा खोल कर समझाईये |

            “हम दोनों बच्चों को अत्यंत प्रेम करते हैं | परन्तु उनकी शिक्षा-दीक्षा के मामले में हममे बहुत मतभेद है | मेरे पति उन्हें विदेश में शिक्षा दिलाना चाहते हैं, जबकि मैं उन्हें अपने पास रखना चाहती हूँ, और शिक्षा का जो कुछ भारत में प्रबंध है, उसी से संतोष कर लेना चाहती हूँ |

            “बच्चे क्या चाहते हैं ? वे किस की आज्ञा अधिक मानते हैं ?

निस्संदेह वे मेरी ही आज्ञा मानते हैं, क्योंकि मैं उनकी माता हूँ | मैं उन्हें उनके पिता की अपेक्षा अधिक प्यार भी तो देती हूँ | हमारे पारस्परिक झगड़े में बच्चे मेरा ही साथ देते हैं |

            “तुम दोनों में कौन अधिक शिक्षित है ?

            “बेशक, मेरे पति अधिक शिक्षित हैं |

बच्चों की शिक्षा के विषय में, तुम दोनों में से, कौन अधिक समझ-बूझ रखता  है ?

निस्संदेह मेरे पति | परन्तु मेरी मातृ-भावना कहती है कि मैं उनकी अधिक रक्षा कर सकती हूँ |

क्या तुम्हारे पति का बच्चों पर कोई अधिकार नहीं ? पिछले 25 वर्षों से तुम उनके घर में रहती हो, उनके यश और नाम की सहभागिनी हो और उनकी दी हुई सुविधाओं का भी तुम लाभ उठा रही हो | यदि तुम बच्चों की माता हो, तो वह पिता   हैं | बच्चों को अपने निकट देखकर जो कुछ भी तुम्हें आनंद प्राप्त होता है, वह तुम्हारे पति के सहयोग और संयोग के द्वारा ही होता है | क्या तुम्हें कभी यह ध्यान नहीं आया कि तुम और तुम्हारे बच्चे तुम्हारे पति ही की देख-रेख और सुरक्षा में सुखपूर्वक जीवन बिता रहे हैं ? वह परिवार के पिता हैं, फिर भी अकेला जीवन व्यतीत करते हैं | और शायद यह कामना भी करते हों कि ऐसे जीवन से तो मृत्यु भली है |

मेरी इस बात का उसके दिल पर गहरा असर हुआ और बोली, मुझे खेद है कि मैंने कभी जीवन के इस पहलू पर ध्यान ही नहीं दिया | मैं अपने आप में इतनी मस्त रही कि मुझे यह कभी सूझा ही नहीं कि मेरे पति मेरे बच्चों के पिता भी हैं, और जबकि मैं उनके घर, आय और बच्चों के प्रति उनके प्रेम का लाभ उठा रही हूँ, उन्हें अपने प्रेम से, जिसके वह एकमात्र अधिकारी हैं, वंचित रख रही हूँ | बच्चो का प्रेम, जिस पर उनका भी अधिकार है, उन्हें उससे भी वंचित कर रही हूँ, और एक सुखी गृहस्थ, जिसका निर्माण मेरा कर्त्तव्य है, मैं उन्हें नहीं दे रही हूँ |

मुझे ख़ुशी है कि तुम अपने कर्तव्य को पहचान पाई हो | पति-पत्नी के सम्बन्ध इतनी निकटता, घनिष्टता और महत्त्व के होते हैं कि उनके एक-दूसरे के विरुद्ध कटू वचन सुनकर हैरानी होती है | जीवन के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण कार्य, उदाहरणार्थ, एक घर बसाना, आर्थिक स्तर का निर्माण करना, परिवार के हिताहित पर विचार करना, संतान को जन्म देना और पालन-पोषण करना  अदि, सभी बच्चों पर ही तो केन्द्रित होते हैं | तब, तुम्ही कहो, पति-पत्नी का अनमेल कैसे सहन किया जा सकता है ? और क्या वह परिवार को भंग करके बच्चों के भविष्य को खतरे में डाल सकते हैं ?

वह भद्र स्त्री, जिसने दो घंटे तक मेरे साथ बातचीत की, उसको कृतज्ञता के भाव का पता ही न था | वह सेवाएँ पाती रहती थी परन्तु उनके लिए अपने-आप को ऋणी नहीं बोध करती थी | पति के कारण वह कई प्रकार के सुख प्राप्त करती थी, किन्तु उनकी कोई अनुभूति उसे नहीं थी | घमंड के कारण अपने को बड़ा समझकर पति के उत्तम गुणों को देखने के अयोग्य थी | उसे घमंड था कि वह बहुत श्रेष्ठ है | इस घमंड ने उसकी अपने पति के सदगुणों के प्रति दृष्टि को धुंधला कर दिया | एक ओर जहाँ बूढी औरत के पति के प्रति कृतज्ञता के भाव ने उनके बुढापे को भी सरस बना दिया था,  वहां दूसरी ओर कृतज्ञता की अनुपस्थिति के कारण इस संपन्न जोड़े का दाम्पत्य जीवन पच्चीस में से तेईस वर्ष तक कड़वाहट से भरा रहा | हालांकि उनमे सरस जीवन की अधिक संभावना थी | और जब पत्नी में कृतज्ञता की भावना जागृत हुई, तो ये पति-पत्नी भी तेईस वर्ष के बाद एक बार फिर सुखी और मधुर जीवन बिताने लगे |

 

विवाहित जीवन की स्थिरता के लिए पारस्परिक-विश्वास बड़ा महत्वपूर्ण है | जहाँ पारस्परिक-विश्वास घर में स्वर्गीय-सुख का कारण बनता है वहां अविश्वास से अत्यंत दुःख और नरक पैदा होता है |

एक बार मुझे एक ऐसी घटना को जानने का अवसर मिला, जो मेरे हृदय पर अमिट छाप छोड़ गई | एक विचित्र मानसिक रोगी के उपचार और परिक्षण आदि के लिए एक होम्योपैथिक डाक्टर को बुलाया गया | मैं तब कालेज में था | वह होम्योपैथिक डाक्टर मेरे पड़ोस में ही रहता था | उसने मुझे साथ चलकर उस विचित्र रोगी का अध्ययन करने को कहा | हम दोनो वहां गए | हमारा मेज़बान एक अमीर आदमी था | उसकी पत्नी ने हमारा स्वागत किया और पड़ोस की एक औरत को बुलाकर डाक्टर को अपना दुःख बताने को कहा | उसने अपनी कथा इस प्रकार सुनाई

मेरा विवाह एक धनी परिवार के इकलौते लड़के से हुआ है | मेरा युवा पति मेरे साथ बड़ा विचित्र व्यवहार करता है | वह मुझे कहीं जाने नहीं देता | एक दफा मैं अपनी एक बहन के विवाह पर पड़ोस के गाँव में गई | ज्यों ही मैं वहां पहुँची मेरा पति भी वहां आ गया और हाथ जोड़कर मुझसे कुछ मिनट बात सुनने को कहा | मैं गई और हमने एकांत में कुछ बातें की | वह बड़े विनीत भाव से बोला, प्रिये, मेरे साथ घर चलो | यदि तुम ऐसा करने से इनकार करोगी, तो मैं आत्महत्या कर लूँगा | मैंने पूछा, तुम्हें क्या हो गया है ? वह बोला, जब तुम मुझसे दूर होती हो, तो मैं तुम्हें सुरक्षित नहीं समझता | मैंने फिर पूछा, क्या तुम्हें मेरे चरित्र के सम्बन्ध में कोई संदेह है ? उसने कहा, जब तुम मेरे निकट होती हो तो मैं तुम्हें परम-सती मानता हूँ | लेकिन जब तुम मुझसे दूर चली जाती हो, तो तुम्हारी पवित्रता और वफादारी के सम्बन्ध में अनेकानेक संदेह मुझे घेरने लगते हैं | मेरे डाक्टर मित्र ने पूछा, उसे ऐसे संदेह कब से होने   लगे ? उसने कहा, लगभग तीन-चार वर्ष से वह ऐसा करने लगा है | उसने अपनी नौकरी भी छोड़ दी | रात-दिन वह मेरे पास बैठा रहता है | यदि मैं संडासादि भी जाती हूँ, तो वह पहले अन्दर जाकर देखता है कि भीतर कोई है तो नहीं | तब वह मुझे अन्दर जाने देता है और जब तक मैं अन्दर रहूँ वह स्वयं दरवाज़े पर खड़ा रहता है | उसका वर्तमान व्यवहार अब असह्य हो गया है | वह मुझे अपनी चारपाई पर बैठाए रखता है, इतने पर भी उसके हाथ में एक छड़ी रहती है, जिससे वह चारपाई के नीचे टटोलता रहता है कि नीचे कोई छिपा तो नहीं है | सच तो यह है कि मेरे पति ने मेरा जीवन अत्यंत दुखमय बना दिया है | अन्य सभी बातों में वह मेरा बड़ा ध्यान रखता है, परन्तु इस मामले में वह पूर्णत: पागल है |

मेरे डाक्टर मित्र ने उसे दूसरे कमरे में जाने के लिए कहा और उसके पति को बुलाया | बड़ी ही सहानुभूति से डाक्टर ने उससे पूछा, सेठ साहब, क्या आप अपनी पत्नी के ऊपर शक़ करते हैं ? यदि ऐसा है तो आप उसे पीहर भेज कर दूसरा विवाह क्यों नहीं करवा लेते ? वह बोला, डाक्टर साहिब मुझे अपनी पत्नी पर पूरा भरोसा है, परन्तु मैं  नहीं जानता कि जब वह मेरी नज़रों से ओझल होती है, तो मुझे क्या हो जाता है और मैं क्यों उस पर शक़ करने लगता हूँ |

क्या यह अविश्वास तुम्हारे भीतर विवाह के समय से ही था ?

मेरी पत्नी तो इतनी अच्छी है कि वह सब सुखों की अधिकारिणी है | जब हमारा विवाह हुआ, मुझे उसमे पूर्ण विश्वास था | मैं उसकी प्रंशसा करने से सुख पाता था | फिर मेरे एक मित्र ने मुझे स्त्री चरित्र नामक एक पुस्तक दी | उस पुस्तक ने मेरे विचारों को बदल दिया | मैं प्रत्येक स्त्री पर, हाँ अपनी माता पर भी शक़ करने लगा | काश ! मैंने वह पुस्तक न पढी होती;  काश, ऐसी पुस्तकों पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाता; परन्तु मैं अब तो उस पुस्तक का शिकार हो चुका हूँ | मेरे व्यवहार से दुखी होकर जब मेरी पत्नी रो देती है तो मैं भी रोता हूँ | मेरी पत्नी ने सुन है कि आप मुझे ठीक कर सकते हैं | सचमुच यदि आप मुझ पर कृपा करेंगे तो मैं आजीवन आभारी रहूँगा | आज मैं पारस्परिक विश्वास रखने वालों को भाग्यवान समझता हूँ | अविश्वासियों पर मुझे दया आती है | निश्चय ही विवाहित जीवन के लिए पारस्परिक विश्वास अनिवार्य है |

मैं डाक्टर के साथ घर लौट आया | उसने रोगी का इलाज शुरू किया, परन्तु मुझे शक़ है कि वह उसे राज़ी कर पाया हो | इस दुखदायी स्थिति के अनुभव के बाद मैंने एक और दम्पत्ति की ऐसी ही करुण कहानी पढ़ी, जो उतनी ही दुखदायी है और विवाहित जीवन में पारस्परिक विश्वास की ज़रुरत को प्रकट करती है |

एक डाक्टर ने अपने जीवन की एक घटना लिखी थी, जोकि सच्ची कहानी के रूप में प्रकाशित हुई थी | उस डाक्टर का एक भली औरत के साथ प्रेम हो गया और बाद में उन्होंने सगाई कर ली | उसने जीवन का सिद्धांत बना लिया कि वह किसी पर-स्त्री के साथ अबतक के सम्बन्ध के बारे में अपनी पत्नी से कुछ न छिपाएगा | इस विवाह से पहले उसने एक रखैल को अपने घर रखा हुआ था और उससे यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि वह उसके साथ विवाह नहीं करेगा |

सगाई के दो-तीन मास बाद, जब वह उस स्त्री से सब सम्बन्ध तोड़ चुका था एक दिन मार्ग में वह उससे मिली | उसने बताया कि उसके गर्भ में डाक्टर का बच्चा है और उसे 21 वर्ष तक उसका पालन-पोषण करना होगा | वह समादृत व्यक्ति था | उसने बच्चे का पालन अपना कर्त्तव्य समझा;  क्योंकि वह उसका अपना बच्चा था, भले ही उसकी माता से उसका विवाह हुआ था या नहीं | अपनी इज़्ज़त बनाए रखने के लिए उसने निश्चय किया कि यदि उसकी मंगेतर उसके जीवन के इस अध्याय पर आपत्ति करेगी, तो वह सगाई तोड़ लेगा | अत: वह सीधा उसके पास गया और सब कुछ उसे कह सुनाया | वह उसे बहुत चाहती थी | उसने डाक्टर की सच्चाई की बहुत प्रशंसा की और भावी बच्चे को पालने का वचन भी दिया |

डाक्टर को ख़ुशी हुई | उसने अपनी रखैल को पूर्ण सहायता का विश्वास दिलाया, परन्तु समयानुसार उसका ख्याल ग़लत निकला | उसके गर्भ में बच्चा था ही नहीं, इसलिए डाक्टर अनेक कठिनाइयों से बच गया |

परन्तु अभी कुछ और संकट बाकी था | डाक्टर का विवाह सुख-शांतिपूर्वक हो गया | उसकी पत्नी ने पांच-छ: वर्ष के लिए अभी माता न बनाने की इच्छा प्रकट की और अपने पास अपने छोटे भाई को बुला लिया और अपने ही बच्चे की तरह प्यार से रखने लगी | यह युवक जब बड़ा हुआ, तो एक दुष्ट औरत के आकर्षण में फंस गया | उसे तब भी घर में बर्दाश्त किया गया, क्योंकि उसकी बहन, डाक्टर की पत्नी, उसे बहुत चाहती थी |

यह भाई एक दुर्घटना का शिकार होकर मर गया | वह औरत, जो उसकी रखैल समझी जाती थी, गर्भवती थी | वह जानती थी कि बच्चे का पिता तो मर चुका है, और यह भी चाहती थी कि कोई 21 वर्ष तक बालक का पालन-पोषण करता रहे | अत: उसे एक चाल सूझी | उसने अपने भावी बालक का पिता होने का इलज़ाम डाक्टर पर ही लगा दिया | उसने डाक्टर के सामने ऐसा कह भी दिया | डाक्टर को एकाएक बड़ा अचम्भा हुआ | वह जानता था कि उसका चरित्र समाज में प्रतिष्ठित है, और शायद कोई भी व्यक्ति उस दुष्ट औरत का विश्वास नहीं करेगा, तो भी उसे बहुत दुःख हुआ | इस दुःख से मुक्ति पाने के लिए वह सीधा अपनी पत्नी की पास गया और उसने अपने हृदय का दुःख उस पर प्रकट कर दिया | पति को धैर्य बंधाने और उसके प्रति विश्वास दिखाने की अपेक्षा वह उसके विरुद्ध हो गई, और बोली, तुम विवाह से पूर्व भी ऐसे गड्ढ़े में गिरे थे, परन्तु तुम्हारी इमानदारी के कारण मैंने तब तुम्हें क्षमा कर दिया था | अब फिर तुमने वही पाप किया है और इमानदारी से उसे स्वीकार करने की बजाये अपने अपराध को छिपाकर तुम जले पर नमक छिड़क रहे हो | मुझे तुम्हारा कोई विश्वास नहीं | लेकिन तुम डाक्टर हो और मैं तुम्हारी पत्नी होने के नाते तुम्हारी अपराध का भांडा नहीं फोडूंगी | अपने सामाजिक जीवन में हम वफादारी और प्रेम का आडम्बर बनाए रखेंगे, परन्तु निजी जीवन में आज से हम अपरिचितों के तरह रहेंगे | आज से हम पति-पत्नी नहीं हैं |

इक्कीस वर्ष तक डाक्टर उस बच्चे का पालन-पोषण करता रहा, और वे दोनों पति-पत्नी अजनबियों की तरह रहते रहे | इक्कीस वर्ष बाद डाक्टर की पत्नी को एक अस्पताल के सर्जन का तार मिला कि वह वहां एक रोगी को देखने आये, जो उससे मिलना चाहती है | वह वहां गई | रोगी वही दुष्ट औरत थी | मृत्यु से पूर्व वह अपने अपराध को स्वीकार कर लेना चाहती थी | उसने स्पष्ट ही उसे बता दिया कि वह बच्चा उसके भाई का था, डाक्टर का नहीं |

इस समाचार को सुनते ही वह पेड़ के पत्ते की तरह कांप गई | वह टूटे दिल वापिस आई और अपने पति से क्षमा मांगने लगी, परन्तु पति इस घटना से अति दुखित होकर बोला, अब तुम्हारा यह प्राश्चित किस काम का ? तुम्हारे अविश्वास ने मेरा जीवन भी उजाड़ा और तुम्हारा भी | पति-पत्नी के लिए पारस्परिक विश्वास कितना आवश्यक  है !

जहाँ यह दो दृष्टांत विवाहित जीवन के अंधकारमय अध्याय को प्रस्तुत करते हैं वहां ऐसे भी दृष्टांत हैं जो उसका सुन्दर पहलू दिखाते हैं | एक प्रसिद्द लेडी-डाक्टर ने एक बार मुझसे कहा, उस मूर्ख सावित्री को तो देखो | वह कहती है कि उसका पति कभी निंदा के योग्य नहीं, उसे उसमे पूर्ण विश्वास है | मैंने कहा, इसमें क्या कोई विलक्षण बात है ? मैं स्वयं अपनी पत्नी में शत प्रतिशत विश्वास रखता हूँ | लेडी डाक्टर बोली, स्त्री पूर्ण रूप से विश्वसनीय कहला सकती है, लेकिन पुरुष नहीं | मैंने उससे कहा, अच्छा, जिसके विश्वास से तुम्हें इतनी हैरानी हो रही है, मैं उस स्त्री से मिलूंगा |

मैं उस अच्छी स्त्री से मिला | वह मुश्किल से अभी 25 वर्ष की थी | मैंने उससे पूछा कि क्या वह सचमुच अपने पति में पूर्ण विश्वास रखती है | वह बोली, वह तो सोना है, मैं उस पर अविश्वास कर ही कैसे सकती हूँ ?

तुम्हें कैसे मालूम कि वह सोना ही है ?

मैं उसके जीवन से पहचान गई हूँ | उसे किसी भी अन्य औरत का कोई आकर्षण नहीं | सब औरतें, जो उसके सम्पर्क में आती हैं, मुझसे इसी बात पर इर्ष्या करने लगती हैं कि मुझे शत-प्रतिशत वफादार पति मिला है |

उसकी बातों से मैं बड़ा प्रभावित हुआ और मैंने उसके मन की ऐसी श्रेठ अवस्था पर उसे आशीर्वाद दिया | जहाँ पहले दो उदाहरण अविश्वास के दुखमय पक्ष को दिखाते हैं, वहां अन्तिम उदाहरण विश्वास की उपस्थिति का सुशोभित और सर्वोच्च रूप दिखाता  है | ऐसे अनेक और उदाहरण भी दिए जा सकते हैं |

पति-पत्नी की एक-दूसरे के प्रति वफादारी अत्यावश्यक है | वफादारी पारस्परिक भरोसे के योग्य बनने का दूसरा नाम है |

वफादारी के  अभाव में विवाहित  जीवन में अनेक दुखान्त घटनाएं देखी गई हैं | मैं एक औरत के जीवन की आपबीती सुनाता हूँ | वह अपनी ढलती आयु में अपने पति के प्रति बेवफा बन कर किसी अमीर व्यक्ति के साथ भाग गई थी | उसने स्वयं ही बताया कि उसका विवाह एक भले व्यक्ति के साथ हुआ था, जो उसका सहपाठी भी था और उसे बहुत प्यार करता था | शिक्षा समाप्त करते ही दोनों विवाह-बंधन में बंध गए और साथ साथ जीवन बिताने लगे | पति जीवन के प्रत्येक पहलू में उससे सलाह करता था | उनके तीन बच्चे हुए थे | एक लड़के और एक लडकी का विवाह भी हो चुका था | दोनों के यहाँ एक-एक बच्चा था |

जीवन के इस काल में एक धनवान व्यापारी उनके घर आया और महमान के तौर पर रहने लगा | इस अमीर व्यक्ति को उस शहर में अपने व्यापार के लिए एक भरोसे के योग्य एजेंट प्रतिनिधि की आवश्यकता थी | विश्वस्त एजेंट बनाए जाने के लिए उसी भले व्यक्ति की सिफारिश की गई थी | अमीर आदमी कुछ सप्ताह वहां रहा | भले आदमी की पत्नी ने विशेष महमान के तौर पर उसकी सेवा की | इस बीच उस औरत और अमीर व्यापारी ने परस्पर आकर्षण-सा महसूस किया | एक दिन वे दोनों घर से चले गए और फिर कभी न लौटे | मध्य आयु की इस स्त्री ने काम वासना के बुरे प्रभाव में आकर अपने नेक पति और अच्छे बच्चों का त्याग कर दिया और सारे घर को अस्त-व्यस्त करने का कारण बन गई |

लगभग एक वर्ष तक वह इस नए प्रेम के नशे में मस्त रही और अपने घर में पैदा की हुई तबाही का उसे ख्याल तक भी नहीं आया |  प्राय एक वर्ष बाद उसकी ममता ने उसके भीतर अपने बच्चों का प्रेम जगा दिया और उसने दो पत्र एक लड़के को तथा दूसरा लडकी को लिखे | पत्रों में प्रार्थना की गई थी कि वे उसकी बेवफाई को क्षमा करें और कम-से-कम उसे पत्र लिखने का अवसर दें | पुत्र ने उत्तर में कुछ इस प्रकार लिखा

प्रिय माता जी, कृपा कर के मुझे कभी कोई पत्र मत लिखें | मैं नहीं चाहता कि तुम्हारे जीवित होने का भी मुझे कभी विचार आये | जब मैं अपने पिता की ओर देखता हूँ, तो ऐसा महसूस करता हूँ कि तुमने निर्दयता से किसी भोले बालक के मुख पर ज़ोर से चपत मार दी है | मेरे पिता तुम्हारे हाथों ऐसा व्यवहार को पाने के अधिकारी नहीं   थे | जहाँ तक हम बच्चों का प्रश्न है, तुमने स्त्री मात्र की, यहाँ तक कि मेरी पत्नी की भी, पवित्रता और वफ़ादारी में मेरे विश्वास को खण्ड खण्ड कर दिया है | जानती हो, मेरे लिए इसका क्या अर्थ है ? अत: मैं प्रार्थना करता हूँ कि तुम हमारे अस्तित्व को ही भुला दो, और हम भी तुम्हें कभी याद नहीं करेंगे |

तीन वर्ष बाद इस औरत के पति की मृत्यु हो गई | स्थानीय पत्रों ने लिखा कि उसकी मृत्यु पत्नी के भाग जाने के ग़म में हुई | क्या बेवफ़ा पति या पत्नी पीछे छोड़े परिवार की तबाही और बरबादी का भी ध्यान करते हैं ?

उपरोक्त मूर्ख औरत अपने अन्त:करण को शायद इस विचार से सन्तोष देना चाहती हो कि अब क्योंकि वह अमीर आदमी से प्यार करने लगी है, इस लिए पति से उसका सम्बन्ध अपने-आप समाप्त हो गया है | परन्तु ऐसे मिथ्या विचार अपराध को सदगुण तो नहीं बना सकते |

तलाक का मार्ग खोल देने से गृहस्थ जीवन की वफादारी पर करारी चोट पहुंचती है | एक व्यक्ति सफलतापूर्वक इच्छानुसार दूसरे का त्याग कर सकता है यह विचार ही परिवार के लिए घातक है |

संसार में सब जगह वफादार पति-पत्नी मिलते ही हैं, यद्दपि उनकी संख्या बहुत कम है | वफादार पति-पत्नी जीवन की अन्तिम घडियों तक एक-दूसरे का साथ देते हैं और सेवा करते हैं | इंग्लैण्ड के महान प्रधान मन्त्री ग्लैडस्टन के सम्बन्ध में कहा जाता है कि जब वह 90 वर्ष के थे, कोई प्रमुख नागरिक उनसे मिलने गया | उसने उन्हें अपनी पतिव्रता और वफादार पत्नी के साथ हाथ में हाथ लिए कौच पर बैठे देखा | उस औरत ने न केवल उनके यौवन काल को ही सुखी बनाया था अपितु अब बुढ़ापे में वह और भी लगन के साथ उनके सन्तोष का कारण बनी हुई थी | जब ग्लैडस्टन की मृत्यु हुई, तो वह उनकी अर्थी के साथ, वेस्ट-मिनिस्टर एबे तक आई, जहाँ उन्हें दफनाया गया| कहते हैं कि राज्य-परिवार के सभी पुरुषों ने घुटने टेक-टेक कर उसकी पत्नी के हाथों को चूमा | राज्य-परिवार के बाद राज्य के सरदारों, कुलीन लोगों और लार्ड्स तथा अन्य उच्च श्रेणी के व्यक्तियों ने बारी-बारी से उसे सन्मान दिया, क्योंकि उस महान नारी ने पति-सेवा और वफादारी का अद्वितीय उदाहरण स्थापित किया था | एक प्रमुख पत्रिका ने लिखा था, वह विधवा की तरह आई, परन्तु दुल्हन की तरह लौटी | एबे में उसे इतना अधिक सत्कार मिला |

विवाहित जीवन में वफादारी का आधार यह है कि विवाहित-जीवन एक जीवन-भर का नाता है | इस नाते में वफादारी उतनी ही अनिवार्य है जितना जीवन के लिए सांस लेना | यह कोई व्यापारिक समझौता नहीं | माता अपने बालक को केवल अपना बालक समझकर ही प्यार करती है | उसके सौन्दर्य, योग्यता अथवा परिवार के लिए कमाई आदि करने की सामर्थ्य उसके प्यार की कसौटी नहीं होते | मैंने ऐसी माताएं देखी हैं जो अपने दुर्बल और मूर्ख बच्चों को अधिक प्यार करती हैं और स्वस्थ् बच्चों की अपेक्षा उनके साथ रहती हैं | इसी प्रकार एक पत्नी अपने पति को इसलिए प्यार करती है कि वह उसका पति है न कि इसलिए कि वह धनाढ्य और योग्य है | इसी प्रकार, कुछेक दशाओं में मैंने ऐसे पति भी देखे हैं जो अपनी सरल, सांवली और अशिक्षित पत्नियों को केवल इसलिए प्रेम करते हैं कि वे उनकी पत्नियाँ हैं |

मैंने एक मूर्ख की पत्नी की कहानी पढ़ी | एक धनवान के दो बेटे थे एक स्वस्थ और सामान्य था, दूसरा मूर्ख था | बहुत धनी होने के कारण उसके मूर्ख बेटे को भी स्वस्थ और समझदार पत्नी मिल गई | उसका प्रेम और वफादारी से भरा हृदय अपने मूर्ख पति पर भी इतना रीझ गया कि मूर्ख पति की सेवा ही उसने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया |

उसके ससुर की मृत्यु हो गई | स्वभावत: ही बड़ा पुत्र परिवार के व्यापार का प्रबन्धक बना | एक दिन वह मूर्ख पति रोता हुआ अपनी पत्नी के पास आया | और शिकायत की कि खजाँची ने उसे जेब-खर्च के लिए धन देने से इन्कार कर दिया है | पति-परायणा क्रोध से भर गई | उसने हाथ में एक चाबुक लिया और अपने पति को साथ लेकर आफ़िस में आ धमकी | उसने खजाँची से पूछा कि उसने अपने मालिकअर्थात उसके पतिको धन देने से इन्कार क्यों किया | खजाँची ने बताया, यह सेठ साहिब का हुक्म है | उस स्त्री का क्रोध और भड़का | वह बोली, क्या मेरा पति सेठ नहीं है ? ऐसा कहते हुए उसने उसे ख़ूब पीटा और अपने मूर्ख पति से बक्स खोल कर जितना आवश्यकता हो, उतना धन ले लेने को कहा | जब बड़े भाई ने यह सुना तो वह उस पर बहुत बिगड़ा | वह स्त्री फिर भी नहीं दबी और ग़रजकर बोली, क्या मेरा पति तुम्हारा भाई नहीं है और क्या आधी संपत्ति पर उसका अधिकार नहीं है ? नहीं, उत्तर मिला | अदालत में जाकर मांग करो | वह बोली, जब तक मैं जीवित हूँ किसी की हिम्मत नहीं कि वह मेरे पति का भाग हड़प जाए | ऐसा कह कर वह अपने पति के अधिकारों के लिए लड़ने का निश्चय कर घर आई | उसने उच्च-श्रेणी के वकीलों की सेवाएं प्राप्त कीं और कई वर्षों तक केस लड़ने के बाद उसी की जीत हुई | जब तक उसका पति जीवित रहा, वह उसके और केवल उसी के लिए जीवित रही | यह घटना एक बलवान नारी की अपने मूर्ख पति के प्रति आश्चर्यजनक वफादारी का सजीव उदाहरण है | वह अपने पति के लिए सबसे बड़ा सहारा और सबसे बड़ी ढारस बनकर रही |

यदि पति-पत्नी माता-पिता के रूप में एक शांतिमय और गौरवपूर्ण घर बनाना चाहते हैं तो प्रत्येक पति को अपनी पत्नी को और प्रत्येक पत्नी को अपने पति को अपने दैनिक व्यवहारिक जीवन में सन्मान देना चाहिए |

विवाह का सम्बन्ध एक बहुत घनिष्ट सम्बन्ध है, और क्योंकि विवाहित जोड़े को सदा एक-दूसरे के साथ रहना तथा एक- दूसरे के लिए जीना होता है, इसलिए इस घनिष्ट मेल-जोल में एक-दूसरे को घृणा करने का डर बना रहता है | विवाह के कुछ समय बाद प्राय: वह एक-दूसरे को कटु-वचन भी कहने लगते हैं और धैर्यहीन पति क्रोध में आकर अपनी पत्नियों को मार भी बैठते हैं | पति-पत्नी में इस प्रकार कटु-वचनों का प्रयोग तथा मार-पीट से बढ़कर जीवन में और कोई भूल नहीं हो सकती |

एक बार मैं अपने घर से रेलवे-स्टेशन को जा रहा था कि मार्ग में एक गली में बड़ा भीषण दृश्य देखने में आया | दो नवयुवक एक बूढ़े को मार रहे थे | मैं भागकर वहां पहुंचा और मेरे रौंगटे खड़े हो गए जब मुझे यह पता चला कि उन नवयुवकों के द्वारा धरती पर गिराया गया वह बूढा उनका अपना बाप था | मुझे देखकर उन नवयुवकों ने अपने पिता को छोड़ दिया और मैंने उसे उठाकर खड़ा किया | मैं उसी गली में उसके घर गया और उसकी पत्नी से मिला | मैंने उस औरत से पूछा, यह झगड़ा किस कारण  हुआ ? क्या तुम्हें मालूम था कि तुम्हारे पति को तुम्हारे ही बेटे मार रहे थे ? उसने उत्तर में कहा, जो कुछ हुआ, उसका मुझे खेद है | लेकिन आप जानते हैं कि बेटा, अपने बाप द्वारा भी, माँ को पिटते नहीं देख सकता | मेरा पति किसी घरेलू कारण से मुझसे नाराज़ था | मेरे विरोध करने पर उसने मुझे ज़ोर की ठोकर मार दी | मेरे बेटे इसे बरदाश्त नहीं कर सके, और बाप-बेटों का यह झगड़ा मुझे लगाईं गई ठोकर के कारण ही हुआ | क्योंकि मुझे गाड़ी पकड़नी थी, इसलिए मुझे वहां से जाना पड़ा | परन्तु अपने स्थान पर पहुँचने तक का सारा रास्ता बाप का बेटों के द्वारा पिटने का यह दृश्य मुझे पीड़ित करता रहा | इस बात का मुझे भी बहुत दुःख हुआ कि पति ने पत्नी को पीटा | और इतने पर भी मुझे बताया गया कि पति अपनी पत्नी के पीछे दीवाना था | हर समय अपनी पत्नी के निकट रहने की इच्छा से ही उसने नौकरी छोड़ दी थी | सम्भवत: वह उससे प्रेम करता होगा, परन्तु मुझे विश्वास है कि उसका आदर तो नहीं करता था |

कई वर्ष बाद एक उच्च अधिकारी ने मुझसे निति-शिक्षा के सम्बन्ध में, जो मैं कालेज में दिया करता हूँ, स्पष्ट कहा, लड़कियों को अपने पति से प्रेम करना बताना चाहिए, लेकिन उससे भी अधिक पति का सन्मान करना सिखाना आवश्यक है | एक- दूसरे को सन्मान की दृष्टि से देखने से वे एक-दूसरे को कठोर और अपमानजनक शब्द न कहेंगे और आपस में मार-पीट तो उनके लिए निश्चय ही असंभव हो जाएगी | मैं हमेशा अपनी पत्नी से यही कहता हूँ, मुझे प्रेम भले ही कम करो, लेकिन मेरा सन्मान अवश्य करो |

मुझे एक शिक्षाप्रद घटना का निजी अनुभव है | एक बहुत पढ़ा-लिखा पति जो अपनी पत्नी को चाहता तो ख़ूब था, परन्तु उसका आदर कम करता था, एकबार आफ़िस जाने से पूर्व उससे नाराज़ हो गया | उसने अपमान-जनक भाषा का प्रयोग किया जिससे उसकी पत्नी की आँखों में आंसू आ गए | उसके पांच वर्ष के बालक ने इस खेदपूर्ण झगड़े को देखा और चिंतापूर्वक अपनी माता को आंसू पोंछते देखता रहा | पति आफ़िस से  लौटा | जब भी वह घर लौटता, सबसे पहले बालक को गोद में लेकर चूमता | उस दिन भी वह बालक को गले लगाने लगा | बच्चा चिल्लाया, मुझे मत छुओ ! तुमने मेरी माँ  को डांटा है और वह बहुत रोई है | मैं तुम्हारे पास नहीं आता |

उस बालक के पिता ने मुझे बताया कि किसी महात्मा के उपदेशों से भी शायद उस पर इतना प्रभाव न पड़ता, जितना उस भोले बालक के निर्दोष शब्दों से पड़ा | उस दिन से मैं अपनी पत्नी से कभी कठोर वचन नहीं बोला | तबसे मुझे इस आदेश अपने साथी को प्यार भले कम करो, उसको सन्मान अधिक दो का वास्तविक मूल्य समझ पड़ा |

विवाहित-जीवन की बहुत-सी दुर्घटनाएं इसलिए होती हैं कि पति-पत्नी यह समझते हैं कि विवाह में केवल प्रेम ही चाहिए, चाहे परस्पर सन्मान हो या न हो | कुछ जोड़े तो यह मानते हैं कि गृहस्थी में केवल प्रेम ही ज़रूरी है | पारस्परिक सन्मान को तो वह बनावटी और स्नेहरहित कहते हैं | मैं उनसे सहमत नहीं | पारस्परिक सन्मान प्रेम का विरोधी भाव नहीं है, बलिक इससे तो प्रेम शुद्ध और मज़बूत बनता है |

मुझे एक छात्रा की घटना याद है, जिसे उसकी माता मेरे कालेज में दाखिल करवाने आई थी | यह कोई असाधारण बात नहीं थी | परन्तु मुझे हैरानी तब हुई जब कुछ दिन पश्चात मुझे उस लड़की के पिता की ओर से एक रजिस्टर्ड पत्र मिला, जिसमे उसने मुझसे प्रार्थना की थी कि मैं लड़की को बी.ए. कर लेने के लिए प्रेरित करूं और वह लड़की की शिक्षा के प्रति अपनी गहरी रूचि दिखलाने के हेतु उसके नाम पर दस हज़ार रुपया जमा करवाने को भी तैयार था |

मैंने लड़की को बुलाया और वह पत्र उसे पढ़ने को दिया | वह चिल्ला उठी, मैं उसके धन की एक पाई भी नहीं छूना चाहती | मैं अपनी माता के आश्रय में रहती हूँ और उसकी आश्रित बनी रहूँगी | मेरे माता और पिता एक-दूसरे से जुदा रहते हैं और मैंने अपना चुनाव कर लिया है | मैं माँ के साथ रहूगी | एकाएक लड़की के द्वारा अपने पिता का तिरस्कार देखकर मैं हैरान रह गया | उन दोनों में भी झगड़े का कारण पत्नी के प्रति पति में सन्मान का अभाव था |

एक दिन, एक बड़ा शिक्षक मुझे मिलने आया | वह एक युवक के सम्बन्ध में मेरे पास आया था | वह युवक एक स्कूल का हैड-मास्टर था और हमारे कालेज में पढाता भी था | शिक्षक ने मुझसे प्रार्थना की कि मैं उस युवक के दूसरे विवाह का विरोध न करूं | मैं दो विवाहों की अनुमति क्योंकर दे सकता हूँ ? मैंने उस शिक्षक को उत्तर दिया |

उस पर जो कथा मुझे बताई गई, वह मेरे प्रस्तुत विषय से सम्बंधित है | वह युवक जितना अधिक शिक्षित था, उतना ही सुन्दर भी था | उसका विवाह भी एक सुन्दर कन्या से हुआ था | अपने पारस्परिक सम्बन्ध में मेल-जोल स्थापित करने से पूर्व ही एक दिन वे आपस में झगड़ पड़े और एक-दूसरे को कठोर वचन कहने लगे | पति यौवन के नशे में धीरज खो बैठा और उसने पत्नी के मुंह पर एक ज़ोर का थप्पड़ मार दिया | पत्नी अपमान से चिल्ला उठी और हमेशा के लिए उसका घर छोड़कर चली गई | पति ने कई बार क्षमा माँगी | मित्रों ने लड़की को समझाया और दम्पति के जीवन में मेल स्थापित करने की कोशिश की | कथा की सपाप्ति पर वह शिक्षक बोला, अब इस युवक का क्या दोष ? वह उसे बहुत चाहता है, परन्तु लड़की कहती है कि उसके अपमान का अब कोई इलाज ही नहीं | यह अति की घटना है | विश्व में ऐसे क्रोधी प्राणी कम ही होते हैं, परन्तु होते ज़रूर हैं | प्रत्येक पति-पत्नी का कर्त्तव्य है कि वे पारस्परिक प्रेम के साथ परस्पर सम्मान भी करें |

युवा जोड़ों के प्रति मेरा यह स्थाई संकेत है कि जब वे माता-पिता बनते हैं तो एक-दूसरे के प्रति उनका व्यवहार सन्मानपूर्ण होना चाहिए | मैंने ऐसे कई दुखान्त दृश्य देखे हैं, जहाँ माता-पिता के पारस्परिक असम्मान ने बच्चों के जीवन को अन्धकारमय बना दिया | मैं एक ऐसे परिवार को जानता हूँ कि जहाँ पति-पत्नी ने केवल मतभेद के कारण अपने घर को उजाड़ दिया | इनके दो बेटे थे | एक पुत्र जो माता के साथ रहता था, पिता का प्यार भी पाना चाहता था | वह अपने पिता के पास गया ताकि अपने माता-पिता में शान्ति और मेल करवा सके | पिता उससे रूखेपन से पेश आया और कहते हैं कि उसकी मां के सम्बन्ध में बुरा-भला भी कहा | लड़के को बड़ा दुःख हुआ और वह अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठा | बहुत देर तक वह मानसिक चिकित्सालय में रहा | माता के दुःख का अनुमान ही किया जा सकता है | उसने दीनतापूर्वक अपने पति से प्रार्थना की कि हम आपस के अनमेल को समाप्त कर दें और बच्चों को एक शान्त और सुखी घर प्रदान करें | परन्तु पति न पिघला और उनका घर बर्बाद हो गया | जहाँ तक मैं उस स्थिति को पहचान सका, मेरा विश्वास है कि वह सब पारस्परिक सम्मान के अभाव के ही कारण था | परिणाम यह हुआ कि वह दोनों सदा के लिए एक-दूसरे से जुदा हो गए और बच्चों का जीवन भी बरवाद हो गया | माता-पिता से मेरी प्रार्थना है कि अपने बच्चों और सुखी गृहस्थ की नींव के लिए अपने संबंधों में पारस्परिक सन्मान को बनाएं |

विवाहित जीवन का मुख्य कार्य संतान की उत्पत्ति और विकास है | माता-पिता को यह नहीं भूलना चाहिए कि बच्चों की विरासत में उनका बड़ा हाथ है; और उनका परस्पर व्यवहार बच्चों के लिए एक वातावरण उत्पन्न करता है |

बच्चे अपने माता-पिता को अपना आदर्श समझते हैं | अपने अच्छे माता-पिता पर वे गर्व करते और बुरे माता-पिता पर लज्जित होते हैं | अत: माता-पिता को कभी भी न भूलना चाहिए कि बच्चे उनके जीवन को अनुकरणीय-आदर्श समझते हैं |

कुछ वर्ष पूर्व जब मैं बम्बई की सिन्धी-धर्मशाला में ठहरा हुआ था, मैंने सात वर्ष के एक लड़के को सिगरेट पीते हुए देखा | मैंने लड़के से सिगरेट छीन ली और उसे   डांटा | जब मैं अपने काम पर निकला तो देखा कि वही बालक अपने पिता के साथ खड़ा था | उसका पिता अत्याधिक सिगरेट पीने वाला दिखता था | मैंने उससे कहा, मेरे दोस्त, तुम्हें सिगरेट पीना छोड़ देना चाहिए, अपने भले के लिए नहीं तो कम-से-कम इस पास खड़े बच्चे के भले के लिए ही सही | लड़के अपने माता-पिता का ही तो अनुकरण करते हैं | पिता के उत्तर से मुझे हैरानी हुई | वह बोला, क्षमा कीजियेगा, मैं सिगरेट छोड़ देने में समर्थ नहीं, परन्तु यह लड़का कभी मेरी नक़ल करने की हिम्मत नहीं कर सकता | मैं हंस पड़ा और बोला, अभी लड़के के तुम्हारे पास पहुँचने के कुछ देर पहले मैंने उसे धुम्रपान करते देखा था | मैंने स्वयं उसके मुँह से सिगरेट छीनी थी | पिता ने ज़ोर से पुत्र के मुंह पर एक थप्पड़ मार दिया और कहा, बच्चों के लिए सिगरेट ज़हर  है | मेरी अवस्था के होने तक प्रतीक्षा करो | यह पिता अन्य अनेक पिताओं की तरह, जो अपने बच्चे के लिए नशाखोरी, बेईमानी और नीच-जीवन का बुरा उदाहरण पेश करते हैं, ठीक मार्ग पर चलने में असमर्थ था |

एक बार एक डबल ग्रेजुएट युवक किसी बी.ए. बी.टी. लड़की का प्रेम प्राप्त करने में सफल हो गया | वह उससे विवाह कर लेना चाहता था | वह लड़की को बहुत प्यार करता था, हर प्रकार से उसकी प्रशंसा करता, परन्तु शायद वह विवाह को बहुत दूर तक टालता चला गया | कई महीनों बाद हम फिर मिले | मैंने उस लड़की के साथ विवाह के बारे में उससे पूछा | मुझे हैरानी हुई जब उसने मुझे यह बताया कि उसने उस लड़की के साथ विवाह का विचार छोड़ दिया है | हमारे बीच निम्न चर्चा हुई :-

तुमने उस लड़की से विवाह का विचार क्यों छोड़ दिया ?

मुझे पता चला कि लड़की का पिता किसी रखैल के साथ जुदा मकान में रहता  है | यद्यपि वह अपनी पहली पत्नी और बच्चों के साथ ही रहता है, खाता-पिता और समय बिताता है, तो भी रात में वह उस पर-स्त्री के पास चला जाता है | मैं ऐसे गिरे हुए व्यक्ति का जमाई बनना नहीं चाहता |

क्या वह अपने बच्चों से प्यार करता और उनका ख्याल रखता है ?

जी हाँ, वह अपने बच्चों से प्यार करता है और अपनी पत्नी का बहुत ख्याल रखता है |

क्या वह अपनी पत्नी और बच्चों को उस स्त्री के साथ मेल-जोल रखने पर मजबूर करता है ?

नहीं |

तो उसकी लड़की से विवाह करके इस शहर से दूर अपने शहर में रहने में तुम्हें क्या आपत्ति है ?

विवाह होगा तो बच्चे भी होंगे | मैं नहीं चाहता कि मेरे बच्चों को पता चले कि उनका नाना एक चरित्र-हीन व्यक्ति था | मनुष्य अच्छाई के अपेक्षा बुराई का अनुकरण शीघ्र करता है| मैं अपने परिवार में बुराई फैलने के जोखम को भी नहीं उठाना चाहता |

युवक ने आखिर उस लड़की से विवाह नहीं किया | लड़की को इस इनकार का कारण मालूम था | अत: कहना चाहिए कि बुरे पिता ने अपने बुरे चरित्र से अपनी लड़की को सुयोग्य वर से वंचित कर दिया |

मेरे देखने में एक और भी ऐसा व्यक्ति आया है, जो अनेक बच्चों का बाप होते हुए भी बुरे जीवन की ओर खिंच रहा था | यद्यपि उसकी पहली पत्नी जीवित थी और उससे कई बच्चे भी थे, तो भी वह किसी अन्य औरत के प्रेम में पड़ गया और उसके लिए जुदा मकानादि लेकर वहीँ गृहस्थी बसा बैठा | इस प्रकार उसकी दो गृहस्थियां थींएक उसकी पहली और विवाहित पत्नी के साथ और दूसरी अन्य स्त्री के साथ | एक दिन विचित्र बात हुई | उसका एक लड़का, जो विवाहित था, किसी अन्य सुन्दर कन्या के साथ प्रेम करने लगा | वह कन्या अपनी माता व बहनों के साथ रहती थी | उसके बाप ने भी पहली पत्नी, अर्थात लड़की की माँ को छोड़ रखा था | अत: कहा जा सकता है कि इस लड़के-लड़की के लिए अपने-अपने घरों में गिरावट के दृष्टांत मौजूद था जिनका उन्होंने अनुकरण किया और अपना जीवन पतित किया |

एक दिन सरहद के एक नगर में बड़ी सनसनाहट छा गई जब यह ख़बर फ़ैली कि एक राय बहादुर की लड़की भागकर वैश्यालय में रहने लगी है | जब एक भद्र जन उसे समझाने गया कि अपने सन्मानित परिवार की इज़्ज़त के लिए उसे घर लौट जाना चाहिए, तो वह फूट फूट कर रों पड़ी और बोली, मेरे बाप के घर की इज़्ज़त उस समय कहाँ चली जाती है जब वह वेश्याओं को घर में नचाने के लिए बुलाता है और उन भ्रष्ट औरतों के साथ ऐसा व्यवहार करता है जैसे कि घर में उसके प्रेम की भूखी औरतों की अपेक्षा वेश्याएं अधिक इज़्ज़त की पात्र हों | मैंने यह सब देखा और इस नतीजे पर पहुँची कि पुरुषों से आदर पाने के लिए लड़की को पिंजरे के पक्षी की तरह घर की चारदीवारी में रहने की अपेक्षा वेश्यालय में रहना अधिक कार्य-सिद्ध है | इसलिए मैंने इस प्रकार के जीवन को अपना लिया जिसे मेरे पिता भी आवश्यकता से अधिक आदर देते हैं | अत: राय बहादुर की वह लड़की सारी उम्र वेश्या ही बनी रही | प्राय: माता-पिता यह महसूस ही नहीं करते कि अपने बच्चों के लिए वह ही आदर्श हैं और उनके जीवन का बुरा दृष्टांत बच्चों के जीवन के लिए घातक हो सकता है | इसलिए माता-पिता को अपने दैनिक जीवन में बड़ी सावधानी से रहना और जीना चाहिए |

उन दिनों मैं कालेज में था जब कि हमारे यहाँ के तहसीलदार के युवक पुत्र ने एम्.ए. एल.एल.बी. की परीक्षाएं पास कीं और हाईकोर्ट में प्रैक्टिस के लिए सनद प्राप्त कर ली | उसका बाप बदनाम रिश्वतखोर था और उसी रिश्वत से उसने पर्याप्त धन इक्कठा कर लिया था | एक दिन किसी दूर के कस्बे में मैं तहसीलदार के कैम्प में उससे मिलने  गया | वार्तालाप के दौरान वह कहने लगा, बेटे, मैं अपनी माता के आशीर्वादों का फल पा रहा हूँ | वह कहा करती थी कि मेरी जेब सदा सोने की मोहरों से भरी रहा करेगी | ऐसा कहकर उसने अपनी जेब से बटुआ निकाला और उसे बाएँ हाथ पर उलट दिया | उसके बटुए में से बहुत सी मोहरें निकल पड़ीं | मैं जानता था कि वह बुरे चरित्र का व्यक्ति है | मुझे उसके जीवन पर दया आती थी | वह छ: महीने तक रिटायर होने वाला था | इसलिए शायद उसने पैसा इक्कठा करने के लिए ज़ोर-शोर से रिश्वत लेना शुरू कर दिया | सरकारी अधिकारी जो उसे रंगे हाथों पकड़ने की फ़िराक में थे, आखिरकार सफल हुए | उसे नौकरी से हटा दिया गया और क़ैद कर लिया गया | उसके विरुद्ध मुक़द्दमा  चला | उसने हज़ारों खर्च किए | उसका लड़का बराबर उसका पक्ष लेता रहा | परिणाम यह हुआ कि उसका अपराध प्रमाणित हो गया और उसपर भारी जुर्माना किया गया | लड़का भी जो अपने पिता के पद-चिन्हों पर चल रहा था, पकड़ में आ गया और उस पर व्यवसायिक अनाचार का दोष लगाकर उसकी सनद छीन ली गई |

ऐसे भी बच्चे होते हैं, जो अपने माता-पिता को देवता समान पूजते हैं | मैंने एक बार समाचार पत्र में पढ़ा कि किसी कैप्टेन ने विख्यात प्रधान-मंत्री लार्ड ग्लैडस्टोन की घरेलू पवित्रता पर उंगली उठाने की हिम्मत की और उसके विरुद्ध कुछ लिखा | प्रधान- मंत्री के पुत्र लार्ड ग्लैडस्टोन ने उस कैप्टन पर मुकद्दमा चला दिया | कैप्टन को तब होश आया जब उसे पता लगा कि उसके पास अपने पक्ष में कोई प्रमाण नहीं, और वह अपराधी ठहराया जा सकता है | वह जज के पास यह प्रार्थना लेकर पहुंचा कि लार्ड ग्लैडस्टोन से उसे क्षमा दिलवा दी जाए | लार्ड ग्लैडस्टोन ने कहा, नहीं, श्रीमान जी, मैं इस आदमी को कभी क्षमा नहीं कर सकता | इसने मेरे श्रद्धेय-पिता का अपमान किया  है | मैं गर्व से कह सकता हूँ कि मेरे माता-पिता के सम्बन्ध अति-श्रेष्ठ थे | सचमुच चरित्रवान माता-पिता ही चरित्रवान संतान को जन्म दे सकते हैं, जिनहे अपनी बारी में अपने माता-पिता पर गर्व होता है |

एक दिन सिन्धु नदी के तट पर खड़े मुझे एक व्यक्ति ने बताया कि जहाँ मैं खड़ा था, वहां एक बड़ी दुखान्त घटना हो चुकी है | किसी युवक ने वहां डूब कर आत्म-हत्या कर ली थी | मैंने उससे पूछा, युवक ने अपने मूल्यवान जीवन का अन्त क्यों किया ? उस व्यक्ति ने मुझे बताया कि यह दुखान्त घटना लड़के की माता के कारण हुई जो अपना घर छोड़कर किसी अमीर के साथ रहने लगी थी | लड़के ने अपनी माता से प्रार्थना की कि वह बुरे जीवन को छोड़ दे, इससे उसे लज्जा का सामना करना पड़ता है | परन्तु माता ने इस चरित्र-हीन जीवन को त्यागने से इनकार कर दिया | लड़के को बहुत दु:ख हुआ और उसने आत्म-हत्या में शान्ति पाई |

निश्चय ही माता-पिता के लिए सतीत्व और पवित्र जीवन बिताना बड़ा आवश्यक  है | एक अंग्रेज़ी पत्रिका स्ट्रैंड मैगज़ीन (Strand Magazine) में एक बार मैंने एक किशोर की कहानी पढ़ी थी, जिसने अपने-आप को गोली से मार डाला, जब उसे यह पता चला कि उसकी मां उसके गर्भ में होने के समय उसके पिता की विवाहिता पत्नी न थी | उसके पिता ने युद्ध के पश्चात आकर उससे शादी करनी थी, परन्तु वह युद्ध में मारे गए | लड़के ने अपनेआप को साथियों में इतना तुच्छ अनुभव किया कि उसने मृत्यु में ही शान्ति ढूँढी |

एक दिन मैं सरहद के नगर में गया | वहां मेरे कुछ सम्बन्धी भी रहते थे | उसी शाम को मैं उन सम्बन्धियों से मिलने निकला | मैंने वहां बड़ा विचित्र दृश्य देखा | मेरे दोनों रिश्तेदार जो व्यापारी थे, अपनी बहन के पति को, जो नौकरी आदि के लिए उन्हीं का आश्रित था, बड़े कठोर वचन बोल रहे थे | बहनोई को उनका यह व्यवहार सम्भवत: अपमानजनक महसूस हुआ, इसलिए उसने नौकरी छोड़ देने की धमकी दी | वह दोनों व्यापारी रिश्तेदार गरजकर बोले, तुम हम पर आश्रित हो, हम तुम्हारे सहारे नहीं हैं | अपमानित बहनोई भी उत्तर में चिल्लाया, मैं तुम्हारे सहारे जीने की अपेक्षा मर जाना अधिक पसंद करूंगा | ऐसा कहकर उसने अपनी वस्तुएं संभाली और उस बड़े कार्यालय को छोड़ कर चल दिया |

ज्यों ही वह कार्यालय छोड़ कर बाहर आया, मैंने एक 22 वर्ष की लड़की की पुकार सुनी, कृप्या ठहरिये, मैं भी आपके साथ आती हूँ | लड़की की मां यह सुनकर स्तब्ध-सी रह गई | और बोली, बेटी यदि तुम उसके साथ जाओगी तो सिवाए भूखों मरने के तुम्हारे कुछ हाथ आने का नहीं | यदि तुम यहीं ठहरोगी तो तुम्हारे प्रति उसका प्यार, उसकी ग़रीबी और बेकारी शायद उसे वापिस आने को मजबूर कर दे | लड़की का उत्तर भी विचित्र था | वह बोली, मां, मैं ज़िन्दगी के साथ जुआ नहीं खेलना चाहती | तुमने मुझे उसके सुपुर्द किया था | वह मेरा पति है | जहाँ वह जाता है, मैं भी जाऊंगी | यदि वह ग़रीबी में रहता है, तो मैं उसे धैर्य बंधाऊँगी और यदि वह जीवन में सफल हो जाता है, तो मैं उसके प्रेम और सम्मान की भागी बनूँगी | अत: मुझे मत रोको, मैं उसी के साथ जाऊंगी | ऐसा कहते हुए वह सीढ़ियाँ उतर गई और अपने निकम्मे समझे जाने वाले पति के साथ हो ली |

लड़की के भाई और माता लड़की के इस प्रकार जुदा होने पर आंसू बहाने लगे और मुझसे बोले, क्या इस लड़की ने ऐसा करके मूर्खता का प्रमाण नहीं दिया ? मैंने कहा, उसने ऐसा करके बहुत बड़ी समझदारी का क़दम उठाया है | विवाह-बन्धन में बंधी दो आत्माओं को हित-अहित, दुःख-तकलीफों, अमीरी-ग़रीबी अथवा रोग या स्वास्थ में एक-दूसरे का साथ देना ही चाहिए |

दो वर्ष बाद मैं उस परिवार से फिर मिला | माता और भाइयों से उस बहिन के सम्बन्ध में पूछा | वे उत्साह से बोले, उसने अपने पति को महात्मा बना दिया है | पुरोहित के रूप में उसने बड़ा नाम पाया है और उसने हमारे परिवार की, जो उसे निकम्मा समझता था, बड़ी इज़्ज़त बढ़ा दी है |

जब मैं उस युवक से मिला तो मैंने उसकी सफलता पर ख़ुशी प्रकट की | वह बोला, मैं अपनी पत्नी को धन्यवाद देता हूँ जिसने मुझे मनुष्य बना दिया | यदि वह उस समय मेरा साथ न देती तो मैं बरबाद हो जाता | उसके उस ठीक क़दम ने मुझे एक नया व्यक्ति बना दिया है |

मैं एक विवाहित जोड़े से मिला | दोनों पति-पत्नी मेरे विद्यार्थी रह चुके थे | यह देख कर मुझे हैरानी हुई कि पति जब भी अपनी पत्नी की बात करता, कहता, वह तो देवी है | उसने मेरा जीवन मेरे लिए संभव बना दिया है | मैंने उससे पूछा कि उसकी पत्नी के व्यवहार में किस चीज़ ने उसे इतना अधिक प्रभावित किया है ? वह बोला, वह मेरे लिए जीती है | कठिनतम परिस्थितियों में भी उसने मेरा साथ दिया है | उसे कभी यह शिकायत नहीं हुई कि मेरा वेतन कम है या मैं असाधारण रूप से ईमानदार हूँ | मेरे थोड़े से वेतन में ही वह मेरे जीवन को हर संभव सुख पहुंचाने का प्रयत्न करती है | वह कभी मंहगे आभूषण आदि की मांग नहीं करती | वह कभी मेरी ग़रीबी से बचने के लिए अपने धनवान पिता के घर जाकर रहना पसंद नहीं करती | वह हमेशा यही कहती     है, मेरा स्थान तुम्हारे साथ है | यदि तुम बादशाह बन जाओगे, तो मैं तुम्हारी   मलिका बनूंगी; यदि तुम फ़कीर होगे, तो मैं भी साथी-फ़कीर होने में ही गर्व का अनुभव करूंगी | मैंने इस दम्पति के सुखी-जीवन को स्वयं देखा है और मैं दावे से कह सकता हूँ कि इस जोड़े से मैंने यही सीखा है कि अर्पित पत्नी ही पुरुष के लिए प्रकृति का उत्तम वरदान है |

एक दिन मैं अपने गुरूजी के चरणों में बैठा था कि उच्च-वेतन पाने वाला एक  गज़ेटिड-आफ़िसर उनके दर्शनों को आया | उस समय गुरूजी के चरणों में एक निर्धन दम्पत्ति भी, जिनकी सांझी आय लगभग साठ रूपये थी, उपस्थित थे | वह सैंकड़ों रूपये का वेतन पाने वाला गज़ेटिड-आफ़िसर हाथ जोड़कर गुरूजी से बोला, हुज़ूर, मैं गज़ेटिड-आफ़िसर हूँ | सैंकड़ों रूपये का वेतन पाता हूँ, तो भी मैं इस जोड़े की प्रसन्नता का दसवां भाग भी नहीं पा सकता, जिनकी आय मेरी तुलना में कुछ भी नहीं और फिर भी जो सुखी जीवन बिताते हैं | वे साथ-साथ पढ़ाने के लिए स्कूल जाते हैं | जब वह स्कूल से लौटते हैं, तो साथ साथ घूमने निकलते हैं | जब धार्मिक सभाएं होती हैं, वे वहां भी साथ-साथ जाते हैं | पत्नी पति के लिए भोजन बनाती है | पति वहीँ रसोई-घर में उसे अपनी संगति का लाभ प्रदान करता है, उसकी प्रशंसा करता है और जो कुछ वह कर रही है, उसके प्रति आभार प्रकट करता दिखाई पड़ता है |

यह सुखी और पवित्र जोड़ा अनेक जोड़ों के सुखी और प्रसन्न जीवन व्यतीत करने के लिए लाइट-हाउस का काम देता था | उनके सुखी-जीवन का रहस्य केवल यही था कि वे एक-दूसरे के लिए जीते थे, वे एक-दूसरे की संगति का मोल किसी भी अन्य साथी से अधिक मानते थे | वे बहुत किफ़ायतशारी से रहते थे | अपनी गृहस्थी उन्होंने उस साधारण आय में भी ऐसी व्यवस्थित कर रखी थी कि कष्ट के दिनों के लिए कुछ बचा भी लेते थे |     मैं प्राय: अपनी श्रद्धा प्रकट करने उनके यहाँ जाता और अक्सर अपनी चर्चा सभाओं में उनका आदर्श उद्धरण करता, क्योंकि वे एक-दूसरे के लिए जीते थे | ऐसे विवाहित लोग, जो इस सच्चाई की उपेक्षा करते हैं, गृहस्थ-जीवन का अपने हाथों नाश कर लेते हैं |

एक विवाहित स्त्री अपनी माता से इतनी बंधी हुई थी, कि प्राय: पति से भी अधिक माता को महत्त्व देती थी | उसका पति बहुत पढ़ा-लिखा व्यक्ति था, जो उसे प्यार करता था और सदैव प्रसन्न और संतुष्ट रखने का प्रयत्न करता था |

इस स्त्री को यह आदत हो गई थी कि वह ज़रुरत से ज़्यादा और बार बार अपनी माँ के पास चली जाती थी जो उसी नगर में रहती थी | जबतक परस्पर के हितों में कोई संघर्ष न था, उसके व्यवहार ने गृहस्थी-जीवन में ख़लल न डाला | परन्तु कुछ वर्षों के बाद जब उनके यहाँ बच्चे हुए, तो पिता को उनकी जुदाई, विशेषकर जब वह कार्य से लौटता, असह्य हो गई | एक समय किसी उत्सवार्थ सास ने अपने जमाई से लड़की और बच्चों को एक महीने के लिए अपने यहाँ छोड़ने की प्रार्थना की | न चाहते हुए भी पति ने इस लम्बी जुदाई को स्वीकार कर लिया | महिना पूरा होने पर भी पत्नी नहीं लौटी | पति उसे लेने गया | पत्नी ने पति से प्रार्थना की कि उसकी माँ की तबियत ठीक नहीं है, इसलिए पन्द्रह दिन और ठहरने दिया जाए | पति निराश होकर लौट आया तथा मन में दुखी हुआ | पन्द्रह दिन बाद वह फिर उसे लेने गया | पत्नी ने फिर अपनी माँ का बहाना बनाते हुए आने की अनिच्छा प्रकट की | पति इस पर बिगड़ उठा और उनमे निम्नलिखित वार्तालाप हुआ :-

पति — यदि अब तुम मेरे साथ नहीं आती हो, तो मैं कभी दुबारा तुम्हें लिवाने नहीं आऊँगा |

पत्नी — तुम्हें इतनी नासमझी नहीं दिखानी चाहिए | क्या मेरी माता का मेरी सेवाओं पर कोई अधिकार नहीं ?

पति — उसका तुम्हारी सेवाओं पर ज़्यादा अधिकार है तो मैं उसे सदा के लिए तुम्हें यहीं रखने की छुट्टी दिए देता हूँ |

उस समय माँ, जिसने छिपकर ये बातें सुन ली थीं, बाहर आई और बोली, बेटे, इतने हटी मत बनो | अगर तुम उसको आयु-भर मेरे पास रखने के इच्छुक हो, तो यह मत सोचना कि मैं तुम्हारे पाँव पर गिरकर उसे ले जाने को कहूँगी | बेशक तुम उसे यहाँ छोड़ दो और दूसरा विवाह कर लो |

पति पत्नी को उसकी माँ के पास छोड़कर अपने बच्चों को साथ लेकर लौट   आया | मुझे बताया गया कि बाद में वह बीस वर्ष तक अपनी पत्नी को घर नहीं लाया | मूर्ख पत्नी ने माता और पति में चुनाव किया और ग़लत फैसला करके अत्यंत दु:ख  पाया | कहते हैं कि जब बच्चे बड़े हुए तो उन्होंने माता व पिता का मेल करा दिया | इस कथा ने मुझे बड़ा प्रभावित किया और मैं महसूस करने लगा कि पत्नी के मन में संसार की सब वस्तुओं और रिश्ते-नातों से अधिक पति का महत्त्व होना ही चाहिए |

ऐसे ही एक और स्त्री की कहानी है | उसका विवाह एक बड़ा वेतन पाने वाले सरकारी कर्मचारी से हुआ था | वह रिश्वत भी लेता था, इसलिए उसकी आय बहुत अधिक थी | इस विवाहिता स्त्री को उसकी माँ ने यह शिक्षा दी थी कि विवाहिता-जीवन में हर वस्तु से अधिकयहाँ तक कि पति से भी अधिक धन का महत्त्व होता है | बेटी ने इस पाठ को भली प्रकार सीख लिया था | इसलिए उसने अपने पति को विवश किया कि वह सारी आय उसके हवाले कर दिया करे | अपनी माँ के गल्त आदेश के कारण उसने सब नक़दी को आभूषणादि में बदल लिया | कहते हैं कि उसके पास लगभग तीस हज़ार के आभूषण थे | (आज के ज़माने में ऐसे आभूषण कई लाख रुप्यों के होंगे )|

एक समय उसका पति एक अपराध में फँस गया, जिसमे लगभग दस हज़ार रूपये के ग़बन का मुआमला था | उसके बड़े अधिकारी ने कहा कि यदि वह शीघ्र 10,000) कोष में जमा करवा दे तो वह मुआमला वहीँ दबा दिया जाएगा | पति ने अपने अधिकारी की दयालुता को दैवी वरदान माना और भागा हुआ अपनी पत्नी के पास गया | पत्नी को सब रहस्य बता कर वह बोला, मुझे दस हज़ार रुपया दे दो, जिससे मैं दंड से बच  जाऊंगा और नौकरी पर भी बहाल रहूँगा | पत्नी ने इस प्रस्ताव को ठुकराते हुए कहा, यदि कुछ समय के लिए तुम जेल भी जाओ तो क्या ? दस हज़ार रूपये हर बार नहीं मिलते | पति जानता था कि अब उसके लिए बचने का कोई रास्ता नहीं है, इसलिए उसने अपने-आप को अदालत को सौंप दिया और दो वर्ष का सख्त जेल का दंड पाया |

मूर्ख पत्नी और उसकी माँ को नौका द्वारा वह नगर छोड़ना पड़ा | मार्ग में नाव उलट गई और उसका आभूषणालंकार वाला डिब्बा पानी में बह गया | इस प्रकार वह  पति और धन, दोनों को गंवा बैठी |

ऐसे हज़ारों दृष्टान्त दिए जा सकते हैं, जो यह स्पष्ट करते हैं कि किस प्रकार विवाहित सुख का नाश हो जाता है, जब विवाहित जन ऐसे सम्बन्धियों को मुख्य समझते हैं जो मुख्य नहीं, और अपने मुख्य सम्बन्धी की उपेक्षा करते हैं | मेरा विश्वास है कि विवाह के पश्चात पति-पत्नी यदि अपने घरों को स्वर्गीय बनाना और रखना चाहते हैं तो उन्हें पारस्परिक प्रेम, विश्वास, वफादारी, सेवा और बलिदान को मुख्य स्थान देना चाहिए |

वर्तमान शताब्दी के संभवत: आरम्भिक वर्षों में मुझे एक पुस्तक पढने का अवसर मिला जिसमे एक बहुत रुचिकर और शिक्षा-पूर्ण कहानी दी हुई थी |

एक धनवान ज़मींदार के यहाँ जो स्वयं राजा कहलाता था, एकलौती बेटी थी | जब वह विवाह के योग्य हुई तो उसकी शादी की समस्या उठी | क्योंकि वह माता-पिता की एकमात्र संतान थी, इसलिए वह दोनों उसे अपनी जाती में किसी ऐसे लड़के से ब्याहना चाहते थे, जो स्थाई रूप से उन्हीं के यहाँ रहे | बाप ऐसे लड़के की खोज में निकला जो ग़रीब भले ही हो, परन्तु जिसके माता-पिता उसे पत्नी के घर में रहने की स्थाई आज्ञा दे दें | वह किसी योग्य और होनहार लड़के की तलाश में विभिन्न स्कूलों में घूमा | सौभाग्यवश उसे एक स्कूल में एक ऐसा लड़का मिल गया जो स्कूल में सबसे योग्य माना जाता था | मुख्याध्यापक लड़के को बहुत चाहता था | ज़मीदार ने लड़के के परिवार के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त की और उसके घर का पता ले लिया | वह लड़का एक विधवा का बेटा था | ज़मीदार एक दिन उस विधवा से मिलने उसके घर गया और अपनी सम्पूर्ण योजना उसके सन्मुख रखी | उसने बताया— श्रीमती जी, मैंने आपके बेटे को देखा और पसंद कर लिया है | आपका बेटा बड़ा होनहार है | मेरे पास इतना धन है कि उसे उच्चतम भारतीय-शिक्षा दिलवा सकूं | यदि वह विदेश जाना चाहे तो मैं उसे स्वयं उसकी पत्नी सहित इंग्लैण्ड ले जाकर विदेशी-शिक्षा पूर्ण होने तक एक उच्च और सन्मानित परिवार में पेइंग गेस्ट (Paying Guest) के तौर पर भी रखवाने की सामर्थ्य रखता हूँ | यदि आप अपने पुत्र से जुदा होना स्वीकार कर सकें तो मैं उसका भाग्य बनाने का वचन देता हूँ |

स्त्री बोली, राजा साहिब, इस प्रस्ताव से आपने मुझे सन्मान दिया, परन्तु वह मेरा इकलौता बेटा है | वही मेरे जीवन का सहारा है | मैं उसे नहीं छोड़ सकती | तथापि, मैं आपके प्रस्ताव को उसके सामने रखूँगी और कुछ ही दिनों में अपना निर्णय निश्चय आपको बता दूंगी |

परन्तु राजा को संतोष कहाँ ? वह अनेक बार लड़के से मिलता रहा | लड़का उज्जवल भविष्य के प्रलोभन से आकृष्ट हो गया | सार यह कि राजा का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया | लड़के का विवाह ज़मीदार की लड़की के साथ हो गया और उसे बड़ी इज्ज़त के साथ दुल्हन के घर ले जाया गया | लड़के के सम्बन्ध में जो आशा थी, वह उसने पूरी कर दिखाई | वह मैट्रिक की परीक्षा में सर्वप्रथम रहा | उसने बहुत अच्छे नम्बर लेकर इण्टरमिडीयेट पास किया | लड़के के दिन बहुत अच्छी तरह से गुज़र रहे  थे कि एक दिन उसकी ज़िन्दगी के क्षितिज पर एक काली घटा उमड़ी और धीरे धीरे फैलकर उसके उज्जवल भविष्य को अंधकारमय बनाने लगी | उसकी पत्नी महसूस करने लगी कि उसका पति वास्तव में उसका आश्रित है | जीवन-साथी की सहायता को अपना विशेषाधिकार समझने की अपेक्षा वह अपने को ही उससे श्रेष्ठ मानने लगी | कहते हैं कि असहाय कीड़ा भी विरोध का साहस रखता है और वह युवक तो कीड़ा नहीं था; एक सुयोग्य और समर्थ युवक था | वह कुछ समय तक पत्नी की ओर से अपमान को सहता रहा, क्योंकि वह महसूस करता था कि उस पर बहुत उपकार हो रहे हैं | परन्तु एक दिन ऐसा आया जब पानी सर के ऊपर से निकल गया | वह अपनी पत्नी से बोला, प्रिये, मुझे महसूस न होने दो कि मैं कोई भिखारी या निकृष्ट जीव हूँ | आखिर मैं तुम्हारा पति हूँ | जीवन में एक साधारण पति को जितना सन्मान मिलता है, उतने का अधिकारी तो मैं भी हूँ | मैं तुम्हारे माता-पिता का आभार मानता हूँ कि उन्होंने मुझे जीवन में सब सुविधाएं और उन्नति के अवसर प्रदान किये | परन्तु ये सब देना तुम्हारे पिता जी ने मेरी माता जी के साथ ठहराया था | मैं तुम्हारे परिवार के प्रति कृतज्ञता बनाए रखने तथा तुम्हें जीवन-साथी के नाते सम्मानित करने की पूरी कोशिश करता रहा हूँ | यदि तुम मेरे प्रति वैसा ही आदर भाव नहीं दिखाओगी, तो मैं तुम्हारे परिवार से सम्बन्ध तोड़ लूँगा | उसकी पत्नी बोली, मेरे साथ सम्बन्ध तोड़ कर तुम क्या कर लोगे ? तुम जीवन में भूखों मरोगे | उसने उत्तर दिया बार बार अपमानित होने से तो भूखों मरना अच्छा है | इस पर मूर्ख लड़की बोली, तुम्हें जो करना है करो | मेरा इसमें क्या आता-जाता है | मैं समझती हूँ कि मेरे साथ रहने से तुम मुफ़्त में शाही ज़िन्दगी बिताते हो, तुम्हें यह नहीं भूलना चाहिए | उसने कहा, मैं यह दिन और आज की बात कभी नहीं भूलूंगा और तुम भी इस दिन को और आज की चर्चा को याद रखना | इतना कह कर वह उठा और कमरे से बाहर चला गया |

उस रात लगभग चार बजे प्रभात में जब वह जागी तो उसने देखा कि उसके पति का बिस्तर खाली था | वह भाग कर अपनी माता के कमरे में गई और सिसक सिसक कर उसे पति के घर से चले जाने की सूचना दी | माँ ने चौकीदार से पूछा कि उसके जंवाई को शायद उसने बाहर जाते देखा हो | चौकीदार ने लड़के के घर छोड़ने की सारी कथा उसे बता दी और वह चिट्ठी, जो वह युवक अपनी राज-कुमारी पत्नी के लिए छोड़ गया था, उनके हाथ थमा दी | उस पत्र में उसने अपनी पत्नी को विश्वास दिलाया था कि यदि वह कभी लौटा तो आर्थिक-दशा के विचार से उसके योग्य बनकर ही आएगा |

कई वर्ष बीत गए | घमण्डी लड़की के होश ठिकाने आ गए | वह भूमि पर सोने लगी | उसने सब प्रकार के उत्तम भोजन त्याग दिए | वह ग़रीब आदमी की तरह भोजन करती | उसने भड़कीली पोशाक़ भी छोड़ दी और साध्वी की तरह रहने लगी |

एक दिन चीथड़े लपेटे एक आदमी महल में प्रविष्ट हुआ | उसने चौकीदार से कहा कि जाकर राजकुमारी को सूचित कर दो कि उसका पति उसे मिलने आया है | लड़की, जो अब नम्र और शांत-स्वभाव की बन गई थी, इतना सुनते ही भाग कर आई और अपने पति की पाँव में गिरकर, दोनों के जीवन में कष्ट का कारण बनने के लिए क्षमा माँगने लगी | युवक ने इधर-उधर की बात छोड़ कर स्पष्ट शब्दों में कहा, मैं अपने निर्धन घर में तुम्हें ले जाने के लिए आया हूँ, वहां जाने के लिए तुम्हें अपने पिता का घर छोड़ना होगा और उसकी दी हुई सब वस्तुएं भी त्यागनी पड़ेंगी | तुम वही पोशाक पहनोगी, जो मैं कमाकर लाऊंगा | तुम मेरी ही कमाई से भोजन करोगी और मेरी बनाई झोंपड़ी में रहोगी | यदि तुम्हें इन शर्तों पर मेरे लिए मेरे साथ रहना स्वीकार हो, तो निश्चय ही मैं तुम्हारे लिए जिऊँगा और तुम्हारे ही लिए मारूंगा |

जब वह ये बातें कह रहा था, लड़की के माता-पिता वहां आ गए और अंतिम शब्द उन्होंने भी सुने | लड़की ने अपने माता-पिता से स्पष्ट कह दिया, मेरा पति आ गया   है | जहाँ वह जाएगा, मैं भी उसके साथ जाऊंगी | यदि वह राजा होगा, मैं रानी बनूंगी;  फ़कीर होगा तो मैं फकीरनी बनकर रहूँगी | दोनों उसी समय महल छोड़ कर चले गए |

वह युवक अपनी दुल्हन को घर ले आया | लड़की ने देखा कि उसके पति ने समय बरबाद नहीं किया, बल्कि अपना भाग्य बना लिया है | वह एक प्रसिद्ध वकील बन गया है | इस प्रकार लड़की के मिथ्याभिमान के कारण पति-पत्नी के जीवन में उत्पन्न हुए दुःख का अंत हुआ | पत्नी ने अब महसूस किया कि पारस्परिक सहायता या सेवा तो उसका विशेषाधिकार था, उसमें अभिमान कैसा ?

यह तो एक कहानी थी जो मैंने कहीं पढ़ी थी | परन्तु मेरी आँखों देखी घटना भी है जिसने मुझे बहुत प्रभावित किया है | एक युवक मेरे कालेज में भर्ती हुआ | मैं जानता था कि उसके माता-पिता कालेज का खर्च नहीं उठा सकते थे | इसलिए मैंने उससे पूछा, बेटे, दो वर्ष इस कालेज-जीवन में तुम्हें आर्थिक सहायता कौन देगा ? वह मुस्कराया और बोला, मेरी पत्नी खर्च करेगी | वह ट्रेंड-अध्यापिका है | उसी ने मेरे बी.ए. कर लेने पर ज़ोर दिया है, वही खर्च भी करेगी |  मैंने पूछा, जब वह तुम्हारा सारा खर्च उठाती है और जानती है कि तुम उसके आश्रित हो, तो उसका तुम्हारे प्रति व्यवहार कैसा रहता है ? वह बोला, उसका व्यवहार अति उत्तम रहता है | हर महीने जब वह वेतन लाती है, तो मेरे पाँव में रख कर कहने लगती है, प्राणनाथ, आपकी इस थोड़ी सी सहायता कर सकने में मैं गर्व महसूस करती हूँ | इसे स्वीकार करके मुझ पर कृपा कीजिए |

मैंने उस स्त्री के दर्शन किए हैं | यद्यपि वह अब सदा के लिए हमसे जुदा हो चुकी है, तथापि उसके जीवन का आदर्श हमेशा मेरे सामने है | जब भी मुझे उसकी याद आती है, मैं हार्दिक-श्रद्धा से झुक जाता हूँ |

मैंने अनेक विवाहितों के जीवन का अध्ययन किया है और सदा इसी परिणाम पर पहुंचा हूँ कि जो दम्पत्ति पारस्परिक सहायता को अपना विशेषाधिकार मानते हैं, वे पारिवारिक जीवन को मधुर और स्वर्गीय बना लेते हैं | परन्तु ऐसे दम्पात्ति जो पारस्परिक सेवा-भावना में मिथ्याभिमानी और घमंडी हो जाते हैं, वह अपने पाँव पर आप कुल्हाड़ी मार लेते हैं और जीवन को कड़वा और नारकीय बना लेते हैं |

विवाहित जीवन का उद्देश्य क्या है, इसके विषय में भगवान् देवात्मा फरमाते हैं:

 

विवाह-बंधन में बंधने से पूर्व लड़की या लड़का बस साधारण व्यक्ति से अधिक कुछ नहीं होते | अनुष्ठान द्वारा उन्हें एक-दूसरे के निकट लाया जाता है | अब देखा जाए कि सामान्यत: इस मिलन का आधार क्या है, तो साधारणत: विषय वासना की तृप्ति इस सम्बन्ध की पृष्ठभूमि है | दूल्हा और दुल्हन के विचार और क्रियाएं अधिकतर इसी इच्छा के इर्द-गिर्द घूमते हैं | उनके विवाहित जीवन का कोई उच्च-उदेश्य नहीं होता | वे प्राय: अपने आत्मिक-जीवन की उन्नति और विकास के सम्बन्ध में एस-दूसरे से बात भी नहीं करते | जीवन की बुराइयों, पापाचार या अशुद्ध भावों से छुटकारा पाने के लिए कभी विचार नहीं करते | साधारणत: अपने पारिवारिक-जीवन को श्रेष्ठ और उच्च बनाने या पारस्परिक संबंधों को धार्मिक पुट देने के लिए कभी गंभीरता से चर्चा भी नहीं करते |

जब विवाहित जोड़े एक- दूसरे को केवल वासना की दृष्टि से ही देखते हैं, तो उनके परस्पर के सम्बन्ध पवित्र और उच्च क्योंकर हो सकते हैं ? पति-पत्नी जब केवल काम-वासना सम्बन्धी चर्चा और मखौल ही करते हैं तो उनका सम्बन्ध श्रेष्ठ हो ही कैसे सकता है ? एक अन्य स्थान पर देवात्मा फरमाते हैं — काम वासना स्वयं कोई बुराई नहीं है | इस वासना की अनुपस्थिति में मानव संतान की उत्पत्ति और मानवजाति की स्थिरता ही सम्भव नहीं | परन्तु इसी इच्छा के साथ बंध जाने से मनुष्य यौवन की अनेक निधियां खो बैठता है और जीवन के मानसिक तथा नैतिक पहलुओं से दिवालिया हो जाता है | यही कारण है कि अधिकतर लोग बहुत सीमित समय तक ही यौवन का आनंद ले पाते हैं | हमारे स्त्री-पुरुषों, युवक-युवतियों की यह स्थिति कितनी दु:खदायी   है ! क्या ऐसे निर्बल लोगों के बच्चों के दुनिया में आने से कभी हमारी जाती या राष्ट्र सशक्त और सतेज बन सकता है ? इसलिए ब्रह्मचर्य-भावना मनुष्य-मात्र के लिए अति आवश्यक है — केवल विवाहित अवस्था में ही नहीं, विवाह होने और जीवन-साथी को पा जाने के बाद भी | इसके लिए मनुष्य को काम-वासना की ग़ुलामी से बचना अनिवार्य   है | उक्त ग़ुलामी से बचकर ही विवाहित जीवन में पवित्रता की कल्पना की जा सकती   है | काम-अनुराग से मुक्त न होकर कोई पुरुष स्त्री जाती के प्रति शुद्ध आदर-भाव रख ही नहीं सकता, न ही स्त्री जाती के प्रति कभी उसकी अभिवृतियाँ उन्नत और प्रतिष्ठित हो सकती हैं |

एक लेखक ने कहा है कि किसी जाती या देश के सभ्य होने का अनुमान इस बात से ही किया जा सकेगा कि उस राष्ट्र के पुरुष स्त्रियों के प्रति कितनी मात्रा में सच्चा सम्मान-भाव रखते हैं और स्त्री जाती के साथ किस प्रकार का सम्बन्ध रखते हैं | उसके आगे उनकी सभ्यता का पता इस बात से लगेगा कि जीवन के उच्च उदेश्य में वह एक-दूसरे को सहयोग दे सकते हैं या नहीं |

मेरे गुरु महाराज ने पति-पत्नी के सम्बन्ध में केवल यह उच्च शिक्षा ही नहीं दी, परन्तु उसे जीवन में कार्य-सिद्ध भी किया | सामाजिक रिवाज़ों के अनुसार बचपन में ही उनका विवाह हो गया था, जब वह स्वयं इस विषय में कोई निर्णय नहीं कर सकते थे | उनकी आयु उस समय बारह वर्ष की थी, जबकि उनकी पत्नी जो अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी, केवल ग्यारह वर्ष की थीं | जैसा कि उन दिनों स्वाभाविक ही था, वह भी बिल्कुल अनपढ़ थीं | जब उनकी मृत्यु हुई तो मुल्तान से एक व्यक्ति ने उनके सम्बन्ध में लिखा था, वह उच्च कोटि की नारी थीं, जो नारी-जगत की मुक्तिदाता कहलवाने का अधिकार रखती हैं |

एक और सज्जन ने उनके सम्बन्ध में लिखा, वे कोई सामान्य नारी न थीं | उनकी मृत्यु से देश को बहुत बड़ी हानि पहुँची है, क्योंकि राष्ट्रीय-उत्थान में हम उनसे बहुत बड़ी आशाएं रखते थे |

अम्बाला के एक भद्रजन ने अपने पत्र में लिखा, मुझे शायद अपनी पत्नी की मृत्यु पर इतना दुःख न होता जितना आपकी पत्नी की मृत्यु से मैं महसूस कर रहा हूँ | ऐसी पवित्र और श्रेष्ठ नारी की मृत्यु जिसने देश को अपने सुकार्यों से शोभित किया, केवल मेरे या आपके लिए ही हानि का कारण नहीं बल्कि समूचे पंजाब की नारी-जाती के लिए शोक और हानि का विषय है |

एक पूर्ण अनपढ़ लड़की का जो कि एक पुराने विचारों के ब्राह्मण परिवार में पैदा हुई, जिसमे सख्त परदे की प्रथा थी और स्त्रियों का सामाजिक कार्यों में भाग लेना तथा विद्या पढ़ना बहुत बुरा समझा जाता था, राष्ट्रीय नभ-मंडल पर नारी जाती के चमकते हुए सितारे की तरह एकदम ज्योतिर्मान हो उठना, निश्चय ही हमारे लिए एक शिक्षाप्रद कहानी है | यह इस बात का सजीव प्रमाण है कि मेरे गुरु भगवान् देवात्मा ने अपनी धर्म-पत्नी के साथ कैसा अद्वितीय सम्बन्ध बनाया | उनका यह दृष्टांत यह प्रकट करता है कि किस प्रकार इस अद्वितीय जोड़े ने अपना जीवन श्रेष्ठ उदेश्यों पर स्थापित किया |

मेरे भगवान् ने उचित ही कहा है —

एक सच्चे शिक्षित व्यक्ति से यह आशा की जाती है कि वह शिक्षा के प्रसार में आनंद और उत्साह से संल्गन रहे | परन्तु हम प्राय: देखते हैं कि पुराने विचारों का कोई हिन्दू जो स्वयं चाहे कितना ही सुशिक्षित क्यों न हो, निम्न-प्रकृति या वहम प्रवृति के कारण अपनी पत्नी को शिक्षा देना पसंद नहीं करता | दकियानूसी नारी स्वयं भी शिक्षा प्राप्त करना पसंद नहीं करती | न ही वह अपने रिश्ते-नाते की अन्य औरतों को शिक्षा-प्राप्ति की अनुमति देना स्वीकार करती है |

भगवान् ने अपनी पत्नी को स्वयं शिक्षा दी | उन्हें भगवान् ने केवल हिन्दी और बंगाली ही नहीं पढ़ाई, बल्कि अंग्रेज़ी की शिक्षा भी दी | बाद में भगवान् ने उन्हें अंग्रेज़ी सिखाने ले लिए घर पर एक शिक्षक भी नियुक्त कर दिया |

अपने अध्ययन द्वारा जो नया ज्ञान भगवान् प्राप्त करते, उसमे अपनी श्रेष्ठ पत्नी को भागीदार बनाते | फल यह हुआ कि भगवान् की पत्नी, पूजनीय श्रीमती लीलावाती जी सामाजिक, नैतिक, राजनैतिक तथा आत्मिक विषयों का गहन और विस्तृत ज्ञान प्राप्त कर सकीं | उनके ज्ञान और जानकारी का संसार, लाखों पुरुषों की अपेक्षा विस्तृत तथा विशाल था | उन्होंने (भगवान् देवात्मा की पत्नी ने) भी ज्ञान को अपने तक ही सीमित नहीं रखा | उन्होंने अपने को नारी जाती के उत्थान और उद्धार के कार्यों में तल्लीन कर दिया | श्रीमती लीलावती जी का गृहस्थ एक आदर्श-गृहस्थ था | भगवान् ने उनके हृदय को उच्च और श्रेष्ठ बनाने का जो फ़िक्र और संग्राम किया, उसका उन्होंने पूर्ण रूप से साथ दिया | जिस प्रकार भगवान् देवात्मा एक अति वफ़ादार और सनेही पति प्रमाणित हुए, उसी प्रकार उनकी पत्नी उनके अति कठिन अद्वितीय जीवन-मार्ग में एक पवित्र, वफ़ादार, स्नेहमयी और अर्पित साथी रहकर एक आदर्श पत्नी बनीं |

सन 1880 के अंत में उनकी मृत्यु पर भगवान् देवात्मा ने उस हानि को बहुत कष्टप्रद महसूस किया | वे लिखते हैं— सन 1880 के अंत में मुझपर भयानक वज्रपात हुआ | मैं अपनी सच्ची मित्र, उच्च-जीवन के मार्ग की विश्वस्त संगिनी, जीवन के हित-अहित में सच्ची सहयोगिनी, अपनी प्रिय पत्नी को गंवा बैठा | मेरे सरीखे उच्च-जीवन के अकेले और अपूर्व राही के लिए अपनी पत्नी जैसे एकमात्र सहयात्री, सदसहायक, प्रेरक और सच्चे-मित्र को खो देना कितनी बड़ी हानि ! कितनी कष्ट-दायक और हतोत्साहजन्य विपत्ति !! इस असाध्य हानि से मुझे बड़ा आघात लगा |

देवात्मा द्वारा अपने जीवन साथी को दी गई कैसी महान श्रद्धांजलि ! हम यही प्रार्थना करते हैं कि अधिक-से-अधिक विवाहित जोड़े इस सत्य को जाने, महसूस करें और अपनाएँ कि विवाहित जीवन का लक्ष्य उच्च-जीवन ही है |

हमारे समाज में दुल्हन पति के घर और उनके रिश्तेदारों को अपने घर और  रिश्तेदारों के रूप में स्वीकार करती है | इसलिए उससे आशा की जाती है कि वह अपने नए घर और नए रिश्तेदारों के साथ शान्ति, मेल और एकता बनाए रखेगी |

मैंने अपने कालेज की एक लड़की के नाम उसकी भावजा का पत्र पढ़ा | उस भावजा का पति अर्थात लड़की का भाई परिवार का मुख्य पोषक था | वह परिवार में सबसे बड़ा लड़का था | उसे अपने माता-पिता की अन्य संतानों का पोषण और शिक्षण भी करना पड़ रहा था जिनमे से कुछ कालेज में भी थे | अत: उनका भविष्य इस बात पर आश्रित था कि नई बहू अपने पति को सबका सहायक बनाती है या उसे प्रभावित कर उनकी मदद से हटा देती है | उस नई बहू ने अपनी ननद को, जो मेरे कालेज में पढ़ती  थी, कुछ इस प्रकार लिखा

मैं तुम्हारे परिवार की सेवा करने और उसे सुदृढ़ बनाने आई हूँ | मैंने तुम्हारे भाई को कह दिया है कि उसका पहला कर्त्तव्य तुम सबके प्रति है | हमने तुम्हारे भाई का वेतन इस प्रकार बांटा है कि उसका एक बड़ा भाग परिवार के लिए खर्च किया जा सके और शेष छोटा भाग हम दोनों के लिए भी बच जाए | अत: तुम स्पष्ट तौर पर अपनी आवश्यकताएं मुझे लिख भेजो, ताकि मैं उन सबकी तुष्टि का प्रयत्न कर सकूं |

इस पत्र की प्राप्ति से सारा परिवार बहू के प्रति आभार और उल्लास से खिल   उठा | ननद की आँखों में आंसू आ गए और उसने मुझे बताया कि ऐसी देवी-स्वरूपा बड़ी भाभी का पाना सचमुच उसके लिए वरदान था |

नई दुल्हन के लिए यही अनुकूल व्यवहार है |

दुल्हन का अनुचित व्यवहार निम्नलिखित कहानी से, जो सच्ची कहानी के रूप में एक पति ने सत्य-कथा-पत्रिका में भेजी थी, प्रकट होता है

उसने लिखा था कि वह बड़ा लजीला व्यक्ति था, इसलिए औरतों से कतराता था | वह कभी मिश्रित-उत्सवों में उपस्थित न रहता, पुरुषों के साथ वह आनन्द में रहता, परन्तु स्त्रियों की संगत में बड़ा अशांत महसूस करता | एक बार उसे एक मिश्रित-सामाजिक-उत्सव में जाना ही पड़ा | उस सामाजिक उत्सव में उपस्थित एक लड़की उसकी अशांति को भांप गई और उसे उसके प्रति उसे सहानुभूति हुई | वह उसके निकट जाकर उससे बातें करने लगी | इससे उसकी घबराहट का एकदम अंत हुआ | धीरे-धीरे इस लड़की ने पश्चिम-समाज की लोकप्रिय वस्तु नृत्य का अभ्यास उसे भी करवाया | अभिप्राय यह कि लड़की ने उसे सामाजिक-उत्सवों में हिल-मिलकर भाग लेना सिखाया |

यह युवक उस लड़की के प्रति आभारी हुआ और उससे प्रेम करने लगा | अपने स्वाभाविक शर्मीले व्यवहार के द्वारा उसने लड़की के सन्मुख विवाह के लिए अपने-आप को पेश किया | लड़की ने विवाह करना स्वीकार कर लिया और उन्होंने विवाह कर  लिया | वह युवक अपनी पत्नी को प्रसन्न देखने का बड़ा इच्छुक था | परन्तु खेद कि उसकी पत्नी बड़ी स्वार्थी थी | अपने नए घर के प्रति उसकी प्रवृति बिलकुल ग़लत थी | अत: उसने विवाहित-जीवन का आरम्भ ही स्वार्थ से किया |

विवाह के फ़ौरन बाद उसने पति से एक नौकरानी रख देने के लिए कहा | कुछ दिन बाद पति ने अपनी पत्नी को निराश और सुस्त बैठे देखा | वह उसे बहुत चाहता था, इसलिए उसे वह इस प्रकार निराश बैठे न देख सका | अत: उसने पत्नी की उदासी का कारण पूछा | वह स्वार्थी लड़की बोली कि उसके लिए एक नौकर कम पड़ता है | केवल एक नौकरानी खाने-पकाने पर ही ध्यान रख सकती है, घर का अन्य बहुत सा काम उसके लिए बोझ बना रहता है | उसने एक दूसरा नौकर भी रख देने के लिए कहा | उसकी यह इच्छा भी पूरी कर दी गई |

लगभग एक वर्ष बाद पत्नी के निकम्मे भाई ने, जो व्यापार में असफल हो चुका था, अपनी बहन से प्रार्थना की कि वह अपने पति से उसे दो हज़ार पौंड उधार में ले दे | उस स्वार्थी औरत ने यह जानना भी ज़रूरी नहीं समझा कि उसका पति इतना धन दे भी सकता है या नहीं | वह तो केवल अपने भाई को प्रसन्न करना चाहती थी | अत: उसने अपने पति को उसकी अपनी सम्मति के विरुद्ध भी उसे इतनी बड़ी रकम देने को मजबूर किया | इससे उसका पति आर्थिक कठिनाई में पड़ गया |

आखिर पति ने पत्नी से अपने दिल की बात कह दी | उसने स्पष्ट कहा कि उसकी आर्थिक स्थिति अनुकूल नहीं है, इसलिए उसे व्यक्तिगत खर्चों को कुछ कम करना  चाहिए | वह हर महीने का निश्चित बजट बनाने लगा, परन्तु वह सदैव बजट से अधिक खर्च करने का आग्रह करती रही |

फिर उस स्त्री की बहिन विधवा हो गई | उसने अपनी विधवा बहिन को अपने नन्हें बच्चे समेत कुछ देर वहां रहने के लिए आमन्त्रित किया | परन्तु यह बहिन भी अनिश्चित समय के लिए वहीँ टिक गई | इस बोझ के शीघ्र ही बाद उसका निकम्मा भाई फिर आया | वह अपनी बहिन से एक हज़ार पौंड और उधार दिलवाने का आग्रह करने लगा | उसका कहना था कि इतनी आर्थिक सहायता के बिना वह बर्बाद हो जाएगा | उस स्वार्थी औरत ने, जो शायद अपने पैतृक-सम्बन्धियों के लिए ही जी रही थी, घर में एक आफत पैदा कर दी, और तब तक शांत नहीं हुई जब तक उसने अपने पति को धन देने के लिए विवश नहीं कर दिया |

उसके पति ने अपना गहरा दुःख प्रकट किया और हमेशा के लिए उसे छोड़ कर चला गया | अपने पति के घर और परिवार के प्रति एक बहू का यह अनुचित व्यवहार था और ऐसी अनुचित प्रवृति हमेशा घरेलू-विपत्ति और पारिवारिक विनाश का कारण बनती है |

ऐसी घटनाएं भी हैं जहाँ पत्नियाँ पति का ध्यान तो रखती हैं, परन्तु उसके सम्बन्धियों की परवाह नहीं करती हैं | मुझे एक बार एक दुखदाई घटना बताई गई कि एक नौजवान लड़के का, जो धन कमा रहा था, विवाह हो गया | उसकी पत्नी उसे बहुत चाहती थी, परन्तु घर में अपने पति पर किसी और का अधिकार उससे सहन नहीं होता था | अत: उसने धीरे-धीरे अपने पति को विवश किया कि वह घर में अपनी माता के अधिकारों पर रोक लगाए | मां को दुःख के दिन देखने पड़े | वह अपने पुत्र और पुत्रवधू द्वारा बार-बार का अपमान सहन न कर सकी | आखिर उसके लिए वहां जीना दूभर हो गया और तंग आकर वह घर छोड़ कर चली गई | उसे अपना गुज़ारा स्वयं चलाना   पड़ा | इसलिए वह अमीर परिवारों के लिए पानी भरने का नीचा कार्य करने लगी | पड़ोसियों ने उसे ऐसा करते देखा | उन्होंने बहू को धिक्कारा भी, परन्तु उसने अपने  धन के ज़ोर से अपने पड़ोसियों को अपनी तरफ कर लिया | कहते हैं, बेचारी मां अकेली और उपेक्षित एक किराए के कमरे में मर गई, जबकि उसके पुत्र और पुत्रवधू धन में खेलते रहे | ऐसे सुपुत्रों का दृष्टांत कोई असाधारण बात नहीं | ऐसी दु:खपूर्ण  घटनाओं के लिए निश्चय ही वे पत्नियाँ उत्तरदायी हैं जो अपने पतियों और उनकी संपत्ति को अपने तथा अपने पैतृक सम्बन्धियों तक ही सीमित कर लेने का निश्चित इरादा लेकर पति के परिवार में प्रवेश करती हैं |

मैंने एक ऐसे परिवार को देखा है जिसमे पति और पत्नी केवल इसलिए जुदा हो गए क्योंकि पति ने पत्नी के कहने पर अपने माता-पिता, भाई-बहिन को छोड़ कर जुदा मकान और जुदा वातावरण में रहना स्वीकार नहीं किया | कहते हैं कि पति की हमेशा से यह शिकायत है कि पत्नी के परिवार के रिश्ते-नातेदार व मित्र उसे ऐसा न करने पर बुरा-भला कहते रहते हैं | उसका कहना है कि वह माता-पिता से कैसे अलग हो जाए, जिन्होंने उसे पाला-पोसा, शिक्षित किया और जिनकी सहायता और प्रेम के बिना वह आज भी शान्ति और खुशहाली लाभ नहीं कर सकता |

कोई नहीं जानता कि इनमे से ठीक कौन है | परन्तु पत्नी अपने पति पर ज़ोर देती रहती है कि वह अपने माता-पिता व पैतृक घर ने नाता तोड़ दे | वह प्राय: अनुचित मनोवृति को धारण किए रहती है | यदि पति ने अपनी पत्नी के साथ रहना इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वह उसे खुश करने के लिए अपने माता-पिता और भाई-बहिनों का त्याग करने के लिए तैयार नहीं था, तो इसमें अवश्य पत्नी का ही दोष है |

एक महान लेखक ने इस प्रकार की एक पारिवारिक-उलझन को सुलझाने का प्रयत्न किया था | उसने एक सौतेली मां का चरित्र प्रस्तुत किया | यह सौतेली मां एक ग़रीब व्यक्ति की बेटी थी और उसका विवाह एक लखपति से हो गया | लखपति को अपनी पूर्व-पत्नी से एक बड़ा लड़का और एक बड़ी लड़की भी थी | इन सौतेले बच्चों ने अपनी सौतेली मां की पूर्णत: उपेक्षा की और उसके साथ कठोर व्यवहार करने लगे | उसने महसूस किया कि उसे एक अनचाहे और प्रतिकूल वातावरण में धकेल दिया गया  है | अत: उसने अपने निस्वार्थ प्रेम और सेवा से इन सौतेले लड़के-लड़की की घृणा पर विजयी होना चाहा | उसने अपने सौतेले लड़के पर अपने दैनिक व्यवहार से प्रकट कर दिया कि वह कोई बिन बुलाई महमान नहीं, बल्कि परिवार की शुभचिन्तक-सेविका है | इससे लड़का प्रभावित भी हुआ | जब उसकी शादी हुई तो सौतेली मां ने लड़के की असली मां के आधे गहने उसकी पत्नी को दे दिए | सौतेली पुत्र-वधू को उसके रिश्तेदारों ने भड़का दिया था, इसलिए वह पति के पास सास की बुराई करने लगी | एक रात  जब बहू अपने पति से सास की बुराई करने लगी तो वह क्रोधित हो गया और सोने के कमरे से बाहर चला आया | सीढ़ियों से नीचे जाने के लिए उसे अपनी सौतेली मां के द्वार के सामने से होकर जाना पड़ता था | सौतेली मां ने उसे देखा और उसके पीछे पीछे वह भी बैठक में चली आई | लड़के ने उसे अपने कष्ट का कारण बता दिया | मेरे विरुद्ध उसे क्या शिकायत है ? मां ने पूछा | लड़के ने उत्तर दिया, क्योंकि घर की सब चाबियां तुम्हारे पास रहती हैं, इसलिए उसका भविष्य सुरक्षित नहीं, वह ऐसा मानती है | सौतेली मां चुपचाप अपनी सौतेली पुत्रवधू के कमरे में गई | उसने बहू को गले लगाकर कहा, घर की चाबियों का गुच्छा यह रहा | तुम घर का सब प्रबन्ध करो, इसमें मुझे ख़ुशी ही होगी | इस उदारतापूर्ण व्यवहार से बहू एकदम पसीज उठी | उसने चाबियां लेने से इनकार कर दिया और कहा, मैं अब कभी निंदकों की बातों में न आऊँगी |

लेखक ने अंत में उसकी विवाहित सौतेली बेटी के प्रति उसके व्यवहार का भी वर्णन किया है | उसने किसी तरह लड़की को पीहर में बुलाया और आभूषणों का डिब्बा उसकी गोद में रख कर बोली, यह तुम्हारी माता की सम्पत्ति है, जो वह तुम्हारे व तुम्हारे भाई के लिए छोड़ गई है | मैंने इसके दो भग करके एक तुम्हारे भाई के विवाह में उसे दे दिया और दूसरा भाग अब तुम्हें देती हूँ | उस लेखक ने सुझाया है कि स्वार्थ-हीनता ही गृहस्थी की सब बुराइयों का इलाज है |

ऊपर जो कुछ मैंने कहा, एक कहानी थी | इस प्रकार की एक सच्ची घटना भी मुझे मालूम है | एक बड़े लखपति के चार बेटे थे | विवाह से पूर्व वे सब सुखपूर्वक संगठित जीवन बिता रहे थे | विवाह के बाद चारों बहुओं ने घर की शांति खो डाली | आखिर पिता ने चारों लड़कों को अलग-अलग कर देने का निश्चय किया | परिवार-विभाजन की तिथि निश्चित कर दी गई और इसी बीच अकस्मात एक पुत्र-वधू की मृत्यु हो गई | आखिर विधुर-पुत्र के पुनर्विवाह तक विभाजन टाल दिया गया |

विवाह के लगभग दो वर्ष बाद नई बहू जिस के साथ उस विधुर-लड़के की शादी हुई थी, बहुत बीमार पड़ गई | पूरे परिवार को उस लड़की की चिंता होने लगी | अन्य तीनों बहुएं और उनके पति इस बहू की सेवा में तल्लीन रहने लगे | मैंने बड़ी बहू से पूछा, तुम लोग इसके लिए एकदम इतने चिंतित क्यों हो गए हो ? वह बोली, आप जानते हैं कि विवाह से पूर्व परिवार के चारों लड़कों ने संपत्ति को बाँट लेने का निश्चय किया था | परन्तु इस नई बहू के आने के समय से वातावरण ही बदल गया है | इसने अपने बहुमूल्य गहने-कपड़े और अपनी सेवाएं सब अपनी तीनों जेठानियों के लिए सहर्ष समर्पित कर दिए हैं | हम बारी-बारी खाना बनाती थीं, परन्तु यह देवी हमारे चाहने पर हमारी बारियों पर भी खाना बना देती है | हम सब का मन बदल गया है | अब हमें जुदा होने की इच्छा भी नहीं रही | विशेषकर मेरे श्वसुर इसे बीमार देखकर निराश हो गए हैं | उस दिन वह किसी डाक्टर से कह रहे थे कि यदि वह उसे (बहू को ) बचा लें तो वह अपनी आधी संपत्ति उसे दे देंगे |

दुःख की बात है कि वह बच न सकी और मर गई | उस लड़की के निस्वार्थ भाव ने जो मेल कर रखा था, वह उसकी मृत्यु के बाद ख़त्म हो गया और वह परिवार सदा के लिए बंट गया |

बहुत-से परिवार स्वार्थी बहुओं के प्रवेश के कारण ही नष्ट हो जाते हैं |

कुछ ऐसी भी छोटी-छोटी बातें होती हैं, पति-पत्नी के द्वारा जिनका पालन घर को स्वर्ग बनाने में बहुत सहायक होता है |

एक दिन मैंने बड़े रोचक शीर्षक मैंने अपने को तलाक़ से कैसे बचाया वाला लेख पढ़ा | लेखिका ने कुछ इस प्रकार लिखा था

मैंने प्रेम-वश एक नवयुवक से विवाह किया | वर्ष भर तक सहर्ष जीवन व्यतीत करने के बाद मैंने अपने पति के व्यवहार में कुछ उदासीनता का अनुभव किया | अपने पति के हृदय-परिवर्तनार्थ मैंने बड़ा संघर्ष किया, परन्तु स्थिति ख़राब होती चली गई | आखिर मैंने निर्णय कर लिया कि मैं पति को जुदा हो जाने को कह दूं | परन्तु ऐसा घातक क़दम उठाने से पूर्व मैंने अपने पड़ोस की एक समझदार और सहानुभूतिपूर्ण वृद्धा से सलाह लेनी उचित समझी | मैंने दिल खोल कर उससे अपने दिल की बातें कहीं कि किस प्रकार प्रयत्न करने पर भी मुझे असफलता मिली| उसने शांतिपूर्वक मेरी बात सुनी और मुझसे पूछा कि जब तेरे पति आफ़िस से आते हैं तो तुम उनका स्वागत कैसे करती हो | मैंने कहा, घर की आवश्यक वस्तुओं की सूची उन्हें देकर मार्किट से सामान खरीद लाने को भेज देती हूँ | उसने पूछा, उसे खाना कब खिलाती हो ? जब वे लौट आते  हैं मैंने उत्तर दिया |

यह वृद्धा बहुत समझदार थी | बस वह केवल इतना बोली, जब तुम्हारा पति आफ़िस जाता है, मैं उस समय कल तुम्हारे यहाँ आऊँगी | तुम्हारा घर और पति दोनों सुरक्षित रहेंगे | मुझे तो हैरानी है कि तुम्हारी गृहस्थी इससे पूर्व ही क्यों नहीं भंग हो  गई |

अगले दिन वह मेरे घर आई और घर के नौकरों की सहायता से उसने मेरे घर को साफ़-सुथरा और आकर्षक बना दिया | तब उसने भोजन-गृह को भी पूरी तरह साफ़ कर डाला और खाने की मेज़ पर बड़े करीने और सफ़ाई से फलादि सजाकर रख दिए | उसने मुझसे भी उत्तम पोशाक़ पहन लेने के लिए कहा ताकि मैं चुस्त दिखाई दूं |

कुछ घंटों के काम के बाद उसने मुझसे कहा, आफ़िस की समाप्ति का समय हो रहा है | तुम आगे जाकर पति का स्वागत करो | अपनी किसी प्रकार की घरेलू बातों से उसे चिंतित मत करना | उसे बात करने देना | उसे सीधे खाने की मेज़ पर ले आना और चुपचाप परोसने लगना | घर तथा भोजन की मेज़ साफ़-सुथरी रखना मत भूलना और स्वयं भी साफ़ और चुस्त दिखाई देना | फिर आकर मुझे परिणाम बताना |

जैसा कि मुझे कहा गया था, मैंने वैसा ही किया | चाय-नाश्ता कर लेने के बाद मेरा पति बड़ी मधुर हंसी हंसा और बोला, प्रिये, आज तुम्हारी वस्तु-सूची कहाँ है ? अनुकूल समय आने पर वह भी दे दूँगी, मैंने उत्तर दिया | कुछ प्रेम भरे शब्दों में वह बोले, प्रिये, तुम नहीं जानती कि तुमने आज मुझे कितना प्रसन्न किया है | तुमने मेरी, मेरे घर की तथा मेरे घर की रानी, सबकी रक्षा की है !

इस कहानी से कई पाठकों को लाभ मिला | अनेक लेखक ऐसे हैं जो घर को स्वर्ग बनाने के लिए प्राय: पत्नियों का मार्ग-दर्शन करते रहते हैं | एक पादरी साहब ने एक स्थान पर पत्नी को सलाह दी है | वे लिखते हैं

सर्वप्रथम और विशेषकर, मैं पत्नी को याद दिलाता हूँ कि वह घर को करीने से सजा कर रखे | आदमी सजे-सजाये घर को सम्भवत: औरत से अधिक सराहता है, क्योंकि वह वहां थोड़ा समय रहता है | आपके सजाये हुए कमरे पर यदि सूर्य की रौशनी का प्रवेश हो तो बहुत ही अच्छा होगा |

ऊपर दी हुई सलाह का समर्थन मैं अपने निजी अनुभवों से कर सकता हूँ | एक बार मैं अपने एक सम्बन्धी के घर गया और उसके घर के कोलाहल को देखकर मुझे बड़ा सदमा लगा | दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे पर चिल्ला रहे थे | झगड़े का कारण घर की बेतरतीबी थी | चीज़ें इधर-उधर बिखरी पडी थीं | पति ने कहा, आज रविवार है, मेरी छुट्टी का दिन है, मुझे साफ़-सुथरा घर चाहिए, जहाँ मैं सुख और शान्ति का आनंद ले सकूं | परन्तु घर इतना बेतरतीबी से रखा हुआ है, उसमे क्योंकर शान्ति और आनंद पा सकता हूँ | अब घर छोड़ कर जाऊं भी कहाँ ? पत्नी बोली, लाला जी, आप बड़े नखरे वाले बन गए हैं | मेरे घर रखने में क्या दोष है ? जहाँ घर में बच्चे होंगे चीज़ें तो बिखरेंगी ही | जिस घर में बच्चे खेलते हैं, वह ऐसा हुए बिना नहीं रह सकता |

मैं समझता हूँ कि पति ठीक कहता था, परन्तु मैं उसकी पत्नी से यह सब कह नहीं पाया |

पादरी साहब ने जो दूसरा आदेश दिया वह इस प्रकार है

पत्नी को घर में भी पति के सामने साफ़-सुथरी और चुस्त बनी रहना चाहिए | अपने पति की प्रसन्नता का ध्यान रखना उसका कर्त्तव्य है | बहुत सी औरतें केवल दूसरी औरतों की सराहना की इच्छुक होती हैं, परिणाम यह होता है कि वे अनावश्यक कपड़ों को धारण करती जाती हैं | प्रत्येक स्त्री को चाहिए कि वह अपने फैशन की अपेक्षा पति की रुची का पहनावा रखें |

यह भी बहुत उत्तम आदेश है | एक बार, जबकि लोग एक चुस्त नवयुवक को अपनी पत्नी से बेवफाई करने के लिए लानत दे रहे थे, वह क्रोध से बरस पड़ा, सज्जनो, क्या आपने कभी मेरी पत्नी को घर की चारदीवारी में देखा है ? वह बिल्कुल, भद्दे ढंग से कपड़े पहनती है | जब मैं उसे देखता हूँ, मुझे आघात पहुंचता है और मैं तथाकथित बुरी औरतों की ओर खिंचता हूँ | कम-से-कम उनमे साफ़ रहने का माद्दा और पोशाक की उत्कृष्ट रुची तो है | मेरी पत्नी को, विशेषकर जब वह घर पर होती है, साफ़ और चुस्त रहना सिखा दो | मैं अपने-आप आफ़िस से सीधा घर आने लगूंगा |

मैं उसके क्रोधपूर्ण कथन से बड़ा प्रभावित हुआ | बहुत से नवयुवक केवल इसी कारण वेश्याओं और रखैलों की ओर खिंच जाते हैं क्योंकि उनकी पत्नियाँ घर को गन्दा रखती हैं और पति के साथ अकेली रहने के अवसरों पर भी अपने को साफ़-सुथरे ढंग से सुसज्जित नहीं करतीं |

पादरी साहब का दिया तीसरा आदेश भी बड़ा महत्वपूर्ण है | उन्होंने कहा

केवल विरोध के लिए ही पति के प्रिय विचारों की टीका-टिप्पणी की आदत मत डालो, बल्कि योग्य सीमाओं में उसकी कल्पनाओं तथा अरमानों का मान करना भी  सीखो | केवल स्त्री की ही पसंद और विचार ठीक नहीं होते |

यह बड़ी मूल्यवान शिक्षा है | एक बार एक आदरणीय बूढी स्त्री ने जो अपने परिवार की मुखिया थी, बड़े खेदजनक भाव से मुझे बताया

मेरा एक लड़का अभी-अभी ब्याहा है | नई दुल्हन में एक बड़ा दोष है | वह परिवार के प्रत्येक जन के विचारों का विरोध करती है | यहाँ तक कि बाहरी लोगों से मिलकर हमारी विचारधारा की निंदा करती है | वह इतनी घमंडी है कि कभी इतना भी नहीं सोच पाती कि अपने परिवार की निंदा कर वह स्वयं अपना निरादर करती है और पति को कोई लाभ नहीं पहुंचाती | वह यह नहीं समझती कि वह उसी परिवार का एक अंग है जिसकी वह निंदा करती है | अपने परिवार के आदर के साथ उसका अपना आदर बढ़ता है | परिवार के अपमान से उसे भी उसकी भागी बनना पड़ता है | वह महसूस ही नहीं करती कि अपने पति तथा उसके सम्बन्धियों की बात काटने से वह धीरे-धीरे उनके प्रेम से वंचित हो रही है | इस प्रकार का विपरीत आचरण वैवाहिक-सम्बन्धों की मधुरता का घातक है |

अपने-आप में ये बातें बड़ी छोटी दिखती हैं, परन्तु इनका प्रभाव बहुत गहरा पड़ता है | यदि दुल्हनें या पत्नियाँ ध्यान दें, तो हमारे बहुत-से मधुर सम्बन्ध सुरक्षित रह सकते हैं |

एक बार मेरे बच्चे चिल्लाते हुए मेरे पास आए | मैंने उनसे चिल्लाने का कारण पूछा | उन्होंने एक पड़ौसी का नाम लेते हुए कहा, बाबा, उसने अपनी पत्नी के मुँह पर थप्पड़ मारा और वह सर के बल दहलीज़ पर गिर गई | उन्होंने अपने जीवन में कभी किसी स्त्री को इस प्रकार पिटते नहीं देखा था, इसलिए वह चिल्ला पड़े |

मैंने उस व्यक्ति को बुलाया और कारण पूछा | वह मेरा विद्यार्थी था| वह बोला, महोदय, मेरी पत्नी की आदत है कि जब भी मैं किसी से बातें करता हूँ, वह हमेशा बीच में बात काटती है | मैंने उसे कई बार कहा है कि जब मैं दोस्तों से बातें करता हूँ, उसे चुप रहना चाहिए | मैंने उससे कई बार प्रार्थना की है कि वह बोलने की अपेक्षा, शान्ति से बात को सुन करे | परन्तु वह मेरे कहने को कुछ नहीं मानती | आज मुझे क्रोध आ गया और मैं उसे मार बैठा | मुझे अपने किए पर पछतावा है, परन्तु मैं बेबस हो गया था |

अन्य कई पतियों ने भी अपनी पत्नियों के सम्बन्ध में ऐसी ही शिकायतें की हैं | क्या अच्छा हो यदि ऐसी स्त्रियाँ और पुरुष बीच में बोलना या बात काटना छोड़ दें |

कुछ हार्दिक शक्तियां ऐसी भी हैं जो विवाहित जीवन की शांति के लिए घातक प्रमाणित होती हैं | इनमे से एक इर्ष्या है |

एक स्त्री ने अपना अपराध मानते हुए स्वयं लिखा था कि वह क्योंकर विधवा हुई और किस प्रकार उसने अपने पारिवारिक जीवन का अपने हाथों नाश कर लिया | उसने एक ऐसे युवक से विवाह किया, जिसे वह हर प्रकार से योग्य समझती थी | जब वह अपने भावी पति से प्रेम करने लगी, तो उस उदार-युवक ने अपने गत-जीवन की पूरी कथा उससे कह डाली | उसने विश्वासपूर्वक अपनी प्रेमिका को बताया कि बचपन से ही वह एक लड़की के प्रति आकर्षित रहा है, जो उसके साथ खेलती और उसके साथ ही पढ़ती थी | वे दोनों कई वर्ष तक इक्कठे रहते, खेलते और पढ़ते रहे और आखिर परिपक्व-अवस्था को प्राप्त हुए | उन्होंने विवाह करना इसलिए उचित नहीं समझा कि वह परस्पर भाई-बहन की तरह प्रेम करते रहे थे और अब पति-पत्नी की तरह एक-दूसरे को चाहना उनके लिए सम्भव न था | जब उन्हें अपने स्नेह की पवित्रता का यक़ीन हो गया तो उस बहन- लड़की ने युवक को अपने पसंद की लड़की से विवाह कर लेने की अनुमति दे दी | अब युवक को मनचाही लड़की मिली तो उसने उसका परिचय अपनी बहन से करा दिया और पारस्परिक लगाव की कथा भी कह सुनाई और कहा, यदि हमने एक-दूसरे को पति-पत्नी के रूप में चाहा होता, तो हमारे विवाह के मार्ग में कोई बाधा उपस्थित नहीं हो सकती  थी | यद्यपि हम में बहुत लगाव है, तथापि वह ऐसा नहीं कि अपने जीवन-साथी के प्रति बेवफ़ा बन सकता हो |

भावी दुल्हन ने युवक को विश्वास दिलाया कि उनके भाई-बहन के सम्बन्ध पर उसे पूरा भरोसा है | उसने उन्हें बेरोक-टोक मिलने की अनुमति दे दी |

उन दोनों का विवाह हो गया | कम-से-कम एक वर्ष तक उनका विवाहित जीवन परस्पर सुख और मेल का रहा और वह बहन भी अनेक बार उनके घर आती-जाती रही | कोई दुर्घटना नहीं हुई, परन्तु एक दिन पत्नी ने महसूस किया कि उसके मन पर इर्ष्या का सर्प कुंडली मारने लगा है | स्वभावत: ही उसके व्यवहार में एक परिवर्तन-सा आने लगा | बहन उसे भांप गई | उसे आगे ख़तरा दिखाई दिया, अत: उसने भाई के घर आना बंद कर दिया | जब अचानक बहन का आना बंद हो गया, तो भाई जाकर उससे मिला | बहन ने उसे बताया कि वह यह समझती है कि उसकी पत्नी उससे इर्ष्या करती है | वह स्वयं इस बात को परख सकता है |

भाई को लगा कि उसकी पत्नी सचमुच उनके भाई-बहन के सम्बन्ध पर शक़ करती है| अत: उसने बहन से मिलना छोड़ दिया | उनकी जुदाई लम्बी और दुखदाई हो गई | भाई दुखी और उदास रहने लगा | उसकी पत्नी ने भी पति में इस परिवर्तन को देखा | उसे दुःख हुआ कि इर्ष्या के कारण वह पति का प्रेम और प्रसन्नता दोनों खो रही है | अत: उसने बहन को पत्र लिखा कि वह उनके घर आए | उसने बहन के घर पहुँचने तक यह बात अपने पति से छुपाए रखी | भाई बहन को देखकर अति-प्रसन्न हुआ और उसके आने का कारण पूछने लगा | उसने बताया कि किस प्रकार उसकी पत्नी ने पत्र में उसे आने की प्रार्थना की और लिखा कि उसके घर की शान्ति और प्रसन्नता उसी के आने-जाने पर निर्भर है | यह सुनते ही वह अपनी पत्नी के कमरे की ओर दौड़ा-दौड़ा गया और उसकी इस दया के प्रति अपना गहरा प्रेम और आनंद प्रकट किया |

बहन सम्भवत: वहां इतनी देर तक ठहरी कि पत्नी का इर्ष्या-परायण हृदय फिर उसे सहन न कर सका | उसे अपने पति को कहना पड़ा कि वह अपनी बहन को चले जाने को कह दे, कुछ समय बाद बेशक वापस आ जाए |

कई महीने तक बहन उनसे दूर रही | पति को बहन की जुदाई दुखी करने लगी और उसकी उदासी दिन-प्रतिदिन बढ़ती चली गई | पत्नी ने पति की दुखमय स्थिति देखी  और जब उसने अनुभव किया कि मुआमला ख़राब से ख़राब होता जा रहा है और संभव है उसका पति बहन की जुदाई के दुःख को सहन न करके उससे सम्बन्ध काट ले, तब उसने अपने पति से प्रार्थना की कि वह उसे क्षमा कर दे और अपनी बहन को बुलाकर जब तक चाहे रखे, सदा के लिए भी रखे तो उसे आपत्ति न होगी | वह बोली कि उसे पति को संतुष्ट और प्रसन्न देख कर ही ख़ुशी होगी |

बहन उनके घर पर आई और वह यह यत्न करती रही कि उसका वहां रहना कम-से-कम हानिकारक और अधिक-से-अधिक सुखदायक हो | बहन जो भी करती, वह गृहणी से सलाह लेकर करती | परन्तु सम्भवत: भाग्य उसके विरुद्ध था | एक सांझ भाई-बहन कार में कहीं घूमने गए | वे एक जंगल में घुसे और दुर्भाग्यवश मार्ग भूल गए | रात भर अँधेरे में उन्होंने मार्ग खोजने की कोशिश की, परन्तु प्रात: के प्रकाश की सहायता के बिना वे जंगल से बाहर निकलने का रास्ता न पा सके | पीछे गृहणी का चिंतित होना स्वाभाविक ही था, परन्तु अनिष्ट तो यह हुआ कि उसका पुराना इर्ष्या-सर्प फिर से फुंकारने लगा और उसने उसकी सहृदयता को डस कर विषमयी बना दिया | अपने पति की सकुशल वापसी पर आनंदपूर्ण उसका स्वागत करने के स्थान में उसने उन दोनों को बुरी तरह डांटना और गाली देना शुरू कर दिया | पति को इस पर भयंकर आघात पंहुचा और उसने बहन को उसी कार में बिठाया और स्टेशन पर रवाना कर आया | जब वह घर आया तो इर्ष्या के विष में उबलती उसकी पत्नी ने एक बार फिर उसे डांटा | इस बार पति यह सहन न कर सका | वह कभी न लौटने के ख्याल से कार में बैठकर घर से चला गया | अस्वस्थ मन:स्थिति में तीव्रतम गति से दौड़ती हुई उसकी कार एक पेड़ से टकरा कर टुकड़े-टुकड़े हो गई और वह आकस्मिक मृत्यु को प्राप्त हुआ |

पति के जाने के बाद पत्नी को होश आया | वह अपने व्यवहार पर पछताई और उसके लौट आने के लिए व्याकुल हो उठी | जब उसे दुर्घटना की सूचना मिली और उसके पति की मृत-देह घर पहुंचाई गई, तो उसका हृदय टुकड़े-टुकड़े हो गया | वह अपनी इर्ष्या के कारण अपने प्रियतम की उपस्थिति और प्रेम दोनों को खो बैठी | उसने मन में अनुभव किया, यदि हम अपने प्रियजनों की कदर उनके जीवन में करें, जैसा कि प्राय: हम उनकी मृत्यु के पश्चात करते हैं, तो जीवन की बहुत सी विपत्तियों और दुखांत घटनाओं से बच सकते हैं | यदि किसी प्रकार भी मेरा पति जीवित मेरे पास लौट आये तो मैं उसकी निर्देशक बनी रहने की अपेक्षा उसके चरणों की दासी बनकर रहना स्वीकार करूंगी | निस्संदेह इर्ष्या व्यक्ति को पतित ही नहीं करती, बल्कि उसके निकट के सम्बंधियों के साथ शान्ति-प्रसन्नता से रह सकने के अवसरों का भी विनाश कर देती   है |

एक बार जबकि मैं चौक में खड़ा था, चार पहिए की एक बग्घी जिसमे एक सुन्दर घोडा जुता था, मेरे पास से गुज़री | उसमे एक अमीर औरत, जो कि कीमती पोशाक़ और बहुमूल्य आभूषणों से से लदी थी, बैठी हुई थी | पास ही खड़ी एक अन्य स्त्री उसे देखकर कहने लगी, यह औरत कितनी सदभागिनी है ! जीवन की प्रत्येक आवश्यक वस्तु उसे प्राप्य है | इस पर एक राही बोला,मातृत्व के अतिरिक्त उसे सब कुछ प्राप्त है | वह सन्तानाभाव से पीड़ित है | इतना कहकर वह राही मेरे पास आकर खड़ा हो गया और बोला, ये ग़रीब औरत या अन्य सब, जो इस अमीर-स्त्री से इर्ष्या करते हैं, उसके दुखी जीवन से ज़रा भी परिचित नहीं | मैंने पूछा, उसे क्या कष्ट है ? वह बोला, उसका सबसे बड़ा शाप उसकी इर्ष्या है | वह प्रत्येक ऐसी औरत से, जो माँ बनने वाली है व बालक को जन्म देती है, भयानक इर्ष्या रखती है | जिस दिन उसे यह पता चलता है  कि उसके छोटे-से नगर में किसी के यहाँ बच्चा हुआ है, तो वह उस दिन खा-पी नहीं सकती | वह परिवार में क्लेश पैदा कर देती है | उसका पति उसे बहुत चाहता है | उसने उसे कई बार यह सुझाव दिया है कि वह किसी बच्चे को गोद ले ले, परन्तु यह दूसरी औरत का बच्चा गोद लेने से इन्कार करती है और इर्ष्या में हर समय जलती रहती है | उसके पति को यह शिकायत है कि जीवन में प्रत्येक सुख के साधन होते हुए भी उसकी पत्नी की इर्ष्या ने उसके जीवन से शान्ति और प्रसन्नता का अपहरण कर लिया है |

एक लड़की ने अपने जीवन की सत्य कथा लिखी थी, जो मैं अपने शब्दों में नीचे कहता हूँ | उसने लिखा, मैं परिवार में दोनों बहनों से छोटी हूँ | मेरी बड़ी बहन स्कूल  में हमेशा पुरस्कार पाती थी, परन्तु मुझे कभी कोई पुरस्कार नहीं मिला था | किन्तु मैं अपनी माता की अधिक लाडली थी, इसलिए प्राय मैं माता से कहकर अपनी बहन की इच्छा के विरुद्ध पुरस्कार में मिली उसकी पुस्तकें या अन्य वस्तुएं प्राप्त कर लेती थी | वास्तव में मैं अपनी बड़ी बहन से इर्ष्या रखती थी | मुझे उसके रंग-रूप, पुरस्कार प्राप्त करने की योग्यता तथा परिचितों से प्राप्त स्नेह और कदर, सबसे इर्ष्या थी |

खुशकिस्मती से मेरी बड़ी बहन एक उत्तम और योग्य युवक का प्रेम पा गई | मैं अभी कालेज में ही थी कि उसकी सगाई हो गई | विवाह की तारीख भी निश्चित हो गई | मुझे तारीख की सूचना दी गई, परन्तु उसके विवाह से पूर्व मेरे पिता इतने बीमार हो गए कि डाक्टर ने उन्हें सेनेटारियम में रहने की हिदायत की | मेरी बहन ने विवाह की तारीख आगे तक टाल दी | और मेरे पिता के साथ सेनेटारियम में चली गई | मुझे घर आने पर विवाह की तारीख में फेर-बदल की ख़बर पड़ी | मुझे दुःख हुआ, परन्तु जब मैंने अपने भावी बहनोई को देखा, तो एकदम उसकी ओर खिंच-सी गई | इतना अच्छा पति पा जाने के कारण मैं अपनी बहन से नफ़रत करने लगी | मैंने बहन के भावी पति को चुरा लेने का निश्चय कर लिया | किसी प्रकार मैंने उसे अपने जाल में फंसा लिया | मेरे साथ विवाह कर लेने के सिवाए अब उसके पास कोई चारा न रहा | जब मैंने उसे पूरी तरह अपने जाल में फंसा लिया, तो विवाह में भी कोई देरी नहीं की | मेरी माता ने, जोकि मुझे बहुत चाहती थी, इस कार्य में मुझे सहयोग दिया | उसे इसमें कुछ भी बुरा नहीं लगा |

माता ने बड़ी बहन को उसके मंगेतर और मेरे विवाह की निश्चित तिथि की सूचना दे दी | इस अन्याय के कारण मेरी बड़ी बहन को बहुत आघात लगा और मेरे रोगी पिता तो यह आघात सह ही नहीं सके और हमेशा के लिए हमसे जुदा हो गए |

मैंने बहन के मनचाहे पति से विवाह कर लिया तो भी मेरी इर्ष्या  का अंत नहीं हुआ | मैंने बहन का पति छीन ही न लिया था, बल्कि उसके लौटने पर यह भी मुझे सहन नहीं था कि वह (अब मेरा पति) उससे बात भी करे | विवाह के कई महीने बाद, एक दिन मैंने अपने पति को सीढ़ी के पास बहन से कुछ गंभीर बातचीत करते देखा, मैं बुरी तरह उन पर चिल्लाई, उन्हें गालियाँ भी देने लगी, बल्कि मारने की नीयत से शीघ्रतापूर्वक सीढीयाँ उतरने लगी | बीच में ही मेरा पांव फिसल गया और मैं लुढ़कती हुई सीढ़ियों के नीचे आ गिरी | मेरी टांग टूट गई | मुझे अस्पताल पहुंचाया गया, जहाँ बड़ा कष्टप्रद समय बीता |

एक दिन मेरा भाई अस्पताल आया और मेरे निकट बैठ गया | वह बोला, मेरी अभागिन बहन, तुमने इर्ष्यावश अपना जीवन तबाह कर लिया |तुमने इर्ष्या के ही कारण बड़ी बहन के पति को छीन लियाऔर अब तुम कभी सुखी विवाहित-जीवन व्यतीत नहीं कर सकतीं, क्योंकि तुम्हारे पति को भी तुम्हारे इस दूषित भाव का पता चल चुका है | तुम्हारे लिए अब उत्तम यही है कि तुम अपने पाप का प्रायश्चित करो | मैंने उत्तर दिया, प्रिय भाई, तुम सत्य कहते हो | मैं कभी खुश नहीं रह सकती | मेरी इर्ष्या सदैव मुझे जलाती रहेगी | इस दु:साध्य इर्ष्या रोग से छुटकारा क्योंकर हो सकता है ? भाई ने कहा, अपने पति को तुम तलाक़ देने और बड़ी बहन से विवाह करने की छूट दे दो | यदि तुम मन की शान्ति चाहती हो, तो तुम्हें प्रायश्चित करना ही पड़ेगा |

उस इर्ष्यालू स्त्री ने भाई की बात मान ली | बाद में वह लिखती है जिस दिन से मैंने भूल सुधारी, तभी से मुझे पूर्ण शान्ति प्राप्त है | अपनी बहन के यहाँ भी मुझे ख़ूब सत्कार मिलता है और मैं निश्चयपूर्वक कह सकती हूँ कि दूसरों के आंसुओं पर निर्मित जीवन कभी शान्तिपूर्ण और सुखद नहीं हो सकता |

साधारणत: हिन्दुओं और मुसलमानों में बहु-विवाह कोई पाप नहीं | मुसलमान तो अपने धर्म के अनुसार चार पत्नियां रख सकते हैं | हिन्दू को भी कानून एक से अधिक पत्नी रखने से मनाही नहीं करता | (यह पुस्तक लेख रूप में 1951 में लिखी गई थी, उस समय हिन्दुओं में बहु-विवाह की मनाही नहीं थी ) | परिणाम यह हो रहा है कि विशेषत: उच्च पदों पर नियुक्त तथा धनवान पुरुष बिना विचारे दो-दो विवाह किये जाते हैं |

मैंने एक बार पत्र मे पढ़ा कि एक पत्नी ने किसी युवती को जिसकी ओर उसका पति गहरा आकर्षण रखता था, खुलेआम पीट दिया | कहते हैं कि उसका पति लगभग रोज़ शाम उस युवती के साथ घूमने जाया करता था | पत्नी को इसमें आपत्ति थी, उसने विरोध भी किये, परन्तु पति ने उसकी ओर कोई ध्यान न दिया | वह बहुत दुखी थी | उसने अपने किसी सम्बन्धी के पास अपना दुःख प्रकट किया और फिर दोनों ने एक योजना तैयार कर ली | वह सम्बन्धी जानता था कि वे दोनों किस समय घूमने निकलते हैं | वह अपनी बहन को साथ लेकर ऐसे स्थान पर जा खड़ा हुआ जहाँ से वे प्राय: हर रोज़ गुज़रते थे | इस स्थान से जब वे निकले तो पत्नी उस युवती पर झपटी और उसे नीचे गिराकर ख़ूब पीटा | उसके पति को स्पष्ट चेतावनी दे दी गई कि वह बीच में न पड़े, स्त्रियों को अपने-आप निपटने दे | लड़की ने पर्याप्त संघर्ष कर अपने को छुड़ाया और अपने घर भाग गई | अनेक लोगों ने इस घटना को देखा, तो भी इस दंड का उन दोनों पर कोई हितकर प्रभाव नहीं पड़ा | कहते हैं उन दोनों ने विवाह कर लिया | इस प्रकार, पहली वफादार पत्नी और उसके बच्चों की माता के साथ घोर विकट अन्याय हुआ | प्राय: ऐसी दुखी पत्नियाँ अपने पतियों को छोड़ भी नहीं पाती, क्योंकि वे पति-घर को ही अपने तथा बच्चों के लिए रक्षा स्थान समझती हैं |

ऐसी ही एक दुःखपूर्ण घटना का मुझे व्यक्तिगत परिचय है | एक जोड़ा कई वर्षों से सुखी गृहस्थ-जीवन व्यतीत करता था | समय के साथ पति के भाग्याकाश का सितारा ख़ूब चमक उठा और वह एक अनजान और साधारण व्यक्ति से ख़ूब धनवान तथा जाना पहचाना व्यक्ति बन गया | अपनी नई अमीरी की स्थिति में वह एक युवा शिक्षित लड़की की ओर आकृष्ट हो गया और उसने उसके साथ विवाह करने की इच्छा प्रकट की | पहली पत्नी ने जो अनेक बच्चों की मां भी थी, अपना भाग्य-दीप बुझता सा महसूस किया | गृहस्थ-जीवन के नाश होने की कल्पना से वह दु:खी और निराश हो गई | परन्तु पति ने स्पष्ट कह दिया कि वह दूसरी के प्यार में बहुत आगे बढ़ चुका है और यदि वह धैर्यपूर्वक सब सहन कर सके तो वह अपनी शक्ति के अनुसार उसे तथा बच्चों को आर्थिक सहयोग तथा पितृ-प्रेम देता रहेगा | और यदि वह उसके दूसरे विवाह का विरोध करेगी, तो वह चुपचाप उनसे जुदा हो जाएगा और कोई सहयता भी न देगा |

उसने दूसरा विवाह कर लिया | यह विवाह क़ानून या रिवाज़ की रुकावट न होने के कारण ही हुआ | यदि दो पत्नियां रखना अपराध होता, तो पति ने शायद ऐसा  न किया होता | दो विवाह करने की पाप-धारणा ने कई घरों को इसी प्रकार विनष्ट कर दिया |

क्योंकि बहु-विवाह पाप नहीं है कई पढ़े-लिखे जन, बिना सोचे-विचारे ऐसा कर लेते हैं | कई वर्ष पूर्व मैं अपनी वार्षिक यात्रा पर बम्बई गया हुआ था, तभी बम्बई के अनेक समाचार पत्रों ने एक गज़ेटेड-आफ़िसर के एक उच्च-शिक्षा प्राप्त युवती से, जो कि नगरपालिका में उच्च-पदाधिकारिणी थी, विवाह का रोमांचकारी समाचार छापा था | एक पत्र ने लिखा था कि युवती ने खुलेआम घोषित किया था कि क्योंकि वह उस युवक गज़ेटेड-आफ़िसर को चाहती थी और बदले में वह भी उसे प्यार करता था, इसलिए उनका विवाह नियम संगत है | जब उस लड़की को याद दिलाया गया कि उस युवक की पहली पत्नी जीवित है और वह उसके बच्चों की मां बन चुकी है, तो वह बोली, क्योकि उसने अपनी पहली पत्नी से प्यार करना छोड़ दिया है, वह विवाह भंग हो गया समझा जाना चाहिए | कुछ अन्य लोगों ने भी लिखा कि उनका प्रेम-बंधन ही, पूर्व विवाह-भंग की अनुमति है | अत: इस प्रकार कुछ लोगों ने कर्त्तव्य और नैतिकता की अपेक्षा भावुकता को ही विवाह का आधार मान लिया | ऐसे दुर्भावी लोगों को निर्दोष और वफादार पत्नी तथा उसके निर्दोष बच्चों के साथ किये गए भयानक अन्याय में कोई पाप नहीं दीखता | यदि दो पत्नी रखना कानूनन अपराध होता, तो दूसरी पत्नी इसका खुल्लम-खुल्ला समर्थन न कर सकती और वह ऐसी कठोरता और बेफिक्री से दूसरी औरत के पति को न छीन लेती |

सन 1908-09 की बात है जब हमारे पड़ोस के सामान्य शांत वातावरण में इस समाचार से सनसनी फ़ैल गई कि मोहल्ले के एक पी.सी.एस. अधिकारी ने नगर का   सबसे बड़ा बंगला खरीद लिया है | अधिकारी का परिवार सभ्य और श्रेष्ठ था | परिवार की लड़कियां न केवल शिक्षित ही थीं, बल्कि गाने और संगीत-कला में भी सुशिक्षित   थीं | परिवार में सबसे छोटा बच्चा लड़की ही थी | वह बड़ी सुन्दर बच्ची थी | जब वह हमारे पड़ोस में आई, तो मुश्किल से बारह वर्ष की थी | केवल दो वर्षों में ही उसका विवाह एक उच्च परिवार के युवा ग्रेजुएट से कर दिया गया | यह विवाह सबकी स्पर्द्धा का कारण बना | दो प्रसिद्द परिवार इस प्रकार संगठित हो गए थे | हम सब पडोसी इस विवाह को एक बड़ा वरदान मानते थे | परन्तु भाग्य हमारी कल्पित-आशाओं पर मुस्कराता-सा दिखाई पड़ता था | लगभग दस वर्ष बाद एक दिन अकस्मात् हमारे पड़ोस में यह हृदयविदारक समाचार फ़ैल गया कि उस ग्रेजुएट ने अपनी देवी समान पत्नी के होते एक फैशनेबल रमणी से विवाह रचा लिया है | उस देवी-समान लड़की के दुर्भाग्य को देखते हुए, इस विवाह ने हमारे सारे नगर को झकझोर दिया | सब लोगों को लड़की से सहानुभूति थी और सब उस दूसरी शादी करने वाले युवक से घृणा करने लगे थे | पड़ोसियों को हैरानी थी कि इतनी सुन्दर और सुशील पत्नी के रहते वह ग्रेजुएट क्योंकर एक वैश्यासरीखी औरत से विवाह करने को तत्पर हुआ | परन्तु वासना अंधी होती है | वह प्राय: मनुष्य को बुराई के दलदल में खींचती है | ग्रेजुएट पुरुष के इस दूसरे विवाह का परिणाम यह हुआ कि पहली पत्नी का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा | अन्तत: वह दु:खों को सह सकने में असमर्थ होने के कारण मृत्यु को प्राप्त हुई | अत: यहाँ बहु-विवाह प्रथम पत्नी की मृत्यु का कारण बन गया |

ऐसी ही एक और घटना है | एक जागीरदार अपनी पहली पत्नी के होते हुए अन्य किसी युवती की ओर आकृष्ट हुआ और अपनी पत्नी के विरोध और बेटों के क्रोध की परवाह न करते हुए उसने उस लड़की से विवाह कर लिया | कुछ ही वर्षों में यह समाचार मिला कि वह विषयी जागीरदार, जिसने केवल बुद्धि-भ्रष्टता के कारण ही उस अवस्था में युवती से दूसरा विवाह किया था, बड़ी सड़क पर मरा हुआ पाया गया | यह अफवाह फैली हुई थी कि उसकी मृत्यु का कारण उसका एक लड़का था | तथापि कुछ प्रमाणित न हो सका, यह विश्वास अवश्य बन गया कि बुरे जीवन का अन्त भी बुरा ही होता है | इस स्थिति में स्वयं पापी को दण्ड भोगना पड़ता है |

बहु-विवाह की घटनाएं सदैव समाज को झकझोरती ही रही हैं | मेरी दृष्टि में आई एक अन्य घटना में ऐसा ही हुआ था | एक उत्तम परिवार की लड़की का विवाह एक ऊंचे परिवार के युवक से हुआ | इस युवा जोड़े के यहाँ सुन्दर बच्चे भी हुए थे | इस प्रकार वे अपने जीवन में प्रसन्न और संतुष्ट थे | परन्तु भाग्य उन पर हंसने लगा | युवा पति किसी अन्य शिक्षित लड़की के प्रेम में फंस गया और उससे विवाह भी कर लिया | परिणाम यह हुआ कि वह पहली पत्नी से जुदा हो गया और उसने उसके बच्चों को अपने पास रख लिया | मैंने अपने संवाददाता से पूछा, जब बच्चों को अपनी माता के साथ किये गए व्यवहार का ज्ञान होगा, तो परिवार की स्थिति क्या होगी ? मेरी बात सच्ची निकली | सबसे बड़ा बच्चा इतना समझ गया कि उसकी दूसरी माता उसकी वास्तविक माता नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक माता के कष्टों का कारण यह दूसरी मां ही थी | इस जानकारी से बच्चों और उनके पिता तथा विमाता के सम्बन्ध कटु होते चले गए | इसी प्रकार दूसरा विवाह प्राय: अनेक समस्याओं को जन्म देता है |

बहु-विवाह में विभिन्न प्रकार के अनेक दोष होते हैं | दूसरे विवाह में हमेशा दूसरी पत्नी पहली पत्नी के आंसुओं पर अपनी ख़ुशी का महल बनाती है | कई बार तो ये आंसू सगी बहन के भी हो सकते हैं |

एक बार एक बड़ी बहन ने अपनी छोटी बहन को किसी विशेष कार्य के लिए बुलाया | बड़ी बहन, जो कि कुछ बच्चों की मां बन चुकी थी, कल्पना भी न कर सकती थी कि उसकी छोटी बहन उसके पति को अपनी ओर आकर्षित कर लेगी | परन्तु हुआ यह कि उसके आजाने से ही उसके पति और बहन में प्रेम हो गया और उन्होंने विवाह भी कर लिया | जब यह बात बड़ी बहन पर खुली तो वह अपना विश्वास और संतुलन खो बैठी | यहाँ बड़ी बहन के दो बच्चे भी इसी बहु-विवाह के शिकार हो रहे हैं | इस परिवार की आगे क्या स्थिति होगी, यह तो अभी भविष्य ही बता सकता है |

अनेक विवाहित जीवन पति-पत्नी के मिथ्याभिमान के कारण विनष्ट होते देखे गए हैं | यदि यह भयानक भाव उन परिवारों में न होता तो उनमे से बहुत से परिवार सुखी और सुरक्षित रहते |

मैं एक परिवार को जानता हूँ | यह बड़ा उत्तम परिवार था | परिवार के लड़के तथा लडकियां सब सुसंस्कृत व सुशिक्षित थे | परिवार की ग्रेजुएट लड़कियों में से एक की सगाई एक अन्य सुपरिवार के ग्रेजुएट लड़के से हुई थी | सगाई के दौरान वे दोनों एक-दूसरे के लिए आदर तथा गहरा प्रेम दिखाते रहे, जिससे सभी यह आशा करते थे कि विवाहोपरांत यह जोड़ा स्वर्गीय-जीवन व्यतीत करेगा | कुछ समय बाद मुझे यह सुन कर खेद हुआ कि उनकी सगाई टूट गई | दोनों परिवारों के मित्र व परिचित इस दु:खद घटना से हैरान हो गए | स्थिति की जानकारों से मुझे यह पता चला कि उनकी जीवन-नौका केवल मिथ्याभिमान के कारण ही दलदल में फंस गई थी | लड़की का विचार था कि उसका भावी पति उसके लिए सब कुछ करने को तैयार होगा | अत: उसने लड़के से सलाह किए बिना ही अपने विवाह-स्थान की घोषणा कर दी, जो कि लड़के व उसके सम्बन्धियों के लिए किसी भी प्रकार से अनुकूल न था | लड़के ने आपत्ति की | लड़की ने इस पर विद्रोह कर दिया और बोली, यदि विवाह से पूर्व तुम मेरी इतनी सामान्य सी इच्छा भी पूरी नहीं कर सकते, तो विवाह के बाद जब मैं तुम्हारी कहलाऊंगी, तुम मेरे लिए क्या कर सकोगे ?

मंगेतर ने अपनी लाचारी दिखाते हुए उसे अपने निश्चय पर पुनर्विचार करने की प्रार्थना की | परन्तु लड़की टस-से-मस नहीं हुई | उसने स्पष्ट कह दिया कि वह पूर्व निश्चित शहर के अतिरिक्त और कहीं भी विवाह करने को तैयार नहीं | दुःख की बात है कि लड़की अपनी जिद्द न छोड़ सकी और वह लड़का अपने माता-पिता का हुक्म न टाल सका, जो उसका विवाह अपने ही नगर में, जहाँ उसकी जात-बिरादरी के लोग रहते थे, करना चाहते थे | आखिर सगाई टूट गई | कहते हैं कि लड़के ने किसी अन्य लड़की से विवाह कर लिया | यहाँ केवल मिथ्याभिमान के ही कारण वह लड़की सुखी विवाह और जीवन-साथी से वंचित रह गई | सुनने में आया है कि उस लड़ी ने अभी विवाह नहीं किया |

गृहस्थ में भी मिथ्याभिमान के कारण पति-पत्नी को अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता है | मैं एक ऐसे जोड़े को जानता हूँ जो सदा झगड़ा ही करता रहता था| मिथ्याभिमान के कारण वह एक-दूसरे को सन्मान नहीं देते थे | और यही बात उनके झगड़े का कारण थी | सच तो यह है कि वास्तविक कारण की ख़बर मुझे तभी लगी जब एकबार अनजाने में ही मैंने उनकी परस्पर बातचीत को सुना मैं तुम पर आश्रित नहीं, अत: तुम्हें मुझ पर क्रोध करने का भी कोई अधिकार नहीं | मैं अपने लिए स्वयं कमाती हूँ, तो भी मेरे साथ अशिष्ट व्यवहार करते हो | यदि मैं पूर्णत: तुम्हीं पर आश्रित होती तो शायद तुम हर समय के तानों से मुझे घर से ही निकाल देते | मैंने निकट खड़े एक व्यक्ति से पूछा कि मुआमला क्या है | वह बोला, अपनी रोज़ी कमाकर लाने वाली औरत अपने पति की बात सुनने को भी तैयार नहीं | अपने मिथ्याभिमान के कारण वह हर समय झगड़ा खड़ा किये ही रहती है |

सूचना देने वाले के इन भावों ने मुझे एक उच्च परिवार की मुस्लिम लड़की की याद दिला दी, जो प्राय: कहती थी, पति पर आश्रित रहकर ही औरत अच्छी रहती है | जीवन में स्वतंत्र आधार बनाकर तो वह कभी नम्रता नहीं रख सकती |

उस परिवार में सदा का झगड़ा होते देख कर मैंने महसूस किया कि मिथ्याभिमान पारिवारिक-सुखी जीवन के लिए प्लेग के सामान है |

प्रश्न पूछा जा सकता है कि क्या सभी औरतें जीवन में स्वंतत्र आधार बनाकर अपने पतिओं की ओर अभिमानी हो जाती हैं ? कदापि नहीं | ऐसी औरतें भी हैं जो अपने पतिओं और गृहस्थ-जीवन को इतना चाहती हैं कि किसी भी मूल्य पर मिथ्याभिमान-वश वे अपनी प्रसन्नता और सुख को खोना नहीं चाहतीं |

मैं एक युवा लड़की के बारे में जानता हूँ जो कि अब मर चुकी है | वह अपनी कमाई से अपने पति की शिक्षा का प्रबन्ध करती थी | जब भी वह वेतन लाती, पति को सादर समर्पित करते हुए कहती, प्रिय पति के थोड़ा भी काम आ सकना मैं अपना अधिकार समझती हूँ |

असली बात यह है कि अच्छे हालात या तो हमें घमंडी बनाते हैं या दीन और नम्र ? क्या पत्नी अपनी स्वतंत्र कमाई को पति-सेवा का साधन मानती है ? या इसी कारणवश वह पति से विशेष-आदर की मांग करती है ?

एक बड़ी विचित्र घटना मेरे देखने में आई जिससे मिथ्याभिमान के विनाशकारी प्रभावों पर प्रकाश पड़ता है | एक युवा धनवान व्यक्ति ने एक लड़की से विवाह किया | वह शिक्षा के लिए बहुत इच्छुक थी | युवक अपनी पत्नी पर प्राण न्योछावर करता था | लड़की ने उससे प्रार्थना की कि वह उसे किसी अच्छे विद्यालय में आगे शिक्षा दिलवाये | उसने एक बोर्डिंग हाई स्कूल में, जहाँ शिक्षा की सभी सुयोग्य सुविधाएं सम्भव थीं, अपनी पत्नी को दाखिल करवा दिया | उसने उसकी शिक्षा पर ख़ूब पैसा बहाया | उसकी पत्नी भी सुयोग्य लड़की थी | उसने मैट्रिक परीक्षा पास कर ली | युवक ने बिना यह विचारे कि वह अपने पारिवारिक-जीवन की जड़ों पर कुल्हाड़ी चला रहा है, उसे और उच्च-शिक्षा पाने के लिए भेज दिया | पति की दया-भावना ने उसका माथा फेर दिया | वह अपने को श्रेष्ठ मान बैठी और महसूस करने लगी कि वह जीवन-भर किसी अंग्रेज़ी-शिक्षा-विहीन धनवान से बंधी नहीं रह सकेगी | लोगों ने पति को पत्नी के जीवन और प्रवृति में बुरे परिवर्तन के प्रति सावधान करना चाहा, परन्तु पति उसे इतना चाहता था कि उसमे कोई दोष देखने में असमर्थ था | परिणामस्वरूप उसके जीवन की दु:खद स्थिति तब प्रकट हुई, जब बी.ए. करने के बाद लड़की ने उसके साथ रहने से इनकार कर दिया | कहते हैं कि पति-पत्नी ने परस्पर जुदा हो जाने निर्णय कर लिया | लड़की ने एम्.ए. पास किया और एक उच्च शिक्षा-प्राप्त व्यक्ति से पुनर्विवाह रचा लिया | यह निश्चय ही बड़ी दु:खद बात थी- मिथ्याभिमान और शोकपूर्ण परिणाम |

केवल स्त्रियाँ ही उच्च-शिक्षा या स्वंतत्र जीवन-प्रवृति से अंधी नहीं होती | एक समय एक अमीर आदमी की लड़की एक ग़रीब परिवार के अति-योग्य लड़के के साथ ब्याही गई | यह युवा पत्नी अपने युवा पति से असाधारण प्रेम रखती थी | उसने पति की इच्छा पूर्ती के लिए अपने माता-पिता को मजबूर किया कि वे उसे उच्च-शिक्षा दिलवाएं | जब वह ऊंचे दर्जे में बी.ए. पास हुआ तो उसने अपनी पत्नी से उच्च-शिक्षार्थ विदेश जाने की इच्छा प्रकट की | लड़की के पिता ने इस अनुमति के विरुद्ध उसे चेतावनी दी | वह बोला, बेटी उसे विदेश मत जाने भेजो | वहां उसका सर फिर जाएगा और वह तुम्हारे प्रति उदासीन हो जाएगा | परन्तु वह पति को बहुत चाहती थी और जीवन में उसकी उन्नति दखने की सच्ची आकांक्षी थी | उसने यह नहीं सोचा कि ग़रीब परिवार के व्यक्ति साधारत: मिथ्याभिमान से भर जाते हैं और अपने-आपको बहुत बड़ा समझने लगते हैं | लड़की अपने हठ पर अड़ी रही और उसका पति विदेश भेज दिया गया | वहां जाकर उसने अपने-आपको बड़ा योग्य सिद्ध किया | इस सफलता से उसमें अभिमान आ गया और वह सोचने लगा कि भारतीय पत्नी उसके योग्य नहीं है| उसने वहां एक अंग्रेज़ औरत से विवाह कर लिया |

जब उसकी पत्नी को यह पता चला तो वह दु:ख से तड़प उठी | उसके माता-पिता के लिए यह मुश्किल हो गया कि किस प्रकार अपनी बेटी को एक निकम्मे और कृतघ्न पति के वियोग से आहें भरने से बचाएं | आश्चर्य की बात है कि पति यह भूल गया कि वह पत्नी के कारण ही कहाँ तक पहुँच गया था | उसे विश्वासघात करने का कोई अधिकार नहीं था, बल्कि उसे जीवन-भर उसका ऋणी रहना चाहिए था | मिथ्याभिमान-वश वह यह भुला बैठा कि उसकी पत्नी ने ही उसे इतना बड़ा बनाया है, अपनी वफादारी, प्रेम और त्याग के द्वारा उसे सुख पहुंचाया है | परन्तु हाय ! मिथ्याभिमान मनुष्य को अन्धा बना देता है और यह व्यक्ति पूर्णत: अन्धा हो गया था |

मेरे जीवन का दुखदतम अनुभव एक युवा लड़की से सम्बंधित है, जिसका पति अनपढ़ और ग़रीब था, परन्तु उसमें अपनी पत्नी को पढ़ाने और प्रशिक्षित करने की तीव्र इच्छा थी | कहते हैं कि वह एक स्कूल में ग़रीब चपरासी के पद पर काम करता था, तो भी उसने अपनी पत्नी को आगे पढ़ाया और ट्रेनिंग भी दिलवाई | समयानुसार उसकी पत्नी उसी स्कूल की मुख्याध्यापिका बन गई जिसमें वह चपरासी का कार्य करता था | उसे अपना जीवन बना देने वाले पति पर गर्व होना चाहिए था, इसकी बजाये वह उसके अस्तित्व से लज्जित होने लगी | कहते हैं कि उसने उसके साथ चपरासिओं का सा व्यवहार ही किया और इतनी बुरी तरह उससे पेश आने लगी कि उसके लिए जीना दूभर हो गया | वह शीघ्र ही मर गया और लोगों ने महसूस किया कि वह अपनी सदभावनाओं और पत्नी के प्रति सेवा-वृति के लिए शहीद हो गया | बहुतों ने तो यहाँ तक कहा कि मृत्यु उसके छुटकारे का साधन बनी |

एक स्त्री की सच्ची जीवन-घटना इस प्रकार है कि उसका पति दूसरा विवाह करके उससे विमुख हो गया | वह स्त्री नई पत्नी के प्रति बदले की भावना से भर उठी और उसे दण्डित करने की सोचने लगी | एक दिन सारा पड़ोस भय से काँप उठा जब यह ख़बर फैली कि उस स्त्री ने अपनी आँखे गरम जलती हुई लड़की से फोड़ डालीं | लोग उसकी सहायता को भागे, परन्तु तब तक वह सदा के लिए अंधी हो चुकी थी | कुछ समय बाद पड़ोसियों ने उससे ऐसा करने का कारण पूछा | उसने बड़ा विचित्र उत्तर दिया, अब मैं अंधी हूँ तो मेरी सौत को मेरी सेवा करनी ही पड़ेगी | और इस प्रकार वह निश्चिन्त होकर अपने विवाहित-जीवन का पूरा-पूरा सुख प्राप्त न कर सकेगी | बदला लेने का यह कितना भयानक तरीका था !

एक दिन मैं किसी परिवार से मिलने गया, तो वहां एक बड़ा अजीब दृश्य मुझे देखने को मिला | पति और पत्नी एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे थे | घर में चूल्हा ठंडा पड़ा था | न आग जलाई गई थी, न खाना बना था | सारा दिन दोनों पति-पत्नी भूखे रहे थे | पति ने अपनी पत्नी की कठोरता की शिकायत की | उसने कहा कि वह उसे भूखा मारने के लिए ही खाना नहीं बनाती | पत्नी बोली, मेरे पति ने मुझे ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है कि मैं भूखी रहकर प्राण दे दूं | वह तो पुरुष है, किसी होटल में जाकर खाना खा सकता है, मैं असहाय औरत हूँ, आर्थिक रूप से भी उस पर आश्रित हूँ | न तो मैं अकेले होटल में जाने का साहस कर सकती हूँ  और न ही मेरे पास पैसे हैं जो मैं भोजन के दाम चुका सकूं |

उसकी बात काटते हुए मैंने पूछा, तुम्हारे घर में अनाजादी मौजूद है और खाना पकाने में तुम स्वयं समर्थ हो | अत: क्यों नहीं अपने और अपने पति के लिए भोजन तैयार कर लेती ? उसने उत्तर दिया, मैं ऐसा नहीं करूंगी | मैं उसे सबक सिखाना चाहती हूँ कि मेरे प्रति उसका अपमान-जनक व्यवहार उसे सुखी नहीं बना सकेगा | मेरे हाथ का पका खाना खाने की कामना करने से पहले उसे मेरी इच्छाओं का आदर करना होगा | वह मेरे जेब-खर्च के लिए मुझे एक निश्चित रक़म देता रहा है और अब इसने  अचानक वह रक़म देनी बंद कर दी है | मैं घर का कोई भी काम करने को तैयार नहीं हूँ ताकि वह मेरी कीमत को पहचाने | इस पर अचानक पति बोल उठा, मुझे खेद ही कि मैंने तुम्हारा खर्च बंद कर दिया | तुम कृप्या गृह-कार्य सँभालो |     इस वाक्य से एक बड़ी दुर्घटना होते-होते बची | पत्नी अपने पति को सीधे रास्ते पर लाने के लिए स्वयं भूखी  मरने पर तुली बैठी थी |

एक सच्ची कहानी है, जिसमे उच्च-शिक्षित दम्पत्ति परस्पर इतनी घृणा करने लगा था कि वे एक-दूसरे को कष्ट पहुंचाने का ही प्रयत्न करते रहते थे | मां ने बच्चों को बाप से विमुख कर दिया | पति ने जवाब में नौकरों को पत्नी का हुक्म न मानने का आदेश दे रखा था | अत: पत्नी को बच्चों के द्वारा किए गए पिता के अपमान और घृणा से ख़ुशी होती और पति को नौकरों के द्वारा पत्नी की अवज्ञा और अपमान से संतोष मिलता | वर्षों तक पति-पत्नी इसी प्रकार परिवार को नरक बना कुत्ते-बिल्ली का सा जीवन बिताते रहे | खेद का विषय है कि उनके सुसंस्कृत-परिवार को यह कभी न सूझा कि वे अपने बच्चों को ऐसे तनाव और दुःख के वातावरण में पोषित कर उनके प्रति बड़ा अन्याय कर रहे हैं|

जहाँ एक ओर अपने भटके पतियों को सन्मार्ग में लाने के लिए बुद्धि और कौशल से उनका हृदय जीतने का प्रयास करने वाली पत्निओं की सच्ची घटनाएं हैं, वहां दूसरी ओर ऐसी पत्नियां भी हैं जो पति के भटकने पर उससे घृणा करने लगती हैं और उससे बदला लेने की ठान बैठती हैं |

एक युवक था | उसने एक सुन्दर और प्रियदर्शी लड़की से ववाह किया | लड़की को यह मालूम न था कि उसका पति भटक चुका है और किसी अन्य स्त्री से भी कोई सम्बन्ध रखता है | परन्तु जब उसे यह पता चला तो सर्वप्रथम उसने इसे सीधे मार्ग पर लाने का प्रयत्न किया | इसमें असफल रहने पर उसका अपमान-जनित हृदय पति से बदला लेने को तड़प उठा | आरम्भ में उसने पति को अपने प्रेम और विवाहित-अधिकारों से वंचित कर दिया | उसका पति खुले-आम उस स्त्री के साथ अनुचित प्रेम करने लगा, तो उसकी पत्नी भी अन्य पुरुषों की ओर आसक्ति दिखाने लगी | इस ग़लत धारणा का परिणाम यह हुआ कि परिवार के बंध टूट गए और उन दोनों का भविष्य अंधकारमय हो गया | सबसे बड़ी दुर्घटना तो यह है कि ऐसे अव्यवस्थित परिवारों के बच्चों का भावी-जीवन दु:खमय हो जाता है |

खेद की बात है कि बदले की भावना अपने-आप कभी शान्त नहीं होती | प्राय: बदले की यह आग एक प्रचंड रूप धारण कर लेती है और परिवार में प्रेम और शान्ति की सभी भावी सम्भावनाओं को भी जलाकर खाक़ कर देती है | कुछ वर्ष पूर्व मैं बम्बई में था | पंजाब आते समय मुझे बम्बाई स्टेशन पर पता चला कि मेरे परिचित परिवारों में से एक लड़की ने आत्म-ह्त्या कर ली थी | मैं जानता था कि वह लड़की अपने युवा पति की बड़ी बुलारी पत्नी थी | उसका पति वहीँ एक दफ्तर में काम करता था | मैंने सूचना देने वाले से पूछा, उस लड़की ने आत्म-ह्त्या क्यों की ? वह बोला, लड़की बदले की इच्छा में अन्धी हो गई थी | उसके घर पर भाई का विवाह होनेवाला है | उसने अपने पति को वहाँ चलने के लिए कहा | पति ने आफ़िस में छट्टी के लिए प्रार्थना-पत्र दिया, जिस पर अधिकारियों ने छुट्टी नहीं दी | उसने पत्नी को समझाया कि वह एकबार फिर अधिकारियों पर छुट्टी देने के लिए दवाब डालेगा | परन्तु वह लड़की मूर्खतावश यही समझती रही कि ऐसी बातों से उसका पति बहाने गढ़ रहा है | जब वह आफ़िस जाने लगा तो उसने व्यंग-बाण छोड़ा, तुम आफ़िस पहुंचोगे तो तुम्हें पता चलेगा कि झूठे बहाने बनाकर मुझे मेरे पीहर ना लिवा जाने का तुम्हें क्या मुल्य चुकाना पड़ेगा | वह अभी दफ्तर पहुंचा ही था कि टेलीफोन पर उसे सूचना मिली कि उसकी पत्नी ने आत्म-ह्त्या कर ली है |

अत: स्पष्ट है कि बदले की भावना के कारण उस युवती ने अपना जीवन तो गंवाया ही, साथ ही एक सुखी परिवार को भी खंडित कर दिया |

कुछ वर्ष पहले समाचार-पत्रों में एक समाचार छपा था कि एक स्त्री अपने नन्हे बच्चे के साथ कुँए में कूद कर मर गई | कारण यही बताया गया था कि वह अपने पति से लड़ पड़ी थी और इस दीवानगी द्वारा उसे दंड देना चाहती थी | यहाँ बदले की भावना से ही वह अपनी सुस्थिर गृहस्थी नष्ट कर बैठी | उसने अपना जीवन खोया, अपने छोटे बच्चों को मृत्यु के घाट उतारा और अपने पति को संताप, पीड़ा और खेद के महा-अन्धकार में तड़पने को छोड़ गई |

पति-पत्नी की बदले की भावना सुखी परिवारों को कैसे खंडित करती है, यह संक्षेप में ऊपर कहा जा चुका है | परन्तु परिवार में केवल माता-पिता ही नहीं होते, उसमे बच्चे भी होते हैं जो भाई बहन कहलाते हैं | भाइयों में बदले की भावना भी कभी-कभी बारूद   के विस्फोट की तरह परिवार का नाश कर देती है |

मेरे जिले के एक तहसील-नगर में एक बार बड़ी भयंकर घटना हुई | बदले के  भाव से उतेजित एक भाई ने दूसरे भाई के परिवार के ग्यारह सदस्यों की निर्मम हत्या करवा दी | बदला तो परमाणु-बम के समान रक्तपात का दृश्य खड़ा कर देता है | काश ! यह बदले का भाव किसी मानवी हृदय में कभी न उपजे | भारतीय इतिहास में, विशेषकर मुस्लिम-युग इस बदले के भाव के कारण नष्ट हुए परिवारों के उदाहरणों से भरपूर है |

ठीक इसी प्रकार, यूरोपियन इतिहास में बदले की भावना से खंडित घरों के उदाहरण पाए जाते हैं | एक यूरोपियन मलिका के सम्बन्ध में प्रसिद्ध है कि उसने प्रेम न होते हुए भी राजनैतिक कारणों से किसी राजकुमार से शादी कर ली | राजकुमार उससे प्रेम करता था, लेकिन मलिका ने इस प्रेम की क़दर न की | वह किसी अन्य व्यक्ति से प्रेम करती रही | उसके पति ने विशेष प्रबंध कर मलिका के प्रेमी को मरवाकर बदला लिया | मलिका भी इसे भूली नहीं, उसमे भी बदले की ज्वाला जलती रही | उसने षडयंत्र द्वारा अपने पति, उस राजकुमार का वध करवा दिया | इससे प्रजा में विद्रोह भड़क उठा और उसे अपना राज्य तथा अन्तत: अपने प्राण भी खोने पड़े | साम्राज्य  एकाधिकारिणी महारानी, जिसका विवाह राजकुमार से हुआ था, का ऐसा शोकपूर्ण अन्त हुआ | सचमुच बदले की भावना ऐसी ज्वाला है जो सुखी गृहस्थों और प्रिय सम्बन्धों को जलाकर धूल में मिला देती है |

नीच घृणा एक और ऐसा विस्फ़ोटक भाव है, जो गृहस्थ-जीवन का विनाश करता है  | एक युवा और सुन्दर स्त्री जिसके तीन-चार बच्चे भी थे, एक दिन मुझसे मिलने  आई | बात-चीत के दौरान मैंने उससे पूछा कि उसका पति कहाँ है | उसने झट उत्तर दिया, वह मुझसे जुदा हो गए हैं, शायद हमेशा के लिए | मुझे हैरानी हुई;  मैंने पूछा, तुम दोनों, समझदार और शिक्षित जोड़ा होते हुए भी जीवन-भर की जुदाई के लिए कैसे तैयार हो गए ? कुछ समय बाद यूँ ही मैंने उससे एक प्रश्न कर दिया, तीनों बच्चे कहाँ हैं ? उसने उत्तर दिया, बेशक मेरे साथ हैं | वे अपने पिता के पास जाने से इनकार करते हैं | फिर उसे मैंने बताया, मैंने तुम्हारे पति को देखा है | वह सुदृढ़-शरीर, ऊंचे कद का उच्च-शिक्षा प्राप्त पुरुष है | तुम उससे जुदाई क्योंकर सहन कर सकीं ? वह बोली, मैंने उसे त्याग दिया, क्योंकि मुझे उससे घृणा है | वह तो पुनर्मिलन के लिए छटपटा रहा है | परन्तु मैं अब उसकी उपस्थिति मात्र भी सहन नहीं कर सकती | मैंने हैरानी से उसकी ओर देखा और कहा, पति से घृणा करने में तुम पूरी उतरती हो | अपने पति से घृणा कर और उसकी सहायता को ठुकरा कर तुम विनाश की ओर बढ़ रही हो | तुम बच्चों को उनके पिता पर गर्व करने से वंचित कर रही हो; और तुम एक परित्यक्त पत्नी होकर बच्चों को उनके पिता के बल और शक्ति के स्वस्थ् प्रभाव से वंचित कर रही हो | उन्हें तुम्हारा कोई नैतिक भय नहीं होगा | तुम्हारा उन पर शारीरिक भय भी नहीं रहेगा | और सचमुच यदि तुम्हारे बच्चे सुरक्षित रह सकें, तो तुम्हें अपने-आप को भाग्यशाली समझना चाहिए |

उसने उत्तर दिया, मैं अपनी स्थिति को जानती हूँ | मुझे अनुमान है कि मैं क्या ख़तरा मोल ले रही हूँ | परन्तु आपको मेरी घृणा की तीव्रता का अनुमान नहीं | मैं अपनी हानियों से लापरवाह हो गई हूँ | मेरा दिल ऐसी अभागी स्त्री से मिलकर बहुत दु:खी हुआ जो यह नहीं समझती कि माता-पिता द्वारा निर्मित अच्छा घर और शांत वातावरण माता-पिता एवं और बच्चों, सभी के लिए एक अच्छा आश्रय-स्थान होता है | मेरी भविष्यवाणी सच्ची प्रमाणित हुई | जो घर उसने अपने तथा बच्चों के लिए बनाया, उससे दुनिया का कोई व्यक्ति स्पर्धा नहीं करेगा |

      एक दिन मुझे एक सज्जन का पत्र मिला जिसमे उसने मुझसे प्रार्थना की कि मैं उसकी बेटी को विश्वविद्यालय की सबसे उत्तम शिक्षा पाने के लिए तैयार करूं | यदि वह उसकी इच्छा स्वीकार कर ले, तो वह 10,000 रु. बेटी के नाम भेजने को तैयार है | ऐसा पत्र पाकर मुझे हैरानी हुई | मैंने लड़की की मां को, जो उसे दाखिल करवाने मेरे पास आई थी, यह शुभ समाचार दिया | ज्यों ही मैंने पत्र का प्रस्ताव उसके सन्मुख रखा, वह क्रुद होकर बोली, यदि वह अपनी सारी संपत्ति भी दें, तो मैं उसे छूना तक नहीं चाहती | मैं तो यह अनुभव करती हूँ कि मेरी बेटी अपने पिता से आर्थिक सहायता माँगने की अपेक्षा मर जाए तो अच्छा है | मैंने लड़की को बुलाकर माता-पिता दोनों के विचार उसके सन्मुख पेश किए | लड़की बड़े निश्चय से बोली, मेरी मां ठीक कहती है, मैं उसी का साथ दूंगी | और उसने मां का ही साथ दिया |

      नीच-घृणा अच्छे-से-अच्छे घरों को भी जलाकर खाक़ कर देती है |

      एक उच्च घराने के युवक का विवाह एक उत्तम परिवार की लड़की के साथ हुआ | समयानुसार उनके यहाँ दो बेटे हुए | उसके बाद उस घर के नभमण्डल पर काले बादल मंडराने लगे | उनके जीवन की नैया राजनीति की भयानक चट्टान से टकराने लगी | जुदा-जुदा उम्मीदवारों को स्वंतत्र मत देने के कारण वे एक-दूसरे से घृणा करने लगे | पत्नी ने अंतत: नम्र होकर पति से क्षमा मांगी | परन्तु पति का हृदय लोहे की तरह कठोर हो चुका था | उसकी घृणा भी गहरी थी | कुछ-एक मित्रों ने समझाया-बुझाया भी, परन्तु वह न झुका | वह बाद में भी विदेश गया, और जब वह घर लौटा, उसकी पत्नी अन्य लोगों के साथ उसका स्वागत करने गई | परन्तु उसने उस स्वागत का निरादर किया | पत्नी का दिल टूट गया | सबके सामने अपने स्वागत का अपमान देखकर वह खोई हुई-सी दुखी हृदय से लौट आई |

      इस प्रकार उनकी मधुर-गृहस्थी, माता-पिता और बच्चों, दोनों के लिए कटुता और नारकीयता में बदल गई | मुझे बताया गया कि एक लड़के ने तो कुछ भावुक होने के नाते अपने पिता और माता के बीच इस अनमेल को इतना गंभीरता से महसूस किया कि वह अपना स्वास्थ ही गंवा बैठा |

      मेरे सन्मुख ऐसी अनेक घटनाएं मौजूद हैं जिनमे नीच घृणा के कारण युवा जोड़े भी गृहस्थ-जीवन सदा के लिए गँवा बैठे | ये जोड़े, विशेषकर दुल्हनें, भूल जाती हैं कि विवाह के साथ ही उन पर एक-दूसरे एवं बच्चों के प्रति बड़ी ज़िम्मेदारी आ जाती है | घृणाकारी पत्नी मन में पति के लिए कितनी घृणा पालती है, इसका प्रमाण एक गृह-त्यागिन पत्नी और एक सुधाकर में हुए निम्न वार्तालाप से प्राप्त है

      सुधारक: श्रीमतीजी, यदि आपका पति आपसे क्षमा की प्रार्थना करे, तो क्या  आप उसके साथ घर जाने को तैयार हो जायेंगी ?

      पत्नी : यदि वह मेरी उपस्थिति में भूमि पर माथा भी रगड़े या बार-बार घुटने टेक कर प्रार्थना करे, मैं तब भी उसके साथ न जाऊंगी | मुझे उससे अति-घृणा है |

      सुधारक : मां लो आपके पति पदोन्नति पाकर तहसीलदार बन जाते हैं और तहसीलदार के रूप में आप से सह-जीवन बिताने की प्रार्थना करते हैं, तो क्या आप उनके साथ रहने को आकर्षित न होंगी ?

      पत्नी : वह मेरे जिले का डिप्टी-कमिश्नर या बादशाह ही क्यों न हो जाए, मैं कभी उसके साथ न रहूँगी |

      सुधारक :  यदि वह मानव-हित में अपना जीवन कुर्बान कर दें, तो क्या आप उनका साथ देंगी ?

      पत्नी : वह अवतार भी बन जाए, मैं उसके पास नहीं जाऊंगी |

      अस्तु, नीच-घृणा में पड़े हुए व्यक्तिओं की ऐसी ही दुर्दशा होती है | उनके दिल तक कोई अपील नहीं पहुंचती | अपने जीवन-साथी की कोई अच्छाई उन्हें दिखाई नहीं पड़ती | उनकी ओर से (जीवन-साथी की ओर से) किसी प्रकार की प्रार्थना उसके मन को नहीं छू पाती |

      एक और घटना मैंने देखी | एक जोड़े ने विवाह-बन्धन स्वीकार किया | वे प्रसन्नचित दिखते थे | उन्होंने दो-तीन वर्ष तक साथ-साथ विवाहित-जीवन बिताया | तब उनके यहाँ एक बालक हुआ | कुछ महीनों के पश्चात बालक की मृत्यु हो गई | उन दोनों को क्या हो गया, मुझे मालूम नहीं | परन्तु अकस्मात वे एक-दूसरे से जुदा हो गए | पति को इस जुदाई से बहुत दुःख हुआ | उसने कई लोगों के द्वारा पत्नी से प्रार्थना की | मैंने स्वयं उसे पत्नी तथा उसके सम्बन्धियों से प्रार्थना करते देखा है | बहुत समय प्रतीक्षा करने के बाद उसने दोबारा विवाह कर लिया | वह दूसरे विवाह के दो-तीन वर्ष के बाद मुझसे मिला, परन्तु वह अपनी पहली पत्नी को तब भी नहीं भूला था | उसने कई प्रकार से अपनी संवेदनाएं अपनी पहली पत्नी तक पहुँचाईं, परन्तु वह अपनी हठ पर अड़ी रही | कोई भी बात उसे छू न पाई और वह अपरिवर्तित रही | सन्देश ले जानेवाले सज्जनों से वह कहती कि जहाँ तक गृहस्थ जीवन का सम्बन्ध है, वह उसे पूरी तरह त्याग चुकी है और उसने पति से जुदा अकेले रहना ही अपने लिए सामान्य-जीवन स्वीकार किया है | घृणा ने उसकी गृहस्थ-जीवन के प्रति सब अभिलाषाओं और उमंगों को जलाकर खाक़ कर दिया था |

      घृणा कैसे उपजती या पनपती है, यह स्पष्ट तथा निश्चित नहीं | मुझे कुछ माध्यमों से पता चला है कि एक ग्रेजुएट युवक ने लड़की के परिवार को बराबर देख-भालकर उससे विवाह रचाया और संतोष अनुभव किया | पंजाब में रिवाज़ है कि विवाह के बाद उसी समय दुल्हन को पति के घर ले जाया जाता है | परन्तु तीन-चार दिन के बाद वह लौटकर पीहर आती है और कुछ दिनों या सप्ताह तक रहती है | उसके बाद उसका पति या उसके सम्बन्धी उसे लिवाने आते हैं और उसे पितृ-गृह से सप्रेम तथा ससम्मान विदाई दी जाती है | परन्तु इस विवाह के बाद पति या उसके सम्बन्धी लड़की को पुन: लिवाने नहीं आए | मुझे बताया गया कि पति ने उसे कभी दोबारा बुलाया ही नहीं | इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को हुए आज लगभग एक-तिहाई शताब्दी हो गई | आजतक निश्चित रूप से कोई न जान सका कि न बुलाने का यथार्थ कारण क्या था | बस लोगों का यही अनुमान था कि पति ने अपनी पत्नी के प्रति अकस्मात घृणा अनुभव की | उसकी मान्यता थी कि लड़की को घर लाने से उसका समूचा जीवन विषैला हो जाएगा |

      दो-तीन वर्ष पूर्व मैंने ऐसा ही एक और अनुभव किया | एक सुशिक्षित जोड़े का विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ | सैकड़ों परिवारों को इस नए जोड़े से स्पर्द्धा हुई | विवाह योग्य आयु की लड़कियों के माता-पिता ने स्पष्ट घोषणा की कि उक्त जोड़े का विवाह एक महत्वपूर्ण घटना थी | वे ये भी कामना करते थे कि उनकी लड़कियों को भी वैसे उत्तम वर मिलें |

      जोड़ा अति मनोहर और सुशिक्षित था | उनके पास संसार के सब पदार्थ थे | दुल्हन जब तीन सप्ताह पति-गृह में रहकर पीहर लौटी, सब लोगों को आशा थी कि उसके दोबारा पति के घर जाने का अवसर आदरपूर्ण तथा उत्सवपूर्ण होगा | परन्तु जब अनेक सप्ताह बीत जाने पर भी लड़की का गौना न हुआ तो सबको बड़ी निराशा हुई | बल्कि यह प्रवाद फैला कि यद्यपि दुल्हन अपने पति से ख़ूब प्यार करती थी, तो भी दूल्हे ने अदालत की सहायता से उससे अलग होने की योजना प्रस्तुत कर दी | दूल्हे की ओर से प्रस्तुत यह अवर्णीय यह प्रस्ताव दुल्हन और उसके माता-पिता के हृदय पर कुठाराघात बनकर लगा | यह घटना भी घृणा का भयानक उदाहरण है | लड़की में उत्तम जीवन-साथी बनने की सब विशेषताओं के होते हुए भी, वह घृणा के योग्य समझी गई |

      बहुत से विवाह संतान-प्राप्ति पर सुरक्षित हो जाते हैं | संतान-विहीन विवाह में बहुत से संकट बने रहते हैं | परन्तु बच्चे विवाह-बंधन को पर्याप्त निकटता और सुदृढ़ता  से कस देते हैं | अत: वे लोग, जो परिवार-नियोजन या संतान-विरोधी प्रसाधनों से परिवार में बच्चों का आगमन बराबर रोके रहते हैं, अपने विवाहित-जीवन को बड़े ख़तरे में डाले रहते हैं |

एक बार मैंने अमेरिका की एक औरत की कहानी पढ़ी | सम्पादक ने उसे संसार की सबसे कमीनी औरत कहकर पुकारा था | यह कहानी बम्बई के एक पत्र में छपी थी |

कहानी एक अत्यंत कमीनी स्त्री के जीवन की थी, जो स्वार्थ के कारण कमीनी हो गई  थी | इस औरत के जीवन की एक यही लालसा थी कि जितना सम्भव हो सके धन इकठ्ठा किया जाए | वह बड़ी सुन्दर स्त्री थी | कई लोग उसकी ओर आकर्षित हुए, परन्तु उसने किसी से भी विवाह करने से स्पष्ट इनकार कर दिया | कारण यह है कि कोई भी उसकी दो शर्तें पूरी करने के लिए तैयार न था | पहली शर्त यह थी कि वह किसी लखपति से शादी करेगी | दूसरी शर्त यह थी कि उसका भावी-पति अपनी समूची धन-सम्पत्ति उसके नाम लगवा देगा | इन शर्तों को पूरा करने के लिए उसने 80 वर्ष के एक बुड्ढे से शादी कर ली | उसने अपनी लाखों की धनसम्पत्ति इस सुन्दर परन्तु स्वार्थी स्त्री को भेंट कर दी | दो-एक वर्ष बाद वह मर गया | तब उसने एक-दूसरे बुड्ढे से विवाह कर लिया, जो आयु में 70 वर्ष से अधिक था | उसने भी विवाह से पूर्व अपनी समूची सम्पत्ति उस स्वार्थी औरत के नाम लगा दी | वह बुड्ढा भी जल्दी ही मर गया | तब उसने किसी युवक से विवाह करने की ठानी | उसने एक नौजवान से, जो सट्टेबाज़ था, शादी कर ली | उस व्यक्ति ने भी वचनानुसार नकद धन उस स्त्री के नाम चढ़ा दिया, और व्यवसाय में जो लाभ होता, वह भी उसे देता रहा | इस युवक-पति से उसे एक लड़का हुआ |

      युवक को एक बार सट्टे में घाटा पड़ गया | घाटा इतना अधिक था कि वह अपनी पूर्व-कमाई से उसकी भरपाई न कर सकता था | अत: उसने पत्नी से प्रार्थना की कि जो धन उसने उसके नाम लगाया है, उसमे से वह उसे कुछ उधार दे दे | उसकी पत्नी ने धन देने से साफ़ इनकार कर दिया और शेयर-मार्केट में पति की स्थिति को गिर जाने दिया | एक बार यदि साख़ नष्ट हो जाए, तो दोबारा बनना कठिन है | वह युवक दिवालिया हो गया और इसी आघात ने उसके प्राण ले लिए | इस प्रकार उस स्वार्थी औरत ने पति के ही धन से उसकी मदद करने की अपेक्षा उसे मर जाने दिया | यह सच है कि उसने फिर विवाह नहीं किया, परन्तु वह अपना स्वभाव नहीं बदल सकी |

      अब वह स्त्री और उसका बेटा रह गए | उसका बेटा बड़ा हुआ और उसने उसे अच्छी शिक्षा दी, सेना में उसे आफ़िसर बनाया और फिर एक दिन उसे अपने पास बुलाकर बार-बार यह समझा दिया कि अब उसके प्रति उसका कोई कर्तव्य बाकी नहीं, और वह उसकी कमाई से कुछ नहीं चाहती | न ही युवा-पुत्र को उसकी सम्पत्ति से किसी प्रकार की आशा रखनी चाहिए | अत: इस स्वार्थी-स्त्री ने अपने तीन पतियों को उनकी ही सम्पत्ति से वंचित कर दिया और अपने जन्म दिए बेटे को भी | जब तक स्वयं जीवित रही, उसने किसी को अपने धन को छूने नहीं दिया |

      पत्र ने लिखा था कि सरकार ने उसकी सम्पत्ति पर जो मृत्यु-सम्बन्धी कर आदि की मांग की, वह इतनी बड़ी रकम थी कि वह कब्र में भी इस विचार से तड़प उठी होगी|           

उसका स्व-प्रसूत पुत्र, जिसे जीते जी उसने अपने धन से वंचित रखा, उसका एकमात्र अधिकारी था | उसने (पुत्र ने) अपने पद से त्याग-पत्र दे दिया और बुरी तरह विलासपूर्ण जीवन में फँस गया | इस प्रकार धन-संचय करने वाले यह नहीं विचारते कि वे धन को तो अपने साथ कब्र में नहीं ले जा सकते, परन्तु धन के मोह और उसके दुरपयोग की बुराइयों को तो अवश्य साथ ले जाते हैं |

      यह एक लोभी स्त्री की कहानी थी | लोभी-पुरुषों की भी लाखों घटनाएं उपलब्ध हैं|

भारत में दहेज़ के बुरे रिवाज़ ने युवकों और उनके माता-पिता को राक्षस बना दिया है | मुल्तान में एक बार युवा पत्नी को उसके पति और सास ने मिलकर क़त्ल कर दिया | वे चाहते थे कि बहू अपने अमीर पिता से कुछेक हज़ार की रक़म और ले आए ताकि पति  बैरिस्ट्री की परीक्षा देने विलायत जा सके | कई दफा पहले वह अपने पिता पर दबाव डाल चुकी थी कि वह उनकी अनुचित मांग पूरी कर दे | इस बार उसने महसूस किया कि उसके पति और सास की मांग अधिक थी, जो उसके माता-पिता के लिए पूरी करनी कठिन थी | अत: उसने इस अनुचित मांग को पूरा करने से इन्कार कर दिया | उसका पति और सास संतुलन खो बैठे और अपनी मांग स्वीकार करवाने के लिए उसे ख़ूब पीटने लगे | बेचारी लड़की बहुत चिल्लाई परन्तु वे अत्याचारी दुष्ट तब तक उसे मारते ही रहे, जब तक उसका प्राणान्त नहीं हो गया | मारपीट के निशान छुपाने के लिए उन्होंने लड़की के माता-पिता के आने से पूर्व ही लड़की का दाह-संस्कार कर दिया | तथापि, माता-पिता ने क़ानून का सहारा लिया | अभियोग सिद्ध हो गया और अपराधियों को दण्ड दिया गया | परन्तु मां-बाप की प्रिय बेटी हमेशा के लिए जाती रही, और हजारों माता-पिताओं के हृदयों से दुःख की कातर आवाज़ निकली प्रिय बेटियो, काश तुमने जन्म ही न लिया होता और यदि जन्म लिया ही था, तो ऐसे लोभी-दुष्टों के साथ तुम्हारा विवाह न हुआ होता |

      बंगाल की प्रसिद्द स्नेहलता की घटना लोग जानते हैं | जब उसने माता-पिता को विवशता-वश यह शिकायत करते सुन कि उसके विवाह के लिए धन या गिरवी रखने को कोई अचल सम्पत्ति नहीं है, तो उसने आत्म-ह्त्या कर ली | बेचारी स्नेहलता ने अपने को मां-बाप के कष्टों का कारण माना और स्वयं प्राण देकर उन्हें कष्ट-मुक्त कर गई |

      मैं एक अमीर व्यक्ति से मिला | उसकी चार या पांच लडकियां थीं | उनमें से कुछेक मेरे ही कालेज में पढ़ती थीं | उसने अकस्मात् उन्हें कालेज से हटा लिया तो मुझे  बड़ी हैरानी हुई | मैं लड़कियों को कालेज-शिक्षण देने का बड़ा पक्षपाती हूँ | अत: जब इन लड़कियों ने, जो कि अमीर मां-बाप की बेटियाँ थीं, कालेज छोड़ा तो मुझे आघात सा  लगा | स्वभाववश ही मैंने इस अमीर के इस उलटे क़दम पर उसे सख्त शब्द कहे | वह बड़े दुखी शब्दों में बोला

      मित्र मेरे बचपन से तुम मुझे जानते हो | कोई साधारण कठिनाई मुझे लड़कियों को कालेज-शिक्षण देने से वंचित नहीं करवा सकती थी | कारण यह है कि मैं अब अमीर हो गया हूँ | अच्छे परिवारों के लड़कों की आँख मेरी धन-सम्पत्ति पर है | यदि मैं अपने भावी दामादों को उनकी मांग के अनुसार दहेज़ दूं, तो मुझे अपने बेटों को निर्धन छोड़ जाना होगा | दहेज़ के अतिरिक्त, विवाहोपरांत उनकी मांगें मेरे धन पर बड़ा बोझ बन जायेंगी | मैं उतना दहेज़ नहीं दे सकता, जितना वे मांगते हैं | मुझे सामान्य परिवारों के लड़के ही ढूँढने होंगे | ऐसे लड़के ग्रेजुएट या एम्.ए. पास लड़कियों से विवाह करने को तैयार नहीं होते | न ही ग्रेजुएट या एम्.ए. लड़कियां उनसे विवाह करना चाहती हैं| इसलिए मैंने उन्हें कालेज से हटा लिया है |

      अन्त में उसने कहा, हमारे सामाजिक रीती-रिवाज़ ऐसे क्रूर और भयानक गिद्ध हैं, जिन्हें ग़रीब माता-पिता और ग़रीब लड़कियों को नोचने के लिए खुला छोड़ दिया गया है | हिन्दू-समाज इन्हीं गिद्धों के अत्याचार से पीड़ित है, जिनके कारण विवाह-सम्बन्ध या तो असम्भव हो गए हैं, या दु:खमय हो गए हैं |

      दिल्ली के कुछ पत्रों में एक घटना छपी थी | यह एक ग्रेजुएट से सम्बंधित थी | इस युवक का विवाह अपने गाँव की एक वफादार लड़की से हुआ था | वह गवर्नमेन्ट सर्वेन्ट था, इसलिए नौकरी की खातिर गाँव छोड़ आया था | उसे विचार आया कि क्यों न वह गाँव से बाहर कोई अमीराना विवाह-सम्बन्ध बना ले और अधिक दहेज़ प्राप्त करे | उसकी प्रथम पत्नी को पता भी नहीं चला कि उसने दूसरा विवाह कर लिया है, न ही नई पत्नी यह जानती थी कि वह पहले से ही विवाहित है |

      उसने फिर एक तीसरी लड़की से शादी की और ख़ूब दहेज़ पाया | उसकी तीसरी पत्नी भी पहले दो विवाहों के सम्बन्ध में अनजान थी | कहते हैं, जब दिल्ली में उसने एक और अत्यन्त अमीर घराने में विवाह का प्रयास किया, तो पोल खुल गई | उसने दलालों को बताया था कि वह एक ऊंची नौकरी रखता है और अभी तक अविवाहित है, और विवाह का इच्छुक भी है | एक व्यक्ति, जो अपनी बेटी के लिए उसका हाथ चाहता था, वक़ील था | वह युवक की सब बातों की छान-बीन कर निश्चय कर लेना चाहता था | अत: युवक को पता किए बिना वह उसके गाँव गया, ताकि उसकी बातों की पूछ-ताछ कर सके | कहते हैं कि वह युवक के माता-पिता और मित्रों से मिला | उसे पता चला कि वह युवक न केवल विवाहित ही है, बल्कि तीन बच्चों का बाप भी है और केवल 60 रु. मासिक का सरकारी नौकर है |

      इन तथ्यों को लेकर वह लौटा और उसने युवक के सभी दावे उससे लिखित रूप में प्राप्त कर लिए | बाद में मामला अदालत में रख दिया और उसे वह दण्ड दिलाया जिसका वास्तव में वह अधिकारी था | उन दु:खी स्त्रियों का हाहाकार, जिनके साथ उसने एक के बाद एक धोखे से विवाह किया था, बड़ा ही करुणाजनक था | लोभ के कारण न केवल उस युवक तथा उसकी पत्नी का विवाहित जीवन नष्ट हुआ, बल्कि उसके छल-कपट में बंधी चार-पांच अन्य लड़कियों का भविष्य भी अंधकारमय हो गया | लोभ राक्षसी शक्ति है, इससे किसी का लाभ नहीं होता | लोभी व्यक्ति तो इसके कारण पतित होता ही है, दूसरों को भी इससे हानि पहुंचती है |

      मुझे एक लड़की के सम्बन्ध में बताया गया, जो अभी तक अविवाहित है | बताने वाले ने कारण बताते हुए कहा कि उसे एक ऐसा कठोर अनुभव हुआ कि वह अब कभी विवाह नहीं करेगी | इस लड़की को एक ग्रेजुएट से प्रेम था मुझे बताया गया कि उस युवक ने लड़की को वचन दिया था कि वह किसी भी मूल्य पर उसी से विवाह करेगा, किसी अन्य लड़की से कभी शादी नहीं करेगा | लड़की ने बी.ए. कर लिया | वह आशा रखती थी कि युवक अपना वचन निभाएगा | उसने अपने माता-पिता से स्पष्ट कह दिया कि वह उसी युवक से विवाह करेगी, किसी और से नहीं | अत: उसने निश्चयपूर्वक अपने माता-पिता को सगाई की बातचीत करने की सलाह दी |

      यह जानकार उसे बहुत दुःख हुआ कि युवक के माता-पिता ने उसके माता-पिता का कोई सत्कार नहीं किया | जब लड़की के माता पिता ने युवक के माता-पिता को बताया कि लड़के और लड़की ने परस्पर विवाह करने का निश्चय किया हुआ है, वे केवल उनका आशीर्वाद चाहते हैं, तो लड़के के माता-पिता क्रोध से बोले, हमारे परिवारों में विवाह माता-पिता के द्वारा पक्के किये जाते हैं, स्वयं जोड़े द्वारा नहीं निश्चित होते |

      ऐसा कहते हुए उन्होंने लड़के की ओर इशारा करके लड़की के माता-पिता से उसी को पूछ देखने को कहा | लड़की के माता-पिता ने लड़के को भी आज़माया | वह बोला, अपने बच्चों के विवाह-संबंधों में माता-पिता पूरा अधिकार रखते हैं | मैं लाचार हूँ |

      लड़की ने युवक के ज़ोरदार वचनों पर अरमानों के कितने ही महल बना डाले थे, परन्तु अंतत: उसे पता चला कि दहेज़ ही उसके दुर्भाग्य का एकमात्र कारण था | लड़के ने एक-दूसरी अमीर घराने की लड़की से विवाह कर लिया, जो अपने साथ बहुत सा दहेज़ लाई थी | पहली लड़की ने महसूस किया कि उसके फूटे भाग्य की नींव में लोभ-भावना ही थी और एक सुखी गृहस्थ बसा सकने के लिए उसे भी धन का आश्रय बहुत ज़रूरी   है |

      इस अनुभूति ने उसकी सब आशाओं पर पानी फेर दिया और उसके सुनहरे सपने   मिट्टी में मिल गए | उसको यह अनुभव हुआ कि सुखी विवाह के लिए पैसा ही कार्यसिद्धि है | लड़की ने जो-जो परिणाम निकाले, वे निश्चय ही ग़लत थे | लोभ मनुष्य को पतित तो अवश्य करता है, परन्तु सुखी गृहस्थ का आधार नहीं है |

      सभी सुखी-सम्बन्धों के लिए सात्विक-शक्तियों द्वारा प्रेरित जीवन अनिवार्य है |

स्कूल के दिनों में एक विचित्र घटना मेरे देखने में आई | एक विद्यार्थी, जो मुझसे सात-आठ वर्ष बड़ा था, वर्नाक्युलर परीक्षा पास कर अंग्रेज़ी स्कूल में प्रविष्ट हुआ |  शायद जिस वर्ष उसने अंग्रेज़ी-स्कूल में प्रवेश प्राप्त किया था, उसी वर्ष मेरा जन्म हुआ था | उसके मैट्रिक-वर्ग तक पहुंचते-पहुंचते मैं उसके साथ जा मिला | इस प्रकार यह विद्यार्थी, जो मुझसे सात-आठ वर्ष बड़ा था, पढ़ाई-लिखाई में आलस्य के कारण फेल होता रहा, यहाँ तक कि मैं मैट्रिक में उससे जा मिला | वह हर श्रेणी में कम-से-कम दो वर्ष रह कर ही अगली श्रेणी में चढ़ पाता था | मैट्रिक में जाते ही उसने पढ़ाई छोड़ दी | जैसा उसका स्कूल-जीवन था, वैसा ही निकृष्ट उसका व्यवसायिक जीवन बना | वह कठिनाई से दस-पन्द्रह रुप्ये मासिक कमा पाता था | मेरी हैरानी की हद न रही, जब मैंने सुना कि उसका कि उसका विवाह एक अमीर घराने की इकलौती बेटी से हो गया   है | मैं जानता था कि इस लड़की को अनेक उत्तम-परिवार अपने योग्य लड़कों के लिए चाहते थे | वह परिवार की एकमात्र अधिकारिणी थी, अत: स्वभावत: ही अनेक लोगों द्वारा ही इच्छित दुल्हन थी |

वह अमीर लड़की इस निकम्मे लड़के से क्योंकर ब्याही गई, मेरे लिए यह एक रहस्य बन गया | जब मैं कालेज से अपने गाँव लौटा तो इस रहस्यात्मक घटना के सम्बन्ध में मैंने पूछा | मुझे पता चला कि कितने युवक व युवतियों के जीवन सहज विश्वास से बरबाद हो जाते हैं | लड़के के माता-पिता ने कुछ विवाह के दलालों से इस मछली के फांसने और इससे विवाह संपन्न करवाने में पूरी सहायता प्राप्त की | लड़के को ऐसा कालेज-विद्यार्थी बताया गया था कि जिसे उच्च-शिक्षा की अतीव लग्न थी और जिसे 125 रूपये मासिक की सरकारी नौकरी मिलती थी, परन्तु वह इसलिए ठुकरा दी गई कि लड़का उच्च-शिक्षा पूर्ण करने की महत्वाकांक्षा रखता था |

इस विवाह के हो जाने के बाद ही इस इकलौती लड़की के माता-पिता को सच्चाई का ज्ञान हुआ | उन्हें पता लगा कि लड़का मैट्रिक भी नहीं और उसे अधिक-से-अधिक वेतन 15 रूपये मासिक मिलता है | माता-पिता ने इसे भाग्य का शाप मानकर कड़वा घूँट पी लिया | मैं इस घटना को कभी न भूल सका | इससे पता चलता है कि समझदार और अमीर माता-पिता भी कैसे सहज-विश्वास के शिकार हो जाते हैं | सहज-विश्वास द्वारा बंधे दम्पत्ति देर तक सुखी जीवन नहीं जी सके | कह नहीं सकता कि उनके यहाँ कोई संतान हुई या नहीं |  

इसी प्रकार सहज-विश्वास का शिकार हुए एक अन्य व्यक्ति की बात है | एक समय, स्कूल के दिनों में, मैं गली में खेल रहा था, जबकि मैंने एक सड़ी झोंपड़ी से एक सुन्दर प्रभावपूर्ण स्त्री को निकलते देखा | ऐसी झोंपड़ी में इतनी सुन्दर नारी के रहने पर मुझे हैरानी हुई | मैंने अपने साथियों से उसके बारे में पूछा | मेरे साथियों में सबसे बड़े ने बताया, क्या तुमने इस स्त्री के सम्बन्ध में नहीं सुना ? वह तुम्हारे सहपाठी की मां   है | तब मैंने पूछा, वह ऐसी झोंपड़ी और इस निर्धन-अवस्था में क्यों रहती है ? मेरे साथी ने बताया, यह स्त्री किसी अमीर के घर को सजा सकती थी, परन्तु वह ऐसी परिस्थितियों का शिकार हो गई, जिन पर उसका कोई काबू न था | तब उसने मुझे उस की दुखभरी कहानी कह सुनाई, यहाँ का एक निवासी जब बुखारा से लौटा, तो उसने यह बात फैलाई कि वह वहां से अपना भाग्य बना कर लाया है | मध्यस्थ-औरतें उसके घर आईं | वास्तव में इस व्यक्ति का कोई भाग्य न जागा था | परन्तु उसने बड़ी चालाकी से कुछ बर्तनों में स्वर्ण-मोहरें रख छोड़ीं और कुछ मोहरें बड़े कपट से इधर-उधर बिखेर दीं | मध्यस्थ-औरतों ने मोहरें देखी और लाकर पुरुष को देते हुए उसकी लापरवाही पर थोड़ी मीठी डांट भी पिला दी | इस पर वह बोला, बहनों, इसलिए तो मैं भी गृहणी चाहता हूँ, ताकि वह अपने धन का ध्यान रख सके | पुरुष अच्छे गृह-पालक नहीं हो सकते |

यह समाचार आग की तरह फ़ैल गया | उस तक अनेक प्रस्ताव आने लगे | यह सुन्दर स्त्री उसे उत्कृष्टत्तम पुरूस्कार रूप में भेंट की गई | सप्ताह-भर में उसने उससे विवाह कर लिया | तब उसकी बंधी हवा धीरे-धीरे छूटने लगी | जब दहेज़ में मिली नक़द रक़म खर्च हो चुकी तो उसने अपनी पत्नी पर वास्तविकता स्पष्ट कर दी | कहते हैं कि उसने फेरी का धंधा आरम्भ किया | उसके यहाँ एक लड़का पैदा हुआ और बाद में वह निर्धनता तथा बालक को विधवा मां का साथी बना, हमेशा के लिए चल बसा |

ऐसी विनाशकारी घटनाएं अनेक लोगों के साथ होती हैं, तथापि सहज-विश्वास का साम्राज्य मंद नहीं पड़ता | विवाह-संबंधों में सहज-विश्वास का पाप ख़ूब पनपता है | अनेक युवक दो-दो तीन-तीन पत्नियां होने पर भी अपने को झूठ-मूठ अविवाहित बताकर और विवाह करने में सफल हो जाते हैं | एक ग्रेजुएट लड़की का पिता उसे एम्.ए. में शिक्षा दिलाने के लिए मेरे पास लाया | मैंने यूं ही पूछ लिया, क्या आपकी लड़की का विवाह अभी-अभी नहीं हुआ था ? जब वह जीवन में सुस्थित है, तो आप उसकी शिक्षा दोबारा क्यों आरम्भ कर रहे हैं ? उसने आह भरते हुए कहा, मेरी लड़की के साथ भयानक दुर्घटना हो गई है | जब उसे पति के घर ले जाया गया, तो उसे पता चला कि वह तो पहले से ही विवाहित व्यक्ति था | उससे उसका दिल टूट गया | वह अपने कपटी पति का घर हमेशा के लिए छोड़कर चली आई है | मैंने उससे पूछा, क्या लड़की को इस मुसीबत में डालने से पूर्व आपने पर्याप्त पूछताछ नहीं की थी ? उसने उदासी से उत्तर दिया, मैं धोखे में आ गया और विवश हो गया | बेटी की इस दुर्घटना ने मुझे दु:खी और अधिक अनुभवी बना दिया है |

लड़की पर इस दुर्घटना का क्या प्रभाव पड़ा ये तो भविष्य ही बताएगा | एक विवाह घोषित हुआ | विवाह के समय दूल्हा बरात लेकर पहुंचा, परन्तु दूल्हा-पार्टी के पहुँचने के पश्चात अचानक विवाह पीछे डालने की घोषणा हुई, तब मैं भी वहां मौजूद था|       सुनने में आया कि दुल्हन ने आखरी समय दूल्हा के साथ शादी रचाने से इनकार कर दिया था | कारण यह था कि किसी ईर्ष्यालु स्त्री ने दूल्हा के विरुद्ध दुल्हन के कान भर दिए थे | उसने दूल्हा पर लगाए कलंक पर झट से विश्वास कर लिया | दूल्हा का पक्ष लेने वालों के सन्मुख लड़की को इस विवाह के लिए राज़ी करने की समस्या खड़ी हो  गई | ज्यों-त्यों कर दुल्हन को मना लिया और शादी हो गई | परन्तु दुल्हन के विश्वास पर जो घाव लग गया था, वह कभी न भर सका | कुछ समय बाद दुल्हन किसी अन्य स्त्री के चक्कर में फंस गई और सदा के लिए अपने पति से जुदा हो गई |

उपर्युक्त घटनाएं स्पष्ट करती हैं कि किस प्रकार सहज-विश्वास ग़लत विवाहित साथी के चुनाव की दुर्घनाएँ पैदा करता है | परन्तु ऐसी घटनाएं भी हैं जो यह स्पष्ट करती हैं कि किस प्रकार सहज-विश्वास अच्छे-भले गृहस्थ-जीवन को बरबाद कर देता है |

एक युवक किसी सुन्दर असामान्य लड़की को ब्याह कर लाया | वह उसे बहुत प्यार करता था | परन्तु पड़ोसी लोग उसका नवविवाहिता के साथ प्रसन्न और संतुष्ट रहना सहन नहीं कर सके | विवाह के समय युवक विधुर था | पडोसी औरतों ने परिवार की इस कमज़ोरी को निशाना बनाकर नई पत्नी को युवक के विरुद्ध भड़काना आरम्भ कर दिया | यदि वह उसे आभूषण पहनाता, तो पड़ोसनें कहतीं, ये आभूषण पहली पत्नी के हैं और उसकी मृत-देह के हाथों-कानों से उतारे थे | यदि पति उसे सुन्दर कपड़े पहनाता तो पड़ोसनें यह कह कर विष घोलतीं, ये वे ही कपड़े हैं जो तुम्हारी मृत सौत त्योहारों के अवसरों पर पहनती थी |

ऐसी अनेक निराधार बातें, जिन पर अविश्वास प्रकट करना चाहिए थी, नई पत्नी द्वारा प्राय: स्वीकार कर ली जातीं | परिणाम यह हुआ कि पड़ोसिनों की कपटपूर्ण बातों से उसका दिल पति से उचाट होने लगा | एक दूसरे को अति प्यार करने वाले ये पति-पत्नी जुदा हो गए | कोमल और भावुक पत्नी की शीघ्र ही मृत्यु हो गई और पति का दिल टूट गया |

सहज-विश्वास और अविश्वास दोनों एक-दूसरे के साथी हैं, दोनों विचित्र रूप से परस्पर बंधे हैं |

मैं एक विवाहित लड़की को, जो अब मर चुकी है, जानता हूँ; वह अपने पति में हमेशा दृढ़-विश्वास रखती थी | जब वह पति के घर आई तो पड़ोसी स्त्रियों से मिलने उनके यहाँ भी गई | पड़ोसियों में से कोई मित्रवत सलाह के तौर पर उसके पति की बुराई करने लगी | वह एकदम उस निन्दक स्त्री के घर से चली आई और जाकर अपने पति से सब कुछ बताकर अनुरोध करने लगी कि वह इस निन्दक स्त्री को कहलवा दे कि उसकी कही बातें उसने (विवाहित पत्नी ने) बहुत बुरी तरह महसूस की हैं और वह उस निन्दक स्त्री को अपनी सबसे बड़ी शत्रु समझती है | इसके बाद किसी पड़ोसन स्त्री की कभी हिम्मत ही नहीं पड़ी कि उसके पति की बुराई करे |

ऐसा नहीं था कि पति में कोई दोष न हो, परन्तु वह उसे उत्तम मानती थी | इस पत्नी के व्यवहार ने घर को सच्चा स्वर्ग बना दिया | मैं चाहता हूँ कि सभी पति-पत्नियां मन की ऐसी ही वृति को अपना लें | अपने किसी भी प्रिय की बुराई सुनना बहुत बड़ी ग़लती है |

  1. अनुचित वासनाएं या इच्छाएं, विशेषकर काम-वासना सम्बन्धी उत्तेजनाएं, सुखी गृहस्थ-जीवन को छुपे बारूद की तरह उड़ा देती हैं |       मैं तब मुश्किल से चौदह वर्ष का रहा हूँगा जब एक दिन मैंने एक एकांत गली में एक अति सुन्दर युवक-युवती को आनंदपूर्वक बातचीत करते देखा | मैं उन्हें नहीं जानता था | मैं हैरान था कि उन्होंने एकान्त गली और उसमें भी उजड़ी हुई जगह को क्यों  चुना ? मैं यह नहीं जानता था कि वे कौन थे और उनका परस्पर क्या सम्बन्ध था | बाद में मोहल्ले के स्त्री-पुरुषों की बातों से मुझे इन दोनों के सम्बन्ध में पता चला | मैंने जाना कि वे युवक और युवती एक-दूसरे के प्रति वासनापूर्ण आकर्षण रखते थे | यों दोनों विवाहित थे | पुरुष एक धनवान व्यापारी  की लड़की से ब्याहा था और युवती का विवाह एक युवक व्यापारी के साथ हुआ था, जो व्यापार के लिए विदेश गया हुआ था | युवती के चार छोटे बेटे थे— सभी जीवित | इस स्त्री का अमीर और युवक प्रेमी भी तीन बच्चों का पिता था | अत: दोनों के पतन का कोई कारण न था | इस अनुचित वासना की दलदल में फंसने से पूर्व वे अपने-अपने विवाहित जीवन-साथियों के साथ सुखपूर्ण सामान्य जीवन बिताते रहे थे | उनके अनुचित आकर्षण ने उनके जीवन का भाग्य ही बदल डाला |        उपर्युक्त घटना के तीन-चार वर्ष बाद इस जोड़े का अनुचित-प्रेम सब लोगों पर प्रकट हो गया | विदेश में गए पति को तार भेजा गया, जिसमे लिखा गया था कि यदि वह अपने घर और प्रतिष्ठा को बचाना चाहता है तो शीघ्र चला आये | उसने तार पाया और फ़ौरन घर के लिए लौट पड़ा | अपराधी जोड़े ने अब ख़तरा महसूस किया | दोनों ने एक युक्ति सोच निकाली | उन्होंने नगर के बाहरी भाग में एक मकान किराए पर ले लिया और खुलेआम अनुचित प्रेम का जीवन बिताने लगे |      पति घर पहुंचा | उसे पता चला कि उसकी सुन्दर पत्नी घर और चार बच्चों को छोड़ कर अपने धनवान प्रेमी के साथ खुलेआम पाप का जीवन बिता रही है | पति ने अपराधी प्रेमी के विरुद्ध सिटी मैजिस्ट्रेट की अदालत में मुकद्दमा चला दिया | सुनवाई के दौरान वक़ीलों और दूसरे शुभचिंतकों ने सुलह कराने के कई प्रयत्न किए | पति ने बच्चों की ख़ातिर यह स्वीकार कर लिया कि वह अपनी पत्नी को इस शर्त पर रखने को तैयार है कि वे दोनों हमेशा के लिए अपने अनुचित संबंधों का अंत कर दें और अपने-अपने विवाहित साथियों के साथ जीवन बिताएं |       अपराधी जोड़े ने यह मानने से इन्कार कर दिया | मुकद्दमा चलता रहा | युवक उपपति तथा औरत ने बराबर मुकद्दमा लड़ा | मुकद्दमा स्पष्ट था | अभियोगी अपराधी प्रमाणित हुआ और उसे छ: महीने के सश्रम कारावास का दण्ड दिया गया, तो भी स्त्री अपने पति और बच्चों के पास नहीं लौटी | उपपति के दण्ड भोगकर जेल से वापिस आने के बाद भी वह उसके साथ पाप्-मूलक जीवन बिताती रही | खेद का विषय है कि अपने नीच-प्रेम के कारण वे अपनी-अपनी बिरादरी से परित्यक्त होकर जिए और मरे | उनकी मृत्यु पर हर किसी ने खेद प्रकट किया | अपनी अनुचित वासना के पोषण के लिए उन्होंने अपने घरों की पवित्रता और शान्ति नष्ट कर दी, अपने प्रतिष्ठित परिवारों की शान्ति, उन्नति और सम्मान को भी आघात पहुंचाया |

    इस प्रकार अनुचित-वासना सुखी और प्रतिष्ठित घरानों को मिट्टी में मिला देती है|

    वकालत के दिनों में एक विचित्र घटना मेरे देखने में आई | एक व्यक्ति विदेश गया था, वहां से वह ख़ूब-सा धन कमा कर लाया | घर लौटने पर उसने एक सुन्दर  लड़की के साथ विवाह कर लिया | उसका विवाहित जीवन सुफलित हुआ | दो-तीन वर्ष में उनके यहाँ एक पुत्र का जन्म हुआ | परन्तु दुर्भाग्य ही कहिए कि वह लड़की एक सुन्दर युवक, परन्तु आवारागर्द बदमाश की ओर आकृष्ट हो गई | इस आवारागर्द ने भी उसके प्रति आकर्षण दिखाया | दोनों अनुचित-वासना के जाल में फँस गए | कुछ समय तक उनकी स्थिति गुप्त रही | परन्तु पाप छिपता नहीं;  यह अपराध भी लोगों पर प्रकट हो गया | पति ने पत्नी को समझाया और उस दुष्टा को पापपूर्ण मार्ग त्याग देने की धमकी दी | परन्तु पत्नी नहीं झुकी, जबकि उस युवक उपपति ने मेरे पास स्वीकार किया कि यदि बात उस पर छोड़ी जाती तो वह स्वयं ही पीछे हट गया होता | परन्तु वह सुन्दर स्त्री बड़ी दृढ़-निश्चयी थी और उसका प्रेमी उसके आकर्षण के पूर्णत: वशीभूत हो चुका था | उस अपराधिनी युवती ने अपने मध्य-उम्र के पति और और वर्ष-भर के शिशु को त्याग कर अपने प्रतिष्ठित और सम्पन्न जीवन को निर्धनता और अभाव के जीवन में बदल लिया |

    मैंने स्वयं उससे अपने पति के पास चली जाने का अनुरोध किया, वहां सम्मान,  संपन्नता और गृह-जीवन उसे प्राप्य था | मैंने उसे समझाया कि पत्नी और माता के रूप में वहाँ उसे कई अधिकार प्राप्त हैं और एक भगौड़ी स्त्री के रूप में वह यह सब खो बैठेगी|

    मैंने उसे बताया कि अपने पति पर उसे सामाजिक और कानूनी अधिकार हैं, जबकि पर-पुरुष के लिए जीवन न्यौछावर कर देने पर भी उसे ऐसे सामाजिक अधिकार प्राप्त नहीं हो सकते | मैंने और आगे कहा, ऐ लड़की, पापपूर्ण जीवन से तुम सबकी नज़रों से गिर रही हो | यदि तुम्हारा प्रेमी तुम्हें त्याग दे, तो तुम्हें सर छुपाने को कोई स्थान न मिलेगा, जीवन-सुरक्षा के लिए कोई सामाजिक  आश्रय उपलब्ध न हो सकेगा और अपने शरीर का पोषण करने के लिए तुम्हें पतन और निकृष्टता का जीवन बिताना पड़ेगा |

          मैंने उसका अंत भी देखा है | उसके उपपति पर मुकद्दमा चला और उसे कारावास का दण्ड मिला | परन्तु लड़की ने तब भी उसका साथ दिया | जब वह जेल से बाहर आया तो लड़की प्रसन्नतापूर्वक उससे मिली और उसके साथ हो ली | अपने शहर में कहीं अपना स्वागत होते न देखकर वे दूसरे प्रान्त में चले गए | उसका छोड़ा हुआ बेटा बड़ा हो गया; जब मैंने पिछली बार उसे देखा, वह मैट्रिक करके कालेज में दाख़िल हो गया था| मैंने उसके साथ उसकी माता के सम्बन्ध में बात की तो उसकी आँखें अपमान से जल उठीं | वह बोला, मेरी कोई मां नहीं, वह सामाजिक और नैतिक रूप में वर्षों पहले मर चुकी | मैंने केवल एक ही प्यार पाया है, और वह है मेरे पिता का प्यार | मैं उस अप्राकृतिक माता की निर्दयता कभी नहीं भुला सकता, जो अपने इकलौते बेटे को बारह महीने की अवस्था में त्याग का चलती बनी | अच्छा ही है कि उसने विश्व को और संतानों से कलंकित नहीं किया और मेरे अतिरिक्त ऐसा कोई नहीं जो उसकी अपवित्रता और निर्दयता को याद करता हो |

          अनुचित-वासना मानव-मात्र के लिए एक अविस्मरणीय अभिशाप है | एक दिन एक स्त्री मेरे पास आई | वह बोली, मैं आपके पास अपने दुखड़े रोने आई हूँ | इतना कहकर वह आंसुओं की बाढ़ में बह गई | उसे देखकर मुझे बहुत कष्ट हुआ और मेरी आँखों में भी आंसू आ गए | स्त्री का दुःख मेरे लिए सदैव असहनीय रहा है | कुछ देर मौन रहकर वह बोली, आप उस विशेष औरत को जानते हैं, और क्या आप यह भी जानते हैं कि उसने मुझसे मेरा पति छीन लिया है ?

          मैंने कहा, हाँ मैं उस स्त्री को जानता हूँ, परन्तु मैं यह नहीं जानता कि उसने तुमसे तुम्हारा पति छीन लिया है | वह आगे बोली, मेरा पति वहां गया था जहाँ वह रहती थी | उसने मेरे पति की ख़ूब सेवा की | वह बड़ा प्रभावित हुआ | वह प्राय मुझसे कहा करता था कि उसकी आवश्यकताओं का बराबर ध्यान रखने के कारण वह उस स्त्री का बड़ा ऋणी है | जब वह इस नगर में आई तो मुझे प्रेरित किया कि मैं भी बदले में उस स्त्री की उतनी ही सेवा करूं | वह एक प्रतिष्ठित मेहमान बनकर हमारे घर रही, परन्तु मैं न जानती थी कि उसकी नीयत ख़राब थी | सर्दियों की रातों में वह बीमारी के बहाने मेरे पति को अपने पास बुला लेती थी | मुझे न मालूम था कि वह केवल कपट ही कर रही थी | मैं अपने पति को प्रोत्साहन देती रही, ताकि वह उसकी सेवाओं का बदला चुका सके | परन्तु एक दिन जब पाप प्रकट हुआ तो मुझे गहरा आघात पहुंचा | कृप्या आप मेरे पति से कहें कि वह उस औरत से अपना सम्बन्ध तोड़ ले |

          पति के इस पतन से उस भली स्त्री का आनंदपूर्ण पारिवारिक वातावरण ऐसा विषैला हुआ कि जहाँ तक मुझे याद है वह दोबारा कभी अपने पति का प्यार और गृह-शान्ति न पा सकी |

          वह दुष्ट औरत, जो इस सब कपट का कारण थी, विवाहित पत्नी की स्थिति को भावुकता कहकर उसका मज़ाक उड़ाती रही | उसने यहाँ तक कह दिया, पुरुष का पतन निश्चय ही उसकी पत्नी का दोष होता है, जो उसके प्यार और आकर्षण का केंद्र बनी रहने में असफल रहती है |

          उस निर्लज्ज स्त्री के ये शब्द निरन्तर मेरे कानों में खटका करते हैं | एक भली औरत के प्यार को चुरा सकने का उसे अभिमान था | पत्नी की मृत्यु हो गई और जीवन में बहुत देर बाद पति ने महसूस किया कि उसकी पत्नी केवल स्त्री ही नहीं थी, जीवन की योग्य सहयोगिनी भी थी | उसका मूल्य किसी भी अन्य स्त्री से अधिक पड़ना चाहिए था| ऐसी श्रेष्ठ पत्नियों के पतियों को किसी भी अन्य स्त्री के आकर्षण या फुसलाहट से बचना आवश्यक है |

          मैंने एक और विचित्र परिस्थिति देखी है | इसमें पुरुष अपराधी था | उसने अपने मित्र की विधवा के प्रति आकर्षण बढ़ा लिया था | उसकी पत्नी ने पति के चरित्र में इस गिरावट का बुरा माना | एक दिन कुछ सम्बन्धियों की उपस्थिति में वे खुलकर लड़ पड़े|

    पति अपनी पत्नी की ज़बान से बरसने वाले आरोपों के कोड़ों से क्रुद्ध हो उठा और उन दोनों में निम्न बातचीत हुई :-_

          पति : मैं उससे अपनी मित्रता नहीं छोडूंगा | यदि तुम्हें यह सहन नहीं, तो तुम भी जाकर दूसरा पति कर सकती हो |

          पत्नी : (क्रोध से) तुम निर्लज्ज आदमी !  तुमने अपना चरित्र सदा के लिए कलंकित कर लिया है और तुम चाहते हो कि मैं भी तुम्हारे बुरे जीवन का अनुकरण करूं, अपने परिवार के नाम पर बट्टा लगाऊँ और घर का वातावरण दूषित कर लूं | तुम्हारी मां सामने बैठी है | उसे जाकर किसी अन्य पुरुष से शादी रचाने को कहो | उसके मुंह पर यह चुनौती देकर वह घर के भीतरी कमरे में भाग गई और सुबक-सुबक कर रोने लगी |

    जैसी कि आशा की जा सकती थी, पति के इस अनुचित प्रेम का परिणाम उनके विवाहित जीवन के विनाश के रूप में निकला |

    विवाहित-जीवन के सुख के नाश का इससे बढ़कर और कोई कारण नहीं हो सकता कि पति या पत्नी या दोनों दुराचार का पथ ग्रहण करें |

असंतोष शिकायत को जन्म देता है और शिकायत से परिवार में निरन्तर खटपट बढती है | असंतोष का एक बड़ा कारण धन का लोभ है |

      एक संतुष्ट परिवार की सच्ची कहानी बताई जाती है, जिसमे धीरे-धीरे असंतोष उपजने से खूब खटपट होने लगी | निम्न-मध्य-वर्ग का एक सुखी परिवार था | पति दैनिक परिश्रम का कार्य करता था | वह कारखाने में ख़ूब मेहनत से काम करता और उसका कार्य प्रबंधकों के द्वारा सराहा भी जाता था | वह अपने कार्यालय में खुश था | उसे कोई विशेष लालच न था | उसे अपने व्यवसाय में प्रसन्नता मिलती और कार्य में सुख मिलता | घर का प्रबंध उसने अपनी सुशील-पत्नी के हवाले कर दिया था | वह भी पति के दैनिक-परिश्रम को पाकर ही खुश थी | प्राय: घर के लिए आवश्यक वस्तुएं खरीदनें के लिए दोनों साथ-साथ बाहर जाते | उन्हें कोई अन्य चिंता न थी |

      उनकी झोंपड़ी के पास ही एक एक अमीर का भव्य-भवन था, जिसमें कई कारखानों का मालिक एक धनवान व्यक्ति रहता था, परन्तु उनके घर में कोई शान्ति न थी | पति कंजूस था, और पत्नी लोभी | पति द्वारा पत्नी के लिए किया गया कोई भी कार्य उसे संतुष्ट न कर सकता था | वह सदैव असंतुष्ट रहती थी | एक दिन वह अपने पति से कहती सुनी गई, तुम्हारे धन ने हमारे लिए क्या किया ? उससे हमारे घर में कोई शान्ति नहीं हो सकी और न ही हमारे बीच कोई प्यार ही बढ़ पाया है | इतना धन होते हुए भी तुम कई बातों में मुझे तंगी में रखते हो | मैं एक धनवान की पत्नी की तरह जीना चाहती हूँ, परन्तु तुम मुझे अपनी बूढी मां की तरह रखते हो जिसने ग़रीबी देखी  और जीवन-भर मध्य-वर्गी स्त्री की तरह रहती रही और तुम्हारे अमीर हो जाने के बाद भी वह वैसी ही बनी रही |

      दूसरे उदाहरणों को छोड़ो, पड़ोसियों की ओर ही देखो | वे दैनिक परिश्रम पर गुज़र करते हैं, तो भी कितने प्रसन्न रहते हैं | वे कल्लोल करते हुए हंसों के जोड़े के सामान हैं | जितना भी समय उनके पास बचता है, वे एक-दूसरे की संगति में रहते हैं, जबकि कई-कई सप्ताह तक मुझे तुम्हारे साथ बैठने का अवसर भी नहीं मिलता |      वे लगभग हर रोज़ इकट्ठे बाज़ार जाते हैं और मैं तुम्हारे साथ बाज़ार जाने को तरस जाती हूँ |         

      पति बोला, प्रिये, तुम अमीर व्यक्ति की पत्नी बनी रहना चाहती हो | अत: मेरे सन्मुख भी अमीर बनने का महत्त्व है | जब पति-पत्नी दोनों धन संग्रह के लालच में पड़ जाते हैं, तो संतोष उनका साथ छोड़ देता है | मैं धन इकठ्ठा करने का अभिलाषी हूँ और तुम मूल्यवान कपड़े और व्यक्तिगत बैंक अकाऊंट बनाने की इच्छुक हो | हम अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाओं के अनुसार ही तो बनेंगे ! हमारी मुख्य आकांक्षा लोभ है, जबकि हमारे निर्धन पड़ोसियों का ध्यान सदैव प्रेम, त्याग और आनन्दपूर्ण संगति पर ही केन्द्रित रहता है | हमारी तुलना में वे अनेक आवश्यक वस्तुओं तथा धन के अभाव में पल रहे हैं, और उनकी तुलना में हम असंतोष में रहते हैं |

      पत्नी ने कहा, सांसारिक वस्तुओं की चकाचौंध से घिरी रईस की पत्नी बनने की अपेक्षा मैं घरेलु ख़ुशी और शान्ति प्राप्त कर एक संतुष्ट स्त्री बनना पसन्द करती हूँ |

      पति मुस्कुराते हुए बोला, तुम्हारे पड़ोसियों को भी यदि सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति का अवसर मिले, तो वे भी संतुष्ट न रह सकेंगे | पत्नी ने ऐसा मानने से इन्कार कर दिया | पति चुप रहा | कई महीनों बाद पड़ोसियों की दशा बदल गई | पड़ोसी स्वयं अधिक समय कार्य करने और अपनी पत्नी को उस सुखद सहयोग और संगति से वंचित रखने लगा | पत्नी अत्यंत बचत से रहने में ही खुश थी | अब वह लगभग कंजूसी का ही जीवन बिताने लगी थी |

      अमीर की पत्नी इस निर्धन जोड़े के जीवन में यह नाटकीय परिवर्तन देख कर हैरान हो गई | अपने पति को संबोधित करते हुए वह बोली, पड़ोसियों के जीवन में यह परिवर्तन क्योंकर (कैसे) आया ? उनकी सहयोग-भावना का अन्त हो गया | पारस्परिक संगति की भावना उनमे धुंधली पड़ चुकी है | वे दोनों कंजूस हो गए दिखाते हैं |

      पति ने बताया, जीवन और मृत्यु के नियम सबके लिए एक सामान हैं | अमीरों और ग़रीबों के लिए कोई पृथक-पृथक नियम नहीं | हम अपनी इच्छाओं के अनुसार अपने जीवन को ढालते हैं | संसार की वस्तुओं को संग्रह करने की हमारी इच्छा ने हमें वर्त्तमान स्थिति में पहुंचाया है, और संग्रह की उसी भावना से यह संतुष्ट जोड़ा भी अब बदला हुआ दीख रहा है | सांसारिक वस्तुओं के संग्रह की भावना हमें वे वस्तुएं तो उपलब्ध कराती है, परन्तु जीवन में संतोष, प्रेम और त्याग के आध्यात्मिक मूल्यों को नष्ट कर देती है |

      पत्नी ने पूछा, इस सुखी जोड़े के जीवन में यह आश्चर्यजनक परिवर्तन कैसे  आया ? पति ने बताया, यह जादू मैंने चलाया है | परन्तु तुमने यह जादू कैसे  किया ? पत्नी ने फिर पूछा |

      पति ने उत्तर दिया, यह तो बड़ा आसान कार्य था | मैंने निन्यानवे (99) रूपये के नोट उनकी पहुँच की सीमाओं में पहुंचा दिये | पत्नी ने नोट पा लिए और सबसे पहले उसी पर इसका प्रभाव पड़ा | उसने अपने पति से कहा कि इस रकम को पूरा 100 रुपया करके रखना चाहिए | बस फिर क्या था, वे जाल में फंस गए | जब उन्होंने 100 रुपया पूरा कर लिया, तो उनमें संग्रह का लोभ और बढ़ा | अब वे बराबर संग्रह कर रहे हैं यद्यपि सौ से दो सौ-तीन सौ की रकम उनके हाथ लग चुकी है | लोभ की ज्वाला उत्तरोत्तर तीव्र और भड़कीली होती जा रही है | इसमें उनका संतोष समाप्त हो चुका है | उनकी पारस्परिक प्रेम-भावना धुंधली पड़ गई है | एक अप्रसन्न परिवार ने, जिस का अपना सुख नष्ट हो चुका था, दूसरे परिवार का सुख भी नष्ट कर दिया |

      एक दफा मैं एक अमीर परिवार के यहाँ गया | इस परिवार में दादा-दादी, माता-पिता और चार बच्चे थे | दादा ने अकेले में मुझे बुलाया और कहा, बेटे, परिवार की आवश्यक्तानुसार मेरे पास सब कुछ है | परिवार के सदस्य पर्याप्त कमाई भी कर रहे हैं | मेरी बहू परिवार की सेवा में बहुत कार्य करती है | परन्तु मेरी बूढ़ी पत्नी ने पुत्र, बहू और बच्चों के विरुद्ध बराबर शिकायत करके घर में मुसीबत पैदा कर दी है | निरन्तर शिकायतों से हम इतने दु:खी हो उठे हैं कि हर कोई यहाँ से भाग जाना चाहता है |

      मैंने पूछा, उसकी शिकायतों का मुख्य रूप क्या है ? वह बोला, उसकी बड़ी शिकायत तो यह है कि परिवार के सभी सदस्य अपनी-अपनी कमाई उसके हाथ क्यों नहीं सौंप देते, और प्रत्येक कार्य में उसकी सहमति क्यों नहीं लेते ? उसे जो कुछ मिलता है, वह उससे संतुष्ट नहीं | जो नहीं मिलता, वह उसी के लिए दु:खी रहती है | अन्य वस्तुओं के अतिरिक्त उसे काफी जेब-खर्च भी मिलता है, तो भी उसे संतोष नहीं होता | वह परिवार का समूचा धन स्वयं पाना चाहती है | वयस्क और विवाहित बच्चों को अपनी पत्नी, बच्चों और सामाजिक आवश्यकताओं का भी तो ध्यान रखना होता है | जितना वे हमारे लिए करते हैं, मैं उसी के लिए उनका आभारी हूँ | मेरी पत्नी मेरे इस व्यवहार पर भी नाराज़ हो जाती है | वह चाहती है कि हम सब का व्यवहार उसकी पसंद के अनुसार ही होना चाहिए | वास्तव में वह चाहती है कि दुनिया उसके इशारे पर चले स्वयं वह सेवा और आभार-स्वीकृति की प्रवृति धारण कर दुनिया को सहयोग नहीं देना चाहती | एक बार मैंने उसको इस मनोवृति से निकालने का अवसर तलाश किया | ऐसा अवसर मिला भी परन्तु मैं असफल रहा | उसकी शिकायत-प्रवृति इतनी तीव्र थी कि वह किसी भी आदेश पर कान धरने को तैयार न हुई | दूसरों के लिए अधिक-से-अधिक करना और उनसे कम-से-कम की आशा रखने का सिद्धांत उसे मान्य नहीं था | वह परिवार की आदृत सदस्या थी | परन्तु अब क्योंकि वह सबके प्रति शिकायत कर रही थी, उसे घृणा की दृष्टि से देखा जाता है | परिवार में सर्वप्रिय बनने के लिए उसके पास अनेकों आधार थे, परन्तु अपनी बराबर शिकायत की बुरी आदत के कारण अब वह सब खो चुकी है | अत: जो लोग परिवार के प्रिय सदस्यों का दुश्चिन्तन करते हैं, वे पारिवारिक-जीवन में विष ही घोलते हैं | दुश्चिन्ता परिवार की शान्ति और सन्तोष का हनन करती है |

      मैंने एक स्त्री के सम्बन्ध में पढ़ा है | वह कभी भी अपने पति का दुश्चिन्तन न करती थी | उसके दोषों में भी उसे निर्दोष सिद्ध करने के लिए वह कोई न कोई कारण ढूंढ निकालती थी | उसका पति अपना घोड़ा बेचने के लिए कहीं बाहर गया | मार्ग में एक ज़रूरतमंद ने उसे अपनी गाय से घोड़ा बदल लेने की प्रार्थना की | यह हानिकारक सौदा था, तो भी उसने स्वीकार कर लिया | जब वह आगे बढ़ा तो एक बकरी वाले व्यक्ति ने उससे बकरी के बदले में गाय मांगी | उसने यह हानिपूर्ण सौदा भी स्वीकार कर लिया|   जब वह और आगे बढ़ा, तो एक मुर्गी वाले आदमी ने उससे मुर्गी के बदले में बकरी दे देने की प्रार्थना की | वह मान गया | घर पहुँचने से पूर्व गाना सुनने के बदले में वह मुर्गी भी दे डाली | इस प्रकार वह खाली हाथ घर लौट आया | उसने अपनी भिन्न-भिन्न सौदे की पूरी कहानी क्रमानुसार सुना दी | उसकी पत्नी उस पर चिल्लाई नहीं | प्रत्येक अदला-बदली की बात सुनकर वह कोई-न-कोई सबब खोज लेती | जब पति ने कहानी पूरी की और कहा कि वह घर पर तो कुछ भी नहीं लाया, पत्नी पुकार उठी, “ऐसा मत कहो कि तुम घर कुछ नहीं लाये ! तुम मेरे लिए तो सर्वाधिक मूल्यवान वस्तु ले आए हो, अर्थात अपने-आपको लाए हो | मैं जीवन में प्रत्येक वस्तु से तुम्हें ही उत्तम मानती हूँ | मैं तुम्हारे मुकाबले में दुनिया की हर चीज़ का त्याग कर सकती हूँ | काश कि प्रिय, तुम मेरे जीवन को सजीव और प्रसन्न बनाए रखने के लिए जुग-जुग जियो |”

एक ग़रीब आदमी के लड़के ने मिडिल की परीक्षा पास की | उसने अस्पताल में कम्पाऊंडर की नौकरी कर ली | अपने कम्पाऊंडर के काम में उसने बड़ी रुची दिखाई | सामान्य बीमारियों के बहुत-से नुस्ख़े उसने इकट्ठे कर लिए और उनकी सहायता से इलाज करने लगा | उसे लगा कि कई रोगों में वह डाक्टरों की अपेक्षा अधिक प्रभावजनक इलाज कर सकता था | आखिरकार उसने स्वयं डाक्टर का व्यवसाय करने का निश्चय किया | एक सफल कम्पाऊंडर के रूप में उसकी लोकप्रियता ने उसे शीघ्र ही लोकप्रिय और कुशल डाक्टर बना दिया | इससे उसे ख्याल आया कि यदि साथ-साथ वह कैमिस्ट का कार्य भी करे और पेटेंट दवाएं बेचे, तो उसकी दुकान और भी चल सकती है|  उसका यह अनुमान भी ठीक प्रमाणित हुआ | उसका काम बढ़ गया | कुछ ही वर्षों में उसने अमीराना आबादी में एक मकान तथा अच्छी मार्किट में एक दुकान खरीद ली |

      अपनी प्रकार से यह सब अच्छा ही था | परन्तु एक बात उसे सदा कष्ट पहुंचाती रही कि अपनी बिरादरी में उसे सामाजिक-सन्मान न मिल सका | बिरादरी की इस उपेक्षा से दोनों पति-पत्नी उदास और दु:खी हो गए | वे अपनी बिरादरी द्वारा प्रशंसा पाने के बहुत इच्छुक थे | अत: उन्होंने एक युक्ति सोच निकाली | उनका बड़ा लड़का विवाह-योग्य आयु का हो गया था | उन्होंने अच्छी बिरादरी में उसकी सगाई कर दी | वे लड़की के सम्बन्धियों पर प्रभाव डालना चाहते थे और इच्छा रखते थे कि अन्य लड़कियों के माता-पिता उन्हीं की चर्चा करें | मुझे बताया गया कि बारात के लिए उन्होंने विशेष गाड़ी  और बैंड का प्रबंध भी किया था, जो कि उस समय कहीं-कहीं देखने में आता था | यह सब खर्चा उन्होंने फ़िज़ूल खर्च नहीं समझा, क्योंकि इससे सब उनके धनवान और प्रभावशाली होने की चर्चा करने लगे | यह प्रशंसा ही तो वे चाहते थे | उन्होंने बड़ी अभिलाषा से इसे चखा | कहते हैं उन्होंने उस गाँव के सभी निवासियों को भोजन करवाया और लगभग 25000/- रूपये खर्च कर दिए, जबकि सामान्यत: ऐसे विवाह 2000/- रूपये की लागत से संपन्न हो जाते थे |

      सामाजिक प्रशंसा के भूखे इस जोड़े ने पानी की तरह धन बहाया धन जो बेचारे कम्पाऊंडर ने खून-पसीना एक करके कमाया था | इस विवाह के बाद एक मज़ेदार घटना घटी | एक सुशिक्षित अधिकारी उसी गाँव के किसी अमीर घराने में अपने बेटे का विवाह रचाने आया | उसने कुल 10000/- रूपये से भी कम खर्च किया | वहां की ग्रामीण जनता, जिसे दोनों शादियों पर हुए खर्च का कोई  अनुमान न था, कहने लगी कि अब वाला विवाह अति शानदार है, जबकि पहले वाला विवाह-उत्सव तो बिलकुल मामूली सा था | ग्रामीणों की इस निन्दित तुलना ने कम्पाऊंडर और उसकी बीवी को बड़ा आघात पहुंचाया और उनकी पहली प्रसन्नता को मटियामेट कर दिया |

      विवाह के बाद, मुझे एक सार्वजनिक-कार्य हेतु चन्दा इकट्ठा करने वाली पार्टी के साथ कम्पाऊंडर के पास जाने का अवसर मिला | जहाँ वह विवाह पर 25000/- रूपये खर्च करके भी न पछताया था, वहां उसने उक्त सार्वजनिक कार्यार्थ पांच रूपये देने से भी इन्कार कर दिया और हमें निराश लौटना पड़ा |

      लड़के की शादी पर इतना अधिक खर्च हो जाने से उसके आर्थिक साधन कमज़ोर पड़ गए | ऐसे अनावश्यक आडम्बर परिवार के आर्थिक साधनों को हानि पहुंचाते हैं और उसकी सुदृढ़ता और स्थिरता को खोखला कर देते हैं |

      एक बार मैं किसी सज्जन के साथ यात्रा कर रहा था | जब हमारी गाड़ी एक गाँव के पास से गुज़री, तो मेरे साथी ने खण्डहर हुई एक दुर्ग-समान हवेली की ओर मेरा ध्यान आकर्षित किया | उसने बताया कि वह हवेली कभी वैश्य जाती के अमीर व्यापारियों की थी | धीरे-धीरे ये व्यापारी अपनी सम्पन्नता खो बैठे | उनके विनाश का मुख्य कारण यही थी कि वे विवाह या अन्य उत्सवों पर एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर कर व्यय करके सस्ती लोकप्रियता पाने का प्रयास करते रहे | सस्ती लोकप्रियता के पीछे अन्धे होकर जीने का फल यह हुआ कि जो कभी दौलत में लोटते थे, वे अब निर्धनता की गुदड़ियों में अपने को छिपाए हुए हैं | मिथ्या प्रशंसा-प्राप्ति की भूख उन्हें निगल गई |

      मैंने उनसे पूछा कि वे परिवार अब कहाँ हैं | वह बोला कि वे लोग अब अपनी प्राण-रक्षा और पेट पालने के लिए जीविका की खोज में सारे देश में फ़ैल गए हैं | सोने-चांदी के बर्तनों में खाने वाले उन लोगों के पास अब मिट्टी के बर्तन भी नहीं |

      एक अमीर आदमी के बारे में मैंने सुना है | वह अपनी बिरादरी के लोगों की वाह-वाह पाने के लिए ब्याह-शादियों तथा मकान बनवाने पर ख़ूब खर्च किया करता था | एक बार किसी देशी रियासत के राजा ने एक ऐसे सामाजिक रिवाज़ का अन्त करना चाहा, जिस पर लोगों के सैंकड़ों रूपये अनावश्यक ही खर्च हो जाते थे | यह रिवाज़ दूल्हे के माता-पिता की ओर से ताम्बे और चांदी के सिक्के वार-वारकर फैंकना था | महाराजा ने हुक्म दिया कि ऐसा करने वालों को 500/- रूपये दण्ड दिया जाएगा | इस हुक्म से उस रिवाज़ का लगभग अन्त हो गया | परन्तु वह सेठ राजा का हुक्म मानना अपनी हेठी समझता था | अत: उसने हुक्म की उपेक्षा कर रईसी दिखाने का निश्चय किया | अत: अपने बेटे के विवाह पर उसने 500/- रूपये दण्ड के रूप में सरकारी कोष में जमा करा दिए और लड़के की घोड़ी पर चाँदी के सिक्के वारता-उछालता चला गया |

      मैंने संवाददाता से यों ही पूछा कि उस अमीर परिवार की भावी गति क्या हुई | उसने उदासी से कहा, आज वह परिवार तिरस्कृत और पिछड़ा हुआ है | उसकी आर्थिक स्वतन्त्रता तथा सत्ता समाप्त हो चुकी है | उन्होंने अनुचित-प्रशंसा की मूर्खतापूर्ण लालसा का मोल चुकाया है |

      मैंने अपने संवाददाता से फिर पूछा, इस मिथ्याभिमान का नशा यदि उन पर सवार न होता, तो उस परिवार की क्या स्थिति हो सकती थी ? उसने शीघ्रता से उत्तर दिया, यदि उस रईस का परिवार ऐसे नशे में न होता, तो कई पीढ़ियों तक वे लोग उच्च परिवारों में गिने जाते रहते |

      मेरे एक मित्र ने मुझे एक अमीर पिता के युवक बेटे की बात बताई, जिसने अनुचित-प्रशंसा प्राप्ति की कमज़ोरी में अपने सम्पूर्ण परिवार का विनाश कर डाला | पिता की मृत्यु के बाद उसने कपड़ा बेचने की दुकान चलाई | बहुत से लोग जो उसकी यह कमज़ोरी जानते थे, उसके इर्द-गिर्द इकट्ठे हो गए और उसके मिथ्याभिमान को हवा देने लगे | वे उससे उधार सामान ले जाते | क्योंकि वह उधार देने को तैयार हो जाता, सबसे अधिक ग्राहक उसी के पास आते | वह गर्व से इसकी चर्चा करता | उसके एक शुभचिंतक ने उसे चेतावनी दी | उसने कहा, यदि तुम नक़द बेचने लगो तो तुम्हारे पास सबसे कम ग्राहक आएँगे | इस स्पष्ट बात से वह क्रुद्ध हो उठा, और बोला, तुम लोग मेरी प्रगति देखकर इर्ष्या करते हो | उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, हम शीघ्र ही तुम्हारी बरबादी देखकर करुणा से पिघलेंगे |

      इस शुभचिंतक के शब्द सत्य निकले | उस मूर्ख युवक को मिथ्या-प्रशंसा प्राप्ति की इच्छा का भारी मोल चुकाना पड़ा, और वह कठिनाई से अपना निर्वाह चला सकने योग्य रहा | इसमें केवल उसे ही दु:खी नहीं होना पड़ा, बल्कि उससे कहीं अधिक उसकी भोली पत्नी और बच्चों को भी दुःख उठाने पड़े |

      मैंने एक अमीर आदमी के बारे में सुना है कि उसने अपने-आप को महादानी कहलाने के आडम्बर में अपना व्यापार नष्ट कर लिया | वह नौकरों पर अपने शुभचिंतक होने का सिक्का बिठाने के लिए उन्हें बड़े-बड़े उपहार दिया करता था | परिणामस्वरूप उसका धन-कोष कम होने लगा | उसके साझियों ने व्यापार की सामान्य-बरबादी रोकने के लिए उसे हमेशा के लिए जुदा कर दिया | परन्तु इसपर भी उसने कोई सबक नहीं सीखा | उसने अपने-आप को बरबाद कर लिया और उसके परिवार को अति दुःख सहने पड़े, और इस सब में उसे मिला कुछ भी नहीं | बहुत-से बरबाद-परिवार इस झूठी प्रशंसा के ही शिकार हैं | बहुत-से परिवारों की स्थिरता को हिलाने वाले तत्वों में मिथ्या-प्रशंसा की भूख बड़ा भारी कारण है |

      मिथ्या-प्रशंसा का भूत विवाह-बन्धन में आने वाले युवक-युवतियों के मार्ग का एक बड़ा ख़तरा है | एक और घटना मेरे ध्यान में लाइ गई थी | दो युवक साथ-साथ पढ़ते थे | एक तो स्थानीय विद्यार्थी था और दूसरा बाहर से आया हुआ था | वह होस्टल में रहता था | स्थानीय लड़का होस्टल के इस लड़के को प्राय: अपने घर पर आमन्त्रित करता और उसने अपनी बहन से भी उसका परिचय कराया था | उस लड़के और लड़की के बीच मित्रता कैसे बढ़ी, यह तो मालूम नहीं | परन्तु पकड़े गए एक पत्र से इतना    अवश्य पता चला कि वह लड़की की ख़ूब प्रशंसा करता था | स्थिति को संभालने के लिए प्रिंसिपल से प्रार्थना की गई | प्रिंसिपल ने उस युवक पर नगर छोड़ जाने के लिए दबाव  दिया | उसके नगर से चले जाने पर लड़की उसके बदकार जीवन की सहयोगिनी बनने से बच गई |

      लड़की ने अध्ययन जारी रखा और डबल ग्रेजुएट बन गई | उसका विवाह एक अमीर ग्रेजुएट से हुआ | जब उसे उस खाई की याद दिलाई जाती जिसमे मूर्खतावश वह गिरने जा रही थी, तो वह लज्जित होकर कह देती, “जवान और अनुभवहीन लड़कियां आसानी से मिथ्या-प्रशंसा पर पसीज उठती हैं, इसलिए उनको अधिक सुरक्षा की आवश्यकता है, जिससे वे अपना उत्तरदायित्व बराबर समझ सकें और अनुचित हानि से उनकी रक्षा हो सके |”

कुछ वर्ष पूर्व मैंने एक सच्ची कहानी पढ़ी थी | वह कहानी एक असाधारण स्त्री की थी जिसने बड़ी से बड़ी मुसीबत आने पर भी अपना घर बनाए तथा बचाए रखा | जब वह युवती थी तो उसका विवाह एक नवयुवक से हो गया और वह उसे प्रेम भी करने लगी | उन दोनों ने अपना घरेलू-जीवन आरम्भ किया | दोनों ने धन कमाना अपना लक्ष्य बनाया और वे अपनी सांझी आय को एक-दूसरे की भलाई के लिए खर्च करते | एक-दूसरे के लिए सुखी घरेलू वातावरण का निर्माण करने में वे प्रसन्नताओं एवं गर्व का अनुभव करते थे | कौन अधिक कमाता है और कौन कम, ऐसा प्रश्न उनके मन में कभी उठा ही न था | कुछ वर्ष तक वे एक-दूसरे की सहायता करते हुए अति सुखी जीवन व्यतीत करते रहे | परन्तु समय के साथ उनके जीवन को अंधकारमय बनाने के लिए दुर्भाग्य के बादल उदय होने लगे | पति की नौकरी छूट गई | परिवार का सारा खर्च पत्नी को उठाना पड़ा | उसने अपना व्यापार चलाया हुआ था | समय गुज़रने के साथ-साथ यह व्यापार प्रगति करता रहा | कई महीने बीत गए और पति को कोई नौकरी न मिल सकी|

वह इस भाव के बोझ से दबा जा रहा था कि उसे अपने भोजन आदि के लिए भी पत्नी पर आश्रित रहना पड़ रहा है, जबकि पुरुष होने के नाते अपना और पत्नी का पालन उसका कर्त्तव्य था | परन्तु उसकी पत्नी सुशील स्त्री थी | उसने अपने पति से अपनी    दुकान में सम्मिलित रूप से कार्य करने की प्रार्थना की | उसने कहा कि दुकान में पति की उपस्थिति उसके लिए न केवल मानसिक शान्ति का कारण होगी अपितु आय के बढ़ जाने का भी कारण हो सकती है | इस प्रकार दोनों के इकट्ठे कार्य करने से वस्तुत: दोनों को प्रयाप्त लाभ पहुंचा |

      उनका व्यापार इतनी शीघ्रता से चमक उठा कि उन्हें लगभग आधा दर्जन नौकर रखने पड़े | इन नौकरों में एक अति-सुन्दर युवती भी थी जो इस परिवार के लिए दुर्भाग्य का सितारा बनी और पति को अपने हाव-भाव से अपनी ओर आकर्षित करने लगी | धीरे-धीरे पति उस युवती पर इतना मोहित हो गया कि अपनी पत्नी की ओर से ध्यान हटाकर उसका ध्यान उस युवती पर केन्द्रित हो गया | पत्नी को इससे बहुत दुःख पहुंचा | दुर्भाग्यवश वह बीमार हो गई | इससे पापी जोड़े को परस्पर प्रेमालाप बढाने के लिए स्वतंत्र अवसर मिल गया | इससे पत्नी और भी दु:खी हुई | स्वस्थ होने पर उसने सारी स्थिति का निरिक्षण किया, जो उसके बीमार पड़ने के कारण बन गई थी | अत्यंत निराशा में उसने अपने जीवन का अंत कर देने का निश्चय किया |

      वह एक पहाड़ी पर गई | वह नीचे कूदने ही वाली थी कि आशा की एक किरन उसके मन में फूट निकली कि अपने घर को बचाने के लिए उसे एक और प्रयत्न कर देखना चाहिए | अत: उसने आत्म-ह्त्या का विचार त्याग दिया और इस उत्साहजनक निश्चय के साथ घर लौटी कि वह पति को उस लड़की से बचाकर, उसे अपना करके, फिर घर बसायेगी | जब वह घर पहुंची तो उसने अपने पति को कमरे में बुलाया और अपनी विचारधारा उसके सामने प्रस्तुत कर दी | उसने अपने पति से कहा क्योंकि वह अपना दिल किसी और को दे चुका है इससे उसके इस व्यवहार से लौटने की कोई आशा नहीं दिखती | इसलिए भला इसी में है कि वह व्यापार में भी जुदा हो जाए | उसने संचित सामग्री मे से उसे अपना भाग स्वयं चुनने के लिए कह दिया और स्वयं शेष लेने को तैयार हो गई |

      पति ने कुल सामग्री का एक भाग अपने लिए चुन लिया | पत्नी ने प्रसन्नतापूर्वक शेष में संतोष अनुभव किया | वह जुदाई के समय किसी तरह की कटुता नहीं चाहती  थी | जब बात समाप्त हुई तो दोनों अपनी-अपनी जगह सोने के लिए चले गए | पत्नी प्रार्थी थी कि इस प्रकार उसका पति लौट आये | पति अपनी पत्नी की जुदाई में चिन्तित था | जब उसने यह देखा कि ऐसी सुशील पत्नी से अलग उसके जीवन की क्या दुर्दशा होगी तो उसकी सोई आत्मा जाग उठी | आधी रात के समय पत्नी ने दूसरे पलंग से सिसकियों की ध्वनि सुनी | वह उसके पास गई और उसका मस्तिष्क सहलाते हुए आश्वासन दिलाने लगी | पति बड़ा दुखी हुआ और पत्नी के गले लगकर वेदना-भरी आवाज़ में कहने लगा, प्रिये हमें अपना घर नहीं तोड़ना चाहिए | पत्नी ने उत्तर दिया, मेरी प्रार्थनाओं का परिणाम निकल ही आया | मेरा घर मुझे प्राणों से भी प्यारा है | परन्तु उस युवती का क्या होगा ? वह बोला, सबसे पहला कार्य जो मैं करूंगा, वह उस लड़की को नौकरी से हटाने का होगा | वह मेरे अत्यंत सुखी घर को बरबाद करने वाली थी और मेरी प्रिय पत्नी को मुझसे जुदा करने वाली थी |

      इस प्रकार एक बड़ी दुर्घटना टल गई | उस सुशील पत्नी ने अपने घर को बचाने के लिए प्रत्येक प्रयत्न किया और उसे सफलता भी प्राप्त हुई |

      एक और ऐसी सत्य घटना मेरे देखने में आई है | एक युवती ने किसी ग्रेजुएट से विवाह किया | विवाहोत्सव ख़ूब खुशियों से सम्पन्न हुआ, परन्तु कुछ ही सप्ताह बाद पति को पता चला कि उसकी युवा-पत्नी को मिर्गी-रोग के दौरे पड़ते हैं | उसने यह बात अपने माता-पिता और भाइयों को बताई, जिन्होंने बहू को पीहर भेज देने का निश्चय कर लिया| 

उन्होंने शिकायत की कि उसके साथ धोका किया गया है | लड़की लम्बे समय से इस दूषित-रोग से पीड़ित थी, जान-बुझकर दुल्हन के माता-पिता ने दूल्हा तथा उसके सम्बन्धियों से यह बात छिपाए रखी |

      जहाँ तक लड़की को पीहर भेज देने का सम्बन्ध था, बिरादरी के लोगों को इसमें दुल्हे का कोई दोष दिखाई नहीं दिया | परन्तु दुल्हे के घर वालों ने ऐसी बात की कि जिससे सबमे हलचल मच गई | दूल्हा युवा एवं ग्रेजुएट था इसलिए किसी दूसरी लड़की से उसकी सगाई भी कर दी गई | उसकी बिरादरी में द्विपत्निकरण की आज्ञा न थी | अत: ऐसी गंभीर स्थिति में उनकी पूरी जाती इस नए क़दम के विरुद्ध क्रुद्ध हो उठी | दुल्हन के सम्बन्धी भी प्रतिष्ठित पदों पर नियुक्त थेउनमे एक वक़ील भी था | उन्होंने दूल्हे के विरुद्ध स्थगन-आदेश प्राप्त करने के लिए अदालत में प्रार्थना की | वे दूल्हे के दूसरे विवाह को रुकवाने का अस्थाई आदेश प्राप्त करने में सफल रहे | आज्ञा-पत्र जारी कर दिया गया | दूसरा विवाह रोक दिया गया | जनता की सहानुभूति पत्नी के साथ थी|

      महीनों गुज़र गए, केस की कारवाई शुरू ही नहीं हुई | आखिरकार निश्चित सुनवाई के लिए कचेहरी से आज्ञा हो गई | यद्यपि दुल्हन के सम्बन्धी दूल्हा के विरुद्ध लड़े तो भी दुल्हन ने पति के विरुद्ध कुछ उलटा नहीं सोचा | वह अपने पति की भलाई तथा आज्ञा न होते हुए भी, पति के घर प्रसन्नातापूर्वक लौट सकने के लिए प्रार्थना करती रही |

      दूल्हा जानता था कि यदि वह अपनी पत्नी से मिले तो अपनी बात मनवा सकता है और अपने दूसरे विवाह की मनोकामना पूरी कर सकता है | अत: ऐसे मिलन के लिए उसने पत्नी को एक सन्देश भिजवाने का प्रबंध किया | पत्नी ने प्रसन्नातापूर्वक स्वीकार किया | वह उससे एक बार मिली तो उसके साथ ही रही | पति को प्रसन्न करने के लिए उसने मुकद्दमा वापस लेना मंज़ूर कर लिया | इससे उसके पिता और सम्बन्धियों को बहुत आघात पहुंचा, परन्तु उसने अपने पति का ही साथ दिया | मुकद्दमा वापिस ले लिया गया | लोगों ने सोचा पति ने लड़की को विश्वास में लेकर चालाकी की है;  मुकद्दमा निकल जाने के बाद वह उसे घर से फिर पीहर भेज देगा | परन्तु पत्नी की पूर्वाशाएं सत्य सिद्ध हुईं | उसके पति ने न केवल उसे घर में ही रख लिया, अपने दिल में तथा घर में पहले का सा स्थान भी दे दिया | वह प्राय: कहा करती थी, मैंने अपना घर बचाने के लिए सब कुछ दाँव पर लगा दिया, और मुझे सफलता मिली |

      यह लड़की मुश्किल से 18 वर्ष की होगी, और लगभग परित्यक्त-पत्नी तो थी ही | गृह न तोड़ने के अपने उत्तम निश्चय से उसने अपने पति एवं गृहस्थी, दोनों को बचा लिया | वर्षों तक वह अपने पति के साथ प्रतिष्ठित बनी रही | वह कोई छ: बच्चों की माता बनी | जब वह मरी तो पीछे एक ऐसी सुशील स्त्री का उदाहरण छोड़ गई कि जिसने अपने पति और घर को बचाने के लिए सब ख़तरे मोल लिए |

      कई वर्ष पूर्व एक बड़ी रोचक और शिक्षाप्रद घटना मेरे ध्यान में आई थी | मेरे एक मित्र ने मुझे लिखा कि मैं उसके घर जाऊं और वहां का हाल-चाल देखकर उसे  लिखूं | मैंने उसी दिन मित्र के परिवार को देखने जाने का निश्चय किया ताकि अगले दिन उसे सूचना भेज सकूं | उस दिन के निश्चित कार्यक्रम के अनुसार मैं रात्री के दस बजे उसके घर जा सका | काफी देर हो चुकी थी, तो भी पहुँचने पर मैंने देखा कि सब लोग जाग रहे थे और उनमे कोई बहस चल रही थी | मुझे देख कर परिवार की बड़ी स्त्री ने कहा, भाई साहब, आप मेरे बहनोई को तो जानते हैं ना, जिसने अपनी पत्नी को इस लिए उपेक्षित कर रखा है कि वह उसकी आशाओं के अनुसार विशेष स्तर की पत्नी नहीं बन सकी | परन्तु इस लड़की (उपेक्षिता-पत्नी) की ओर देखो, कहती है कि वह अपने पति के पास, यहाँ से 300 मील दूर जायेगी | लड़का भले उसे दरवाज़ा भी न खोले ! वह उपेक्षिता-पत्नी परदेश में क्या करेगी ? मैंने लड़की के उत्तर की राह देखी | कुछ रूककर वह बोली, भाई साहब, पत्नी के रूप में आप मेरी स्थिति भी समझते हैं | मैं पति का दिल जीतने की सारी चेष्टाएँ किये बिना उससे दूर रहना कैसे सहन कर सकती हूँ ? मेरी कितनी इच्छा है कि मैं अपना पति और गृहस्थी फिर से पा जाऊं;  इस सब के लिए मैं शक्ति-भर सब प्रयत्न करके देखना चाहती हूँ |

      तुम क्या करोगी ? मैंने पूछा | मैं उसके पास जाऊंगी और उसकी भली प्रकृति से प्रार्थना करूंगी उसने उत्तर दिया, आजतक मैंने उपेक्षिता-पत्नी की स्थिति स्वीकार कर रखी थी अब इससे अधिक मैं यह सब सहन नहीं कर सकती | मुझे स्वयं जाकर उससे प्रार्थना करने दो | अधिक से अधिक यही तो होगा कि वह मुझे स्वीकार नहीं करेगा | उससे मेरी स्थिति में कोई और बिगाड़ नहीं आने वाला | मुझे व्यक्तिगत-प्रयत्न कर देखने का संतोष तो होगा | यह भी सम्भव है कि शायद मैं उसे राज़ी कर सकूं |

      मैंने परिवार की बड़ी स्त्री को राज़ी कर लिया कि वह लड़की को वहां जाकर प्रयत्न कर देखने की अनुमति दे दे |

      लड़की को अपने पति के शहर जाने की आज्ञा मिल गई |

      मैं इस घटना के सम्बन्ध में सब कुछ भूल चुका था कि एक दिन अकस्मात् उस लड़की से गली में मेरी मुलाक़ात हो गई | उसे देखकर मुझे हैरानी हुई | मैंने पूछा तुम इस नगर में कब लौटीं ? तुम अकेली आई हो, या पति के साथ ? उसने स्वाभिमान से कहा, मैंने अपना पति और गृहस्थी दोनों पा लिए हैं | उधर देखिये, वे ही अपने मित्र से बात करते हुए, मेरे पति हैं | उन्होंने मुझे आगे चलने को कहा, वे पीछे आयेंगे | मैं बोला, मैं तुम्हें बधाई देता हूँ | तुमने एक बड़ी विजय पाई है | इसमें तुम्हें कड़ा संघर्ष करना पड़ा होगा | वह बोली, बड़ी विजय के लिए बड़े प्रयत्न तो ज़रूरी ही हैं | पति और गृहस्थी को दोबारा पा सकना एक बड़ी विजय थी, अत: उसमे बड़ी कोशिश की ज़रुरत होना स्वाभाविक ही था |

      वह फिर मुस्कुराई और बोली, “कोई भी औरत, यदि वह पति और गृहस्थी को अपने लिए बनाए रखने का निश्चय कर ले, तो सदा के लिए असफल नहीं रह सकती | मैंने अपनी गृहस्थी की नौका को डूबने से बचाने का निश्चय किया था, और मैंने उसे बचा लिया | मेरा विश्वास है कि यदि चाहें तो हम गृहस्थी की नैया पार लगा सकती हैं |”

एक युवक की पत्नी, जो कि बहुत सुन्दर थी, विवाह के दो वर्ष बाद मर गई | उसकी मृत्यु का उसे बड़ा शोक हुआ | कुछ समय तक इसी वियोग में वह दूसरे विवाह के प्रस्तावों को वह ठुकराता रहा | समय पड़ने पर जब उसके दुःख के घाव भर गए तो उसने एक अच्छे परिवार की लड़की से विवाह की बात स्वीकार कर ली | परन्तु यह लड़की रंग-रूप में साधारण थी | कुछ लोग उसे पहली पत्नी की तुलना में उंदर कहते थे| वास्तव में वह असुंदर न थी, परन्तु पहली पत्नी की तुलना में वह साधारण ही कही जा सकती थी | मैंने सोचा कि वह पति का दिल जीतने में असफल रहेगी | परन्तु मेरा भय झूठा निकला |

      एक बार मैं उस सामान्य-सी लड़की के पति के साथ बैठा था | मुझे तब बड़ा विस्मय हुआ जबकि अकस्मात् वह बोल उठा, लोग मुझसे इसलिए सहानुभूति दर्शाते हैं कि मेरी प्रथम सुन्दर पत्नी की जगह मुझे अब यह सांवली पत्नी मिली है | परन्तु मेरा व्यक्तिगत अनुभव यह कहता है कि मैंने कुछ नहीं गंवाया | मेरी दूसरी पत्नी ने मेरा जीवन और भी सुखी बना दिया है | उसकी सर्वोच्च विशेषता तो यह है कि वह मुझे कभी नाराज़ होने का अवसर ही नहीं देती |

      मैंने उससे पूछा— क्या तुम्हारा कोई मतभेद नहीं ? आखिरकार तुम लोग मनुष्य हो | तुम्हारे भी कुछ मतभेद और झगड़े तो होंगे ही | ऐसे में तुम अपनी कटुता को कैसे शान्त करते हो ?

      वह कुछ देर चुप रहकर बोला, दूसरी पत्नी के साथ मेरी कोई कटुता है ही नहीं | जब मैं उससे किसी कारण झगड़ पड़ता हूँ और क्रोधित होकर दफ्तर चला जाता हूँ, तो लौटने पर सदैव मेरी टेबल पर उसका पत्र पड़ा मिलता है, जिसमे वह ग़लती चाहे मेरी हो या उसकी, वह स्वयं क्षमा मांग लेती है | अपने ऐसे शान्त आचरण से वह मुझे मजबूर कर देती है कि मैं अपनी भूल पर खेद करूँ | उसकी ऐसी प्रवृति का परिणाम यह हुआ कि अब घर में झगड़ा होता ही नहीं |

      मेरे लिए सामाजिक जीवन की यह विचित्र घटना है, जिसमे एक साधारण सी लड़की ने अपने पति और उसके सम्बन्धियों के गृह-जीवन में ऐसी आश्चर्यजनक शान्ति तथा स्नेह स्थापित कर दिया |

      बहुत-से परिवार केवल इसलिए झगड़ते और बरबाद होते देखे गए हैं कि वहां पारिवारिक झगड़ों में पति या पत्नी या दोनों परस्पर झगड़ों के पश्चात अपना दोष देखने और स्वीकार करने से साफ़ इन्कार कर देते हैं |

      मुझे एक और घटना मालूम है | एक अत्याधिक सुन्दर लड़की का विवाह किसी विधुर से हो गया | अपने पति के प्रति उसका व्यवहार अहंकारपूर्ण था | एक बार वह अपने पति से ज़रा अधिक कठोरता से झगड़ पड़ी | पति ने उसके मुंह पर चांटा मार  दिया | झगड़ा बम्भीर हो उठा | वह भाग कर मेरे घर आ गई और अपनी बात कहने लगी | मैंने शांतिपूर्वक उसकी बात सुनी, और फिर प्रश्न किया, क्या झगड़े में तुम अपना भाग बराबर का देख सकती हो ? कुछ समय तक वह चुप रही | फिर उसके हृदय में रौशनी चमकी और वह बोली, मुझे दुःख है, मैंने उससे यह नहीं कहा कि ग़लती मेरी ही थी | मैंने उससे पूछा, क्या तुम अब महसूस करती हो कि ग़लती तुम्हारी ही थी ? वह बोली, हाँ, मन की इस शांत अवस्था में मैं निश्चय ही यह स्वीकार करती हूँ कि क्रोध की ज्वाला को मैंने ही हवा दी थी |

      तब मैंने उससे पूछा, क्या तुम अपनी वर्त्तमान दुःख की भावनाओं का पति के सन्मुख प्रकाश कर सकती हो ? तुम्हें प्रयाप्त शान्ति मिलेगी |

      वह बोली, मैं ऐसा अवश्य करूंगी | मैं सीधे क्षमा मांगने के लिए ही अपने पति के पास जा रही हूँ | उसने अपनी बात राखी | तीन-चार दिन बाद जब मैं उससे मिला, तो मैंने पूछा कि उस दिन कया हुआ ? वह बोली, आपका नुस्खा अति-लाभदायक सिद्ध हुआ | मेरे क्षमा मांगने से उनकी (पति की) आँखों में आंसू आ गए और तब से वह मुझे अधिक प्रेम भी देने लगे हैं |

इस नुस्ख़े से बहुत-से लोगों ने लाभ उठाया है |

एक और ऐसी ही घटना मेरे देखने में आई है | एक अमीर पति था | वह ज़रा घमण्डी था | वह अपनी पत्नी-बच्चों के साथ बहुत कठोर व्यवहार करता था | जब तक  बच्चे छोटे थे, सब उसकी कठोरता और क्रूरता सहन करते रहे | पत्नी उसके (पति के) दोषों की उपेक्षा कर देती परन्तु वह जानती थी कि माता के प्रति पिता का दुर्व्यवहार बच्चों को दुखी कर रहा है | एक दिन बड़े लडके ने पिता के पास जाकर प्रार्थना की कि उनकी उपस्थिति में उनकी माता का अपमान न किया जाए | इस नम्र-सम्मति से पिता को समझना चाहिए था | परन्तु प्रतिक्रिया उल्टी हुई | एक दिन जब उसने अपनी बेटियों के सामने पत्नी को क्रूरतापूर्वक अपमानित किया, तो वे बेटियाँ फूट-फूट कर रों पड़ीं | ऐसी अवस्था में पिता की ओर से साधारण-सी उदारता भी परिवार को बचा सकती थी और उसकी श्रेष्ठ पत्नी द्वारा बनाया हुआ सुखी पारिवारिक जीवन उसके लिए सुरक्षित रह सकता था | बच्चों ने स्पष्ट कह दिया कि यदि माता उनका साथ न देगी तो भी वह पिता का घर छोड़ कर चले जायेंगे |

एक दिन मां और बच्चे अपने नाना के यहाँ चले गए | वे कभी लौट कर पिता के यहाँ नहीं आए | कुछ समय तक पिता ने लापरवाही का व्यवहार बनाए रखा | परन्तु धीरे-धीरे उसे समझ आने लगी कि अपनी ज़िद और मूर्खता से उसने अपना सुखद घर उजाड़ लिया | वह पछताने लगा, परन्तु अब बहुत देर हो चुकी थी | तब तक बच्चों की शादियाँ हो चुकी थीं | उनमे से कोई भी अपने पिता के पास कभी न आया | मां ने एक बार संकेत किया था, मुझे तो पति और बच्चों के बीच चुनाव करना पड़ा | मैं तो दोनों को साथ रखना चाहती थी, परन्तु मेरा पति नहीं झुका | मेरी चेतावनी पर उसकी ओर से सामान्य-सी क्षमा-याचना मेरे मधुर-सुखद घर को बचा सकती थी | परन्तु मेरा पति वह सब न समझ सका | परिणाम यह हुआ कि हमारा गृहस्थ ही टुकड़े-टुकड़े हो गया |   

कुछ वर्ष पूर्व मैंने टिट-बिट्स में देल्कार्नेगी की प्रसिद्द पुस्तक हाउ टु विन-फ्रेंद्ज़ एण्ड इन्फ्लुएंस पीपल से उद्धृत एक छोटी सी कहानी पढ़ी थी |

      एक औरत थी, जिसका पति और तीन बलवान बच्चे थे | वह उन्सब्को बहुत चाहती थी, और उनको प्रसन्न तथा स्वस्थ् रखने के लिए नित्य नए-नए सुस्वादु भोजन बनाया करती थी | वह बीस वर्ष तक इसी प्रकार उनकी सेवा करती रही, परन्तु यह देखकर उसे हैरानी हुई कि उसके पति या बच्चों ने कभी उसकी सेवाओं की तनिक भी प्रशंसा तक न की |       

      एक दिन उसने डाइनिंग टेबल पर प्लेटें सजाकर उन्हें साफ़-सुथरे कपड़े से ढक दिया | फिर अपने पति और बच्चों को डाइनिंग रूम में जाकर खाना शुरू करने को कहा| वे लोग डाइनिंग रूम में गए और उन्होंने खाने की प्लेटों पर से कपड़ा हटाया | जब उन्होंने सारी प्लेटों में घास भरी देखी तो उनकी हैरानी और क्रोध की सीमा न रही | लड़के बोले, मम्मी, हमारे साथ ऐसा मज़ाक क्यों ? माँ ने उत्तर दिया, क्या तुम सचमुच देख सकते हो कि यह घास है ? परन्तु बीस वर्ष तक मेरे द्वारा परोसे अच्छे भोजन तो तुम्हें दिखाई नहीं दिए | तुम उनकी तनिक भी सराहना नहीं कर सके | मैंने सोचा शायद तुम भोजनों को देख नहीं पाए | मुझे विश्वास हो गया है कि इसमें तुम्हारी आँखों का कोई दोष नहीं | वे ठीक देख सकती हैं | यदि वे घास देख सकती हैं, तो निश्चय ही उत्तम भोजन भी देख सकती होंगी | घास देखकर तुम नाराज़ हो, परन्तु स्वादिष्ट भोजन देखकर तुमने कभी एक भी प्रशंसात्मक शब्द नहीं बोला |

      पति खिलखिलाकर हंस पड़ा और बोला, श्रीमतीजी, आप ठीक कहती हैं | हम इतने गंवार बने रहे कि कभी आपका आभार भी प्रकट न किया | हम सचमुच आपके आभारी हैं |

      इस कहानी से पता चलता है कि आभार प्रकट करना तथा गुणों की प्रशंसा करना हमारा कर्त्तव्य है |

      एक शिक्षित व्यक्ति अपने यूरोप के दौरे से वापिस लौटा | उसने अपना निजी अनुभव बताया | उसने बताया कि वह एक होटल में गया | होटल के बेयरे ने उसका ख़ूब ध्यान रखा और सेवा की | परन्तु अगले दिन जब वह वहां पहुंचा तो उसी नौकर ने उसकी बात सुनाने से इन्कार कर दिया | उसने होटल के मैनेजर से उस बेयरे के विरुद्ध शिकायत की | मैनेजर यह सुनकर हैरान हुआ किकोई इस बेयरे के काम के खिलाफ शिकायत कर सकता है | मैनेजर ने दूसरे नौकर को ध्यान रखने का हुक्म दिया | अगले दिन जब वह फिर होटल में गया तो मैनेजर उसके पास आया और कहने लगा, मेरे दोस्त, मेरा यह नौकर बड़ा भावुक है | वह कहता है कि उसने बड़े जोश से आपकी आवभगत की | परन्तु लगता है कि आपने उसकी सेवाओं के लिए धन्यवाद नहीं दिया | इसी से वह चिढ़ गया | पानी के सामान्य गिलास के लिए भी धन्यवाद न देना यहाँ असभ्यता मानी जाती है | उस व्यक्ति ने बताया कि तब से उसने अपने जीवन का यह नियम बना लिया कि जिस किसी से वह थोड़ा-सा भी काम ले, नौकर हो या तांगेवाला, वह उसे धन्यवाद अवश्य देता है | हमारे देश में घर या बाहर प्राप्त की गई सेवाओं के बदले धन्यवाद देने और आभार प्रकट करने का रिवाज़ ही नहीं है |

      मैंने उक्त नवीन अनुभव बताने वाले को धन्यवाद दिया |

      एक दिन मैंने कालेज में नीति-शिक्षा देते समय लड़कियों से पूछा कि क्या कभी उन्होंने अपने माता-पिता को कृतज्ञता का पत्र लिखा है ? उनमे से कुछ हँस दीं और बोलीं, श्रीमान, क्या हमारे माता-पिता को नहीं मालूम कि वे हमारा पालन-पोषण करते हैं ? उनको इसकी याद दिलाना कया आवश्यक है ? एक अन्य लड़की बोली, आपकी सम्मति अनुसार मैंने अपने माता-पिता को उनके द्वारा दी गई असंख्य सेवाओं के प्रति धन्यवाद का पत्र लिखा था | मेरी माता ने इसका मज़ाक उड़ाया और मुझे लिखा, ऐसे पत्र लिखने में समय नष्ट मत करो | तुम वही समय अध्ययन में लगाकर मुझे उचित धन्यवाद दे सकती हो | 

      माता के उक्त व्यवहार से मुझे हैरानी हुई | शायद उसे मालूम ही नहीं होगा कि कृतज्ञता एक महान मूल्यवान गुण है, जबकि कृतघ्नता एक बहुत बड़ी बुराई है | वह नहीं जानती थी कि अध्ययन-वृति के विकास की ही तरह जीवन में सात्विक-वृतियों का विकास भी ज़रूरी है | शरीर, बुद्धि और सात्विक-जीवन को विकास साधनों की आवश्यकता है |

      ऐसे माता-पिता भी हैं जो अपने बच्चों में उक्त सदगुणों के विकास की कद्र करते हैं | एक रिटायर्ड सरकारी-कर्मचारी ने अपनी दो बेटियों को हमारे शिक्षालय में प्रविष्ट करवाया | माता-पिता और अन्य सम्बन्धियों के साथ अपने रिश्ते-नातों की पवित्रता तथा उत्तमता के लिए, हमारी समाज द्वारा नियत दिनों में उन्होंने अपने माता-पिटा की सेवाओं की प्रशंसा में उन्हें पत्र लिखे | पिता ने प्रधानाचार्य को लिखा, “अभी-अभी हमारी बेटियों की ओर से उच्च विचार-पूर्ण पत्र मिले, उन्हें पाकर मैं तथा मेरी पत्नी अत्यंत भावुक हो उठे | बच्चों में ऐसी कृतज्ञता-वृति जगाने के लिए हम आप सबके आभारी हैं | बहुत कम बच्चे ही माता-पिता को अपना शुभचिंतक मानते हैं और कुछ ही ऐसे होते हैं जो माता-पिता द्वारा दी गई सुविधाओं को पहचानते हैं |”

प्रश्न:-     सच्चे गुरु की पहचान क्या है ?

उत्तर:-    पहले आप बताएं कि आपके सामने सच्चे गुरु की क्या तस्वीर आती है ?

प्रश्न-करता:-

मैं तो उसको ही सच्चा गुरु मानता हूँ कि जो करामात (चमत्कार) करके दिखाए, पानी से शराब बना कर दिखाए,किसीवृक्ष को हिलाकर कई मन मिठाइयों के टोकरे भर कर दिखाए, सफेद घोड़े पर सवार होकर सातवें आसमान तक जाए | क़बर से शरीर सहित बाहर निकल कर आसमान तक उड़ जाए | पूर्णत: मुर्दा को ज़िंदा कर दे, उंगलीपर बहुत बड़ा पर्वत उठा ले, जिसके हुक्म से सूर्य भगवान् नीचे उतर आये और दरिया फटकर दो टुकड़ों में बंट जाए, जिसमे एक रास्ता जाए, कि जिस गली में से उस पूर्ण गुरु को उसका रक्षक अपनी गोद में उठाकर दरिया पार हो जाए|

उत्तर:-    यह सच्चे गुरु की तारीफ़ या परिभाषा बिलकुल नहीं है | यहसारीकरामातें(अर्थात चमत्कार)प्रकृती में असम्भव बातें हैं | ऐसी बातें कभी हुई नहीं – न हो सकती हैं | इन बातों को मानकर मनुष्य की बहुत बड़ी हानि करना और उसेउलटी पट्टियांपढ़ाना आरम्भ करना है | यदि ऐसी असम्भव बातें कोई कर के दिखा भी दे, तो भी ऐसी क्रियाओं से वह रूहानी या आध्यात्मिक गुरु नहीं बनता, वह एक मदारी बन जाता है, जोतरह तरह के खेल रच कर दिखाता है |ऐसे सब चमत्कार यदि किसी के लिए सम्भव  भी समझे जाएँ, तो भी इन चमत्कारों के करने वाला आत्मिक-सत्य ज्ञान देने वाला गुरु नहीं हो सकता |

प्रश्न:-     यदि वह चमत्कार असम्भव हैं, औरप्रकृति(Nature) के नियमों और घटनाओं के विरुद्ध हैं, तो लाखों और करोड़ों मनुष्य उनको सत्यक्योंमानते हैं ?

उत्तर:-    वह इसलिए मानते हैंक्योंकि वह अंध-विश्वासी हैं, जिस प्रकार लाखों-करोड़ों बच्चे अलिफ़-लैला तथा तोता-मैना की कहानियों को सच मानते हैं, परोंवाली स्त्रियों को परियां मानते हैं, ठीक उसी प्रकार बच्चों की सी प्रकृति रखने वाले अंध-विश्वासी जन क्याकुछ नहीं मानते |वह तो हज़ारों लाखों गप्पों को सत्यमानते हैं | लाखों करोड़ों जन आवागमन या पुनर्जन्म की गप्प को सत्य मानते हैं, महात्मा बुद्ध के जिम्मे उनके पहले पांच सौ जन्मों की जो कथाएँ लगाईं हैं, उनको लाखों और करोड़ों जन सत्य मानते हैं, लाखों करोड़ों हिन्दू यह मानते हैं कि मरने के बाद ‘मनुष्य-आत्मा’पशु का शरीर बना कर पशु बन जाता है, पौदा बन जाता है, आदि|थोड़े दिन हुए कि एक घटना अखबार में छपी थी कि एक कर्नल कीपत्नी को कुछ धोखेबाजों ने ठग लिया | अर्थात उसका पति गुज़र गया | पति के गुज़र जाने का उसको बहुत बड़ा सदमा लगा, वह मंदिरों में जाकर पूछती रहती थी, कि कोई बतावे कि परलोक में मेरे पति का क्या हाल है ? कुछ ठग ब्राह्मणों ने कह दिया, कि तुम्हारा पति नरक में तड़प रहा है,यदि तुम अमुक अमुक दान करो तो उसकी आत्मा को शान्ति प्राप्त होगी |यह कह कर उन ठग ब्राह्मणों ने उस स्त्री से अढ़ाई हज़ार रूपये ठग लिए| बड़े बड़े पढ़े लिखे जन इस भयानक गप्प को मानते हैं, कि कोई ऐसी जगह है, जिसका नाम स्वर्ग है, और कोई ऐसी जगह है, जिसका नाम नरक है |

प्रश्न:-     क्यानाना मज़हबों के बानी (संस्थापक) सच्चे आध्यात्मिक गुरु नहीं हैं ?

उत्तर:-    जी नहीं |

प्रश्न:-     वह क्यों ?

उत्तर:-    वह इसलिए कि वह सब के सब आत्मा के सम्बन्ध में सत्य ज्ञान से खाली थे | जिनके सामने आत्मा की वास्तविकता(सच्चाई) खुली हुई न थी, वह आत्मा के सम्बन्ध में सत्य-ज्ञान दे ही क्या सकते थे, इसलिए उन्होंने सत्य ज्ञान नहीं दिया |

प्रश्न:-     आत्मा का नाम तो उनकी पुस्तकों में बहुत बार आता है ?

उत्तर:-    जीहां, अवश्यआता है | उनके सामने आत्मा का नाम तो अवश्य था; परन्तु उनके सामने आत्मा का सत्य-ज्ञान न था, इसलिए आत्मा के सम्बन्ध में जोभीज्ञान उन्होंने दिया, वह सारा मिथ्या ज्ञान था | मिथ्या ज्ञान के प्रचारक होकर वह आध्यात्मिक-गुरु नहीं हो सकते थे;इसलिए वह सच्चे आध्यात्मिक-गुरु न थे |

प्रश्न:-     यदि वह सच्चे आध्यात्मिक-गुरु न थे, तो क्या थे ?

उत्तर:-    वह मिथ्या मतों के प्रचारक थे | उन्होंनेअपने दिलो-दिमाग पर आत्मा की मानसिक-छवियाँ बनाकर उसके सम्बन्ध में किस्से-कहानियांघड़ लीं, और इन कल्पित कहानियों का मनुष्यों को अनुरागीबनाया |

प्रश्न:-     कल्पित कहानियों का मनुष्य किस तरह से प्रेमक (अनुरागी) बन जाता है ?

उत्तर:-    जिस प्रकार बच्चे कल्पित कहानियों के प्रेमक बन जाते हैं |

प्रश्न:-     विविध मतों के अनुयायी ‘बच्चे’ तो नहीं, वह तो समझदार जवान वप्रौढ़ हैं |

उत्तर:-    वह शरीर के विचार से अवश्यजवान या प्रौढ़हैं, परन्तु आध्यात्मिकता के विचार से वह बच्चे ही हैं | वहकल्पनाकेस्तर से ऊपर नहीं उठ सके, इसलिए उनका तर्क की दुनिया में जन्म ही नहीं हुआ, तब विज्ञान की दुनिया में प्रवेश करना उनके लिए कैसे सम्भव  था |

प्रश्न:-     क्या कभी नौजवान आदमी भी दिमाग के विचार से बच्चे हो सकते हैं ?

उत्तर:-    न केवल हो सकते हैं, किन्तु हैं | आज करोड़ों अनपढ़ जन यह मान ही नहीं सकते कि सूर्य इस पृथ्वी से सौ गुणा बड़ा है, वह यह मानही नहीं सकते कि पृथ्वी सूर्य के इर्द-गिर्द घूम रही है, वह यह मान ही नहीं सकते कि हमारा सारासौर्य-मंडल इस विश्व (अर्थात NATURE)में एक रेतके कण के बराबर है, और जो आकाश में धुआं नज़र आता है, उस धुएं के टुकड़े से भी हमारे सौर्य-मण्डल जैसे लाखों सौर्य-मण्डल उत्पन्न हो सकते हैं | अबआप ही बताएं कि इतने विशाल विश्व कीवास्तविकताकितने जनों के सन्मुख आ सकती है ?  करोड़ों जनों में से किसी किसी जन के सामने हीआती है | अब इस विशाल विश्व में रहकर यदि लाखों और करोड़ों जन यह मान लें, जैसा कि मानते हैं कि सारा विश्व इस पृथ्वी के लिए बनाया गया है, तो यह कैसी महा मूर्खता है ! यह पृथ्वी तो इस विश्व में किसी गिनती में नहीं है | वह रेतके कण का लाखवां या करोड़वां भाग है | जिन मिथ्या मतों के बानियों (संस्थापकों) ने अपने उपास्य की ओर से यह शिक्षा दी है, कि यह असीम विश्व छै दिन में बनाया गया, क्या वह ज्ञानी माने जा सकते हैं ? कदापि नहीं| वह किसी के पथ-प्रदर्शक बनने के योग्य नहीं,उनकी यह शिक्षा बच्चों की कहानियों की तरह गप्प है |

प्रश्न:-     मैं समझ नहीं सकता कि लाखों करोड़ों मनुष्य ऐसे अयोग्य क्यों हैं, जो तर्क को छोड़ कर कल्पना को पसन्द करते हैं, विज्ञान को छोड़कर कल्पितकहानियों पर विश्वास करते हैं?

उत्तर:-    इसमें मुझे कोई गूढ़ राज नज़र नहीं आता| सारा भेद तो योग्यता और अयोग्यता का है | करोड़ों जन ऐसी योग्यता ही नहीं रखते कि वह तर्क के अनुयायी हो सकें | आप सारे पशु-जगत को देखें, उस जगत में कई बड़े बड़े हाथीऔर ऊँट पाए जाते हैं, उनकाशरीर कितना बड़ा है, परन्तु बुद्धि के विचार से वह कितने हीनहैं |मनुष्य का दो साल का बच्चा जिस बुद्धि का प्रकाश करता है,उस बुद्धि का प्रकाश एकहाथी नहीं कर सकता | ठीक इसी प्रकार लम्बा चौड़ा शरीर रख कर भी और साधारण बुद्धि रख कर भी साधारण मनुष्य मंतक(अर्थात मंत्रणा)और तर्क विद्या के विचार से बहुत हीन अवस्था में हैं | तर्क विद्या के विचार से विज्ञान की दुनिया से कोसो दूर पड़े हैं | उनकीमानसिक और हार्दिक अवस्था यह है कि वह कहनियाँ सुनकर ही तसल्ली पाते हैं, और मंतक से घबरा उठते हैं | यही कारण है कि भारत वर्ष में जगह जगह कथायेंहोती हैं, और ऐसी कथाएं प्रतिदिन हज़ारों लाखों जगह की जाती हैं | मनुष्य की उन्नतिमें करोड़ों जनों के लिए यह मार्ग ही नहीं खुला कि वह तर्क और ज्ञान के अनुरागी बन सकें | मनुष्य की ऐसी अधोगति की अवस्था के अनुसार मिथ्या मज़हब पैदा हो गए, और जो मनुष्य इस निम्न अवस्था में हैं, कि कल्पना में ही खुश रहें, वह इन कल्पित मतों का ख़ूब उत्साह से प्रचार करते हैं | परन्तु ज्यों ही कोई जन तर्क की ओर आकृष्ट होता है, औरपरीक्षा की कसौटी पर अपने विश्वासों को परखने लगता है, त्यों ही वह जन मिथ्या मज़हबों से मुंह मोड़ कर तर्क और विज्ञान की ओर अपना कदम उठाता है |ऐसी विशेष हस्तियों को अंध-विश्वासी जन काफ़िर और नास्तिक के नाम से पुकारतेहैं, और उनको अपने से ग़ैर और पराया समझकर उनपर नान प्रकार के अत्याचार और ज़ुल्म जारी रखते हैं |

प्रश्न:-     यह तो आपने अजीब बात बताई, किमिथ्या मज़हब वहां तक हीमाने जाते हैं, जहां तक कल्पनाका राज्य है| ज्यों ही कोई जन कल्पना से ऊपर जाकर तर्क और विज्ञान की दुनिया में प्रवेश करता है, त्यों ही वह मिथ्या मतों को त्याग देता है | आपकेकथनके अनुसार जो लाखों करोड़ों मनुष्य कल्पना के दास हैं, उनको तो मिथ्या गप्पों की ज़रुरत है, इसलिए उनको ऐसे गुरुओं की ज़रुरत है, जो उनके कल्पना-प्रिय हृदयों को खुराक पहुंचाएं ?

उत्तर:-    जीहां| मनुष्य को अपने भावों की तृप्ति चाहिए,अपनी ज़रूरतों की तृप्ति    चाहिए | इसलिए जिस मनुष्य में जो भाववर्तमान होंगे, उनकी तृप्ति के सामानों की ओर वह भागा जाएगा, जिस चीज़ की उसको ज़रुरत महसूसनहीं होती, उसके लाभ करने के लिए वह कोई संग्राम नहीं करेगा | अदना मनुष्य तो अदना भावों (अर्थात नीच भावों) के प्रेमी हैं | इसलिए वह ऐसे रहबरों (गुरुओं) की तलाश में है जो उनके अदना-भावों को तृप्त करें | जिसके हृदय में कोई उच्च भाव नहीं, वह ऐसे उच्च-भावों केदाता की तलाश भी नहीं करेगा | दुनिया ऐसे पीरों फ़क़ीरों के पीछे भागी जाती है, जो यह दावाकरते हों कि हम अपने अनुयाइयों कोधन दे सकते हैं, उनको खुशहाल बना सकते हैं, उनकी खेतियों और फसलों को हरा भरा बना सकते हैं | हम उनको मुकद्दमों में जीत दिला सकते हैं, हम उनके दुश्मनों को तबाह कर सकते हैं, हम उनके घरों को बच्चों से आबाद कर सकते हैं, आदि आदि | प्रचलित मज़हबों के उपास्य कहलाने वाली इल्हामी-पुस्तकों में भी इस प्रकार की अदना कामनाओं को पूरा करने के आश्वासन देते हैं | मनुष्य के स्वाद-सुख-अनुराग, काम-सुख अनुराग आदि नीच भावों की तृप्ति करने के लिए उन्होंने एक ‘स्वर्ग’ नामक स्थान कीकल्पना की है | आप सोचें, कि यदि किसी कुत्ते को कहा जाये कि तुम अपने उपास्य से अपने लिए कोई प्रर्थना करो, तो कुत्ता अपने उपास्य से क्याचाहेगा ? निस्संदेहवहयहीचाहेगा, किमुझेहड्डियोंकेढेरदो, भेड़ियाक्याचाहेगा, किमुझेभेड़ोंकेरेवड़दो,जिनको मैं चीड़ फाड़ कर खा जाऊं | गाय क्या चाहेगी ? यही कि मुझे हरी हरी घास दो, एक एक कामी-पुरुष क्या चाहेगा, वह यही चाहेगा, कि हे मेरे उपास्य तुम मुझे सुन्दर सुन्दर स्त्रियाँ प्रदान करो,यदि इस लोक में न दे सको, तोपरलोक में स्वर्ग दो | लालचीमनुष्य क्या चाहेगा ? यही कि मुझे धन-सम्पत्ति दो | काश्तकार(खेतिहर) अपने उपास्य से क्या चाहेगा ? यही कि अच्छी फसल हो जाये |दुश्मनों से घिरा हुआ जन क्या चाहेगा ?यही कि मुझे दुश्मन पर जीतदो | मौज-बहार की ज़िंदगी का प्रेमक यह चाहेगा कि मौज-बहार करने के लिए उसे बहुत से सामान प्राप्त हों | अदना-भावों (नीच भावों) के रखने वाला जन ऐसा ही उपास्य चाहेगा जो उसके अदना भावों को तृप्त करे | इसलिए जैसे पुजारी – वैसे उपास्य बन गए | जैसे चेले – वैसे गुरु बन गए | अदना चेलों ने अपनी अदना प्रकृति को तृप्त करने वाले गुरु ढूंढें | इसलिए यह कहना कुछ ग़लत न होगा, कि करोड़ों मनुष्यों को सच्चे आध्यात्मिक-गुरु की ज़रुरत ही नहीं, इसलिए नीच-जीवनधारी मनुष्यों को आत्मा के सम्बन्ध में सत्य-ज्ञान देने वालों की मांग ही नहीं | इसलिए कहा जाता है कि जैसा शिष्य होगा, वैसा ही उपास्य होगा| ऐसेनीच अस्तित्वों को उनकी नीच प्रकृति का सत्य-ज्ञान देने वाले और उससे छुटकारा देनेवाले किसी सत्यउपास्य की ज़रुरत नहीं | यही कारण है कि सत्य-मोक्ष-दाता की मांग दुनिया में नहीं है| इसलिए‘सत्य मोक्ष दाता का हितकारी रूप’ नीच अस्तित्वों के सामने स्पष्टनहीं है | जिस प्रकार एक एक ‘रोग का बोधीबीमार’ डाक्टर को देखकर बलिहार जाता है, उसी प्रकार ‘आत्मिक-रोगों से त्रस्तएक एक रोगी जन’ आत्मिक रोगों से मुक्ति दाता के शुभ संवाद को सुनकर भी उत्साह से नहीं भरता| जिन करोड़ों अस्तित्वों के सामने उच्च जीवन की महिमा नहीं, उच्च जीवन की सुन्दरता नहीं, उच्च जीवन का मनोहर रूप नहीं, उच्चजीवन की उच्चत्तम बरक़तें नहीं, वह भला उच्च-जीवन-दाता की क्यों क़दर करेंगे, उनका सन्देश सुनकर क्यों उत्साह से भरेंगे ? उनकेपरम हितकारी रूप को क्यों देखेंगे ? और क्यों उनपर बलिहार जायेंगे ? प्रकृति(नेचर) में आखिरकार अटल नियम कामकरते हैं, क्योंकिनेचर नियम-बद्ध है, उसमे कोई बात अटकल पच्चू नहीं चलती | मनुष्य के हृदय को जिस चीज़ की ज़रुरत होगी, वह उस की तलाश करेगा, जिस चीज़ की ज़रुरत नहीं, उसकी तलाश नहीं करेगा | करोड़ों मनुष्य नीच-अनुरागों और नीच घृणाओं की तृप्ति के सामानों की ज़रुरत अनुभव करतेहैं, इसलिए उनकी तलाश में लगे हुए हैं | इन भावों की तृप्ति के सामानों को देने वाला सच्चा या झूठा अस्तित्व उनको पूजनीय नज़र आयेगा | अब आप समझ गए होंगे, कि सच्चे आध्यात्मिक-गुरु की दुनिया में मांग क्योंनहीं है |

प्रश्न:-        मेरे सामने यह सत्यसाफ़हो गया है कि जिस प्रकार पशुओं को स्कूलों और कालेजों की कोई ज़रुरत नहीं, लाइब्रेरियों की कोई जरूरत नहीं, यहां तक कि अस्पतालों की भी कोई ज़रुरत नहीं, और वह इसलिए कि वह सब इस दुनिया से कटे हुए हैं,जिस दुनिया की बातें स्कूलों और कालेजों में सिखाई जाती हैं | वैसे ही जो मनुष्य आध्यात्मिक-दुनिया से कटे हुए हैं, वह“सच्चे आध्यात्मिक-गुरु” की तलाश भीनहीं करते |

उत्तर:-    पशु इसलिए शिक्षक-जनों की तलाश नहीं करते,क्योंकि उनकी उन्हें ज़रुरत अनुभव हीनहीं होती | वह घास और भूसा देने वालों की तलाश इसलिए करते हैं क्योंकि उनकी उनको ज़रुरत अनुभव होती है | ठीक इसी प्रकार नीच प्रकृति रखने वाले जन जो उच्च-जीवन से बिलकुल अबोधि हैं, वह सच्चे आध्यात्मिक-गुरु(अर्थात आध्यात्मिक पथ प्रदर्शक) की कोई ज़रुरत अनुभव नहीं करते | ऐसे करोड़ों जनों के निकट सच्चे सतगुरु की मांग ही नहीं, और न उनके हृदय में सच्चे गुरु की तलाश है |यदि सच्चा आध्यात्मिक-गुरु उनके आगे से गुज़र भी जाए, तो भी वह उस दृष्टि से उसकी तरफ देखेंगे, जिस दृष्टि से एक पशु एक ज्ञानी-जन की तरफ देखता है | हमें इसलिए इस तत्व को बार बार स्मरण रखना चाहिए कि निज की अयोग्यता के कारण भी लाखों और करोड़ों लोग‘सच्चे गुरु’ के दरबार से वंचित रहतेहैं |

प्रश्न:-     क्या ऐसे मनुष्य भी हैं कि जिनके भीतर ‘सच्चे आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शक गुरु’ की मांग हो ?

उत्तर:-    जीहां| ऐसे जन समय समय में उत्पन्न हुए हैं जिन्होंने व्यकुलता से भरकर ऐसे गुरु के आने कीप्रार्थनाएँ की हैं, और हृदय-गत कामनाएं की हैं कि हमें कोई ऐसा “सच्चाआध्यात्मिक-गुरु” मिले, जो हमें हमारे आत्मिक-अन्धकार से निकाले, जो अपनी आध्यात्मिक-ज्योति और शक्ति देकर हमारे जीवनों की कायापलट दे, और संसार में जो नाना प्रकार के पापों और ज़ुल्मों की आग भड़क रही है, उसको बुझा दे, और मनुष्यों के हृदय में उच्च-भावों का ऐसा सुन्दर और मधुमय चमन लगावे, जिस चमन में प्रत्येक पौधा फूल और फल दोनों देता हो, जिसकी महक से इस पृथ्वी का वायु-मंडल खुशबूदार हो जाए, और जिसके रंग-रूप से इस पृथ्वी का रूप महा सुन्दर और महा पवित्र हो जाए, और सच्चे अर्थों में इस पृथ्वी पर धर्म का राज्य स्थापित हो जाए |

प्रश्न:-     आप इस बारे में कुछ बताएँगे कि दुनिया में किस किस प्रकार की मांग होती है |

उत्तर:-    जीहां| मैं इसके विषय में फिर किसी अवसर पर अवश्य बताऊंगा |

गुरु या रहबर की क्यों ज़रुरत है ?

प्रश्न:-     मनुष्य को गुरु या रहबर की क्यों ज़रुरत है ?

उत्तर:-    जिस प्रकार अन्धे को सुजाखे की ज़रुरत है, निर्धन को धनवान की ज़रुरत है, अनपढ़ को विद्वान् की ज़रुरत है, असहाय मनुष्य या जाति कोएक बोधि और बलवन नेता व लीडर की ज़रुरत है, ठीक उसी प्रकार किसी सच्ची आत्मिक ज़रुरत को पूरा करने के लिए किसी सचमुच के सच्चे आध्यात्मिक-गुरु की ज़रुरत है |

प्रश्न:-     क्या आप इक्कीसवीं सदी में भी गुरु की ज़रुरत का प्रचार करते हैं ?

उत्तर:-    जीहां| इक्कीसवींसदी छोड़ कर किसी अन्तिमसदी में भी,(यदि कोई सदी हो) गुरु की सदा ज़रुरतरहेगी|

प्रश्न:-     क्या गुरुडम ने पहले हीभारत वर्ष का बेड़ा ग़र्क नहीं किया ?

उत्तर:-    जी नहीं | ‘सच्चा आध्यात्मिक-गुरु’ प्रत्येक मनुष्य के लिए परमावश्यकहै |  बाकी इतना सच है, कि झूठे गुरुओं के पीछे जाने में मनुष्य उलटे मार्ग पर पड़ जाते हैं,और बहुत धक्के खाते और हानि उठाते हैं | परन्तु इससे सच्चेगुरु की आवश्यकता बुरीतथा ग़लत प्रमाणित नहीं होती | झूठा सिक्का मनुष्य को बेशक धोखा देता है, परन्तु यह कहना, कि चूंकि दुनियां में झूठे सिक्के चलते हैं, इसलिए सच्चे सिक्के की ज़रुरत नहीं, बड़ा भारी भ्रम है |इसी प्रकार किसी होटल में हो सकता है कि रोटी अच्छी न मिले, और उस रोटी के खाने से पेट में बदहज़मी हो जाए, परन्तु इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि मनुष्य को रोटी की ही ज़रुरत नहीं, या किसी अच्छे होटल की ज़रुरत नहीं रहेगी |प्रकृति(Nature)ने मनुष्य के हृदय में कई ज़रूरतों का बीज डाल दिया है | यदिमनुष्य की वह ज़रूरतें पूरी न हों, तो मनुष्य का अस्तित्व ही स्थिर न रहेगा |आंखें प्रत्येक मनुष्य के लिए बहुत बड़ाउपहार हैं,परन्तु यह आंखेंभीकई बार धोखा देदेती हैं | मार्ग में जाते जाते मनुष्यदूर से किसी सूखे हुए वृक्ष के तने को देख कर यह समझ लेता है,कि कोई चोर खड़ा है | और डर के मारे पसीना पसीना हो जाता है, और कई बारवहांसे भाग निकलता है | अब मनुष्य की ऐसीहालत किसने बनादी? क्या यह सत्य नहीं, कि उसकी अपनी ही आँखों ने ? इस प्रकार एक एक आंखें रखने वाला जन कई बार अपनी आँखों के कारण कई प्रकार के भ्रमों में पड़ जाता है | रस्सी को सांप समझ लेता है, और भयभीत होकर बेहोश हो जाता है |कई बार डर के मारे मौत का शिकार भी हो जाता है | अब उसकी यह बुरी हालत किस कारण से हुई ? क्या उसकी अपनी आंखें ही उसके भ्रम की जिम्मेवार नहीं ? इस भ्रान्ति-प्राप्त जन को किसने धोखा दिया ? क्या उसकी अपनीआँखों ने नहीं दिया ? एक बार की बात है कि एक गली में एकऐसाघर था, कि जिस में कोई जन रहना नहीं चाहता था, और यह कहा जाता है, कि उसमे भूत-प्रेत रहते हैं | एकबार कई नौजवान लड़केइस घर के सामने खड़े हुए यह बातें कर रहे थे, उनमे से एक ने कहा, कि यदि कोई नौजवान रात के वक़्त इस घर के अन्दर जाकर ज़मीन में कील ठोक कर आ जावे, तो मैं उसको माई का लाल कहूंगा, और इतना (अर्थातबहुत सारा)इनाम दूंगा | एक नौजवान ऐसा करने के लिए तैयार हो गया | औरनियत समय पर वह एकमोटी सी कील और हथौड़ालेकर उस घर में प्रवेशकरगया | उसने कील ज़मीन में ठोक भीदी, लेकिनकुछ समयके बाद उसकी चीखें निकलनी शुरू हो गईं | लड़कों ने समझा कि भूतों ने उस नौजवान को पकड़ लिया है | वह वहां से डर के मारे भागगए | कुछ ने जाकर अपने माता पिता से कहा कि अमुक नौजवान लड़का भूतों के मकान में चला गया है, और वहां से उसकी चीखें निकलती सुनी गई हैं | कईसमझदार सयाने जन जत्था बना कर और लालटेन लेकर उस घर के अन्दर गए | वहां उस नौजवान को मरा हुआ पाया |उसके मुर्दा चेहरे पर भय के आसार उज्जवल रूप में नज़र् आ रहेथे | जब उसको उठायागया तो क्या देखा, कि उसकी धोती का एक टुकड़ा कील के अन्दर आया हुआ था | अनुमान यह है कि जब उसने ज़मीन में कील गाड़ी, तब उसकी धोती कील के नीचे आ गई | और वह ज्योंहिउठा,त्योंहि  उसने अपने आपको भूत के द्वारा पकड़ा हुआ अनुभव किया | असलकारण को न जानकर वह इस भ्रम में पड़ गया कि किसी भूत ने उसको पकड़ लिया है, और वह चीखें मार कर बेहोश हो गया और वहीँ मर गया | अब इतना भारी धोखा उसको किसने दिया ? उस घर में अँधेरे के कारण उसकी आँखों ने | उसके साथी नौजवानों को किस ने धोखा दिया ? उनके कानों ने | अब क्या हम इससे यह परिणामनिकालें, कि आँखों की कोई ज़रुरत नहीं,विवेक तथा संवेदनाओं की कोई ज़रूरत नहीं, कानों की कोई ज़रूरत नहीं,दिमाग की कोई ज़रूरत नहीं |जो इस प्रकार के परिणामनिकालेगा, क्या वह मनुष्य बुद्धिमान माना जा सकता है? कदापि नहीं | दुनिया में कोई मनुष्य ऐसा नहीं कि जिसको उसकी आँखों ने कभी धोखा न दिया हो,जिसकेकानों ने उसेकभी धोखा न दिया हो, जिसको उसके अपने कई बोधोंने कभीधोखा न दिया हो,परन्तु यह भी सत्य है कि यदि आंखें धोखा देती हैं, तोआंखें ही उन धोखों को दूर भीकरती हैं | अगर कान धोखा देते हैं तो कान ही धोखा दूर करते हैं, अगर दिमाग धोखा देता है, तो दिमाग ही धोखा दूर करता है | इसी प्रकार अगर झूठे गुरु धोखा देते हैं, तो कोई सच्चा गुरु ही धोखा दूर करता है |

प्रश्न:-     मैं इतना तो समझ गया हूँ, किकिसी सच्चे गुरु की कोई आवश्यकताही न समझना महा मूर्खता की निशानी है | यह मनुष्य के लिए एक बहुत बड़ा धोखा है, कि किसी सच्चे अध्यात्मिक गुरु की ज़रूरत नहीं|भला मनुष्य की यह अवस्था क्यों है कि उस को हर सूरत में सच्चागुरु परमावश्यकहै?

उत्तर:-    यह मनुष्य की जन्म-जात आवश्यकता है, मनुष्य‘नन्हेंबच्चे’के रूप में उत्पन्न होता है, औरबहुतलाचारी की अवस्था में भी | उसका बच्चा होना ही यह बताता है कि वहकितनी ही आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर निर्भरकरताहै | यदि दुनिया में माताएं न होतीं, तो कोई बच्चे नज़र न आते | अगर मूर्ख बच्चा घमण्ड में आकर या किसी और बीमारी के कारण माता-पिता से सहायतालेना छोड़ दे, तो विनष्ट हो जाएगा | वह अपनी माता से सहायता लेकर पलता है, माता से सहायता लेकर उठनाबैठना सीखता है, भागना दौड़ना सीखता है, माता से सहायता लेकर ही शब्दउच्चारण करना सीखता है | माता से सहायता लेकर ही चीज़ें पहचानता है, और उन चीज़ों की ज़रूरत अनुभव करता है,माता-पिता की कृपा से ही वह शिक्षा पाना शुरू करता है, और वर्षों तक माता-पिता की सहायतापाकर ही अपनाजीवन व्यतीत करताहै | इसीलिएहिन्दुओं में प्रत्येक बच्चे के लिए यह कहागया है, कि उसके प्रथम गुरु उसके माता पिता हैं | माता-पिताउसकीएक बहुत बड़ी आवश्यकताको पूरा करतेहैं |उसको अबोधता की हालत से बोध की हालत में लाते हैं, और वर्षों तक उसकी पालना करके उसका ज्ञान की दुनिया में प्रवेश कराते हैं |इन्हीं अर्थों में माता-पिता बच्चे के प्रथम गुरु कहे गए हैं | स्वयं भी उसको ज्ञान देते हैं,और फिर औरों से भी ज्ञान दिलाते हैं |उसके शरीर और आत्मा दोनों की ज़रूरतों को पूरा करते हैं, उसके बाद बच्चा अपनी अज्ञानता से निकलने के लिए ज्ञानी पुरुषोंपर निर्भर करता है |यहज्ञानीपुरुष‘शिक्षक-जन’ कहलाते हैं, और यह गुरु-जनभीकहलाते हैं, ऐसे गुरुओं से जुड़ कर हज़ारों और लाखों बच्चे विद्वान् हो रहे हैं |जब मनुष्य अज्ञानी उत्पन्न होता है, तब इस अज्ञानता के अँधेरे से निकलने के लिए वह ज्ञानी-जनों पर आश्रित है | वही ज्ञानी-जन उसके गुरु कहलातेहैं, क्योंकि वह उसकी एक बहुतबड़ी ज़रूरत को पूरा करते हैं | हो सकता है, कि किसी बच्चे की मां गूंगी हो, बहरी हो, और इसलिए ऐसी माता अपने बच्चे की वह सेवान कर सके कि जिसकी बच्चे को बहुतज़रुरत है | अर्थात वह बच्चे को बोलना न सिखा सके, और इसलिए उसे अबोधता से निकाल कर बोध की दुनिया में लाने में असमर्थ हो | परन्तु इससे यह कहांप्रमाणित होता है कि क्योंकि एक माता ऐसी है, इसलिए माता की ज़रूरत नहीं | होसकता है कि कोई शिक्षक-जन शिक्षा देने की अच्छीयोग्यता न रखता हो, अपनेशिष्योंका पूर्ण मार्ग-दर्शन न कर सकता हो |लेकिनइससे यह कहांसिद्ध होता है, कि शिक्षक-जनों की ज़रूरत ही नहीं ? अर्थातएक एक इंसानी बच्चे के लिए अबोधता से निकल कर बोध की दुनिया में आने के लिए माता-पिता रूपी गुरुओं की नितांत आवश्यकता है |अज्ञानता से निकल कर ज्ञान की दुनिया में आने के लिए एक एक अज्ञानी-जन को शिक्षक-जनों की बहुतआवश्यकता है | जहां झूठे गुरु संसारमें भरे पड़े हैं, वहां सच्चे गुरु भी अवश्यहैं | और ऐसे सच्चेगुरुओंकी कृपा सेलाखों और करोड़ों इंसानी बच्चों का बहुतहित हो रहा है |

प्रश्न:-     क्या यह सत्य नहीं कि प्रायमाता-पिता बच्चों को बुरी आदतें भी सिखा देते हैं ? वहमांसाहारी होकर बच्चों को भी मांसाहार सिखाते हैं,ख़ुद नशों के आदि होकर बच्चों को नशा पीना सिखाते हैं, ख़ुद रिश्वतखोर होकर बच्चों को रिश्वत लेना सिखाते हैं, वह आम राय के भूखे होकर और ख़ुद सिद्धान्त-हीनता का जीवनरखकर बच्चों को भीइसी मार्ग पर चलने वाला बना देते हैं | ख़ुद महा स्वार्थी होकर बच्चों को भी अपनत्व (स्वार्थ)के विष से भर देते हैं | इस प्रकार पाप जीवन व्यतीत करके जब माता-पिता अपनेबच्चों को पाप जीवन में ढालते हैं, तो क्या वह गुरु होने के अधिकार को बुरी तरह से खो नहीं रहेहोते हैं |

उत्तर:-    जब कोई माता-पिता जाने या अनजाने अपने बच्चों को पाप जीवन की तरफ धक्का देते हैं, तब वह अवश्य अपने बच्चों के लिए हानिकारक बन जाते हैं |यह माता-पिता का दुर्भाग्य है | इसलिए देवसमाज में इस बात पर बहुत ज़ोर दिया जाता है कि माता-पिता बनने से पहले प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में उच्च परिवर्तन लाभ करे |भविष्य में बननेवाले प्रत्येक माता-पिता का यह कर्तव्य होताहै कि वह पाप-जीवन से बाहर निकलें | वह स्वार्थपरता के महा भयानक रूप से बाहर निकलें, और परोपकारी बनने की कोशिश करें | परन्तु यदि कोई माता-पिता इन कमज़ोरियों में फंसे हुए हों, तो भी उनकी जोऔर सेवाएँ हैं, उनको हम भूल नहीं सकते | माता-पिता के कारण हमने जन्म पाया, औरहम अबोधता की दुनिया से निकल कर बोध की दुनिया में आये, गूंगेपन से निकल कर बोलने की दुनिया में आये, लूले-लंगड़ेपन की हालत से निकल कर दौड़ने-भागने के योग्य बने | इसलिएसंसार में माता-पिता हमारे प्रथम गुरु हैं | हमारा कर्तव्य है कि हम उनके अथाह उपकारों को सदा स्मरण रक्खें, और पाए हुए उपकारों को कभी न भूलें | बेशकवह हमारी आत्मिक-आवश्यकता पूरी नहीं कर सकते,कि जो आवश्यकता हमारासच्चाआध्यात्मिक-गुरु या सद्गुरु ही पूरी कर सकता है |किन्तु फिर भी उन्होंने जितनी आवश्यकता पूरी कर दी, उतनाहीहमपरउपकारकियाहै|

प्रश्न:-     मैं इतना तो मानता हूँ कि कोई जन माता-पिता के उपकारों का ऋण-परिशोध नहीं कर सकता, वह फिर भी हमें प्यार करते हैं, हमारे शारीरिक-जीवन के लिए बहुत बड़े सहायक होते हैं, परन्तु स्कूलों के अध्यापक या कालेज के प्रोफ़ेसर न तो हमें प्यार करते हैं, और न हमें पाप-जीवन से बाहरनिकालते हैं | वह पैसे लेकर काम करते हैं | बिना पैसे के बात नहीं करते | पैसे कमाने के लिए नाना प्रकार की चालें चलते हैं | क्या ऐसे जन गुरु के नाम को बट्टा नहीं लगाते ? ऐसे जन हमारे गुरु कैसे हो सकते हैं ?

उत्तर:-    आपठीक कह रहे हैं, किकई बार स्कूलों के अध्यापक और कालेज के प्रोफेसरों की हालत दुखमय होतीहै | वह कई बातोंको लेकर महा स्वार्थी होते हैं | कई सूरतों में वह इस कदर अधोगति को प्राप्त हुए होते हैं कि नियत समय को छोड़ कर किसी विद्यार्थी को किसी प्रकार की सहायता नहीं देते |उनकोजितने पैसे मिलते हैं, उतना काम भीनहीं करते | अपने नियत समय केकाम से भीजीचुराते हैं |मांसाहारी होकरजाने या अनजाने मांसाहार का प्रचार करते हैं | तम्बाकू पीने की महिमा गाते रहते हैं | कई सूरतों में अपने विद्यार्थी-जनों से लेकर शराब पीते हैं, ख़ुद काम-रुपी बातों में दिलचस्पी लेते हैं, और अपने शिक्षार्थी-जनों को भी इस गंदगी की दलदल में धकेल देते हैं | इसी प्रकार कई सूरतों में अपने विद्यार्थियों का चरित्र भी बिगाड़ देते हैं |ऐसे जनों से यह आशा करना कि वह अपने शिष्यों को उनकेमाता-पिता का सा प्यार देंगे, एक कीकर के वृक्ष से सेबों की आशा करना है |फिर भी यह सत्य है कि जहां तक ज्ञान का सम्बन्ध है, उनसे हमारा भला हो जाता है | वह विद्वान हैं, वह ज्ञानी पुरुष हैं, वह पैसों के कारण भी हमारी अज्ञानता को मिटाते हैं, हमें ज्ञानी और विद्वान् बनाते हैं, हमें विद्वानों की संगत में बैठने के योग्य बनाते हैं, ज्ञान का जो विशालसमुन्दर विश्व में बह रहा है, जो ज्ञान लाइब्रेरियों की पुस्तकों में भरा पड़ा है, उसके साथ हमारा सम्बन्ध जोड़ देतेहैं| अर्थात पिछले ज़माने के लेखक-जन और इस ज़माने के लेखक-जन जो ज्ञान की धारा बहा देते हैं, उसके साथ हमारा सम्बन्ध जोड़ देते हैं | हम उनके इस ऋण को न भूलें | वह हमारे विद्या अर्थात ज्ञान-गुरु हैं, धर्म-गुरु नहीं| वह फिर भी हमारे गुरु हैं क्योंकि उन्होंने  मानसिक दृष्टि से हमारीबहुत बड़ी सेवाऔर सहायता की है | क्या यह सत्य नहीं, कि उन्होंने अविद्या के ग़ारसे निकाल कर हमें ज्ञान के संसार में प्रवेश करवाया है, उन्होंने हमें ज्योतिर्मान किया है तथा बुद्धिमान बनाया है | और ज्ञान की नईदुनिया हमारे सामने खोल दी है, जिस दुनिया में प्रवेश करके हम मानसिक-दृष्टि से नाना पक्षों में असीमउन्नति लाभ करने के योग्य हो गए हैं |

प्रश्न:-     आप यह बताएँ कि हमारी आध्यात्मिकज़रूरतों को पूरा करने के लिए जो प्रचलित धर्म या मज़हब हैं, क्या वह हमारे लिए काफी नहीं ? क्याहमाराईश्वरहमारा सच्चा रक्षक(पथ-दर्शक) और परम गुरु नहीं ? आप देखें तो सही किईश्वरकितना दयालु है, कि वह समय समय पर ख़ुद आकर तथाअपने प्यारों के द्वारा इल्हाम (किसी जन पर किसीपरलोकवासीआत्मा का आवेश या नियंत्रण ) की शक्ल में हमें रूहानियत(आध्यात्मिकता) का संदेश देता है | क्या खुदा या ईश्वरसे बड़ा भी कोई गुरु हो सकता है जो आत्मिक-जगत में हमारा पथ प्रदर्शन कर सके?

उत्तर:-    खुदा या भगवान तो एक वहम या भ्रम है, वह एक गप्प याकल्पना है | ऐसे गप्प या कल्पित अस्तित्व से इल्हाम (या आवेश) की आशा करना व्यर्थ है | बाकी जो कुछ इल्हाम की शक्ल में बताया जाता है, वहवास्तवमें प्रारम्भिक समय के (अर्थात आदि कालके)मनुष्यों को बताया हुआ केवल साधारण ज्ञान है, ऐसेनाक़स (दोष-पूर्ण)ज्ञान को इल्हाम इसलिए बताया जाता है ताकि इस ज्ञान को यह मोहर लग जाये कि खुदा का ज्ञान होने के कारण इल्हाम गलतियों से पाक़ (पवित्र) है| परन्तु यह इल्हाम वास्तव में मनुष्यों की आने वाली नस्लों(पीढ़ियों) का मानसिक दुनिया में ऊंची से ऊंची उड़ान करने के मार्ग में बहुत बाधाजनक एवं खतरनाक अन्ध विश्वास है | और ऐसे खतरनाक और अपवित्र अन्ध विश्वास को पवित्रता का पहराव पहनाने का प्रयास करना एक बहुत जबरदस्त पालिसी (सोचीसमझी चाल) है | यदि दुनिया को यह विश्वास हो जाये कि यह कहलाने वालाइल्हामी ज्ञान (खुदा या भगवान की ओर से दिया गया ताथाकथित ज्ञान)वास्तव में शुरू ज़माने के मनुष्यों का ज्ञानहै, तो इस पर बुद्धि और समझ रखने वाले लोग आलोचनाकरेंगेऔर प्रश्न उठाएंगे, और उसको स्वीकार करने से पहले तर्क की कसौटी पर जांचेंगे | इसलिए तर्क की कसौटी से बाहर रखने के लिए इल्हाम की यह गप्प फैलाई गई है | आप यह स्मरण रक्खें कि इस समय भी करोड़ों जन इस खुदा या भगवान्  के वहम से बाहर निकले हुए हैं | इल्हाम के धोखे से निकले हुए हैं | वहवैज्ञानिक–ज्योति और तर्क के दिलदादा (अर्थातअनुरागी) बने हुए हैं, और वह उनके द्वारा सबधार्मिक विश्वासों को जांचना सीख गए हैं, और इस ज़माने की जोरौ जारी है, वह खुदा या भगवान् के मिथ्या विश्वास को बहा ले जायेगी | वह इल्हाम की गप्प को भी बहा ले जायेगी और मिथ्या मज़ाहब को जड़ से उखाड़ कर मनुष्य मात्र को इस महा धोखे से स्वतन्त्र कर देगी | मनुष्यों को खुदा या भगवान् रुपी गुरु की आवश्यकता नहीं है, मनुष्योंको ऐसे ठगोंकी आवश्यकता नहीं है, कि जो अपने आप को भगवान् कहते हैं | बाकी अगर भगवान्  मान भी लिया जाए, और उनकी इल्हामी पुस्तकें भीमानलीजाएँ, तो कौनसा ऐसा पाप या गुनाह है, जो इन तथाकथित इल्हामी या धार्मिक पुस्तकों ने जायज़ या ठीक करार नहींदिया? पशुओं का वध करना खुदा ने जायज़ किया, मांसाहार खुदा ने सिखाया, नाना पशुओं का भक्षण इल्हामी पुस्तकों में मौजूद है, गैर मज़ाहब के लोगों को लूटना, उनके बीवी- बच्चों को गुलाम बनाना, उनकी फसलों को तबाहकरना उनके मंदिरों को तोड़ना फोड़ना, यहां तक कि उन की ह्त्या करना खुदा औरखुदा की इल्हामी पुस्तकों में जायज़ (उचित) ठहराया गया है | इसलिए यदि खुदा होता,तोभी वह धार्मिक या आध्यात्मिक गुरु बनने के योग्य नहीं माना जा सकता था |मनुष्य-मात्र जितना इस वहम या भ्रम से बाहरनिकलेगा, उतना ही वह इन भयानक पापों के जाल से बाहर निकल आएगा, और इस पहलू में मानवता का बहुत बड़ा उपकार हीहोगा | देवसमाज इस पहलू में मनुष्यों की अति महत्त्व-पूर्ण सेवा कर रही है | मूर्ख मनुष्य देवसमाज के सम्बन्ध में उसकेकृतज्ञ होने की बजाये शत्रु बने हुए हैं | मिथ्या मज़हबों की पैदा की हुई मनुष्यों की कैसी उलटी मत !  खुदा-परस्तों को चाहिए कि वह बजाये चिढ़नेके देवसमाज के साहित्य का अध्ययन करें और इस खौफनाक भ्रम-जाल से निकल कर आध्यात्मिक-भलाई के सच्चे मार्ग पर पड़ जाएँ और सच्चे गुरु की वास्तविकता को समझकर उन्हें प्राप्त करें |

प्रश्न:-     आप ने बताया है कि इस विश्व में समय समय पर कुछ योग्य जनों ने सत्य-मोक्ष दाता की ज़रुरत अनुभव की है, और इस ज़रुरत को लेखों के द्वारा प्रकट कियाहै | आप कृपा करके ऐसे लेखों में से कुछ उदाहरण देनेका कष्ट करें ?

उत्तर:-    जीहां| कलकत्ता के मशहूर एडिटर स्थूल-देह त्यागी राव बहादुर नरेंद्र नाथ सेन ने अपने रोज़ाना अखबार ‘इंडियन मिरर’ जो कलकत्ता से छपता था, उसमे सोलह अक्टूबर १९०१ ई० के पर्चे में यह लिखा था:-

१         आजकलका ज़माना गोया नीच हैवनी ज़िन्दगी(नीच पशु जीवन) का ज़माना है | …………….और यह ज़माना लोगों की ऐसी खौफ़नाक हालत से मुक्ति के लिए एक अवतार के प्रकट होने की आकांक्षा कररहा है |

२         हिन्दुस्तान के बंगाली विख्यात डा. रविन्द्र नाथ टेगोर ने एक स्थान पर लिखा है:-

“कौनजानता है कि एशिया के अंतिम पूर्वी-क्षितिज पर ऐसे सूर्य का प्रकाश नहीं हो चुका है, औरऐसा दिन अभी भी नहीं चढ़ चुका है (अर्थात कोई ऐसा अविर्भाव हो चुका है) … कि जो आविर्भाव सारी दुनिया को अपनी ज्योति से ज्योतिर्मान कर देगा |”

३         मिस्टर जे. एच. मोरसाहबनेअपनीपुस्तकऐथिक्सएंड ऐजुकेशन(Ethicsand  Education) (आचार विज्ञान और शिक्षा) के पृष्ट 9 पर यह प्रकट किया है कि “हमे एक नए मुक्ति-दाता की जरूरत है, हां एक ऐसे मुक्ति-दाता की, जो हमें उन बेड़ियों से मुक्त करे, कि जिनमे हम बाल्य-अवस्था से ही जकड़ेजाते हैं |”

४         मिस्टर फिलिप टामसन ने रिसाला पाजिटिव रिव्यू (Positivist Review) बाबत माह अगस्त १९१९ ई० में एक लेख के द्वारा यह लिखा है :-

“रौशन दिमाग मनुष्य पुराने मतों से बहुत आगे बढ़ गए हैं,  …… अवलोकन और सोच विचार की शक्तियों का ठीक व्यवहार करके अब हमारे लिए उनके मिथ्या मतों पर विश्वास करना सम्भव नहीं रहा |”

५.        स्थूल देह त्यागी प्रोफ़ेसर डबल्यू जेमरुस साहब ने यह लिखा है:-

“मनुष्यों को जिस चीज़ की बड़ी ज़रुरत है, वह यह है कि उनके मिथ्या विश्वासों को तोड़-फोड़ कर अच्छी तरह उनकी छानबीन की जाए और विज्ञान की उत्तरी-पश्चिमीवायु उनमेदाख़िल होकर उनकी रोगी और असभ्यअवस्था को दूर करे |”

६.        डाक्टर पाल साहिब ने रिसाला पाजिटिव रिव्यू (Positivist Review) बाबत मॉस जून १९२० में यह लिखा है:-

“दुनिया को बेहतर करने का इससे बढ़कर कोई और उपाय नहीं कि ऐसा सत्य धर्म प्रगटहो कि जो विज्ञान पर स्थापित हो और जिसका उद्देश्य इस दुनिया में मनुष्य की नैतिक और सांसारिक बेहतरी करना हो |”

७.        मिस्टर डबल्यू जेकल साहिब एम्. ए.ने अपनी किताब दी बाईबल अनट्रस्टवर्दी (The Bible Untrustworthyअर्थात बाइबल विश्वास के योग्य नहीं) के पृष्ट २०० पर यह लिखा है:-

“तमाम सोच विचार रखने वाले लोगों के सामने यह बात पूर्णत: साफ़ है कि हमें एक नए धर्म की ज़रुरत है |” फिर आगे चलकर उन्होंने उसके पृष्ठ २६६ पर यह लिखा है:-

“हमारी उम्मीद हिन्दुस्तान से ही पूरी होगी |” वस्तव में उनकी आशा भारतवर्ष से पूरी हुई | भारतवर्ष में ही देवात्मा का विशेषआविर्भाव हुआ है कि जिन्होंने विज्ञान पर स्थापित सत्य-धर्म का प्रकाश और प्रचार किया है, और जिन्होंने ही अपने मुबारिक जीवन का यह उद्देश्य बताया है कि मनुष्य के नैतिक तथा आत्मिक-जीवन को उच्च से उच्च बनाना है और ऐसे परिवर्तितजनों केलिएयहां देव-राज (अर्थात सत्य और शुभ का राज्य) फैलाना है |

८.        एक लेखक अखबार “वन्देमातरम” में यह लिखते हैं:-

“विज्ञान की असीम उन्नति का यह परिणाम होगा कि हमारा धार्मिक-अनुभव पुरानी प्रथाओं से अपना दामन छुड़ाकरवर्तमान काल के अनुसार नए नियमों से अपना सम्बन्ध जोड़ेगा |” अब यह आशा रखना तो व्यर्थ है कि हम पुन: उनधार्मिक मिथ्या विश्वासों के विश्वासीहो जाएँ कि जिनका जादू विज्ञान ने विनष्ट करदिया है |

प्रश्न:-     आप ने बड़ी कृपा करके मुझे ऐसे बहुत से अवतरणों (उदाहरणों)का ज्ञान दिया है, इनसे ऐसी बातों का मुझे ज्ञान मिला है कि जो मेरे लिए बहुत लाभदायक हैं| अर्थात दुनिया प्रचलित मतों से तंग आई हुई है | इन मतों में जो मिथ्या संस्कारों और मिथ्या विश्वासों का राज्य फैला हुआ है, उनको रोग बताया गया है, और यह कामना की गई है कि ऐसी वैज्ञानिकसुन्दरवायु चले जो इन रोगों को दूर कर दे| और यह भी प्रगट किया गया है कि यह आशा करना कि मनुष्य दोबारा मिथ्या मतों के पीछे जायेगा, बिलकुल व्यर्थ आशा है | विज्ञान पर स्थापित धर्म की आकांक्षा की गई है, और यह व्याकुलता प्रगट की गई है कि हमें कोई ऐसा मुक्तिदाता मिले जो हमारे मिथ्या और मोह के बंधनों को तोड़ दे, हमारे नैतिक तथा आत्मिक-जीवन को बेहतर कर दे, हमें उच्च-जीवन का अभिलाषी बना दे, हमें समाज और मनुष्यों का भला चाहने वाला बना दे | मैंइस प्रकार की जाग्रति कोबहुत मुबारिक समझता हूँ | विविध जन जो इस प्रकार के भावों से भरे हुए हैं, वह अवश्य सच्चे सतगुरु के आविर्भाव की आकांक्षा करते हैं |अर्थात इस प्रकार के मनुष्य ही सच्चे शिष्य हो सकते हैं |

उत्तर:-    जीहां| जब मनुष्य नीच-जीवन से तंग आ जायेगा तथा आत्मिक-अन्धकार से घबाराएगा, तब वह केवल भले मनुष्यों की आवश्यकता को ही अनुभव नहीं करेगा, किन्तुवह ऐसेवास्त्विक आध्यात्मिक-गुरु की तलाश भीकरेगा, कि जो उसकी इस व्यकुलता को पूरा      करे|देवसमाज में कई आये हुए जन इस प्रकार की आकांक्षा का प्रकाश करते हैं | एक एक जन ने एक एक सभा में यह प्रगट किया है कि मेरा हृदय बेचैन था, एक ओर दुनिया के सुख सुविधा के सामानों में मुझे तृप्ति मिलनी बन्द हो गई, और दूसरी ओर मैं जिस मत का अनुयायी था, उससे मुझे कोई तसल्ली नहीं मिलती थी | मैंने बड़े पापड़ बेले, भिन्न भिन्न मतों में गया, परन्तु मेरे हृदय को सच्ची तसल्ली कहींन मिली | आखिरकारमैंएक बार देवसमाज के सतसंग में गया, वहां यह सुनकर कि देवसमाजी भगवान् को नहीं मानते, मेरे हृदय में उनके लिए अश्रद्धातथा घृणा उत्पन्न हो गई थी, लेकिनज्योहीमैं देवसमाज के उच्च मंडल में जाकर बैठा,मेरे भीतर अजीब जादू सा होगया| ऐसा मालूम हुआ कि मैं रुलता फिरताअन्तमें सही ठिकाने पर आगया | मुझ आध्यात्मिक-भटकाव में भटकते हुए को आखिरकार सच्चा ठिकाना मिल गया | सच्चे आध्यात्मिक-गुरु की तलाश में जो मेरा हृदय बेचैन हो रहा था, उसेसच्चासतगुरु प्राप्त हो गया |  फिरक्याथा, मेरेमनऔरमस्तिष्कदोनोंकोविशेष अध्यात्मिक-उर्जामिलनेलगी| मैंनेअपनेजीवनकासच्चालक्ष्यखुलता हुआ देखा और यह भी देखा कि यह जीवन-लक्ष्यकहां पूरा हो सकता है | इन दोनों बातों ने मेरे हृदय को जिस प्रकार की सच्ची शान्ति से भर दिया, वह एक ऐसा जन ही अनुभव कर सकता है, जो वर्षों से भूला भटका फिरता हो, जो घर से बेघर होकर कोई ठीकाना न रखता हो,जो कोई सिर ढकने की जगह न पाताहो |ऐसी अवस्था में उसको जीवन दायक घर और सामान मिल गए | मैंने यह भाव-प्रकाश उन थोड़े से जनों के दिए हैं कि जिनका हृदय सच्चे सतगुरु की तलाश में भटकता फिरता था | इसलिए प्रकृति(Nature) में जो लाखों योग्य जन उत्पन्न हुए हैं, उनमे से जिन सौभाग्यवान जनों को देवात्मा की देवज्योति मिलेगी, वहआत्मा तथा सत्य-धर्म का अद्वितीय ज्ञान पने के लिए देवात्मा का ही दरवाज़ा खटखटाएंगे, तथाभगवान् देवात्मा की देवज्योति पाने पर वह मिथ्या मतों के भयानक रूप को देख सकेंगे | मिथ्या-मतों के प्रवर्तकों की वास्तविक छवि उनके सामने आ जायेगी | मिथ्या-मतों के उपास्यों को वह असल रूप में देख लेंगे और कभी भी उनकी ओर मुंह नहीं करेंगे | वह सदा के लिए मिथ्या और पाप को बढ़ाने वाले मतों से अपना पीछा छुड़ा लेंगे |

प्रश्न:-     आपके भावों को जानकर मुझे यह मालूम होताहै कि मिथ्या-मतों मेंआप कोई अच्छी चीज़ नहीं देखते ?

उत्तर:-    जब कोई मनुष्य तपेदिक के रोग में फंसा हुआ हो, तब क्या हमें इस बात से तसल्ली मिलेगी कि उसका नाक अच्छा है, या उसके कान अच्छे हैं, या उसके बाल सुंदर हैं, या उसका यह या वह अंग अच्छा है | हम तो इस फिकर (चिन्ता) मेंपड़ जायेंगे कि उस जनपर ऐसी भयानक बीमारी का हमला हुआहैकि जिससे उसका सारा अस्तित्व ही क्षय हो जाएगा| हमें इसबात से कोई तसल्ली नहींमिलतीकि अमुक मत मांसाहार छुड़वाता है, या कोई दान-पुन्य करना सिखाता है, या व्यभिचार को बुरा समझता है | हमें देखना तो यह है कि किस मार्ग पर एक एक मत मनुष्य को डाल देता है ? जब कोई डाक्टर सत्य-प्रकृति(True or Real Nature) कोछोड़ कर इस भ्रम में पड़ जाये कि परमात्मा नामक अस्तित्व की पूजा से शारीरिक रोग दूर हो जायेंगे, तो वह डाकटर कैसा ख़तरनाक़ ! इसी प्रकार मिथ्या मतों ने विश्व में जो अन्धकार फैलायाहुआ है, वह यह है कि वहसत्य-नेचर(अर्थातसत्य-प्रकृति)को छोड़ कर मनुष्यों का सम्बन्ध एक कल्पित अस्तित्व के साथ जोड़ देते हैं, जिसका नाम ईश्वर या प्रमात्मा है | यह मिथ्या मतों की बहुत हानिकारक शिक्षा है | यह मत शुरूसे ही मनुष्यों को जानबूझ करअथवाअनजाने में गुमराह करते हैं, उनकी क्रिया इस प्रकार की है, जैसे कि उस जन की हो सकती है, जोसचमुच की खुराक से अपना सम्बन्ध तोड़ कर इस भ्रम में पड़जाए, कि ईश्वर की पूजा से ही मेरा पेट भर जाएगा | जो मत सत्य-प्रकृति(True or Real Nature) से मनुष्य का सम्बन्ध तोड़ देते हैं, वह इस प्रकार की ही गलती करते हैं, अर्थात वह आत्मा की सच्ची खुराक से‘मनुष्य-आत्माओं’ का सम्बन्ध तोड़ कर उनको एक खौफनाक भ्रम में डाल देते हैं | मनुष्य का जीवन और उसकी मृत्यु नेचर के सम्बन्धों में ही निहित है | उसके आत्मा की उन्नति और अवनति भी नेचर के भीतर (अर्थात नेचर के सम्बन्धों में) ही है | वह प्रकृति-मूलक सम्बन्धों में ही विकास पाता है, और प्रकृति-मूलक सम्बन्धों में ही विनष्ट होता है | यदि उसको नेक बनना है, तो वह मनुष्यों तथा अन्य अस्तित्वों की सेवा करे | वह सचमुच के अस्तित्वों की सेवा करने से ही बेहतर बनेगा | यदि वह मनुष्यों को तो घृणा तथा एक कल्पित ईश्वर को प्रेम करेगा, तो वह अवश्य पतित हो जायेगा | ईश्वर के नाम से किसी को क़त्ल करना उस व्यक्ति को क़ातिल ही बनएगा | ईश्वर के नाम पर किसी ईश्वर से मुनकर-जन(अर्थातईश्वर को न मानने वाले जन) को क़त्लकरना उस ईश्वर के पुजारी को हत्यारा ही बनाएगा, तथा यदि कोई ईश्वर है और उसकेइस आचरण को ठीक समझता है,तोवह भी हत्यारा ही समझा जाएगा | हत्या से हत्यारा बनता है, चोरी से चोर बनता है | किसी को लूटने से लूटेरा बनता है | किसीकोगुलाम बनाने से मनुष्य शैतान बनता है | किसी कौम के बच्चों और स्त्रियों को गुलामबनाकर ले जाने से मनुष्य शैतान से भी अधिक बुरा और महा खौफ़नाक शैतान बन जाता है, चाहे वह अपने आपको ईश्वर याअल्ला का प्यारा ही क्यों न समझे | मूर्ख मनुष्य यह नहीं समझता कि शराब पीने से शराबीके शरीर कीहानि है, ज़हर खाने से शरीर की हानि है | और कई सूरतों में उसकी मृत्यु है | पाप-कर्म करने का आत्मा परबहुतबुरा प्रभावहोताहै | इस सत्य से अंधा बनाने वाले जितने भी मज़हब हैं, वह सब त्याग कर दिए जाने योग्य हैं | इसलिए जो जो मत ‘मिथ्या-उपास्यों’ की पूजा सिखाते हैं, वह मनुष्य के आत्मा में तपेदिक से भी अधिक भयानक रोग (आत्मिक-रोग)उत्पन्न करते हैं |अब जो मत इस प्रकार की खौफनाक शिक्षा देते हैं, क्या वह इस योग्य हैं कि हम उनमे एक व दूसरी खूबियाँ देखने की तलाश में लग जाएँ, और यह कहना आरम्भ कर दें कि उन्होंने चोरी को बुरा कहा है, वह बदचलनी को बुरा बताते हैं, उन्हों ने इस या उस ज़ुल्म को बुरा कहाहै |

प्रश्न:-     तो क्या आपकी यह मुराद हैकि चाहे मिथ्या-मतों ने किसी पाप को बुरा ही कहा हो, तो भी क्योंकि वह इस मूलगलती के करने वाले हैं कि मनुष्य का सम्बन्ध सत्य-प्रकृति (True or Real Nature) से तोड़ कर मिथ्या-उपास्यों के साथ जोड़ते हैं, इसलिए वह बहुत बुरी तरह से गुमराह(अर्थातपथ-भ्रष्ट)भी हैं, और इस योग्य हैं कि दुनिया से शिघ्र मिट जाएँ ?

उत्तर:-    जीहां|पहले तो यदि कोई मज़हब किसी पापको पाप कहताभी है, तो वह पापियों को उस पाप से मुक्ति नहीं देता |जिस प्रकार एक मिथ्या मत के प्रचारक ने लिखा था कि उनकी अपनी समाज में 95 प्रतिशत मनुष्य ऐसे वर्तमान हैं कि जो बदचलन हैं, बदद्यानत हैं, ठगऔररिश्वतखोर हैं, आदि आदि | और यही हालप्रत्येक दूसरेमज़हबॉनके मानने वलों का भीहै | उनके मज़हब में प्रवेश पाने की कोई कोईनैतिक शर्त नहीं है | मनुष्य कैसा ही नीच हो, कैसा ही बदचलन हो, कैसा ही ठग हो, कैसा ही बद्दयानत हो, मिथ्या-मतों में केवल विश्वास (वह भी उथला अर्थातदिखावे का विश्वास)रखने से ही प्रवेश पा जाता है | वह स्कूल ही क्या जिस की मैट्रिक कक्षा में ऐसे जन भी प्रवेश पा सकते हों कि जो लिखना-पढ़ना भी न जानते हों ? वह कालेज ही क्या जिसमे बिना यहविचार कियेकि विद्यार्थीअनपढ़ या पढ़े हुए हैं, प्रवेश कराए जाते हैं | वह मज़हब ही क्या जिसमे पापी-जन भी बिना किसी जांचपड़तालकेआसानी से प्रवेश पा सकते हों | अर्थातनैतिक-जीवन को बेहतर बनाने का किसी मज़हब ने बीड़ा नहीं उठाया |इसकेविपरीत‘मनुष्य-आत्माओं’ को ‘आत्म-अन्धकार’ मेंधकेलनेकाबीड़ा अवश्यउठायाहै| अबआपहीसोचेंकिएकतरफतोयहकुलमिथ्या-मतप्रकृतिसेसम्बन्धकाटकरमनुष्योंकोमिथ्या-उपास्योंकेसाथजोड़तेहैं, औरदूसरीतरफमनुष्योंकेनैतिक-जीवन को बेहतरनहींकरते, तोऐसेमज़हबयाधर्मकोरखकरदुनियाकाकहांभलाहोसकताहै? मैंनेआरम्भमेंऐसेकईजनोंकेउदाहरणदिएहैंकिजोदोबातेंमज़हबकेलिएज़रूरीबतातेहैं| एकतोमज़हबऐसाहोनाचाहिएजिसकाआधारविज्ञान परहो, दूसरामज़हब ऐसा होनाचाहिएजोमनुष्योंकोउच्च-जीवनकादानदेताहो|

प्रश्न:-     क्यामिथ्या-मतोंकेलोगयहदावानहींकरतेकिउनकामज़हबभीविज्ञानकेअनुसारहै?

उत्तर:-    दावातोअवश्यकरतेहैं, लेकिनउनकायहदावा व्यर्थकादावा है |“विज्ञान”प्रकृतिकेभीतरअटलनियमोंकीशिक्षादेताहै| जबकिमिथ्या-मत करामातोंकीशिक्षादेतेहैं| ‘विज्ञान’प्रकृति केभीतरपरिवर्तनकेनियमकीअटलताकाप्रचारकरताहै| मिथ्या-मत आत्माकेअमरहोनेकीशिक्षादेतेहैं| अर्थातउनका दावा है कि ‘मनुष्य-आत्माओं’के जीवनमेंकोईपरिवर्तनहोताहीनहीं| विज्ञानयहबताताहै किप्रत्येकअस्तित्वजड़तथाशक्तिसंपन्नहै, और मिथ्या-मत यह शिक्षा देते हैं कि उनके उपास्य निराकार हैं| विज्ञान यह बताता है कि प्रकृति की अपनी शक्तियों से जो परिवर्तन होता है, वह दो रूप ग्रहण करता है, अर्थात विकास और विनाश | जहां कई अस्तित्व बेहतर बनतेहैं, वहां कई अस्तित्व बदतर भी बनतेहैं | विज्ञान यह सिखाता है कि प्रत्येक परिवर्तन प्रकृति के भीतर उसकी अपनी शक्तियों से होता है | मिथ्या मत यह बताते हैं कि प्रकृति के भीतर सब परिवर्तन ईश्वर या खुदा के हुक्म से होता है | विज्ञान यह बताता है कि प्रकृति में जड़ और शक्ति अपनी मात्रा में सदा उतनी की उतनी रहती हैं | इसलिए प्रकृति अनादी है, स्वयंभू है | जब विज्ञान प्रकृति को अनादी और स्वयंभू बताता है, तब मिथ्या मतों का यह कहना कि प्रकृति का कोई बनाने वाला है, कैसी मूर्खता ! सत्य धर्म यह कहता है कि प्रकृतिके भीतर जो विनाश और विकास के नियम काम कर रहे हैं, उनका कार्य आत्मा पर भी होता है | आत्मा का जीवन है, आत्मा की मृत्यु भी है | जो‘मनुष्य-आत्मा’ जीवन के नियम पूरा करेंगे, वह जियेंगे, जो जन जीवन के नियमों को भंग करेंगे, वह अवश्य मृत्यु को प्राप्त हो जायेंगे | आत्मा अपनी बनावट में अमर नहीं है | कौनसा मत है जो इस सत्य को स्वीकार करता है, और प्रकृति के विकास और विनाश के नियमों को मानता है ? और कौनसामज़हब यह मानता है कि मनुष्य का शरीर और आत्मा– दोनों ही प्रकृति की अपनी शक्तियों के द्वारा प्रगट (अर्थात उत्पन्न)होते हैं, न कि किसी खुदा या ईश्वर की शक्ति से ? अब इन सच्चाइयों को सन्मुख रख कर आप भी समझ सकते हैं किदेव-धर्म को छोड़ कर अन्य कोई भी मत या मज़हब विज्ञान पर स्थापित नहीं है | यह भी सत्य है कि अन्य कोई भीमज़हब मनुष्यों के नैतिक-जीवन को बेहतर करने में लगा हुआ नहीं है | यहसत्य है कि किसी अन्यमत या मज़हब ने यह लक्ष्य नहींबनाया हुआ कि अपने अनुयाइयों केजीवन मेंनैतिकता तथा सत्विक-भावों को पैदा करना है | इसलिए यह दोनों आवश्यकताएं देव-धर्म को छोड़ कर अन्य कोई मत पूरी नहीं करता|

प्रश्न:-     मैं समझ गया हूँ कि देव-धर्म के अतिरिक्त अन्य कोई मत विज्ञान पर स्थापित नहीं है, और न ही‘नैतिक तथा आध्यात्मिक जीवन’ को उच्च बनाने में और न सात्विक या उच्च भावों को उत्पन्न करने में लगा हुआ है |

उत्तर:-    मुझे बहुत ख़ुशी हुई है कि आपने मेरे दृष्टिकोण को अच्छी तरह समझ लिया है |

प्रश्न:-     आपने यह बात मेरे मानसिक-कोष में अंकित कर दी है कि वास्तविक आध्यात्मिक -गुरु वही हो सकता है जो विज्ञान पर स्थापित सत्य-धर्म कीशिक्षा का प्रचार करता हो, और अधिकारी-आत्माओं(DeservingSouls) में नैतिक और आत्मिक उच्च-बोधों को उत्पन्न करने क्षमता रखताहो | क्या दुनिया में कोई ऐसा मत भीहै कि जो विज्ञान पर स्थापित हो ?

उत्तर:-    जीहां, है, और अवश्य है |

प्रश्न:-     आप तो अपने मत को ही विज्ञान-मूलक मत बताएंगे | इस प्रकार की तरफदारी या पक्षपात प्रत्येक मत के अनुयायी में होती है |

उत्तर:-    मैं एक-मात्र देव-धर्म को ही विज्ञान-मूलक धर्म समझता हूँ | वह इसलिए नहीं कि वह मेरा धर्म है, किन्तुइसलिए किदेव-धर्म प्रकृति की सत्य घटनाओं और उसके अटल नियमों पर स्थापित है,और जिसको तुम वैज्ञानिक कसौटी पर जांच सकते हो |पक्षपात के शब्द को सुन कर मैं डरना नहीं चाहता | सत्य और शुभ को लेकर किसी का पक्ष लेना मनुष्य का सबसे बड़ा कर्तव्य है | मैं देवधर्म का इसलिए पक्ष लेता हूँ, क्योंकि यह उन सत्यों पर स्थापित है जो विश्व-व्यापी हैं, औरयह उस लक्ष्य को पूरा कर रहा है जो प्रकृति-मूलक है| और जो मनुष्य को सर्वोच्च अवस्था तक ले जाता है | मैं फिर दोहराता हूँ कि देवधर्म ही एक ऐसा धर्म है जो विज्ञान-मूलक है |

प्रश्न:-     बाकी मत विज्ञान-मूलक क्यों नहीं हैं ?

उत्तर:-    वह इसलिए विज्ञान-मूलक नहीं हैं क्योंकि वह आरम्भ से ही प्रकृति की सत्यता से अन्धे हैं | वह धर्म को प्रकृति से ऊपर की वस्तु समझते हैं | केवल वही शिक्षा विज्ञान-मूलक है कि जो प्रकृति को सत्य और सारसमझे| जो उसकी सत्य घटनाओं और उसके अटल नियमों पर स्थापित हो | ईश्वर-परस्त मिथ्या मत तो ईश्वर के अस्तित्व को सत्य समझ कर उसके विश्वास पर खड़े किये गए हैं | वह कुल मत ‘कल्पित-ईश्वर’ के मिथ्या विश्वास पर स्थापित तो हैं, परन्तु विज्ञान-मूलक नहीं हैं |

प्रश्न:-     यदि कोई मत ईश्वर के विश्वास पर स्थापित किया गया है, तो क्या वह विज्ञान-मूलक धर्म से ऊंचे दर्जे का नहीं है ? क्या ईश्वर या परमात्मा प्रकृति से ऊपर नहीं ?

उत्तर:-    यह आपकी बहुत बड़ी भूल है कि आप किसी कल्पित या किसी सत्य अस्तित्व को प्रकृतिसे ऊपर दर्जा देते हैं |प्रकृति का तो क्या कहना है, ईश्वर तो एक चींटी की तुलना में भी कोई हैसियत नहीं रखता, क्योंकिचींटी अस्तित्व रखती है, और ईश्वर का कोई अस्तित्व ही नहीं है | अंग्रेज़ी का एक मशहूर मुहावरा है कि ‘A living dog is better than a dead  lion’अर्थात एक जीवित कुत्ता किसी मरे हुए शेर से कहीं बेहतर है | जिस अस्तित्व की कोई हस्ती ही नहीं, वह सचमुच के छोटे से छोटे अस्तित्व की तुलना में भी कोई वास्तविकता नहीं रखता | बाकी आपको अधिकार है कि आप यह मान लें कि कोई ईश्वर या ख़ुदा है और वह सब अस्तित्वों से ऊंची हस्ती रखता है, और उसकी तुलना में प्रकृति (Nature) कोईहस्ती नहीं रखती, और ऐसे अस्तित्व पर स्थापित जो मत या धर्म खड़ा किया गया है, वह बहुत ऊंचा धर्म है | बेशक वह ऊंचा रहे, परन्तुआप इससे तो इनकार नहीं कर सकते कि वह विज्ञान-मूलक धर्म नहीं है, और नहीं हो सकता |

प्रश्न:-     हाथी के पांव में सबके पांव हैं | क्या इससे यह मुराद है कि ईश्वर या खुदा पर स्थापित मत में विज्ञान-मूलक धर्म भी आ जाता है ?

उत्तर:-    ऐसा समझना बहुत बड़ी गलती है | प्रत्येक‘विज्ञान’ प्रकृति (Nature) को सत्य मानता है और वह प्रकृति की ही सत्य घटनाओं और उसके अटल नियमों पर स्थापित होता है | ईश्वर के विश्वास पर स्थापित धर्म प्रकृति की सत्य घटनाओं और अटल नियमों पर स्थापित नहीं है | ईश्वरपर स्थापित मत यामज़हबकभीभीऔरकिसीसूरतमेंभीविज्ञान-मूलकनहींहोसकते|

प्रश्न:-     यदिवहविज्ञान-मूलकनहींहैंतो, इससेक्याहानिहै?

उत्तर:-    उनसेइतनीअधिक हानिहैकिवहउसकोकभीपूरानकरसकेंगे, औरईश्वरकेभ्रम पर स्थापित मत मिथ्या भी हैं और प्रकृति के अटल नियमों और सत्य घटनाओं पर सभी के विरुद्ध भी हैं | इसलिए महा हानिकारक हैं |

प्रश्न:-     भला वह किस तरह ?

उत्तर:-    वह इस तरहकि जो कुछ है, वह प्रकृतिमें ही है, और जो भी अस्तित्व प्रकृति में वर्तमान है, वह और केवल वह हीसत्य है |प्रकृति मेंजोनियम काम कर रहे हैं, वह और वही सत्य तथा विश्वव्यापी हैं|इसलिएवह सब के सब मत झूठे हैं कि जो प्रकृति की सत्यता से इनकार करते हैं | इसी प्रकार वह सारे का सारा तथाकथितज्ञान भीमिथ्या है किजो प्रकृति की सत्य घटनाओं और उसके अटल नियमों के विरुद्ध है | प्रकृति की सत्य घटनाएं यह हैं– कि‘प्रत्येक जीवित तथा अजीवित अस्तित्व’ जड़ तथा शक्ति सम्पन्न हैं |अब जो जन यह मानते हैंकि उनका ईश्वर केवल शक्ति है और कुल ‘मनुष्य-आत्मा’ भी शक्ति हैं, वहसबमिथ्या को मानते हैं | इसी तरह जो जन प्रकृति के नियमों की अटलता के विरुद्ध जानबूझ कर अथवाअनजाने में शिक्षा देते हैं, वह सब के सब मिथ्या मत हैं | अब दुनिया के मत तो चमत्कारों को मानते हैं,चमत्कार यह दिखातेहैं कि किसी मत का बानी (संस्थापक)प्रकृति केअटल नियमों के विरुद्ध घटनाएं पैदा कर सकता है | इसलिए जोजो मतप्रकृति की सत्यता को नहीं मानते और प्रकृति की सत्य घटनाओं और अटल नियमों के विरुद्ध शिक्षा देते हैं, तथाचमत्कारों को मानते हैं, वह सब के सब मिथ्या मत हैं, और भयानक तौर पर पथ-भ्रष्ट तथा विपथ-गामी हैं |

प्रश्न:-     आपने तो प्रचलित मतों को सत्यता के आधार पर किसी काम का नहीं रहने दिया औरप्रकृति को ही बहुत बड़ी उच्च पदवी दे दी है |

उत्तर:-    प्रकृति को मैंने तो उच्च पदवी नहीं दी, वह तो स्वयं उच्च हस्ती रखती है | यह तो भूली भटकी मानवता प्रकृति की सत्यता से अन्धी है; इसलिए प्रकृति को छोड़ कर कल्पना के पीछे भाग रही है और वहमों के पीछे भाग कर मनुष्यों ने इतनी हानि और दुःख उठाया है कि जिस का अनुमान नहीं हो सकता | विपथ-गामी मनुष्यों ने गलतियों से रहित एक सर्व-ज्ञानी अस्तित्व को अपनीकल्पना से घड़ लिया है, और उसको घड़ कर उसकी तरफ से नबियों या रसूलों या पैगम्बरों आदि का भेजे जाना मान लिया है | उसकी तरफ से विशेष पुस्तकों का भेजा जाना मान लिया है |और इसलिए आरम्भ काल की शिक्षा जो ऐसी इल्हामी पुस्तकों में वर्तमान है, उसको खुदा या ईश्वर का दिया हुआ ज्ञान मान कर और फैला कर मनुष्य-मात्र के दिमागों और दिलों को ऐसी अँधेरी कोठरी (SmallDark Room)में बुरी तरह से बन्द कर दिया है कि अभी तक करोड़ों मनुष्य इस 21वीं सदी में भी उस प्रारम्भिक-काल के मिथ्या तथा कल्पित ज्ञान को परे नहीं फैंक सके | बड़े बड़े विद्वान् जन अब भी यह मानते हैं कि सारी प्रकृति का कोई पैदा करने वाला है, जिस के “कुन” नामक शब्द कहने से लाखों और करोड़ों अस्तित्व पैदा हो गए | कई विद्वान् जन यह भी मानते हैं कि खुदा या ईश्वर ने सूर्य तथा सितारे आदि इस पृथ्वी को ज्योतिर्मान करने के लिए जगमगाते दिए बनाए हैं | अर्थातसारी प्रकृति इस तुच्छ पृथ्वी की सेवा करने के लिए बनाई गई है | ओह! कितनी अज्ञानता और कितनी अन्धता !!

लाखों और करोड़ों मनुष्यऐसी पुस्तक के पुजारी बने हुए हैं कि जिसमे यह बताया गया है कि आसमान की भी कोई हस्ती है | वह एक प्रकार कीछत है, जिसके खम्बे (Pillers) कोई नहीं,जो छत बिना खम्बों के खड़ी है |औरजितने पहाड़ हैं, वह बड़ी बड़ी मेखें (अर्थात कीलें) हैं, जो ख़ुदा ने इस पृथ्वी को एक स्थान पर स्थिर रखने के लिए ठोक दी हैं | जो यह मानते हैं कि यह पृथ्वी एक स्थान पर खड़ी है और सूर्य उसके चारों ओर घूम रहा है | लाखों और करोड़ों मनुष्य इस मिथ्या और पाप-मूलक शिक्षा के विश्वासी बने हुए हैं कि सारा ‘पशु-जगत’ मनुष्य की सेवा केलिएबनाया गया है, और मनुष्य का यह जन्म-जात अधिकार है कि वह कई पशुओं को बेशक काट कर खा जाए, और वह एक विशेष अवसर पर लाखों और करोड़ों पशुओं को वध कर दे | ओह! कैसी भयानक शिक्षा !!

लाखों और करोड़ों जन यह मानते हैं कि खुदा ने आरम्भ से ही स्त्रियों को पुरुषों की तुलना में दूसरे दर्ज़े की (Inferior) उत्पन्न किया है | यह आरम्भ-काल का जंगली(पाशविक) ख्याल उन सब ज़ुल्मों के लिए जिम्मेवार है, जो स्त्री जातिपर सदियों से किये गए हैं | अब इस और अन्य नाना प्रकार की मिथ्याओं और पाप-मूलक शिक्षाओं को इतनी लम्बी आयु क्यों मिली ? इसलिए कि वह सारी की सारी शिक्षाएं एक गलतियों से रहित सर्वज्ञानी और सर्व-शक्तिमान अस्तित्व की तरफ से बताई गई हैं, और अंध-विश्वासी जन इस कल्पित अस्तित्व को सत्यमानकर उसके विरुद्ध सोचने को ही पाप समझते हैं | इस खौफनाक अंध-विश्वास ने लाखों और करोड़ों दिमागों को ताले लगा दिए हैं | मनुष्य की सोचने और समझने की शक्तियों को ग़ारत कर दिया है | इसलिए आप बेशक खुदा या ईश्वर के विश्वास पर स्थापित मज़हबों या मतों को ऊंचे समझें,दरअसल आपके उच्च समझने से वह उच्च हो नहीं जायेंगे | वह मिथ्या-मूलक ही रहेंगे, पाप-मूलक ही रहेंगे | जिस प्रकार इन मिथ्या-मतों ने करोड़ों मनुष्यों को गुमराह तथा पथ-भ्रष्ट किया है, वह आगे के लिए भी जबतक उनका अधिकार मनुष्यों के हृदयों पर रहेगा,उनकी हानियाँ करते तथा उनको गुमराह हीकरते रहेंगे |

प्रश्न:-     मैं आपके दृष्टिकोण को समझ गया हूँ, किकिसी अस्तित्व के साथ कल्पित गुणों को लगा देना उसको गुणवान नहीं बना देता | यदि खुदा या ईश्वर को गलतियों से रहित बताया गया है, तोसत्यकी ज्योति के सन्मुख यह दावा एक क्षण के लिए भी नहीं ठहर सकेगा, क्योंकि कहलाने वाली इल्हामी-पुस्तकों में मिथ्या-शिक्षा वर्तमान है, ईश्वर को सर्वज्ञ बताने से वह सर्व-ज्ञानी नहीं बन जाता, क्योकि कहलाने वाली इल्हामी-पुस्तकों में जो शिक्षा वर्तमान है, वह सत्य-ज्ञान के पूर्णत: विरुद्ध है | ऐसी बताई हुई शिक्षा के विचार से ऐसा उपास्य मनुष्यों की तुलना में भी अल्प-ज्ञानी प्रमाणित होताहै| मैंने समझने के लिए यह प्रश्न किये थे |मैं यह मानता हूँ कि प्रकृति सत्य है, प्रकृति की घटनाएँ ही वास्तविकता की वस्तु हैं, और प्रकृति के नियम पूर्णत: अटल हैं | वही ज्ञान सच्चा है कि जो प्रकृति की सत्यता सिखाता है | वही ज्ञान सच्चा है जो प्रकृति केसत्यअस्तित्वों और घटनाओं सत्यता से अवगत करवाता हो |वह सारे का सारा ज्ञान मिथ्या है, जो प्रकृति के नियमों और उसकी सत्यघटनाओं के विरुद्ध हो | विद्वान् की पदवी उस जन को ही मिल सकती है, जिसकी शिक्षा प्रकृति कीघटनाओंऔर अटल नियमों पर ही स्थापित हो | मिथ्या-मत विज्ञान पर स्थापित नहीं, वह तो सरासर गप्प हैं | एक-मात्र वही मत विज्ञान-मूलक हो सकता है और सत्यता की पदवी पा सकता है कि जो प्रकृति की घटनाओं और अटल नियमों पर स्थापित हो | इसलिए आपका मत ही विज्ञान-मूलक है | अब कृपा करके आप यह बताएं कि इस विज्ञान-मूलक मत का दाता कौन है ?

उत्तर:-    इस विज्ञान-मूलक सत्य शिक्षा के प्रगटकरने वाले भगवान् देवात्मा हैं |

प्रश्न:-     उन्होंने यह शिक्षा कहां से पाई है ?

उत्तर:-    उन्होंने यह सारी शिक्षा अपनी देव-शक्तियों के विकास से उत्पन्नतथा विकसित देव-ज्योति में देखी और प्रकाशित की है |

प्रश्न:-     देव-ज्योति से आपका क्यातात्पर्य है?

उत्तर:-    प्रकृतीके लाखों और करोड़ों वर्षों के विकास-क्रममेंभगवान् देवात्मा अद्वितीय देव शक्तियां (अर्थात सत्य और शुभ से पूर्णाग प्रेम तथा मिथ्या और अशुभ से पूर्णाग घृणा ) लेकर इस पृथ्वी पर अवतरित हुए | उनमें अपनी इन देव-शक्तियों की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप  अद्वितीय देव-ज्योति तथा देव-तेज उत्पन्न तथा विकसित हुए| यह देव-ज्योति तथा देव-तेज विज्ञान-मूलक सत्य धर्म के खोजने के लिए अति आवश्यक थे | देवात्मा को छोड़कर यह दोनों किसी और मनुष्यात्मा में उत्पन्न नहीं हुए, क्योंकि सब ‘मनुष्यात्माएं’ अपनी अपनी आत्मिक-गठन में अधूरी थीं और हैं | अत: यह देव-शक्तियां तथा देव-ज्योति एवं देव-तेज उनमे उत्पन्न  हो ही नहीं सकते थे | साधारण मनुष्य तो एक ओर, बड़े बड़े विद्वानों, प्रचलित मतों के संस्थापकों और सारे मतों के उपास्यों में भी यह देव-ज्योति उत्पन्न नहीं हुई |

प्रश्न:-     आपका यह दावा तो बहुत बड़ा दावा है, क्या इतने बड़े बड़े महा-पुरुषों में यह देव-ज्योति उत्पन्न ही नहीं हुई ?

उत्तर:-    जी नहीं | यह कहा जाता है कि एक बार एक ऊँट जो पानी का प्यासा था, ऐसी जगह पहुंचा कि जहां एक पानी का भरा हुआ मटका धरती के अन्दरगाड़करमुसाफ़िरों के लिए रक्खा गया था, उसके ऊपर एक ढक्कन था | इस ढक्कन के ऊपर एक मट्टी का प्याला भी रक्खा हुआ था | यह ऊँट उस मटके और प्याले को देखकर भी प्यास बुझाने के लिए अपनी कोई सहायतानहीं कर सका |इस कहानी में यह बताया गया था कि उसी स्थान पर एक पांच वर्ष का बच्चा लाया गया था, जो उसके मालिक का बेटा था | कहानी लिखने वाले ने यह लिखा है कि यह ऊँट और छोटा बच्चा बातें कर रहे थे | ऊँट उस बच्चे को कह रहा था कि मेरे शरीर में ऐसी शक्ति है कि मैं तुम्हें अपने पांवों के नीचे दबा कर तुम्हारे प्राण निकाल सकता हूँ | उस बच्चे ने उसे उत्तर दिया,कि ऐ मेरे मित्र ! तुम मुझसे बहुत लम्बे और ऊंचे हो, और शक्तिशाली हो, परन्तु फिर भी मेरी सहायता के मोहताज़ हो, मैं एक ऐसी ज्योति का स्वामी हूँ, जो तुम्हारे भीतर नहीं है, न केवल तुम्हारे भीतर किन्तु सारे पशु-जगत के भीतर नहीं है| बड़े बड़े हाथियों में नहीं, बड़े बड़े मगर-मच्छों में नहीं | ऊँट ने कहा, किमुझेवह ज्योति दिखाओ | बच्चे ने उत्तर दिया, कि मैं तुम्हें अभी दिखाता हूँ |  इस बात को हृदय में रख कर यह बच्चा ऊँट पर सवार होकर ऐसे स्थान पर पहुंचा जहां ऊँट पानी के लिए तड़पने लगा | उस बच्चे को पता था कि पानी कहां है, उसने ऊँट को उसी स्थान पर लेजाकर कहा, कि यहां पानी है, तुम ढूंढ सकते हो तो ढूंढ लो | यदि ऊँट के पास बुद्धि की ज्योति होती तो वह उस मटके को देख लेता, घड़ा तो उसके सामने ही था, केवल उसका मुंहही धरती से बाहर था | घड़े के मुंह पर एक ढक्कन रक्खा हुआ था | ऊँट ने इधर-उधर बहुतदेखा, लेकिन उसे कहींपानी न मिला | तब उस बच्चे ने जाकर घड़े का ढक्कन उतारा और ऊँट से कहा कि लो पानी पी लो | पानी घड़े के कुछ नीचे था,और ऊँट का मुंहउसके अन्दर न जा सकता था | ऊँट के मुंह में उसने एक कटोरा लगाया, लेकिन वह कटोरे को क्या करता | आखिरकारबच्चे ने उस कटोरे से पानी निकाल कर ऊँट को पिलाना शुरू किया और बताया, कि तुम जिस ज्योति से विहीन हो, उस अन्धता के कारण तुम कटोरे को सामने देखकर भी अपने काम नहीं ला सके | फिर वह बच्चा उसे कुँए पर ले गया और वहां जाकर बताया कि यह कुआं मेरे पिता ने खुदवाया है | सारा पशु-जगत एक कुआं तकनहीं खोद सकता,चाहे शरीर के विचार से वहकितना ही बलवान क्यों न हो, क्योंकि उसमे मानसिक-ज्योति नहीं है | अब इस कहानी के अनुसार सारा पशु-जगत मानसिक-ज्योति से खाली होने के कारण न केवल अन्धाहै, किन्तु असमर्थ भी है | इसी तरह सारा मनुष्य-मात्र देव-ज्योति से खाली है, तब उस में वही लक्ष्ण उत्पन्न हो सकते थे, जो देव-ज्योति से विहीन अस्तित्वों में हो सकते हैं | सारा मनुष्य-मात्र देव-ज्योति से विहीन होकर घोर आत्मिक-अन्धकार में ग्रस्त था, इसलिए वह अपना आत्मिक-हित करने में भी असमर्थ हो गया |अब इस सच्चाई को सामने रखकर कोई जन इस गुमराह करने वाले विचार में नहीं पड़ सकता कि देखो मनुष्यों में ऐसेऐसे महान लोग उत्पन्न हुए, फिर भी आपकहते हैं कि यह सबके सब देव-ज्योति से विहीन थे | निस्संदेहवह देव-ज्योति से इसलिए विहीन थे, क्योंकि वह देव-शक्तियों से शून्य थे | जिस प्रकार पशु-जगत मानसिक-ज्योतिसे इसलिए वंचित था और वंचित है क्योंकि वह उन्नतशील मानसिक-शक्तियों से विहीन है | देव-ज्योति से विहीन होकर किसी भी कहलाने वाली (तथा-कथित) बड़ी हस्ती ने आत्मा के सम्बन्ध में सत्य-धर्म की शिक्षा नहीं दी और न ‘मनुष्य-आत्माओं’ को सत्य-मोक्ष दी और न उनके उच्च विकास का बीड़ा ही उठाया |

प्रश्न:-     यह देव-शक्तियां किस में उत्पन्न हुईं ?

उत्तर:-    जैसा कि ऊपर वर्णित किया जा चुका है,केवलदेवात्मा में |

प्रश्न:-     क्या फिर देवात्मा ही एकमात्र सत्य-धर्म के शिक्षक हैं ?

उत्तर:-    जीहां| क्योंकि उन्होंने ही अपने आत्मा में देव-ज्योति उत्पन्न और विकसित की, कि जिससे उनके सन्मुख सारी आत्मिक-दुनिया खुल गई |

प्रश्न:-     तो क्या वही एकमात्र आत्मिक सत्य-ज्ञान के तथावही देव-ज्योति दाता हैं ?

उत्तर:- जीहां| सत्य-धर्म के एकमात्र शिक्षक होने के कारण केवलवह ही सच्चे आध्यात्मिक-गुरु तथाजीवन पथ-प्रदर्शक हैं |

प्रश्न:-     आपने देव-ज्योति दाता भगवान् देवात्मा को ही एकमात्र सत्य-देव अर्थात सच्चे उपास्य-देव और परम गुरु के रूपमें प्रकाशित किया है, और वह इस बात को लेकर, कि देव-ज्योति दाता वह और केवल वही हैं, क्योंकि बिना देव-ज्योति के किसी के सन्मुख आत्मिक-जगत खुलता नहीं; इसलिए आत्मिक-जगत में प्रवेश की आकांक्षा रखने वालेप्रत्येक अधिकारी मनुष्य के लिए यह परम आवश्यक है कि वह भगवान्देवात्मा की शरण को प्राप्त करे | क्या यही एक ज़रुरत है कि जिसके पूरा करने के लिए हमें सच्चे गुरु की आवश्यकताहै ?

उत्तर:-    आत्मा के सम्बन्ध में सत्य-ज्ञान पाने के लिए भगवान् देवात्मा का दरबार एक ही दरबार है, जो इस दरबार से निकलेगा, वह आत्म-अन्धकार के हवाले हो जायेगा | भगवान् देवात्मा न केवल आत्म-अन्धकार हर्ताहै, बल्कि आत्म-मोक्ष दाता और आत्म-विकासकर्ता भी हैं |

प्रश्न:-     वह किस प्रकार ?

उत्तर:-    इसके बारे में आपको गंभीरता से कुछ सत्यों का दर्शन करना चाहिए, जो यह हैं:-

१.        पहला सत्य यह है कि मनुष्य-आत्मा अपने भीतर जिस जिस प्रकार के भाव रखता है, उन्हीं के अनुसार वह अपनी सारी चिंताएं और अन्य कार्य करता है, और जो जो भाव उसके  भीतर नहीं हैं,उनके साथ सम्बन्ध रखने वाली चिंताएं और क्रियाएं भी नहीं कर करता और नहीं करसकता |

२.        सारा मनुष्य मात्र सुखार्थी प्रकृति रखने के कारण नीच रागों और नीच घृणाओं में बुरी तरह फंसा हुआहै और इन नीच-शक्तियों के अधीन होकर वह नाना प्रकार की नीच गतियाँ ग्रहण करता है, जिन नीच गतियों के कारण वह अपनी और अपने साथ सम्बन्ध रखने वाले  सब अस्तित्वों की महाहानियाँ करता है, और वह हानिकारक बन जाता है | करोड़ों जन अपनी इस प्रकृति के कारण हिंसक-जीव बने हुए हैं |

३.        इन नीच रागों और नीच घृणाओं के दासत्व के कारण मनुष्य असंख्य प्रकार के पाप करता है, ऐसा कोई पाप नहीं, जो मनुष्य अपनी सुखार्थी प्रकृति के कारण नहीं करता, इस लिए पापों का जो बाज़ार गर्म है, उनके मूल कारण मनुष्यों की नीच-भाव शक्तियां हैं, जिनको हम नीच अनुराग और नीच घृणायें कहते हैं |

४.        मनुष्य अपने ऐसे ही नीच भावों के कारण असत्य और अशुभ को ग्रहण करता है | झूठ और बुराइयों कापक्षपाती हो जाता है| अपनी और औरों की झूठी महिमा गाता है, झूठी कथाएं रचता है, झूठे मुकद्दमें लड़ताऔरलड़ाताहै, झूठेदस्तावेज़(प्रमाणपत्र) बनाता है, औरोंपरझूठेदोषऔरआरोपलगाताहै, अपनेकिसीसच्चेदोषसेबचनेकेलिएझूठेगवाहखड़ेकरलेताहै, अपनीईर्ष्याकोतृप्तकरनेकेलिएकिसीकीसच्चीप्रशंसाभीनहींसुनसकता, औरइसलिएउसकीझूठीनिन्दाकरताहै| दुनियामेंअसंख्यप्रकारकीमिथ्याओंकाराजऔरझूठचारोंओरफैलाहुआहै, इनसबकामूलकारणभीमनुष्यकेयहीनीच-भावहैं|

५.        इन नीच अनुरागों और नीच घृणाओंके कारण जिसस्वतंत्रताकामनुष्यअनुरागीबनाहुआहै, उसस्वतंत्रताकोभीकरोड़ोंजनखोबैठतेहैं | यदिउन्हेंयहकहाजायेकिआत्म-स्वतंत्रता मनुष्यकोमिल ही नहीं सकती, तो यह असत्य न होगा |मनुष्य तो जिस अस्तित्व से सुख पाता है, उसका दास हो जाता है | घर के सामानों और पदार्थों के साथ बंधजाता है, घर के एक एक कमरे के साथ बंध जाता है, अपने गांव या शहर के साथ बंध जाता है, अपनी स्त्री और बच्चों के साथ बंध जाता है, अपने मिथ्या से मिथ्या विश्वास के साथ बंध जाता है, अपने दोस्तों व मित्रों के साथ बंध जाता है,अपनी समाज औरसोसाईटी के साथ बंध जाता है, अपने भाई-बहनों के साथ बंध जाता है | इन्हीं सब बन्धनों के साथ बंध कर वह अपनी स्वतंत्रता को खो देता है | उनके सम्बन्ध में खौफ़नाक़ पक्षपात के अत्यन्त भयानक भूत को अपने दिल का स्वामी बना लेता है | जहां एक ओर उनकी जुदाई से आघात पाकर कई बार वह मृत्यु के हवाले हो जाता है, और अनुचित दु:खोंका शिकार हो जाता है, वहां दूसरी ओर वह इस भयानक पक्षपातके कारण नाना सम्बन्धों में भयानक हानितक करलेता है |

६.        मनुष्य अपने नीच-भावों के वशीभूत होकर सच्चाई और भलाई का भी शत्रु बन जाता है, इसीलिएआत्मि-सत्य-ज्ञान का आकांक्षी नहीं बनता, औरआत्म-अज्ञानता और अन्धतामें ही संतुष्ट रहता है, और इस अन्धता से उत्पन्न हुई कई प्रकार कीहानियों का शिकार हो जाता है | ऐसे करोड़ों मनुष्य डरते हैं तो सच्चाई से, और तृप्ति पाते हैं, तो झूठ और अन्धता में | अब यदि आत्म-अज्ञानता का भयानक रूप किसी के सन्मुख आजाए तो वह उससे डरेगा, परन्तु यह अभागे और नीच-भावों के दास जनसत्य-ज्ञान से डरते हैं |

७         इन्हीं नीच-भावों के कारण करोड़ों मनुष्य उलटा-दृष्टा बने हुए हैं | वह झूठ कोसच, और सच को झूठ मानते हैं, और नेकी को बदी(बुराई) और बदी को नेकी समझते हैं, इसलिए वह खौफनाक रूप में आत्म-रोगी बन जाते हैं | इन नीच भावों के वशीभूत होकर मनुष्य जो सबसे बड़ी हानि उठाता है, वह यह है कि वह सत्य और हित को ग्रहण करने की सामर्थ्य को (यदि उसमे कुछ ऐसी सामर्थ्य वर्तमान हो) खोता रहता है, और असत्य और अहित का सामना करने की योग्यता तथा बल कोभीखो देता है | इसलिए वह आत्म-कल्याण का या यह कहो कि जीवन के कल्याण का सारा मार्ग स्वयं ही बन्द कर लेता है | अब यदि आप इन सच्चाइयों पर विचार करें, तो आप समझ सकेंगे कि हम मनुष्यों को आत्मा के सम्बन्ध में अज्ञानी, अन्धे, रोगी और दुर्बल क्यों कहते हैं ?

प्रश्न:-     अब यदि मनुष्य की यही प्रकृति है, तो क्या ऐसा मनुष्य कोई हितकर गति भी कर सकता है ?

उत्तर:-    केवल इस प्रकार की प्रकृति रखकर मनुष्य साधारणत: कोईआत्मिक-उच्च-गति ग्रहण नहीं कर सकता | इस प्रकार की प्रकृति रखने वाले इननीच-अस्तित्वों में से कोई कोई अस्तित्व नाम या झूठे संस्कार के वश में होकर जो जो दान पुण्य करते हैं, उससे भलाई तो अवश्य आती है, परन्तु वह कुल भलाई ऐसा दान देने वाले मनुष्य अपने दया भाव से नहीं करते |इतनासत्यहै कि करोड़ों नीच प्रकृति रखने वाले जनों में से कुछ ऐसे जन भी पाए जाते हैं कि जो कोई न कोई उच्च या सात्विक-भाव रखते हैं | ऐसे मनुष्य अपने सात्विक-भावों से परिचालित होकर कुछ न कुछ हित-उत्पादक गतियाँ अवश्यग्रहण कर लेते हैं | परन्तु जो करोड़ों मनुष्य इन उच्च भावों से ही विहीन हैं, वह तो हानिकारक गतियों में ही रात दिन अपनी जीवन-यात्रा पूरी करते हैं |

प्रश्न:-     क्या इन करोड़ों मनुष्यों में पण्डित, पैगम्बर, योगी, मौलवी, काज़ी, पादरी और फुन्गी आदि कहलानेवालेवह करोड़ों मनुष्य भी शामिल हैं, जो विद्वान् कहलाते हैं?

उत्तर:-    जीहां| जिस प्रकार बड़े से बड़ा पशु भी छोटे पशुओं की भान्ति पशु-प्रकृति (अर्थातपशु-स्वभाव) का ही प्रकाश करतेहैं,ठीक उसी प्रकार नीच भाव रखनेवाले बड़े बड़े विद्वान् या धर्म-प्रचारक भीसाधारण मनुष्यों की भान्ति अपनी प्रकृति से हानिकारक फल उत्पन्न करने से नहीं रुक सकते | वह भी सभी के सभी बुरी तरह आत्म-अन्धकार तथा आत्म-अज्ञानता में ग्रस्त हैं |

प्रश्न:-     क्या यह विद्वान् और प्रचारक मनुष्य आत्मिक-ज्योति की अभिलाषा नहीं रखते ?

उत्तर:-    उनके सन्मुख जब देव-ज्योति का तत्व ही नहीं खुला, तब वह उसकी अभिलाषा कैसे कर सकते हैं ?

प्रश्न:-     भला यह देव-ज्योति मनुष्यों के हृदय में पहुँच कर क्या कार्य करती है ?

उत्तर:-    यह महान और सर्वोच्च देव-ज्योति अधिकारी मनुष्यों के हृदयों में प्रवेश करके उन्हेंउनकी नीच-गतियों को हानिकारक और घृणित रूप में दिखाती है|यह देव-ज्योति ऐसी हानिकारक और घृणित गति से निकलने के लिए उनके हृदय में उच्च् प्रेरणा उत्पन्न करती है, यह अति महानऔरउच्च देव-ज्योति एक एक अधिकारी हृदय को उच्च-भावका सौन्दर्य दिखाती है, यह महा दुर्लभ देव-ज्योति उच्च-भाव का सुन्दर रूप दिखाकर उस मनुष्य को इस भाव के पाने के लिए इच्छुक बना देती है | यह इच्छा या अभिलाषा एक बहुत ही असाधारणप्रेरणा है | इस आकांक्षा से परिचालित होकर एक एक अधिकारी मनुष्य उस देव-तेज को पाता है, जिस से उसकी यह आकांक्षा पूर्ण होती है, वह एक ओर अपनी नीच-प्रकृति से सच्ची मोक्ष लाभ करता है, और दूसरी ओर उच्च-भावों में उन्नति पाता है |

प्रश्न:-         यह देव-ज्योति और देव-तेज तो महा अमूल्य रत्न हैं ?

उत्तर:-    जीहां| यह तो मनुष्य के लिए परम आवश्यक लाभ हैं |

प्रश्न:-     इन्हीं देव-ज्योति और देव-तेज सम्पन्नकिरणों को आप किसी और नाम से भी स्मरण करते हैं ?

उत्तर:-    जीहां| हम इनको देव-प्रभाव कहते हैं |

प्रश्न:-     देव-प्रभावों से आपका क्या अभिप्राय है ?

उत्तर:-    देव-प्रभाव वह असर हैं कि जो देवात्मा की देव-प्रकृति से उसी प्रकार निकलते हैं, जिस प्रकार नीच प्रभाव नीच-प्रकृति रखने वालों से निकलते हैं |

प्रश्न:-     क्याआपकायह तात्पर्य है कि प्रत्येक मनुष्य मेंसे प्रभाव निकलते हैं ?

उत्तर:-    जीहां, जहां कहीं शक्ति है, वहां ही उसका कार्य भीवर्तमान है | ‘मनुष्य-आत्मा’ ‘शक्तिमय’ अस्तित्वहै, इसलिए हर समय उस मेंहलचल जारी रहतीहै | औरयह हलचल उस अस्तित्व से प्रति पल असर निकालती रहती है | इन असरों को हम प्रभाव कहते हैं | जैसीमनुष्य की प्रकृति अर्थात स्वभाव, वैसे ही उसके प्रभाव | नीच भाव रखने वाले मनुष्यों मेंसे हर क्षण नीच प्रभावनिकलतेरहतेहैं, और उच्च-भाव धारियों मेंसे उच्च प्रभाव| इसी प्रकार देवात्मा मेंसे देव-प्रभावनिकलतेरहतेहैं |

प्रश्न:-     क्या यह प्रभावकर औरों के अस्तित्वों कोभी प्रभावितकरतेहैं ?

उत्तर:-    जी हां | जिस प्रकार एक एक फूलदार वृक्ष की महक दूर दूर तक पहुंचती है, और घ्राण-शक्ती रखने वाले मनुष्यों को सुगन्धित कर देती है, और एक एक गन्दगी के टोकरे मेंसे निकलती हुई बदबू दूर दूर तक फ़ैल कर नाकरखने वाले मनुष्यों के लिए एक मुसीबत की वस्तु प्रमाणित होती है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य के नीच और उच्च प्रभाव दूर दूर तक फैल कर अपनी सीमाओं के अन्दर आये हुए अस्तित्वों पर अपने अच्छे या बुरे प्रभाव डालते रहतेहैं |

प्रश्न:-     यदि यह सत्य है, जैसा कि सत्य नज़र आता है,तब तो एक एक बुरे मनुष्य के साथ रहना, उसके कमरे में निवास करना, उसी कमरे में उसके पास सो जाना या किसी बाज़ार या दफतरों आदि में कई ऐसे नीच अस्तित्वों के सम्पर्क में आना औरउनके प्रभावों में सांस लेना बहुत ही हानिकारक है ?

उत्तर:-    जीहां,सारी दुनिया की शारीरिक बीमारियाँ इतनी ख़तरनाक नहीं, जितने‘नीच जीवन धारियों’ के नीच-प्रभाव खतरनाक हैं,और इस प्रकार के प्रभावों के महा-हानिकारक ‘प्रभाव-क्षेत्र’ दुनिया में स्थान स्थान पर बने हुए हैं, जिस में वासकरके और सांस लेकर लाखों और करोड़ों मनुष्य आत्मिक-बेहोशी की अवस्था में पहुंचते रहतेहैं और हानिकारक प्रकृति ग्रहण कर लेते हैं |

प्रश्न:-     तबक्याउच्च संगत की मनुष्य को नितांत आवश्यकता है ?

उत्तर:-    जीहां, जिस प्रकार शरीर के लिए ज्योति, खुली और ताज़ा वायु, साफ और निर्मल जल, और अच्छा और पौष्टिक-भोजन तथाहवाऔर ज्योति-दार खुले मकानों की अत्यंत आवश्यकता है, ठीक उसी प्रकार आत्मिक-जीवन (अर्थात आध्यात्मिक-जीवन)के लिए उच्च प्रभाद दायक मण्डल कीभीअत्यंत आवश्यकता है |

प्रश्न:-     क्या उच्च-प्रभाव औरदेव-प्रभाव एक ही बात है ?

उत्तर:-    नहीं, उच्च-प्रभाव तो एक एक सात्विक-शक्ति रखने वाले जन से भी निकल सकते हैं, परन्तु देव-प्रभाव केवलदेवात्मा से ही निकलते हैं | देव-प्रभाव तो देव-शक्तियों से हीनिकल सकते हैं, और देव-शक्तियों का प्रकाश केवल देवात्मा मेंही हुआ है |

प्रश्न:-     तबक्यादेव-प्रभाव दायक मण्डल में किसी मनुष्य का प्रवेश करना और रहना उसके लिए बहुत बड़ा सौभाग्य है ?

उत्तर:-    जीहां,देव-प्रभाव दायक मण्डल में रहकर हीमनुष्य को देव-ज्योति और देव-तेज लाभ हो सकता है | देव-प्रभाव दायक मण्डल में रहकर ही मनुष्य के जीवन में उच्च परिवर्तन आनाआरम्भ होता है | उसके पाप-कर्मझड़ने आरम्भ हो जाते हैं,उसके मिथ्या-विश्वास उससे दूर भागना आरम्भ कर देते हैं | उसकीआँखों के सामने नाना सम्बन्धियोंका उपकारी रूप आने लगता है |पहलीसारी उम्र के भूले हुए माता-पिता(अर्थात उनका उपकरी रूप)उसके सामने नए रूप में प्रकट होने लगता है | वह(माता-पिता) अब उसे श्रद्धा के भाजन प्रतीत होने लगते हैं | पहलेकीउनके सम्बन्ध में की हुई हानियाँ उसेदुःख देने लगती हैं | इसी तरह और नाना सम्बन्धों में भी उसेअपनीहीनताएं और नीचताएं नज़र आने लगती हैं |देव-प्रभाव ऐसे अधिकारी हृदय को अपनी नीचताओं तथा हीनताओं के लिए दुःख से भर देतेहैं, और उसको हानी-परिशोध की हालत में ले जातेहैं | देव-प्रभाव दायक मण्डल में निवास करके एक एक अधिकारी आत्मा नीच लक्ष्यों के पीछे अपने जीवन की अमूल्य “आत्मिक-पूँजी”लुटी हुई देखकर अपना बहुत बड़ा नुकसान अनुभव करता है और यह पुकार उठता है,किहाय! मैंने अपना “जीवन-धन” लुटाया, नीच लक्ष्यों के पीछे मैं नीच बन गया, अदना(तुच्छ) लालसाओं के पीछे मैं अदना बन गया और नाना प्रकार की नीच चिंताएंऔर क्रियाएं करके मैंने अपना आत्मिक-रूप घटिया बना लिया | अब ऐसा मनुष्य धनी होकर धन में चैन नहीं पाता, पद-धारी होकर पद में तसल्ली नहीं पाता, अपनी नीच बिरादरीका मुखिया होकर उसमे तृप्ति नहीं पाता, वहतोभगवान् देवात्मा के दरबार में तुच्छ से तुच्छ सेवा का अधिकार पाकर भी फूला नहीं समाता | देवसमाज के मंदिर में झाडू देकर जीवन-रस पाता है, साधन की तैय्यारी करके गदगद हो जाता है | आये हुए सत्संगियोंकीसेवा करके ख़ुशी से भर जाता है |भगवान् देवात्मा के कार्य के लिए धन देकर अपने आपको धनी समझता है | अपनी अमूल्य शक्तियों (अर्थात योग्यताओं) कोभगवान् देवात्मा के कार्य में भेंट करके अपने आपको सौभाग्यवान महसूस करता है, भगवान् देवात्मा के कार्य में अपना सब कुछ देकर भी संतुष्ट नहीं होता, और बार बार यही प्रकाश करता है कि कुछ और हो तो मैं वह भी भेंट कर दूं | मैं ऐसे सतगुरु की क्या सेवा कर सकता हूँ ? मैं ऐसे सतगुरु का क्या ऋण-परिशोध आर सकता हूँ ? कुछ भी नहीं कर सकता |

प्रश्न:-     क्याप्रत्येकदेव-धर्मीऐसा हो जाता है ?

उत्तर:-    जी नहीं |

प्रश्न:-     वह क्यों नहीं ?

उत्तर:- वह इसलिए क्योंकि प्रत्येकजन सब प्रकार की योग्यता नहीं रखता | अभिलाषा के साथ योग्यता की भी अत्यंत आवश्यकता होतीहै |

नीच-प्रभाव क्यों नीच-प्रकृति से उत्पन्न होते हैं, इसलिए जिस जिस हृदय में वह प्रवेश करते हैं, उस उस हृदय को वह नीच और पतित बनाते हैं | अर्थात ऐसे हृदयों को “पाप- जीवन” का प्रेमक बनाते हैं | मिथ्या और पाप का प्रेमक बना देते हैं | आत्मा के हित के सम्बन्ध में बिलकुल बेसुध कर देते हैं |इसके भिन्न वह आत्मा की निर्माणकारी शक्ति को दिनों-दिन शिथिल करते जाते हैं, जिसके कारण एक एक अभागा जन एक ओर बुराई तथा मिथ्या का सामनानहीं कर सकता, और दूसरी ओर किसी भलाई और सच्चाई के ग्रहण करने की सामर्थ्य नहीं रखता | जो ‘भाव’ उच्च कहे जाते हैं, वह एक एक अधिकारी जन को एक या दूसरे प्रकार के पाप से छुटकारा तोदेते हैं, और किसी अच्छे या भले काम के करने की सामर्थ्य भीउत्पन्न करते हैं | एक जन ने जो हिन्दू था, एक मुस्लमान सूफी को अपना गुरु बनाया | मैंने उससे मालूम किया कि तुम ने उसको किस बात के लिए गुरु बनाया है ? उसने कहा कि मेरे गुरु ने मुझे इस योग्य बनाया है कि मैं काम-वासना के अधिकार से बाहर निकल आऊँ | मैं इस योग्य हो गया हूँ कि सारी आयु ब्रह्मचारी का जीवन व्यतीत कर सकूं | इसके भिन्न मेरे गुरु ने मुझे इस योग्य बनाया है कि मैं दुनिया के सब काम-काज से मुक्त होकर उनकी भक्ति में लग जाऊं और कुछ न कुछ औरों की सेवा करूं| जहां तक उस नौजवान को इस सूफी ने स्त्रियों के सम्बन्ध में पवित्र बनाया, वहां तक उसके हृदय में बेहतर परिवर्तन आया, और जहां तक उस सूफी ने उसको किसी सांसारिक-लक्ष्य से उदासीन बनाया और कुछ न कुछ सेवा के काम के लिए उसके अन्दर आकांक्षा उत्पन्न कर दी, वहां तक उसकाअवश्य भला हुआ है | उस सूफी के यह प्रभाव उस हिन्दू शिष्य के लिए कुछ न कुछ बेहतरी की तरफ लेजाने वाले प्रमाणित हुए | जो प्रभाव मनुष्य की प्रकृति को जहां तक कुछ न कुछ ‘उच्च और सेवाकारी’बनाते हैं, वहां तक वह शुभ-जनक प्रभाव कहे जा सकते हैं | परन्तु इस प्रकार के सारे उच्च-प्रभाव मनुष्य को आत्म-अज्ञानता से बाहर नहीं निकाल सकते | इस प्रकार के उच्च-प्रभाव मनुष्य को आत्मा और उसकी गतियों और उन गतियों के फलों और आत्मिक-जीवन की रक्षा और उसके विकास आदि के साधनों के विषय में जो सत्य-ज्ञान है, उसके देखने या उपलब्ध करने के योग्य नहीं बनाते | यहभाव आत्मिक-रोगों को देखने के योग्य भी नहीं बनाते, न उनका घृणित-रूप ही दिखाते हैं, और न मृत्यु-दायक रूप दिखाते हैं, और न उनसे मोक्ष पाने के लिए प्रेरणा या आकांक्षा ही उत्पन्न कर सकते हैं | इस प्रकार के उच्च-भाव नाना प्रकार के उच्च-गति-दायक अथवाविकासकारी सात्विक-भावों का दर्शन नहीं करा सकते, न उनके सुन्दर रूप को देखने या उपलब्ध करने के योग्य बनाते हैं | न उनको लाभ करने की प्रेरणा व आकांक्षा उत्पन्न करतेहैं | इस प्रकार के सात्विक-भाव मनुष्य को शरीफ अवश्य बनाते हैं, परन्तुआत्म-ज्ञानी और आत्म-बोधीनहीं बनाते और न आत्मा की सत्य-मोक्ष का अभिलाषी बनाते हैंऔर न आत्मिक-उच्च-विकास की आवश्यकता और सुन्दरता को दिखाते हीहैं |मानो सारा आत्मिक-जगत इन उच्च-भावों की परिधि से ही बाहर है |

प्रश्न:-     यह तो मैं समझ गया हूँ कि नीच-प्रभाव आत्म-विनाशक हैं, परन्तु मैंने आपसे ही यह भी सुना है कि उच्च-प्रभाव या सतसंग भी मनुष्य को आत्मिक-जगत में प्रवेश करने के योग्य नहीं बनाते| इससे आपका क्या तात्पर्य है ?

उत्तर:-    उच्च-प्रभाव ‘उच्च-मण्डल’ उत्पन्न करते हैं, परन्तु वह ‘देव-मण्डल’ उत्पन्न नहीं कर सकते, जो आत्मा की रक्षा,सत्य मोक्ष तथा विकास के लिए परमावश्यक है |

प्रश्न:-     हो सकता है कि यह आपकी बात सत्य हो, परन्तु मैं इसके सम्बन्ध में अधिक ज्ञान लाभ करना चाहता हूँ |

उत्तर:-    उच्च-प्रभाव तो सात्विक-जीवनधारी मनुष्यों से निकल सकते हैं, या एक व दूसरे प्रकार के पाप से मुक्त जनों से निकलते हैं | यह हो सकता है किकोई मनुष्य सात्विक-भाव रखता हो, परन्तु सात्विक-भाव रखनेवाला जन आत्मिक-सत्य-ज्ञान से खाली हो सकता है और प्राय होता है | एक एक मनुष्य एक या दूसरे प्रकार की पाप की गति से मुक्त हो सकता है,परन्तु फिर भी नाना प्रकार के नीच अनुरागों और नीच- घृणाओं में ग्रस्त होता है | इसी प्रकार  एक व दूसरी प्रकार का अच्छा भाव रखने वाला जन भी नाना नीच-अनुरागों और नीच-घृणाओं में ग्रस्त हो सकता है | जिस सूफी का मैंनेऊपरउल्लेख किया है, वह वैरागी थे, स्त्री पुरुष के सम्बन्ध में पवित्र थे, दयावान थे | परन्तु पक्के मांसाहारी थे, शराब के नशे में साधारणत: मस्त रहते थे, तथा बोतलों की बोतलें शराब पी जाते थे, और उनके सम्बन्ध में यह कहा जाता था कि वह शराब पीकर खुदा की भक्ति में मग्न हो जाते हैं | अब यह सूफी एक भला पुरुष था, उसने एक वैश्या को भी उसके घृणित पेशे से निकाल कर पवित्र जीवन रखने वाली बना दिया | फिर भी न केवल आप आत्मा के सम्बन्ध में अज्ञानी रहा, किन्तु उसके जितने भी शिष्य रहे, वह सब के सब भी आत्मिक-ज्ञान के विचार से अन्धे ही रहे | इसलिए भला मनुष्य बनने से कोई जन आत्म-ज्ञानी और आत्म-बोधीनहीं बन जाता | न आत्मा के सम्बन्ध में सत्य-सिद्धांतों को देखने के योग्य ही होता है | न आत्मा के जीवन तथा मरण के भेदोंको देखने के योग्य बनता है | न ऐसा जन सत्य-उपास्य देव और मिथ्या उपास्य देव में कोई अन्तरअनुभव करता है | अर्थात वह आत्मा के सम्बन्ध में सत्य-ज्ञान से शून्य रहता है |वह आत्मिक-जगत से मानो कटा रहता है | जिस सूफी का मैंने ऊपर उल्लेख किया है, वह खुदा को मानता था, या यह कहो कि ब्रह्म को मानता था | अर्थात वह जन मिथ्या-विश्वासी था | अब आप समझ गए होंगे कि भला पुरुष बनने पर भी मनुष्य ‘आत्मा’ के सम्बन्ध में सत्य-ज्ञान, सत्य-मोक्ष और उच्च विकास से मीलों दूर पड़ारहता है |

प्रश्न:-     देव-प्रभावों से मनुष्य को क्या कुछ प्राप्त होता है ?

उत्तर:-    जीवन-प्रद या उच्च परिवर्तनकारी देव-प्रभावों को पाकर और उनको ग्रहण करने के योग्य होकर एक एक अधिकारी जन अपने आत्माऔर उसकी गतियों और उनके फलों और अपने ‘आत्मिक-जीवन’ की रक्षा औरउसके विकास के साधनों आदि के विषय में सत्य-ज्ञान को लाभ करने की आवश्यकता और उसकी महिमा को देख या उपलब्ध और उसके लाभ करने के लिए प्रेरणा या आकांक्षा लाभ कर सकता है | इसके भिन्न ऐसा अधिकारी जन इन जीवन-प्रद ‘देव-प्रभावों’ को पाकर अपने आत्मा में अपने किसी नीच गति दायक और महा हानिकारक या विनाशकारी भाव और विकारों को देख या उपलब्ध कर सकता है और उनसे मोक्ष पाने के लिए प्रेरणा या आकांक्षा या इस नीच-गति से आंशिक या पूर्ण, कुछ काल या सारी वयस के लिए मोक्ष लाभकरसकता है | इन्हीं जीवन-प्रद देव-प्रभावों को पाकर एक एक अधिकारी जन अपने आत्मा में किसी उच्च-गति दायक या विकासकारीभाव के लाभ करने की आवश्यकता को देख या उपलब्ध कर सकता है, और उसको लाभ करने के लिए अपने हृदय में प्रेरणा या आकांक्षा जाग्रत हुई अनुभव कर सकता है और उसे आंशिक या पूर्ण रूप से, कुछ काल या सारी वयस के लिए उत्पन्न या उन्नत कर सकता है | और इसी प्रकार इन परम कल्याणकारी देव-प्रभावों को पाकर और ग्रहण करके ऐसा अधिकारी जन अपने अस्तित्व का परम हित लाभ कर सकता है |

प्रश्न:-     मैं आपका बहुत कृतज्ञ हूँ कि आपने देव-प्रभावों के कार्य के बारे में विस्तार से बताया है | अबतो मैंयह अनुभव करता हूँ कि ऐसे जीवन-प्रद देव-प्रभावों के लाभ से बढ़ कर और कोई लाभ या और कोई सौभाग्य नहीं |

उत्तर:-    जी हां | यह सत्य है कि आत्मा रखकर यदि मुझे आत्मा का ही ज्ञान न हो, आत्माकेरूप और उसके जीवन का हीज्ञान न हो, आत्मा के रोगों और पतन का ही ज्ञान न हो, आत्मा के सत्य-मोक्ष का ही ज्ञान न हो, आत्मा के उच्च विकास की सत्य विधि का ही ज्ञान न हो – और बाकी चाहे सारी दुनिया का ज्ञान हो, तो क्या मैं ज्ञानी कहलाने के योग्य हूँ ? यदि मैं सारी दुनिया को जान भीलूं और अपने आप से भूला रहूं, तो क्या मैं ज्ञानी कहलाने का अधिकारी मानाजा सकता हूँ ? इसके भिन्न यदि मुझे सारी दुनिया का धन भी प्राप्त हो जाए, परन्तु मेरा आत्मा ‘आत्मिक-रोगों’ मेंबुरी तरह ग्रस्त रहे,तो मुझे धनाड्य होने से क्या लाभ ? यदि आत्मिक-रोगों के कारण मेरी आत्मिक-पूंजी (अर्थात उच्च आत्मिक-गुण, यदि कुछहों) क्षय हो जाए, और आत्मिक-पूँजी को खो कर यदि मैं सारी दुनिया का बादशाह भी हो जाऊं, तो भी मुझे क्या लाभ ? मेरी सारी हस्ती ‘आत्मा’ को लेकर ही है, यदिमैंउसको ही खो दूं, तो बाकी सब सामान और सम्बन्धी मेरे किस काम के ? अब मुझे आत्मा के सम्बन्ध में ज्ञानी या बोधीबनाने वाले,आत्मिक-रोगों से सत्य मोक्ष देने वाले, सात्विक-भावों से मेरे हृदय को ज्योतिर्मान और बलवान करने वाले यदि कोई प्रभाव हैं, तो वह देव-प्रभाव हैं | इसलिए यदि मेरे लिए कोई लाभ करने (प्राप्त करने) की वस्तु है, तो वह ‘देव-प्रभाव’ हैं| और यदि मेरे लिए कोई दुर्भाग्य का विषय है, तो वह यह है कि मैं इन देव-प्रभावों से विमुख रहूँ |इसलिएयह वचन सत्य हैं कि “देव-प्रभावों के लाभ से बढ़कर और कोई लाभ या औरकोई सौभाग्य नहीं | और देव-प्रभावों से वंचित होने से बढ़कर और कोई हानि या और कोई दुर्भाग्य नहीं |”

प्रश्न:-     यह जीवन-प्रद ‘देव-प्रभाव’ कहां से लाभ हो सकते हैं ?

उत्तर:-    यह‘देव-प्रभाव’ उसजीवन-दायकस्रोत अर्थात झरनेसे प्राप्त हो सकते हैं, जिसमेयह उत्पन्न होते हैं |

प्रश्न:-     यह देव-प्रभाव कहां उत्पन्न होते हैं ?

उत्तर:-    यह देव-प्रभाव ‘देव-शक्तियों’ से विशिष्ट ‘देव-आत्मा के देव हृदय’ में उत्पन्न होते हैं, जो गूढ़ सत्य मैं इससे पहले आपको कई बार बता चुका हूँ |

प्रश्न:-     यह‘देव-प्रभाव’ किस प्रकार लाभ हो सकते हैं ?

उत्तर:-    यह‘देव-प्रभाव’ भगवान् देवात्मा के साथ जीवन्त सम्बन्ध स्थापन करके उनकीपूजा विषयक साधनों के द्वारा प्राप्त हो सकते हैं |

प्रश्न:-     भगवान् देवात्मा के साथ सम्बन्ध स्थापन करने के लिए किन किन विशेष शक्तियों (अर्थातभावों) की आवश्यकता है ?

उत्तर:-       उनके साथ जीवन्त-सम्बन्ध स्थान करने के लिए अटल कृतज्ञता, अटल श्रद्धा,  अटल विश्वास तथादेव-प्रभावों के लिए अटलआकर्षण विषयक भावों की आवश्यकता है |

प्रश्न:-    इन भावों में से देव-पूजा के लिए सबसे अधिक किस भाव की आवश्यकता है ?

उत्तर:-   किसी सच्चे उपास्य-देव की सच्ची आत्मिक-पूजा के लिए पूजा विषयक जिन सात्विक-भावों की आवश्यकता है, उन भावों में से श्रद्धा विषयक सात्विक-भाव एक अति आवश्यक सूत्र है |

प्रश्न:-     यह सात्विक श्रद्धा क्या होती है ?

उत्तर:-   यह सात्विक श्रद्धा किसी जन के परोपकार सम्बन्धी काम के सौन्दर्य को दिखाने की आंतरिक आँख है जोउसका साक्षात-ज्ञान देती है | उस परोपकारी के ऊपर मोहित कर देती है, और बिना किसी स्वार्थ, लालच,भय या डर के उस परोपकारी जन के परोपकार की महिमा को प्रगट करने के लिए तैयार करती है, और उसकी महिमा के प्रचार में लगा देती है, और इस शुभ काम को करने के लिए आवश्यक त्याग करने के निमित्त तैयार कर देती है |यह श्रद्धा सात्विक-भावों पर मोहित करती है, क्योंकि यह भाव परोपकारी के आंतरिक-रूप के सौन्दर्य को दिखाता है | इसलिए यह भाव स्वाभाविक तौर पर ऐसे जन की सेवा में लगा देता है, जिसके प्रति यह भाव उत्पन्न होता है |

प्रश्न:-    क्या आपका यह तात्पर्य है कि जिस जन के भीतर सात्विक श्रद्धा नहीं, वह सात्विक-पूजा नहीं कर सकता ?

उत्तर:-   जीहां, आपने ठीक समझा है | सात्विक-श्रद्धा के बिना किसी का सात्विक-रूप  नज़र हीनहीं आता, इसलिएपूजा तो कहीं रही |

प्रश्न:-    यदिकोई जन बहुत विद्वान हो, तो क्या उसके भीतर सात्विक-श्रद्धा वर्तमान नहीं हो सकती ?

उत्तर:-   विद्वान होना सात्विक-श्रद्धा की शर्त नहीं है, क्योंकि यह दोनों अलग अलग क्षेत्र हैं | मेरे मित्र,यह भी सत्य है कि अधिकतर लोग तो सात्विक-श्रद्धा से शून्य दिखाई देतेहैं, तथाकहीं कहीं किसी जनके भीतर इस श्रद्धा का थोड़ा सा लक्ष्ण कठिनता से मिलता है |आप किसी ऐसी सभा में चले जावें कि जहां किसी बुज़ुर्ग जन की महिमा का वर्णन होता हो, तो आप यह देख कर हैरान रह जायेंगे कि जहां उसकी कई प्रकार की महिमा का उल्लेख होता है, वहांउसकेकिसीसात्विक-भावकाइतनाअधूरायात्रुटी-पूर्णउल्लेखहोताहैकिहैरानीहोतीहै| अधिकतर मामलों में बड़ेबड़ेपढ़े-लिखेजनभीकिसीकेसात्विक-गुणोंकोदेखनेकेप्रायअयोग्यपाए जाते हैं| यदिसचपूछोतोसात्विक-श्रद्धाबहुतहीदुर्लभवस्तुहै|

प्रश्न:-    क्याबातहैकिफिरभीएकएकगुरुकेसैंकड़ों हज़ारों नहीं बल्कि लाखों और करोड़ों शिष्यवर्तमानहोतेहैं? वह किस बात को लेकर उन्हें अपना गुरु या उपास्य समझते हैं |

उत्तर:-   साधारणत: वह इस बात को लेकर उनकी पूजा करते हैं कि ऐसा गुरु या उपास्य इस लोक या परलोक में उनको सुख के सामान पहुँचाने की सामर्थ्य रखता है, और दुखों से बचाता है | मुस्लमानों का वहिश्त (स्वर्ग) भीवासना-मूलक वहिश्त है | औरों के वहिश्त या स्वर्ग भी क्या देते हैं ? केवल इतना ही बताते हैं कि हमारे गुरु की यह सामर्थ्यहै कि मरने के बाद वह अपने शिष्यों को ‘सत पुरुष’ या परमात्मा के दर्शन कराएग, औरवह इसी बात को लेकर उनके सम्बन्ध में महिमा के गीत गाने में लग जाते हैं | कईयों का यह विश्वास है कि हमारा ख़ुदा आवागमन के चक्कर से निकाल देता है | किसी के सामने यह है ही नहीं कि गुरु का सबसे प्रथम कर्तव्य यह है कि वह आत्मा के सम्बन्ध में सत्य-ज्योति दे और आत्मिक-पतनकारी शक्तियों तथा नीच-गतियों से सत्य-मोक्ष प्रदान करे और उच्च अर्थात सात्विक-भावों को उत्पन्न और उन्नत करे | लोग यदि गुरु की महिमा गाते हैं, तो उनके सम्बन्ध में चमत्कारों का वर्णन करते हैं | सात्विक-भावों की दृष्टि से तो ऐसा मालूम होता है कि सारी दुनिया रूठी हुई है | किसी गुरु के सच्चे सात्विक भावों कावर्णन इल्हामी पुस्तकों में ढूँढने पर भी बड़ीकठिनता सेकहीं कहीं थोड़ा सा अंश देखने को मिलता है | एक एक उपास्य-देव यह डींग तो मार देता है कि ऐ मेरे चेलो! अमुक जंग में मैंने तुम्हें सहायता की | तुम्हारे अमुक शत्रुओं पर जंग में मैंने ईंट, रोड़े और आग के गोले बरसाए | मैंने तुम्हे इस प्रकार की या उस प्रकार की बादशाहत दी | लेकिनकहींभी कोई गुरु या उपास्य-देव यह नहीं बताता कि मैंने तुम्हें पाप-जीवन से छुटकारा दिया, मैंने तुम्हारे भीतर उच्च-भाव उत्पन्न किये, और लालच के भावों का तो वर्णन आता है, परन्तु किसी सात्विक-परिवर्तन का वर्णन नहीं आता |

प्रश्न:-    ऐसा क्यों है ?

उत्तर:-   यह इसलिए है कि साधारण मनुष्य का तो क्या कहना, बड़े बड़े मज़हबों के संस्थापक भी सुख की दुनिया से बाहर नहीं हैं | उनका हित की दुनिया में प्रवेश ही नहीं हुआ, किसीकिसी जन में कोई थोड़ा सा अच्छा भाव अवश्य उत्पन्न हुआ, परन्तु उस परआत्मिक-जगत(अर्थातआध्यात्मिक-जगत) नखुल सका|अबजिस मनुष्य-मात्र में आत्मिक-जगत का ही अकाल पडा हुआ है, वह भला आत्मिक-जगत मेंवासकरने के स्वपन कब देख सकते थे | मनुष्यों ने गुरु ढूंढा तोवासनाओं को तृप्त करने के लिए,किसी ने ढूंढा तो कल्पित आनन्द पाने के लिए, किसीने ढूंढा तोदुःख से छुटकारापाने के लिए, मनुष्यों में उरु की दुखों से बाहर निकलने के लिए तोतलाश हुई तथा सुखों को पाने के लिए भी तलाश हुई, परन्तु सच्चाई और भलाई को जानने और पाने के लिए कोई तलाश न हुई | इसलिए आज भी किसी मज़हब या धर्म के अनुयाई से पूछो कि तुम्हारा पूजनीय देवता तुम्हें क्या देता है? उसका यही कहना होगा कि वह अमुक दुखों से हमें छुटकारा देता है, और अमुक सुखों को हम तक पहुंचाता है | जिस को सुख-दुःख के भावों के आधार पर गुरु की तलाश है, उसको सत्य और हित की तलाश नहीं| इसलिए सत्य और हित प्रदान करने वाले गुरु की भी तलाश नहीं |

प्रश्न:-    फिर भी, क्या यह सत्य नहीं कि किसी न किसी मनुष्य ने पाप और मिथ्या के बंधनों से मुक्त करने वाले आविर्भाव की आकांक्षा और मांग भी की है ?

उत्तर:-   जीहां| विश्व में पाप और मिथ्या के द्वारा जो नरक फैला हुआ है, उस की अग्नि को देख कर किसी किसी अच्छी प्रकृतिरखने वाले विचारशील जन ने यह प्रार्थना की है कि कोई ऐसा अवतार आविर्भूत हो किजो पाप और मिथ्या की बेड़ियों को काट दे, ताकि नाना सम्बन्धों से नरक की अग्नि बुझ सके | उन्होंनेसतगुरु की आकांक्षा की है, परन्तुउनके सामने किसी सच्चे सतगुरु की कोई वास्तविकतस्वीर नहीं बन सकी| अपनी‘सुख-मूलक सीमा बद्ध’ प्रकृति के कारण वह ऐसी तस्वीर बनाभीनहीं सकते थे |

प्रश्न:-    फिरदेवात्मा का अविर्भाव किस प्रकार और क्योंकरहुआ ? क्या मनुष्य श्रेणी की आकांक्षा से हुआ, या किसी और नियम के द्वारा हुआ ?

उतर:-    इसका उत्तर आगामी अध्याय में मिलेगा |

देवात्मा ही एकमात्र परम गुरु और परम उपास्य देव हैं, वह इसलिए कि वही देव-ज्योति और देव-तेज के दाता हैं | अपनी महान, दुर्लभ और अनोखी देव-ज्योति के द्वारा वह हमें आत्मा का रूप दिखाते हैं, आत्मा के मरण और जीवन के नियम बताते हैं |आत्मा के सत्य-मोक्ष और विकास के सम्बन्ध में जो विश्वव्यापी नियम हैं, उनका दर्शन कराते हैं | वह अपने अनोखे देव-तेज के द्वारा अधिकारी हर्द्यों में उच्च परिवर्तन लातेहैं | एक ओर आत्म-अन्धता और आत्म-अज्ञानता को दूर करके आत्मिक-सत्य ज्ञान के ग्रहण करने की सामर्थ्य प्रदान करते हैं, और दूसरी ओर आत्मिक-रोगों से सत्य-मोक्ष और सात्विक-शक्तियों में उच्च विकास उत्पन्नकरके वह सब अधिकारी आत्माओं का परमकल्याण साधन करते हैं |

प्रश्न:-     परन्तु ऐसी महा श्रेष्ठ हस्ती का आविर्भावकिस प्रकार हुआ ? आप खुदा या परमात्मा को तो नहीं मानते | खुदा-परस्त तो अपने हृदय को यह तसल्ली देते हैं कि उनका खुदा या भगवान् समय समय में मनुष्यों के भले के लिए अपने प्यारों को इस धरती पर भेजता रहता है या स्वयं अवतार लेता रहता है | भगवान् देवात्मा के देवरूप में किसने अवतार लिया?

उत्तर:-    उनके जीवन में देव-शक्तियों ने अवतार लिया है |

प्रश्न:-     वह किस प्रकार?

उत्तर:-    प्रकृति की निर्माणकारी अथवाविकासकारी विधि से | यह विधि एक बहुत ही महत्त्व-पूर्ण अटल और अनादी विधि है | जैसे प्रकृति अनादी और स्वयंभू है,वैसे ही यह विधि भी अटल और अनादी है |

प्रश्न:-     क्या कोई विधि या प्रक्रिया सदा से हो सकतीहै ?

उत्तर:-    जीहां, जब से प्रकृति है(जो सदा से है) तबसे उसका परिवर्तन का नियम भी सदा से है | प्रकृति तो जड़ और शक्ति-सम्पन्न पदार्थों और अस्तित्वों से भरी हुई है | जहां शक्ति है, वहां हलचल है | जहां हलचल है, वहां परिवर्तन है |शक्तियों से उत्पन्न यहहलचल विश्वव्यापीहै |इसलिएयह परिवर्तन भी विश्वव्यापी है| यह परिवर्तन दो रूपों में प्रकाशित होता है, एकनिर्माणकारी तथा दूसराध्वंसकारी| अर्थात एक विकासकारी दूसरा विनाशकारी | यह दोनों प्रकार के परिवर्तन सदा से हैं और सदा रहेंगे | निर्माण का कार्य होता ही रहेगा, और विनाश का कार्य भी होता ही रहेगा | जब प्रकृति एक है, दो या दो से अधिक नहीं, तथाउसके निर्माण कार्यका सिलसिला भी एक हीहै, और लगातार है | यह कभी और किसी समय भी प्रकृति के भीतर से रुक अथवानष्ट नहीं हो सकता | इसलिए इस निर्माण कार्य को हम अटल कार्य कहते हैं, क्योंकियह कार्य प्रकृतिकीजिन विधियों के अनुसार होता है,वह विधियाँ भी अटल हैं | जिसप्रकृति में अटल विधियों से काम होता हो, उसप्रकृति के सम्बन्ध में यह गप्प हांकना कि यह विधियां अटल नहीं, किन्तु टल भी सकती है, और किसी नबी या पैगम्बर के हुक्म से टल जाती हैं,बहुत बड़ी भूल है | प्रकृति की अटल विधियाँबदलहीनहींसकतीं| वहअपनास्वभावनहींछोड़सकतीं| वहकिसीकीसिफरिशनहींसुनतीं, सिफारिशकरनेवाला चाहेकहलानेवाले ख़ुदाका कोईप्याराहो, चाहेस्वयंअवतारहो, चाहेउसकारसूलयापैगम्बर हो| जिस प्रकार विधियाँ अटल हैं, उसी प्रकार उनका कार्य भी अटल है | और वह यह है कि ऐसे पदार्थों औरअन्य अस्तित्वों का निर्माणहोता रहता है, जो एक ओर हानिकारक न हों, या कम से कम हानिकारक हों, और दूसरी ओर अन्य अस्तित्वों के सम्बन्ध में अधिक से अधिक हितकर हों |इसलिए यदि हम अपनी पृथ्वी के इतिहास को देखें, तो हमेंइसनिर्माणकारी सिलसिले का आश्चर्यजनक रूप से दर्शन होता है | इस पृथ्वी को अलग अस्तित्व रखते हुए करोड़ों वर्ष हो चुके हैं | यह आदि-काल में आग का गोला थी, फिर धीरे धीरे इसकी ऊपर की सतह (परत) ठंडी होती गई, औरधीरे धीरे एक, फिर दूसरी तथा इस तरह कितनी ही गैसें उत्पन्नहोती गईं | तथा उन गैसें से पैदा हुई हवाएं निकल कर धरती ने अपना वायु-मण्डल बना लिया | उसवायु-मण्डल में दो गैसें अर्थात आक्सीजन और हाइड्रोजन के एक निश्चित अनुपात में मिलने से पानी उत्पन्न हो गया और नदियों और समुन्द्रों के रूप में परिवर्तित हो गया |अबप्रकृतिमें जो नियम पूरे हुए – वहविकासकारी अटल नियम निम्नलिखितथे | पृथ्वी की सतह भी ठंडी, पृथ्वी के ऊपर पानी भी बहुत और उसके भिन्न वायु-मण्डल भी वर्तमान, सूर्य की ज्योति तथा ताप भी वर्तमान | इसपरिवर्तन के द्वारा निर्माण का कार्य भी वर्तमान | इन नियमों के पूरा होने से परिणाम वही निकला, जो होना था | इन सब अनुकूल हालात के मिलने से निर्माण का कार्य आगे जाने के लिए बाध्य था | और इसलिए धरती पर जीवनी-शक्ति का सूत्रपात हुआ, क्योंकि यह सब हालात जीवन-दायक थे | जीवन-दायक सामानों के कार्य से ही जीवनी-शक्ति उत्पन्न हुई और उनकी वर्तमानता में ही वह स्थिर (अर्थात सुरक्षित) भीरही और रहती है | वह व्यक्ति मूर्ख हैं जो इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि प्रकृति में निर्माण का कार्य तो है, परन्तु एक एक विशेष अवसर पर कोई परमात्मा नामक अस्तित्व किसी नए अस्तित्व को प्रगट करता है |इन ना-समझों को यह पता नहीं कि प्रकृति के नियम लगातार काम करतेहैं | वह रुकते नहीं | जो भी कोई अस्तित्व प्रगटहोता है, वहप्रकृति की अटल विधियों के कारण ही प्रगट होता है | यहप्रकृति की अटल विधि है कि जिन सामानों में और जिन हालात में कोई विशेष अस्तित्व प्रगट होता है, वहउन्हींसामानों और उन्हीं हालातों में सुरक्षित रहता है | यदि यह हालात किसी प्रकार मिलने बन्द हो जाएं, तो वह सब अस्तित्व धीरे धीरे विनष्ट हो जाएँगे | इसलिए जब एक एक कोशिका(Cell) के जीवित अस्तित्व धरती पर उत्पन्न हुए, तब वह अनुकूल हालत मिलने पर ही उत्पन्न हुए | पानी न होता तो वह उत्पन्न ही नहीं हुए होते, वायु-मण्डल न होता तो भीउत्पन्न न हो सकते थे, सूर्य की ज्योति और ताप न होता तो भी वह उत्पन्न न हो सकते थे | इसलिए एक एक समय में जब निर्माणके कार्य ने आगे क़दम उठायाहै, तब हमें यह अध्ययन करने की आवश्यकता है कि किन हालात में प्रकृति ने छलांग मारी, किनहालातमें प्रकृति की शक्तियों ने आगे क़दम उठाया, या किन हालात में निर्माण-कार्य आगे बढ़ा | अनुकूल हालात मिलते जाने पर इन्हीं एक ‘कोशकीय-शरीर-धारी’ अस्तित्वों से ‘बहु-कोशकीय-शरीर धारी’ अस्तित्व उत्पन्न तथा विकसित हुए |इन एक सेल रखने वाले जीवों से हीउद्भिद और पशु-जगत का आरम्भ हुआ | और इस समय जो उद्भिद और पशु-जगत कीनस्लें वर्तमान हैं, वह इसलिए सुरक्षित और स्थिर हैं,क्योंकि उन सबके अस्तित्वों में उच्च परिवर्तन के विकासकारी नियम के अनुसार कार्यहोता रहा है | और उन्हीं नस्लों ने उन्नति लाभ की जो विरोधी हालत का सामना कर सकी थीं, जो अपनी हस्तियों से न केवल हानिकारक प्रमाणित न होती थीं, किन्तु हितकर और सेवाकारी प्रमाणित होती थीं | इन नस्लों में जो एक एक अंग उत्पन्न हुआ है, वह भी सफलता के आधार पर उत्पन्न तथासुरक्षित रहा है | पशुओंकेविकास का यहसिलसिला भी करोड़ों वर्षों से लगातार चल रहा है| इस सिलसिले में भी हितकर प्रजाति के जीव्‘जत्थे’ (समूह) कीशक्ल में रहकर अपने अस्तित्वों को सुरक्षित रख सके |ज्ञान और बोध रखने वाले मनुष्यों को प्रकृतिके निर्माण के कार्य में दो बातों का स्पष्ट ज्ञान हो सकता है, एक तो यह कि किसी जीवित गठन में वही अंग सुरक्षित रहा है जो उस गठन-प्राप्त अस्तित्व के लिए हितकर है| उसका ऐसा प्रत्येक अंग झड या विनष्ट हो गया कि जो उसकी गठन के लिए हानिकारक था| इसी प्रकार जब पशुओं के जत्थे सुरक्षित हो गए, तोउनमे भी वही नियम कार्य करता रहा | एक एक अस्तित्व की (चाहे वहवनस्पति,पशु अथवा मनुष्य प्रजाति का जीव हो)अपने आप में अपनी कोई कीमत नहीं, यदि वहदूसरे अस्तित्वों के साथ हितकरअंग बन कर न रहे, नहीं तो वह ख़ुद भी सुरक्षित नहीं रह सकता | यहीकारण है कि गाय, भेड़ें और बकरियां आदि पशु नाना प्रकार के हिंसक पशुओं से घिरे रहकर भी अपनी नस्ल को सुरक्षित रख सके| इस जत्थे की जिंदगी का नियम यही रहा है कि जो पशु बीमार हो जाता था, वह जत्थे के साथ नहीं चल सकता था, इसलिए उसका जत्था या तो उसे मार डालता था, या वह ख़ुद ही जत्थे से अलग होकर, उसके लिए बोझ नहीं रहता था, औरधीरे धीरे नष्ट हो जाता था | आपकोइन सच्ची घटनाओं से अच्छी तरह यह ज्ञान हो सकता है कि एक एक गठनकारी जीवित अस्तित्व में वही अंग स्थिर (अर्थातसुरक्षित) रहे, जो हितकर थे और जत्थे (समूह) में भी वही नस्ल स्थिर रह सकी, कि जिसके अंग उसकी नस्ल को मुख्य रखकर अपना जीवन व्यतीत करते रहे | निर्माण-कार्य का नियम तो दूसरों के लिए सेवाकारी होकर अपने जीवन को सफल बनानेका कार्य है | और इसलिए मैं पुन: दोहराता हूँ कि हितकर अंग ही किसी गठन में स्थिर (सुरक्षित) रहे| औरहितकर यासेवाकारी अस्तित्वों की नस्ल ही प्रकृति मे स्थिर (सुरक्षित) रही|

प्रश्न:-     क्या आपका तात्पर्य यह है कि आँखों और कानों जैसे हितकर अंग इसलिए उत्पन्न हुए और सुरक्षित रहे कि वह हितकर और सेवाकारी रहे थे?

उत्तर:-    जीहां| जीवित पदार्थ और पशु चौतरफा सामानों के साथएकाकार रह कर ही ज़िंदा रह सकते थे | इसलिए नाना सम्बन्धों में पूर्ण मेल की अवस्था मेंहोने के कारण अनुकूल हालात में उच्च-परिवर्तन लाभ करते गए | इस परिवर्तन के क्रममें वह ऐसे अंगों के स्वामी हो गए, जो अंग उनकी हस्ती को सुरक्षित रखने के लिए और उनका अनुकूल हालातसे गठजोड़ करने के लिए आवश्यक थे | विकास-क्रममें एक एक अच्छे अंग के उत्पन्न होने और सुरक्षित रहने का यह इतिहास है | पशु-जगत केक्रममें एक और अनोखी तथा नई बात यह आरम्भ हो गई थी कि जहां कहीं कई शारीरिक अंगों ने प्रगट और स्थिर होना शुरू किया, वहां ऐसे अंग भी उत्पन्न होने शुरू हुए, जो विविध प्रकार के हालात का ज्ञान और बोध पाने के लिए आवश्यक थे | यही कारण है कि जहां नाना प्रकार के शारीरिक अंग उत्पन्न हुए, वहां मनुष्य के दिमाग़ में मानसिक-शक्तियां भीउत्पन्न हुईं, और जब प्रकृति के निर्माण-कार्य ने मनुष्य की शारीरिक-गठन को अंगों के विचार से पूर्ण कर दिया, तब उसका कार्य शरीर को लेकर आगे चलने की आवश्यकता न रही | इसलिए फिर प्रकृति के निर्माण-कार्य ने एक और विकास की नई राह पकड़ीऔर ऐसी शक्तियां उत्पन्न हो गईं कि जो इस गठन के लिए अधिक हितकर होने वाली थीं,अर्थात मानसिक-शक्तियां | जिनवानरों की नस्लों में से मनुष्य की प्रजाति उत्पन्न हुई, उन प्रजातियों कीशारीरिक-बनावटकी मनुष्य की शारीरिक-बनावट (अर्थात अस्थि-पिंज्जरों) के साथ तुलना करें, तो हमें आश्चर्य होगा कि इन में यदि कोई अन्तर है, तो केवल मानसिक-शक्तियों का अन्तर है, न कि शारीरिक अंगों का |मनुष्य ने वानरों की नस्लों पर जो विशेषता लाभ की, वह मानसिक उन्नति(बुद्धि-शक्ति)के कारण लाभ की, न कि शारीरिक बल के कारण| इनवानरों की नई नस्ल में से जो नस्ल मनुष्यों की हो गई, उसमे प्रारम्भिक कालमें कोई विशेषता न थी, अन्तर केवल इतना था कि जहां बाकि नस्लों मेंमानसिक-उन्नति का सिलसिला ठहर हुआ था, वहां इस नस्ल में उन्नति का सिलसिला (कार्य)शुरू हो गया | उनमेयह परिवर्तन अनोखे प्रकार केनिर्माण का कार्य था| यहप्रकृति का अद्भत चमत्कार था | परन्तु आरम्भ में यह अनोखापन दिखाई नहीं देता था |हज़ारों और लाखों वर्ष तक मनुष्य बिलकुल जंगली औरनंग-धड़ंग रहा| पशुओं की तरह बेघर और बे-घाट रहा | उसको न खेती का बोध था, न कपड़ों का | पशुओं की तरह बच्चे पैदा कर लेता और पशुओं की तरह ही बच्चे पल जाते थे |परन्तु निर्माण का कार्य बराबर अपना काम कर रहा था | विकास-क्रमअपना कार्य करने से रुक नहीं सकता था, क्योंकि निर्माण का कार्य रुक नहीं सकता | इस सच्चाई को बारबारस्मरण करना चाहिए | इन जंगली मनुष्यों में से कुछ श्रेणियां उन्नति के मार्ग पर पड़ गईं, और उन्होंने धीरेधीरे जो उन्नति की, वह बहुत हैरान करने वाली है | यह बेघर अस्तित्व लाखोंमकानों के बनाने वाला हो गया| यह इधर उधर भटकने वाला प्राणी गाँव और नगरों को बनाने और आबाद करने वाला हो गया | यहप्रकृति के ही फलों और फूलों का आधार रखने वाला प्राणी खेतों और बागों को उत्पन्न करने वाला तथाउनका स्वामी हो गया | यहसैंकड़ों के जत्थे में रहने वाला प्राणी (अर्थात मनुष्य) करोड़ों के जत्थे में रहने वाला बन गया|यह नंग-धड़ंग रहने वाला प्राणी कपड़ेबनानेवाली कलों (अर्थातमशीनों) के बनानेवाला हो गया| यह अज्ञानता का पुतला लाखों पुस्तकों के लिखने वाला बन गया | जो बोल नहीं सकता था, वह सैंकड़ों भाषाओं और बोलियों के उत्पन्न करने वाला हो गया | जोप्रकृति की प्रत्येक आपदासे डरता था, वह क्या पृथ्वी, क्या समुन्द्र और क्या वायु-क्षेत्र (आकाश) का स्वामी हो गया | अपने शारीरिक-रोगों के दूर करने वाला हो गया | अपनी आयु को लम्बा करने के नियमों को जानने वाला बन गया|कहांइसकी वह जंगलीपन की अवस्था और कहांइसका वैज्ञानिकबन जाना ! यह सब चमत्कार मनुष्य की उन्नतशील मानसिक-शक्तियों की कारण ही उत्पन्न हुए हैं|

प्रश्न:-     मैंने आपके विस्मय-जनक उल्लेख को सुन लिया | आपने बहुत कृपा की जो मुझे प्रकृति के निर्माण-कार्य (अर्थात विकास-प्रक्रिया)का दर्शन कराया है| प्रकृति के निर्माण-कार्य के जो चमत्कार हैं, उनकी तुलना में किसी हादी के चमत्कार क्या महत्त्व रखते हैं ? उन मनुष्यों ने तो करामातो (चमत्कारों) की गप्पें ही मारी हैं और अपने आपको बुरी तरह से अन्धा बनाया तथा प्रमाणित किया है| इस विशाल प्रकृति के निर्माण-कार्य के सन्मुख किसी हादी या नबी की हस्ती ही क्या है, वह तो सारे के सारे इस कार्य के ज्ञान से ही पूर्णत: शून्य रहे हैं| मिथ्या-मत तो वास्तव में विपथ-गामी हैं| मूर्खता से भरी हुई चमत्कार की गप्पों को दोहराते हैं, और एक एक हस्ती में जो प्रकृति का सत्य तथा आश्चर्यजनक चमत्कार वर्तमान है, उस का दर्शन नहीं करते| मैं तो अपने आपको बड़ा धन्य समझता हूँ कि आपकी कृपा से मुझे यह ज्ञान मिला | क्या प्रकृति का निर्माणकारी-कार्य अपना सब‘कार्य’ पूर्ण कर चुका है?

उत्तर:-    मैं आपके इस प्रश्न को सुन कर आश्चर्य-चकित हूँ | प्रकृति के निर्माण का कार्य कभी बन्द नहीं हो सकता, वह तो अनादी है, और अटल है | इतना तो सत्य है कि मनुष्य-जगतमें उसकी असाधारण मानसिकउन्नति के साथ साथ मनुष्यों ने जब सुख दुःख के भावों से परिचालित होकर सुख के पाने के लिए नाना प्रकार के अनुराग बढ़ाये, और दुःख से बचने के लिए नाना प्रकार की घृणायें उत्पन्नकर लीं, तब वह उनके बुरी तरह से दास बन गए | वह अपनी सुध-बुध को खो बैठे और बुरी तरह से खो बैठे | उनका (अर्थात मनुष्यों का) असाधारण ज्ञान उनके अपनेलिए ही मुसीबत का कारण हो गया |

प्रश्न:-     वह क्यों ?

उत्तर:-    वह इसलिए कि उनके जीवन के परिचालक-भावनीच-अनुराग और नीच-घृणायें हो गए |

प्रश्न:-     इन सुखों का स्वाभाव क्या है ?

उत्तर:-    इन सुखों का स्वभाव यह है कि यह मनुष्य को सच्चाई और भलाई का शत्रु और मिथ्या और पाप का अनुरागी बना देते हैं |

प्रश्न:-     मनुष्य का यह रूप तो निर्माणकारी कार्य के पूर्णत: विरुद्ध है ?

उत्तर:-    जीहां, यही कारण है कि इन भावों से परिचालित होकर मनुष्य एक-दूसरे के सम्बन्ध में हितकर बनने के स्थान में एक-दूसरे के जानी दुश्मन बने हुए हैं, और उस कापरिणामयह है कि लाखों और करोड़ों जन बुरी तरह से विनष्ट हो रहे हैं |

प्रश्न:-     ऐसा क्यों ?

उत्तर:-    वह इसलिए कि जो जन बिगाड़ने या विनाश करने के काम में लग जाते हैं, वह विनाश-क्रमकी परिधि में आ जाते हैं | ऐसे जन केवल मनुष्यों को नष्ट ही नहीं करते, बल्कि प्रजातियों का भी नाश कर देते हैं | इसलिए जबतक प्रत्येक मनुष्य को यह बोध न हो कि औरों की रक्षा में मेरी रक्षा और औरों की भलाई करने में मेरी भलाई है, औरों के विकास करने में मैं ख़ुद विकास पाता हूँ, तब तक ऐसा जन विनाश के चक्कर से बाहर निकलने की कोई आकांक्षा नहीं करेगा | मिथ्या-मतों ने तो करोड़ों जनों की आंखें(अर्थात आंतरिक-बोध) फोड़ दी हैं | उन्होंने अपने अनुयाइयों को यहमिथ्या-शिक्षा दी है कि केवल तुम्हारे मत वाले तुम्हारे भाई हैं, बाकि सब तुम्हारे शत्रु हैं | इसलिए एक एक मत वालों ने दूसरे मत के निर्दोष जनों पर बहुत बड़ा अत्याचार किया है, और यह प्रमाणित किया है कि उनका मत विनाशकारी मत है| इसलिए इस मत के अनुयाई जनों की जितनी हानि हुई है और होगी, उतनी मजलूम (दबी-कुचली) जातियों की हानि नहीं होगी |

प्रश्न:-     यह सत्य है, और मैं हैरान हूँ कि मनुष्यों के सामने यह सच्चाई प्रगट क्यों नहीं हुई, कि प्रत्येक अस्तित्व की अपनी भलाई अन्य अस्तित्वों के सम्बन्ध में हितकर तथासेवाकारी होने में है, न कि हानिकारक बनने में | उनका अपना शरीर उनके सामने रहा है, और वह देखते रहे हैं कि यदि उनके शरीर का कोई अंग शरीर के लिए सहायकारी तथा सेवाकारी न रहे, तो विनष्ट हो जाता है | एक एक मनुष्य विशाल प्रकृति का अंग होकर, यदि उसके लिए हितकर प्रमाणित न हो, तो क्या वह विनष्ट हो जाएगा ?

उत्तर:-    निस्संदेह| यह बिलकुल सत्य है, परन्तु यह सत्य मनुष्य-मात्र से छुपा हुआ है | ऐसा कोई धर्म-संस्थापकव हादी उत्पन्न नहीं हुआ कि जो इस सत्य को देखता हो और इसका प्रचार करता हो | यदि कोई ऐसा संस्थापक होता, तो वह अपने मत में ऐसे घृणा से भरे हुए शब्दों का प्रचार न करता, जैसा कि एक एक हादी या संस्थापक ने किया है | अर्थात वह दूसरे मत के लोगों को काफिर न कहता, वह उनको मलेच्छ न बताता, वह उनको apostate जैसे घृणा-सूचक शब्द न कहता | वह अपने नारकीय विचारों का प्रकाश न करता | वस्तव में आरम्भ-काल में उत्पन्न हुए संस्थापक व हादी इससे अधिक और कर भी क्या सकते थे ? कुछ नहीं, कुछ नहीं !

प्रश्न:-     तो फिर यह अवस्था किस प्रकार दूर हो ?

उत्तर:- यह अवस्था तो दूर होने के लिए ही है | और इसका समाधान भी प्रकृति के निर्माणकारी कार्य में ही हो सकता है, और उसकी पूर्ती प्रकृति ने भगवान् देवात्मा के आविर्भाव में ही रक्खी है |

प्रश्न:-     वह किस प्रकार ?

उत्तर:- इसका उत्तर आगामी अध्याय में दिया गयाहै |

यदि आपको प्रकृति के निर्माण-कार्य का ज्ञान होता, तो आप निश्चित तौर पर यह विश्वास रखते और प्रगट करते कि मनुष्य-मात्र का इस दुर्दशा से उद्धार होना ही होगा, नहीं तो निर्माण-कार्य (अर्थात विकास-क्रम) का जो उद्देश्य है, वह पूरा ही नहीं होता | तथा विकासक्रम अर्थ-हीन शब्द बन कर रह जायेगा|

प्रश्न:-     प्रकृति के निर्माण-कार्य का क्या उद्देश्य है ?

उत्तर:-    निर्माण-कार्य का उद्देश्य यह है कि अपूर्ण गठन के पूर्ण होने का प्रबंध हो | अनमेल के मिट जाने और मेल के आने के हालात उत्पन्न हों |चारों-जगतों (अर्थात भौतिक-जगत, वनस्पति-जगत, पशु-जगत तथा मनुष्य-जगत)का आपस में जीवन-दायक उच्च मेल स्थापन हो | औरजोजो अस्तित्व इन चारों जगतों में प्रगट होते हैं, वह हानिकारक न रहनेकी अवस्था में पहुँचजावें, न्याय की शक्तियों के वारिस (अधिकारी)बनजावें, और विनाश करने वाली शक्तियों से मुक्त हो जावें |प्रकृति के निर्माण-कार्य का यह उद्देश्य विकास-क्रमकेनियम में निहित है,जिसे हम सबको समझने की बहुत बड़ी आवश्यकता है|

प्रश्न:-     मनुष्य में जो शारीरिक-गठन अपनी पूर्णता को पहुँच चुकी है, वह किस प्रकार सम्भव  हुआ ?

उत्तर:-    प्रकृति के निर्माण के सिलसिले में ही मनुष्य की शारीरिक-गठन पूर्णता को प्राप्तहुई है |

प्रश्न:-     मनुष्य की मानसिक शक्तियों में असाधारण प्रकाश और विकास किस प्रकार हुआ?

उत्तर:-    मनुष्य की मानसिक-शक्तियों की उत्पत्ति और उन्नति प्रकृति के निर्माण-कार्यों के सिलसिले में ही हुई है | विशाल प्रकृति का यह निर्माण-कार्य उसकी गुप्त ‘क्रियाशाला’ (Laboratory) में आश्चर्यजनक चमत्कार पैदा करता है | जो विशेष हस्तियाँ प्रकृति के इस विशाल कार्य को देख तथा उपलब्ध करके उसके छिपे हुए सत्यों और तत्वों की खोज में लग गईं, उनको ही प्रकृति के न केवल विशाल और असीम होने का, बल्कि सत्यों औरतत्वों की पूर्णकान(अर्थात भंडार)होने का बोध हुआ | उन्होंने ही यह उद्घोषणा की कि हे मनुष्य ! प्रकृति ही सब प्रकार के सत्य-ज्ञान का भण्डार है | यदि सत्य ज्ञान खोजना है तो उसका ही दर खटखटाओ |कल्पित खुदा या परमात्मा के कल्पित प्रेम में अपना समय नष्ट मत करो |

प्रश्न:-     तबआप क्या यह मानते हैं कि मनुष्यकी दुर्दशाआखिरकार दूर होनी ही थी ?

उत्तर:-    जीहां| जिनके सामने प्रकृति के निर्माण-कार्य की वास्तविकता खुल गई हो, वह यह दावे से कहेंगे कि बुराई मिटने के लिए है, झूठ नष्ट होने के लिए है, मिथ्या-विश्वास मिटने के लिए हैं | आत्म-अन्धापन और अज्ञानता नष्ट होने के लिए है | आत्मिक-सत्य ज्ञान फैलने के लिए है, सत्य और शुभ का राज्य आने के लिए हैं |

प्रश्न:-     मुझे यह बात समझ में नहीं आती कि प्रकृति कोई मनुष्य नहीं,ईश्वरनहीं, कोई होश रखने वाला देवता नहीं, फिर भी आप प्रकृति से होश की बातों की आशा क्योंरखते हैं, और ऐसी बुलंद (ऊंची) आवाज़ किस बूते पर निकालते हैं,कि मिथ्या और बुराई का राज्य जाएगा, और सत्य और शुभ का राज्य आयेगा ?

उत्तर:-    यह बिलकुल सत्य है कि ‘प्रकृति’ईश्वरनहीं, कोई होश रखने वाला अस्तित्व भीनहीं | परन्तु प्रकृति एक असाधारण हस्ती है कि जिस के रूप का ज्ञान पाकर और उसमे वर्तमान शक्तियों का ज्ञान पाकर मनुष्य वह कुछ जान तथा बता सकता है किजो कोई खुदा या पैगम्बर नहीं बता सकता | नैपचून नामकग्रह के अस्तित्व का होना एक सौ वर्ष पहले दोवैज्ञानिकोंने बताया था | वह वैज्ञानिक गणितज्ञ थे| उन्होंने सब ग्रहों का प्रभाव इस पृथ्वी पर गणित के अनुसार जान लिया था, फिर भी उनकी गणना में कुछ फ़र्क पड़ता था, जिसके कारण चंद्र एवं सूर्य ग्रहण लगने के समय का ठीक ठीक पता नहींचल पाता था | वह प्रकृति के नियमों की अटलता को जानते थे, इसलिए उन्होंने पूर्ण विश्वास के साथ यह बताने का साहस किया कि जिन ग्रहों का हमें ज्ञान है, उनके भिन्न कोई और (अन्य) गृह भी है, जिसके कारण सारे ग्रहों की स्थितियों का ठीक आकलन नहीं हो पाता, तथा चंद्र-ग्रहण एवं सूर्य-ग्रहण के बारे हमें ठीक समय का ज्ञान नहीं हो पाता| प्रकृति के नियमों का कार्य अनिवार्य है, अत: जब उसकी विधि पूर्ण होगी, तब जो कुछ इस विधि के द्वारा होना होगा, वह होकर रहेगा | अब मनुष्य की खुराक‘झूठ’ तथा‘बुराई’ नहीं | ‘झूठ’ केवल झूठ ही है, इसलिए वह सत्य की ज्योति में ठहर नहीं सकता | मनुष्य की जैसी कुछआत्मिक-गठन है,इसकाप्राकृतिक-स्वाभाव इसे सत्य की ओर ले जाने का है, क्योंकि झूठ में इसकी मृत्यु है | यदि मनुष्य की आत्मिक-गठन में यह बात न होती, तो विज्ञान का कोई भी सत्य दुनिया में कभी स्थापित न हो सकता|बेशक गलेलियो को कारागार में बन्द करके समाप्त किया गया था, परन्तु उसकी खोजी गई सच्चाई को उस समय के मिथ्या परायण लोग क्यों न दबा सके ? वह इसलिए किप्रकृति में मनुष्य का राज्य नहीं, प्रकृति में निर्माणकारी कार्य (अर्थात विकास-क्रम) का राज्य है |प्रकृति के निर्माण-कार्य में ऐसे जनों का उत्पन्न होना ज़रूरी था कि जो एक एक पहलू में मिथ्या को त्याग और सत्य को ग्रहण कर लेवें | ब्रूनो नामक वैज्ञानिक कोप्रकृति के निर्माण-कार्य ने प्रगट किया | मिथ्या परायण लोगों ने उसको ज़िंदा जला दिया | यह सत्य है कि ब्रूनो न रहा, परन्तु उसने जिस सत्य को प्रगट किया था, वहआजजीवित है | इसी प्रकार डार्विन को दबाने काकोई थोड़ा प्रयास नहीं किया गया| खुदा-परस्तों (अर्थात ईश्वरवादी)का तो प्राय: सारा समूह पागल हो गया | वह डार्विन की सच्चाई में अपने खुदा का अपमान समझते थे | खुदा-परस्तों के हादियों ने जो शिक्षा दी थी, वह डार्विन की सच्चाई के सामने हास्यप्रद थी | लाखों और करोड़ों खुदा-परस्तों ने दांत पीसे, परन्तु जय किसकी हुई ? सूर्य की ज्योति के सामने धुन्ध के बादल कब तक खड़े रहते ?प्रकृति केविकास-क्रम में ऐसे जन उत्पन्न होते गए, जो प्रकृति की अधिक से अधिक खोज करते गए, औरजिन्होंने सत्य की ऐसी शाहादतें (प्रमाण) पेश कीं, कि मिथ्या की कमर टूट गई |प्रकृति के निर्माण-कार्य के सिलसिले में ऐसे मनुष्यों का उत्पन्न होना अवश्यम्भावी है कि जो सत्य की ज्योति में आंखें खोलने के अधिक से अधिक योग्य होते जावें |प्रकृति मेंऐसे अस्तित्व उत्पन्न होते ही रहेंगे, जो सब प्रकार की मिथ्याओं कीपोल खोलते ही रहें | यदि शोक होता है तोकेवलमिथ्या परायण जनों पर,क्योंकिवहमिथ्या के अन्धकार में पड़े रहना चाहते हैं और उसी में रहकर विनष्ट हो रहे हैं |

इसी प्रकार अन्यसब बुराइयों का हाल है | ग़ुलामीकी बुराई सदियों तक जारीरही, परन्तु उस बुराई के विरुद्ध समय समय पर अच्छे जन उत्पन्न होते गए, कि जो ग़ुलामी की बुराई को मिटानेका संग्राम करते रहे | प्रकृति के ऐसे ‘रत्न’ प्रारम्भिक-काल में बहुत थोड़े थे | किन्तु समय के साथ साथ बढ़ने लगे, और ऐसा समय आया कि इस अन्याय को दूर करने के लिए कई श्रेष्ट हस्तियाँ उत्पन्न हो गईं | लाखों जनों ने ऐसी हस्तियों के विरुद्ध आवाज़ उठाई, उनकोबहुतसताया और तड़पाया गया| उनकी ह्त्या करने के षड्यंत्र किये  गए| परन्तु जब प्रकृति ऐसी किसी श्रेष्ट हस्ती को उत्पन्न करती है, तब उसको ऐसी विशेष-शक्ति के साथ उत्पन्न करती है, जिसके द्वारा वह लाखों करोड़ों जनों पर विजयी रहता है | समय आया कि जबग़ुलामी पूर्णतया दूर हो गई | करोड़ों गुलाम आज़ाद किये गए और मनुष्य-मात्र के माथे से यह कलंक का टीका सदा सदा के लिए मिट गया | इसी प्रकार अन्य सैंकड़ों प्रकार की बुराइयों का हाल रहा है, जोमनुष्यों की प्रत्येक सामाजिक-गठन (Social Organizations) में उत्पन्न हो गईं| यथा;

भारत वर्ष में सती की भयानक प्रथा आई, परन्तुविकास-क्रमकी विरोधी होने के कारणवह एक दिन इस धरती से मिट गई | हमारे देश में विधवओं पर सैंकड़ों वर्ष अत्याचार होता रहा | विधवओं की शादियाँ बल-पूर्वक रोकी जाती रहीं | लाखों और करोड़ों जन ऐसी बुराइयों के साथी रहे | जो बुराई के साथी होकर मृत्यु को प्राप्त हुए, वह तो कालिख़का टीका अपने माथे पर लेकर इस दुनिया से विदा हुए,परन्तु इन लाखों और करोड़ों बुराई के साथियों की तुलना में प्रकृति ने अपने निर्माण-कार्य के सिलसिले में ऐसे भीजन उत्पन्न किए,जिन्होंने इस बुराई के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाई, ऐसी श्रेष्ट हस्तियों के शब्द ज्योति और शक्ति से भरे हुए होते थे |उन्होंने औरों में नई जान फूंक दी, तथाइस विषय में अन्धकार मिटने लगा|सदियों से फैली हुई एक अन्यायकारी प्रथा का भयानक रूप नज़र आने लगा | इस तरह भलाई के साथियों का जोश और उत्साहबढ़ता गया, और अन्त में एक एक बुराई को जड़ से उखाड़ दिया गया |

इसीप्रकारबाल-विवाह का भयानक भंवर जारी रहा, जिस में छोटी आयु के लाखों बालकों और बालिकाओं की आहुति दी जाती रही | और ऐसे लाखों और करोड़ों बुराई के प्रेमक अपने अंधकारमय-जीवन से नीच-प्रभावों का धुआं निकाल निकालकरअन्धकार, अज्ञान, और अन्याय के बादल उत्पन्न करते रहे |उनके विरुद्ध प्रकृति के निर्माण-कार्य के द्वारा कुछ ऐसी श्रेष्ट हस्तियाँ उत्पन्न हुईं, जिनकी आवाज़ में बिजली जैसी कड़क थी| जिनके लेखों में असाधारणशक्ति थी, और जिनके आन्दोलनों में विशेष प्रकार की झलक थी |आखिरकार वही हुआ जो होना था | अर्थात बुराई के बादल छंटने लगे | बुराई के साथी निर्बल और निस्तेज होने लगे | उनके हथियार गिरने लगे, और निर्माणकारी-कार्य का यह बोलबाला होने लगा कि बुराई मिटने के लिए है और भलाई आने के लिए है |

अब यदि आप इन थोड़ी सी घटनाओं को सुनकर कोई परिणाम निकाल सकते हैं – तो वह यह है कि बाकी सब बुराइयां भी नष्ट होने के लिए हैं | मांसाहार दुनिया से जाएगा | बेशक‘मांसाहारी जन’ कालिख का टीका अपने माथे पर लेकर मरेंगे, परन्तुपशुओं पर यह अत्याचार सदा के लिए जारी नहीं रहेगा | बद-दयानती दुनिया से मिट जायेगी, यदि अपमानित होना है, तो बद-दयानत जनों ने, यदि प्रकृति की फटकार पड़नी है, तो बद-दयानत जनों पर | इसी प्रकार बद-चलनी (व्यभिचार) दुनिया से दफा होने के लिए है | काम-अनुराग पूजा की चीज़ नहीं,बेवफाई पूजा की चीज़ नहीं |जो इस काम-अनुराग के पुजारी हैं, वह इस लोक में भी कई स्त्रियाँ रखेंगे और परलोक में भी स्त्रियों के स्वपन हीदेखेंगे | वह काम-अनुराग के कोढ़ से कोढ़ी हो जायेंगे, वह इस नीच-अनराग के इस आत्मिक-कोढ़ से अपमानित होते रहेंगे |आनेवाली नस्लों की दृष्टि में वह पशुओं से भी निकृष्ट समझे जायेंगे | यदि कोई इस बुराई के शिकार होंगे, तो वह ऐसे ही रोगी आत्मा होंगे | उनको स्मरण रखना चाहिए कि पशु-पनजाने के लिए है | जिस प्रकार भूख बुरी चीज़ नहीं, परन्तु चोरी बुरी चीज़है | खाना बुरा नहीं, लेकिन पेटू बनना बुरा है | इसी प्रकार विवाह का सम्बन्ध बुरा नहीं, लेकिनकाम-अनुरागी बनना बुरा है | इर्ष्या तथा द्वेष का कोढ़ नष्ट होने के लिए हैं | घमंड तथा नीच-घृणा जाने के लिए है | स्वेच्छाचारिता जाने के लिए है | बुराहाल तो उनका हुआ, जो इनके गुलाम थे | नाश तो उनका हुआ, जिन्होंने उनको अपने जीवन में पाला और बढ़ाया| समय के साथ साथयह सब बुरी शक्तियां और बुरे भाव मिटने के लिए हैं | इन बुराइयों के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले  विश्व में कहीं न कहीं उत्पन्न होते रहे हैं, परन्तु शुरू शुरू में उनकी आवाज़ इतनी शक्ति-शाली नहीं थी कि इन बुराइयों के गुलाम डर जाते |अंतत: प्रकृति के उसीविकासकारी कार्य के द्वारा एक ऐसा अनोखा और अद्वितीय आविर्भाव उत्पन्न हुआ कि जिसके हृदय में कुल मिथ्याओं और कुल बुराइयों को मिटाने के लिए पूर्ण बल वर्तमान है | जिनकेजीवन्त-शब्दों की गूँज से बड़े बड़े पापी हिल जाते रहे हैं, और उनके पाँव उखड़ जाते रहे हैं, उनके शरीर कांपने लग जाते रहे हैं | और कई बार ऐसे जन उनके पास से उठकर दूर भाग जाते रहे हैं, कि कहींवहअपनी प्रिय बुराइयों को छोड़न बैठें | औरशेषकितने ही जन अपनी बुराइयों पर शर्मसारहोते और अपने आपको कोसते रहे हैं कि हाय ! इन बुराइयों ने हमें बुरी तरह से बरबाद कर दिया |और वह उनको त्यागने के लिए मजबूर होते रहे हैं |

प्रश्न:-     ऐसीप्रत्येक झूठ तथा बुराई के विरुद्ध नईआवाज़ किस ने उठाई ?

उत्तर:-    इसआवाज़ को उठाने वाले जन थे विज्ञान-मूलक सत्य धर्म के प्रवर्तक परम पूजनीय भगवान् देवात्मा |

प्रश्न:-     क्या उनका यही विश्वास है कि बुराई मिटने के लिए है, और मिट कर ही रहेगी | झूठ मिटने के लिए है, औरमिटकर ही रहेगा | सत्य और शुभ जय पाने के लिए है, और वह अवश्य जय पायेंगे ?

उत्तर:-    जीहां| उन्होंने फरमाया था:-

“यहां देव-राज आयेगा –  मुझको यकीन है,

देवत्व ही फतह पायेगा – मुझको यकीन है |”

उन्होंने यह भी बताया था:-

“दुनिया-परस्त लाख मुक़ाबिल में हों खड़े,

आख़िर शिकस्त खायेंगे – मुझको यकीन है |”

प्रश्न:-     यह असाधारण घोषणा उन्होंने किस आधार पर की ?

उत्तर:-    अपनी अद्वीतित देव-शक्तियों के बल के आधार पर |

प्रश्न:-     देव-शक्तियों के बल से आपका क्या तात्पर्य है ?

उत्तर:-    देव-शक्तियों के बल से मेरा तात्पर्य यह है कि भगवान् देवात्मा को ही प्रकृति ने देव-शक्तियां बीज रूप में देकर इस विश्व में आविर्भूत किया है |ज्यों ज्यों यह देव-शक्तियां उनके हृदय में उन्नत होती गईं, त्यों त्यों इन देव-शक्तियों की महिमा उनके सामने सारी दुनिया की तुलना में असाधारण रूप में प्रकाशित होती गई | उन्होंने देव-शक्तियों का सुन्दर और जीवन-दायक रूप देखा, उनका देव-ज्योति और देव-तेज उत्पन्न कर्ता रूप देखा | इस देव-ज्योति में उन्होंने सारा आत्मिक-जगत देखा | अर्थात उन सब अति सुन्दर आत्मिक-सत्यों और तत्वों का दर्शन किया, जिनका आत्मा के जीवन और मृत्यु के साथ गहरा सम्बन्ध है | उसदेव-ज्योति में उन्होंने मनुष्य-मात्र की आत्मिक-अन्धता कावास्तविकहाल देखा | उनकी आत्म-अन्धता का हालदेख कर देवात्मा के दुःख की कोई सीमा न रही | आत्म-अन्धता के कारण जो मनुष्य अन्धेरे में ठोकरें खा रहे थे, और नाना सम्बन्धों में टकराहट उत्पन्न कर रहे थे, उस टकराहट का भयानक रूप देखा | आत्म-अन्धकार में रहकर जो करोड़ों मनुष्य अपने भीतर ‘नीच-अनुरागों’ और‘नीच-घृणाओं’ को उत्पन्न करके मदहोश और पागलों की तरह अपनी शारीरिक तथ आत्मिक-पूँजी (अर्थात जन्मजात उच्च-भावों) को लुटा रहे थे और हिन्सक तथा खूंखार पशुओं की तरह अपने साथी मनुष्यों और पशुओं की हत्याएं कर रहे थे, वह भयानक दृश्य भी देवात्मा ने अपनीइस देव-ज्योति में देखा | उनका देव-हृदय परम दयालु होने के कारण बेचैन हो उठा | और जहां एक ओर उनके सामने झूठ तथा बुराई का भयानक रूप खुला, वहां दूसरी ओर उन्हें यह भी प्रतीत हुआ कि यह सारा दृश्य ‘मनुष्य-अत्माओं’ में सेदेव-ज्योति केआनेसे ही मिट सकेगा | अन्धेरा ‘ज्योति’ के सामने खड़ा नहीं रह सकता,इसलिए वह मिटने के लिए है | जिस अँधेरे में आत्मिक-रोग उत्पन्न होते हैं, वहआत्मिक-रोग अँधेरे के मिटने से ही मनुष्यों कोअपनेवास्तविक रूप में नज़र आ सकेंगे | और ज्यों ही ऐसे उच्च बोध की अवस्था पैदाहोती जायेगी, त्यों ही मनुष्य अपनी प्रकृति से लाचार होकर इन आत्मिक-रोगों से मुक्ति पाना चाहेंगे, औरभगवान् देवात्मा की ओर आकृष्ट होने लगेंगे |भगवान्देवात्मा ने अपनी देव-शक्तियों के रूप को देख कर पूरे दावे से यह फरमाया है कि इन देव-शक्तियों के कार्य से ही मनुष्य-जगत में से सब प्रकार की मिथ्या और सब प्रकार की बुराई मिट कर रहेगी| भगवान् देवात्मा ने देव-शक्तियों के असीम देव-बल का भीदर्शन किया है और उनके सन्मुख यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि असीम देव-बलके सामने बुराई तथा झूठ का राज्य ठहर ही नहीं सकता | उनकोप्रकृति ने इन देव-शक्तियों को देकर इस योग्य रखा है कि वह किसी भी हालत में झूठ तथा बुराई के सामने पराजित नहीं हो सकते | भगवान् देवात्मा  तो जय पानेके लिए हैं, उनकाविजय-पताका उनके विजयी होने का बाह्य्क चिन्हहै |

संक्षेप में कहा जाए तो सच्चा गुरु तथा आध्यात्मिक-पथ-प्रदर्शक वह आत्मा होता व हो सकता है कि जो प्रकृति की विकास प्रक्रियाकी अटल विधियों के अनुसार अपने आत्मा में सारे के सारे सात्विक-भाव उत्पन्न तथा विकसित कर सका हो | इसके पश्चात अद्वितीय देव-शक्तियां अर्थात(१) सत्य के प्रति पूर्णाग अनुराग, (२) असत्य के प्रति पूर्णाग घृणा, (३) शुभ के प्रति पूर्णाग अनुराग तथा (४) अशुभ के प्रति पूर्णाग घृणा मूलक देव-भावों को पूर्ण विकसित अवस्था में लाभ कर सका हो, क्योंकि इन अद्वितीय भाव-शक्तियों के मिलने से ही कोई “मनुष्यात्मा”अपनीगठन में पूर्णतालाभ करता है | विश्व में भगवान् देवात्मा ही वह अकेली हस्ती है जिनकी आत्मिक-गठन पूर्णतालाभ कर सकी है | जबकि बाकी सब मनुयात्मायें अधूरी आत्मिक-गठन लिए हुए हैं | जो आत्मिक-अंग सारी मानवता को मिले भी हैं, वह भी अपनी गठन की दृष्टि से बहुत टेढ़े-मेढ़े हैं | सारी मानवता आत्मिक-रोगों से भी बुरी तरह ग्रस्त है | इसलिएएकपूर्णगठन-प्राप्त आत्मा अर्थात देवात्मा को छोड़ कर और किसी मनुष्यात्मा को प्रकृति ने यह सौभाग्य प्रदान नहीं किया था कि वह सत्य-धर्म की विज्ञान-मूलक खोज कर सके|

विकास-क्रम में देवात्मा काअविर्भावहोना अनिवार्य था| जिस विधि से इस अविर्भाव ने प्रकाश पाया,वह विधि प्रकृति की अपनी विधि है, जिसको हम विकास-क्रमकी विकास-प्रक्रिया (अर्थातप्रकृतिकेनिर्माण काकार्य) के नाम से जानते हैं |

प्रश्न:-     आपके अनुसार निर्माण का कार्य किसी समझ-बूझ रखने वाले अस्तित्वकी शक्ति के द्वारा नहीं होता ? फिर भी आप उसके सम्बन्ध में यह शक्तिशाली दावे किस आधार पर करते हैंकि ऐसा होकर ही रहेगा, ऐसे विश्वास की सुनिश्चितता आपको किस प्रकार प्राप्त हो जाती है ?

उत्तर:-    देखनेऔर अच्छी तरह समझने से |

प्रश्न:-     वह किस प्रकार ?

उत्तर:-    मुझे यह ज्ञान है कि यदि आग पर बर्तन रख जाएगा, तो वह गर्म हो जाएगा | जलनेवाली वस्तु जब भी आगकेसंपर्क में आएगी, वहतब ही वह जल उठेगी| मुझे इस बात का इसलिए विश्वास है,क्योंकि यह प्रकृति का नियम है, जोकि विश्व्यापी तथा अटल है | यह अपना स्वभाव बदल नहीं सकता | जहां यह नियम पूरा होगा, वहां ऐसा ही स्वभाव प्रगट करेगा |ज्यों ही यह कारण न रहेगा, त्यों ही इसके सम्बन्ध में ऐसाकार्य भी बन्द हो जाएगा | यह प्रकृति का ऐसा सत्य है कि जिसके सम्बन्ध में ज्ञानी होकर मनुष्य विश्वास कर सकता है | यदि यह नियम समझ-बूझ वाला होता, तो इसके सम्बन्ध में निश्चित बात हो ही नहीं सकती थी | आप देखें कि परमात्मा एक सर्व-ज्ञानी पुरुष माना जाता है, परन्तु उसकी बात पर कोई भरोसा नहीं | वह ज्ञान देता है तो उलटा, बातें बताता है तो जुदा जुदा और एक दूसरे के विरुद्ध |संसार में वहकभी मूसा को भेज देता है, तो कभी ईसा को | कभी मुहम्मद साहिब को भेज देता है, तो कभी बहाउल्हा को | उसकी ओर से भेजा गया प्रत्येक पैगम्बर अपनी अपनीमहिमा का नारा लगाता है, और यह कहताहै कि खुदा ने उसको भेजा है | परन्तु परमात्मा या खुदा चुप है | उसकी तरफ से इल्हाम का दावा किया जाता है, कि करोड़ों मनुष्य उसको मानते हैं | बहुत अच्छा हुआ कि प्रकृति होश वाली न थी, नहीं तो ईश्वर या खुदा की न्याईं वह भी अटकल-पच्चू चलती | जब कभी कहलाने वाले खुदा को गुस्सा आया तो खेतियाँ उजाड़ दीं,भूकम्प भेज दिए | अब उसके गुस्से का कौन पता निकाले ? उसके पुजारी तो उस पर लट्टू हो जाते हैं और उसके गुस्से से ही भविष्य में घटने वाली सच्चाई देख लेने का दावा करते हैं | परन्तु प्रकृति में जिन कारणों से भूकम्पआता है, उन कारणों का यदि कोई अध्ययन करे, तो उसकी हानि से अपनी रक्षा कर सकता है |

प्रश्न:-     आपने यह तो नई बात बता दीकि होश रखने वाला ईश्वर तो अटकल-पच्चू चलता है, और नियम-बद्ध-प्रकृतिपूर्त: विश्वास के योग्य है |क्याआप इस सत्य को अधिक विस्तार से बताने का कष्ट करेंगे?

उत्तर:-    आपयह नही देखते कि कहलानेवाले खुदा या ईश्वर की तरफ से मूसा आया, ईसा आया, मुहम्मद आया, वहाउल्हाआया और प्रत्येक ने एक नया दीनव मज़हब चलाया, और नई नईबातेंबताईंतथा जुदा जुदा शिक्षाएं देनी शरू कर दीं | वही बात एक मज़हब अच्छी कहता है, औरदूसरा उसे बुरी कहता है | खुदा चुप रहकर यह तमाशा देखता रहता है | दो सौ वर्ष ईसाईयों और मुसलमानों में मज़हबी जंग रही, दोनों ही मज़हब यह कहतेजाते थे कि खुदा ने भेजे हैं, फिर भी दोनों मतों के अनुयाई एक-दूसरे के खून के प्यासे बने रहे | लाखों जानें नष्ट हो गईं,परन्तु अल्ला मियाँ चुप साधे रहे | इरान में नया मज़हब पैदा हुआ, वहाउल्हा इस का नबी बताया गया,मुस्लमानों ने उस मज़हब के अनुयाइयों पर बहुतबड़ा अत्याचार करना आरम्भ कर दिया | कहा जाता है कि तीस हज़ार वहाई मारे गए | इस्लाम का यहदावा  है कि हम शान्ति लाते हैं,ईसाइयत का यह दावा हैकि हम शान्ति लाते हैं,  दोनों खुदा के मज़हब शान्ति पैदा करने का दावा करते हैं, और लाये हैं जंग | प्रकृति के नियमों में यह दोनों परस्पर विरोधी बातें हो ही नहीं सकतीं |प्रकृति खुदा की तरह नाराज़ नहीं होती, तथा किसी की झूठी सिफारिश नहीं सुनती | वह झूठे लारे नहीं देती, और झूठी उम्मीदें भीनहीं देती, झूठी प्रार्थनाएँ नहीं सुनती, अपनीझूठी महिमा नहीं सुनती, किसी के रोने पर अपना स्वाभाव नहीं बदलती | किसी के विरोधी अथवबागीहोने पर तैश में नहीं आती, प्रकृति के नियमों पर उपरोक्त प्रकार की किसी बात का कोई प्रभाव नहीं होता |प्रकृति के नियम अटलता से ही काम करते हैं |जो अस्तित्व प्रकृति के नियम पूरे करेगा, वह चाहे प्रकृति से विरोधी व बाग़ी क्यों न हो, उननियमों का फल अवश्य भोगेगा | वेदान्त मत रखने वाले प्रकृति से विरोधीही रहे, परन्तु जब वह रोटी खाते थे, तो रोटी खाने के फल अवश पातेथे, जब पानी पीते थे, तब उनकी प्यास बुझजाती थी,जबहवामें सांस लेते थे, तब जीवित रहते थे | जबरौशनी में आंखें खोलते थे, तब देख सकते थे | प्रकृति ने उनके विरोधीहोने से खुदा की न्याई अपनास्वाभाव नहींबदला | प्रकृति के नियमों में उनके स्वाभाव की जो अटलता है – वह पूर्णत: विश्वास के योग्य है | परन्तु कहलाने वाले ‘खुदा’ या ‘ईश्वर’ के स्वाभाव की तो कोई अटलता ही दिखाई नहीं देती|

प्रश्न:-     इस अटलता के निश्चित और आवश्यक फल क्या हैं ?

उत्तर:-    पहला और मुख्यत: निश्चित लाभ यह है कि मनुष्य विश्वस्त होकर अपना जीवन व्यतीत कर सकता है | एक एक कृषक जब गेहूं बोता है तो गेहूं के फसल की आशा करता है| जब ज्वार बोताहै तब ज्वार की आशा करता हैं | जब बाजरा बोताहै, तो बाजरे की आशा करता है | आम के वृक्ष से आम की आशा करता है | आक के पौधे से आक की ही आशा हो सकतीहै| अब यदि प्रकृति की यह अटलता न होती, तो मनुष्य विश्वस्त होकर न जीवन व्यतीत कर सकता था, न होश रख सकता था | यदि कोई गेहूं बोता है और खेतमें पैदा हो जावे ज्वार, बो आये ज्वार और निकल आये बाजरा, बो आये बाजरा और निकल आयें सरकंडे, तो क्या मनुष्य अपने होशो-हवास स्थिर रख सकता है ? भूकम्प आते रहे,और जब तक मनुष्य ने भूकम्पों के नियमों का अध्ययन नहीं किया,तब तक बहुत हानि उठाता रहा | जबउन नियमों का ज्ञान पाकर मनुष्य ने उनके आधार पर भवन बनाए, तब वह किसी भूकम्प से न गिर सके | यदि कोई ईश्वर होता, जो बहुत नाराज़ होने वाला बताया जाता है, तो मनुष्य का क्या हाल होता ? कोईवस्तु उसके सामने सुरक्षित न होती|किसीठीकबात पर मनुष्य चल ही न सकता | इसलिए न जीवित रह सकता, और न अपने होश स्थिर रख सकता | खुदा या ईश्वर का विश्वास ही मनुष्य को अटकल-पच्चू बना देता है |

प्रश्न:-     यदि होशवाली सत्ता की आप ज़रुरत ही अनुभव नहीं करते, तो मनुष्य-मात्र के होश पाने के महिमा क्यों गाते हैं ?

उत्तर:-    अच्छा हुआ आपने यह प्रश्न पूछ लिया | मैंने होश वाले खुदा या ईश्वर की आवश्यकता नहीं बताई है | होश मनुष्य के लिए बहुत मूल्यवान वस्तु है, परन्तु इस बात को अपने हृदय में अच्छी तरह अंकित कर लें, कि मनुष्य के होश भी इसीलिए स्थिर हैं क्योंकि प्रकृति और उसके नियम पूर्ण विश्वास के योग्य हैं | यदि प्रकृति और उसके नियम विश्वास के योग्य न होते, तो सब मनुष्य परेशान और पागल हो जाते | आप विचार करेंकि यदि कृषक अपने खेत में गेहूं बो दे, और उसमे पैदा हो ज्वार, और यदि ज्वार बोदे, और खेत में पैदा हो बाजरा, और यदि बाजरा बोये, तो उत्पन्न हो सरकंडा |यदि गिलास में पानी आग बन जाए,तो क्या किसी के भी होश ठिकाने रहेंगे ? मनुष्य के होश का प्रकृति की सच्ची घटनाओं के साथ गहरा सम्बन्ध है | घटनाओं के साथ मेल होने के कारण ही मनुष्य का आत्म-विश्वास बचा और बना रहता है | और हम उसको ही अधिक होश वाला समझते हैं जो प्रकृति की घटनाओं का अधिक ज्ञान रखता हो |हम वैज्ञानिक लोगों की महिमा क्यों गाते हैं, उनको ऊंची श्रेणी के मनुष्य क्यों कहतेहैं ? वह इसलिए कि उच्च श्रेणी के जन प्रकृति की घटनाओं कीसच्चाइयों और नियमों के सत्य ज्ञान के खोजने में लगे हुए हैं | हममिथ्या-मतों के प्रचारकों को बेहोश क्यों बताते हैं, इसलिए कि वह प्रकृति और उसके नियमों की सत्यता से हट कर जो शिक्षा देते हैं, वह सब भ्रन्तियोंसे भरी हुई है | क्या यह भी कोई होश की बात है कि खुदा नेजगह जगह की मट्टी इकट्ठी करके मनुष्य का शरीर बनाया, और उसके नाक में फूंक मारकर उसको जीवित बना दिया ? क्या यह पागलपन नहीं, जबकि मनुष्य के सामने ज्ञान वर्तमान है कि मनुष्य पशुओं से विकसितहुआ है, तो भी यह मनुष्य उस ज्ञान से लाभ नहीं उठा सकता और बिलकुल बेतुकी हांकता रहता है | आप पागलखाने में जाकर ज़रा ध्यान से पागलों की बातें सुनें, और विचार करें कि वह पागल क्यों कहे जाते हैं | वह इसलिए पागल कहे जाते हैं क्योंकि वह प्रकृति की घटनाओं को उलटे रूप में देखते हैं | साधारण तथा गरीब होकर भी एक एक स्त्री यह कहती रहती हैकि मैं महारानी हूँ, यदि उसका अफसरभीउसकोमहारानीकहकर नबुलाये, तोवहउसपरआक्रमणकरनेकेलिएतैयारहोजाती है |एकएकअफसरउससेझाडूभीयहकहकरदिलवाताहै,कि महारानीजीआपकृपाकरकेअमुक स्थान पर झाडू लगा दें |अब उस बेचारी महारानी की यह समझ में नहीं आता कि मैं तो पागल हूँ, फिर भी अपने आपको महारानी कहती हूँ, औरयदि सचमुच में महारानी हूँ, तो किसी की आज्ञा मानने की मुझे क्या ज़रुरत है ? अब एक एक पागल कब होश वाला समझा जाता है, जबवह प्रकृति कीघटनाओं को उनके असल रूप में देखनाआरम्भकर देता है | यदि आप इस सच्चाई को देख चुके हों, तो कितने ही प्रश्नों का उत्तर आपको मिल जाएगा |

प्रश्न:-     वह किस प्रकार ?

उत्तर:-    आपने पूछा था कि मिथ्या क्यों मिटने के लिए है, तथा सच्चाई क्यों स्थापन होने के लिए है | आपनेयहीपूछा थाया नहीं ?

प्रश्न:-     जीहां| मैंने अवश्य यहीपूछा था, अबआप बेशक इस प्रश्न का उत्तर दें |

उत्तर:-    आप ही देखें कि मनुष्य की होश के यह अर्थ हैं कि वह प्रकृति की घटनाओं को उनकेवास्तविक रूप में देखे | होश रखने वाले मनुष्यों सेआपक्याआशा करेंगे ? यही कि वह प्रकृति के नियमों के सम्बन्ध में अधिक ज्ञानी हों, और अधिक तत्व-दर्शी हों | तब मनुष्य-श्रेणी में से ऐसे मनुष्यों का उत्पन्न होना आवश्यक है कि जो सत्य-ज्ञान के आकांक्षी हों,और इसलिए अपने होश को स्थिर रखने वाले हों | अन्धकार तब तक कायम रहा, जब तक देखनेवाली आंखें उत्पन्न नहीं हुईं|ज्योंहिआंखें उत्पन्न हुईं, त्योंहि जीवों का अन्धकार दूर होने लगा | इसी प्रकारप्रकृति की विकास विषयक प्रक्रिया में जब ऐसे मनुष्य उत्पन्न होने आरम्भ हुए कि जिन के हृदय में प्रकृति की घटनाओं और सत्य-नियमों के जानने की आकांक्षा उत्पन्न हुई, तब मनुष्य की उन्नति में एक नया मार्ग खुल गया | ज्यों ज्यों मनुष्य-श्रेणी के लोग अपनी विभिन्न खोजों में सफल होते गए, और अपनी खोजों के द्वारा लाभ किये गए सत्यों का प्रचार करते गए, त्यों त्यों मनुष्य-श्रेणी की मानसिक-बेहोशी दूर होने लगी | इन खोजी हुई सच्चाइयों से ज्योतिर्मान होने के लिए सैंकड़ों मनुष्य उनके साथ जुड़ने लगे | यह मनुष्य के स्वभाव में है कि ज्यों ही उसको ज्योति मिलेगी, त्यों ही उसका अन्धकार जाएगा | इसलिएज्यों ज्यों मनुष्यों के हृदय सत्य-ज्ञान की ज्योति से ज्योतिर्मान होंगे, त्यों त्यों वह मिथ्या-विश्वासों के पहाड़ों को उठाकर समुद्र में फैंक देंगे | आप ज्योतिर्मान होकर अन्य मिथ्या-विश्वासों में फंसे हुए मनुष्यों पर तरस खायेंगे | मनुष्य के होश स्थिर रखने के लिए मिथ्या का अन्धकार दूर होना तथा मनुष्य की होश स्थिर रखनाऔर बढ़ाना मनुष्य के अस्तित्व के लिए अति आवश्यक है – यह तो मनुष्य-प्रकृति का स्वभाव है | मनुष्य में जो जीवित रहने और मृत्यु से बचने की गहरी आकांक्षा तथा संग्राम है, वह भी तभी सफल हो सकता है, जब मनुष्य जीवित रहने और मृत्यु से बचने के नियमों का ज्ञान पने तथा उन्हें पूराकरने के योग्य बन जाए |अबइननियमों का जानना और पूरा करना मनुष्य के बोधवानहोने के लिए अति आवश्यक है | इस पृथ्वी पर मनुष्य-मात्र में एक ऐसी श्रेष्ठ-श्रेणी वर्तमान है कि जो यह अच्छी तरह से जानती है कि प्रकृति की घटनाओं और नियमों के जानने में ही मेरी रक्षा है | यह श्रेष्ठ-श्रेणी दिनों दिन सत्य-ज्ञान की ज्योति से ज्योतिर्मान होती जा रही है | और अपने लेखों और मुख के द्वारा सत्य-ज्ञान का प्रचार करती है | वह सच्चे फलों के आधार पर सत्य-ज्ञान की महिमा प्रगट करती रहती है | अब यह आवश्यक है कि सत्य-ज्ञान की ज्योति से अज्ञानता का अन्धकार मिट जाए | इसलिए मैं फिर दोहराता हूँ कि सत्य-ज्ञान कीइसलिए विजय होगी क्योंकि सत्य-ज्ञान में ही मनुष्य की रक्षा तथा विकास है | सत्य-ज्ञान की इसलिएविजय होगीक्योंकि सत्य-ज्ञान को पाने से ही मनुष्य अपनी होश स्थिर रख सकता है, और उसे और बढ़ा सकता है | सत्य-ज्ञान की इसलिए जय होगी क्योंकि मनुष्य के भीतर जो जीने का संग्राम वर्तमान है, वहसंग्राम सत्य-ज्ञान के पाने से ही सफल हो सकता है | और सत्य-ज्ञान की इसलिए जय होगी क्योंकि सत्य-ज्ञान के खोजी और प्रेमकों की एक श्रेष्ठ-श्रेणी प्रकृति के निर्माणकारी-कार्य से उत्पन्न हो चुकी है, और वह दिनों दिन बढती जा रही है, और वह श्रेणी सत्य-ज्ञान की ज्योति से ज्योतिर्मान होकर महाबली श्रेणी बन गई है | और यह श्रेणी जो जो सच्चे चमत्कार करके दिखाती है, वहचमत्कार नबियों, हादियों, पैगम्बरों और रसूलों आदि के मिथ्या-मूलक चमत्कारों से अति श्रेष्ट और महान हैं |

प्रश्न:-     जब सत्य-ज्ञान में नईजाग्रति है, और सत्य-ज्ञान में जीवन है, मिथ्या में मदहोशी (अर्थात बेहोशी) और मृत्यु है, तब तो आपका यह दावा सच्चा है, कि मिथ्या मिटने के लिए और सत्य-ज्ञान स्थापित होने के लिए है |इस विषय को आप कृपा करके और आगे बढायें|

उत्तर:-    मैंने आपको बताया है कि प्रकृति का निर्माण-कार्य अटल और अनिवार्य है | यह कार्य किसी के रोकने से न रुक सकता है और न बदल सकता है | यह कार्य लागातार अपना अमल(सिलसिला)जारी रखता है | इस कार्य के निरंतर गतिशील रहने के कारण नए नए अस्तित्व तथा नई नई नस्लें उत्पन्न होती रहती हैं | इस कार्य के कारण हस्तियों के भीतर नए नए अंग (यथा शारीरिक, मानसिक तथा भाव-विषयक आदि) उत्पन्न होते रहते हैं | इस कार्य के कारणनानाअस्तित्वों के अंगों में अपूर्णता से निकल कर पूर्णता की ओर जाने का रुझान बनारहता है | इसलिए नए नए अंगों को पाकर पहली वर्तमान नस्लों से नई नस्लों (अर्थात प्रजातियों) का प्रकाश होता है | मनुष्य ने तो प्रकृति की इस सत्यता को देखकर कई अनुसंधान भी किये हैं |कुत्ते की नस्ल को ही ले लें, मनुष्यों ने ऐसी विशेषता रखने वाले जोड़ों (नर और मादा)को मिलाना शुरू किया, कि जो खास विशेषता रखतेथे, और जिस विशेषता को मनुष्य स्थिर रखना चाहते थे, और उन विशेषता रखने वाले जोड़ों से जो बच्चे उत्पन्न होते थे, यदि उनमे से उस विशेषता का प्रकाश नहीं पाया जाता था, तो उनको छोड़ दिया जाता था| और जिनमे वह विशेषता वर्तमान होती थी, उनका पालन करते तथा उनको सुरक्षित रखा जता था | इसक्रमको एक लम्बे काल तक स्थिर रखा गया | जहां उन्होंने खिलौनों जैसे बहुत छोटे कद के कुत्तों की नस्ल तैयार की, वहां बड़े बड़े डील-डौल वाले कद तथा शेर की सी हिम्मत रखने वाले कुत्ते भी उत्पन्न तथाविकसितकिये | इसी प्रकार मटमैला रंग रखने वाले कबूतरों में से नाना प्रकार के सुन्दर कबूतर उत्पन्न तथाविकसित किये | और मनुष्य उनसे कई प्रकार के काम लेने लगे | बेशक ऐसे हालात में जोड़ों (नर और मादा) को मिलाना मनुष्य के अपने हाथ में रहा है,लेकिनप्रकृतिमेंभी यह चुनाव का क्रम (Selection) जारी है | ‘मनुष्य-श्रेणी’ में मनुष्य चुनाव करता है, और प्रकृति में ‘अनुकूल-हालात’ चुनाव करते हैं |नानाप्रकार के पालतू पशुओं में जो मनुष्य ने कई प्रकार की श्रेणियां उत्पन्न कर दीं, वह प्रकृति के नियमों के पालन करने से ही हुई हैं, न कि किसी कहलाने वाले खुदा के दरबार में प्रार्थनाएं करने से | जो ज्ञान मनुष्य ने लाभ किया, वह सत्य-प्रकृति और उसके अटल नियमों का ज्ञान था, न कि इल्हामी पुस्तकों का | मूर्ख मनुष्य तोते की तरह यह रटता रहता है कि ईश्वर नामक कल्पित अस्तित्व सत्य-ज्ञान का दाता है, और उससे प्रार्थना करने से ही सारे कार्य सिद्ध होते हैं, जबकिवास्तविकताठीकइसके विरुद्ध है | खुदा या ईश्वर की प्रार्थनाओं से कुछ नहीं बनता और न बनेगा, क्योंकि खुदा या ईश्वर पूर्णत: कल्पित अस्तित्व है | प्रकृति का दर खटखटाने से और उसके ज्ञान के असीम भण्डार से सत्य-ज्ञान पानेसे मनुष्य के नाना कार्य सिद्ध हो रहे हैं | ऐसे जनों पर बहुत शोक है, जो इस वास्तविकता को उपलब्ध नहीं करसकते; औरएक कल्पित अस्तित्व के अन्धविश्वास में फंस कर अपने शरीर तथा आत्मा दोनों की ही(जानबूझकर अथवाअनजाने में)हत्याएं कर रहे हैं | अब यदि आपके सामने प्रकृति के निर्माण या विकास की सत्यता प्रगट हो गई हो, तोआपसमझ सकेंगे कि प्रकृति का निर्माण-कार्य समय के साथ साथ ऐसे जनों को उत्पन्न करता ही जाएगा कि जो अपने अस्तित्व को स्थिर रख सकेंगे | जो सत्य-ज्ञान के अधिक से अधिक आकांक्षी हों, उसको पाने की अधिक से अधिक योग्यता रखते हों, और जो इस सत्य-ज्ञान के द्वारा अपनी हस्ती को स्थिर (सुरक्षित) रखनेऔर उसकी आयु के बढाने में सफल होसकें| प्रकृति का ‘निर्माण-कार्य’बनाने का कार्य है, औरजबकि यह कार्य रुकता नहीं, तब बनाने का कार्य लगातार बढेगा |अब यह बनाने का कार्य मनुष्य-श्रेणी में भी प्रभाव डालरहा है, तथा ज़ोर से अपना काम कर रहा है | सारांश यह है कि जहां विनाश के कार्य के सिलसिले में झूठ और बुराई के प्रेमक उत्पन्न हो गए, जोअपना और औरों का नाश कर रहे हैं, वहां प्रकृति के विकास-क्रममें अच्छे से अच्छे जन भी उत्पन्न होते गए और हो रहे हैं | जो जन एक व दूसरी मिथ्या के सम्बन्ध में उच्च-घृणा रखनेवाले हों, औरसत्य-ज्ञानके सम्बन्ध में एक वदूसरे अंग में प्रेमक हों,ज्यों ही दूसरी श्रेणी (सत्य-ज्ञान आकांक्षी श्रेणी)ने विकास लाभ किया, त्यों ही ऐसे जनों ने मिथ्या का किला नष्ट कर दिया | सत्य-ज्ञान के आकांक्षी और प्रेमक जनों ने ज्यों ही ‘आत्मिक-जगत’ (अर्थात आध्यात्मिक-जगत)में प्रवेश किया, त्यों ही मिथ्या की मृत्यु का नगारा बजने लगा, और इस महाबली श्रेणी के सन्मुख मिथ्या-अनुरागीजनों को हारमाननी ही पड़ी, क्योंकि यही प्रकृति का नियम है|इसी प्रकार जहां बुराईके प्रेमक बुराई का बाजार गर्म करने के लिए उत्पन्न हुए, वहां ऐसे सात्विक भाव्-धारी जन भी उत्पन्न हो गए कि जिनका उत्पन्न होना निर्माण-कार्य के सिलसिले में आवश्यक था | ऐसे जनों ने एक एक बुराई को नष्ट करने का बीड़ा उठाया | जहां विनाश का चक्कर है, वहां विकास का चक्कर भी है, जहां बिगाड़ने का काम है, वहां बनाने का काम भी है | बनाने का काम महाबली है, उस कार्य की दिवार की ईंट पर ईंट चुनी जा रही है, इसलिए‘विकास-क्रम’ काबड़ाभारीभवन बनता जा रहा है, यह अधिकार विनाश के कार्य (अर्थात विनाश-क्रम) को प्राप्त नहीं |अब जहां एक एक मिथ्या और एक एक बुराईको मिटाने वाले जन उत्पन्न हो गए, वहां वह समय भी आने वाला था कि सारी मिथ्याओं और बुराइयों को मिटाने वाले और समस्त सच्चाइयों और भलाइयों को स्थापन करने वाले भी आविर्भूत हो गए, अर्थातप्रकृति के निर्माण या विकासकारी कार्य के द्वारा अन्तत: मनुष्य सृष्टि के सरताज परम पूजनीय भगवान् देवात्मा का अद्वितीय आविर्भाव हो गया,जोन केवल मनुष्य-मात्र के, किन्तु उसके नीचे के अन्य सब जगतों के लिएभीप्रकृति का महान दान है |

प्रश्न:-     आपके वचनों से मुझे यही प्रतीत होता है कि प्रकृति में जो विस्मय-जनक निर्माण अथवाविकास का कार्य लगातार कामकर रहा है, उसी ने अनुकूल समयतथा अनुकूल हालात में भगवान् देवात्मा को आविर्भूत किया |परन्तु जिस उद्देश्य के लिए वह आविर्भूत हुए, उस उद्देश्य का आप कृपा करके संक्षिप्त शब्दों में वर्णन करें |

उत्तर:-    भगवान् देवात्मा को प्रगट करने में जो पृकृति के निर्माण-कार्य का लक्ष्य प्रतीत होता है, वह यह है कि ‘मनुष्य-आत्मा’एक ओर ‘आत्म-अन्धकार’ से निकल कर ‘आत्म-सत्यज्ञान’ की दुनिया में आंखें खोलें, और दूसरी ओर नाना ‘नीच-अनुरागों’ और‘नीच-घृणाओं’ से‘सत्य-मोक्ष’ पाकर‘सात्विक-भावों’ को अपने हृदय में उत्पन्न और उन्नत करने के संग्राम में लग जाएँ |भगवान् देवात्मा यह सामर्थ्यरखते हैं कि अधिकारी-मनुष्यों (Fit  Souls) को उनकी अपनी योग्यता के अनुसार सब प्रकार की मिथ्याओं और नीच-भावों से मोक्ष देकर आत्म-ज्ञान के सत्यों और तत्वों से ज्योतिर्मान करें |और सब प्रकार की नीच-शक्तियों के दासत्व से मोक्ष देकर उनके हृदयों में सात्विक-भावों को उत्पन्न करें | इस सामर्थ्य के रखने के कारण देवात्मासारे मनुष्य-जगत के परम कल्याण के लिए सत्य उपास्य-देवके रूप में प्रगट हुए हैं|परम गुरु तो प्रगटहो चुके, अब उनके अनुरागी-शिष्यों की आवश्यकता है |

प्रश्न:-     क्याप्रत्येक मनुष्यभगवान् देवात्मा काशिष्य बनने की योग्यता नहीं रखता?

उत्तर:-    जी नहीं | लाखों और करोड़ों मनुष्य तो प्रकृति (स्वभाव) से ही ऐसे अयोग्य उत्पन्न होते हैं कि वह किसी हाल में भी भगवान् देवात्मा के देवरूप की महिमा को देख नहीं सकते, तब वह उनको गुरु रूप में किस तरह ग्रहण कर सकते हैं ? यह बिलकुल सत्य है कि जो जन उनकी महिमा देखेंगे, वहीउनकी ओर थोड़ा व अधिक आकृष्ट होंगे | इस बात की बड़ी हैरानी होतीहै कि भगवान् देवात्मा प्राय: आधी सदीसे अधिक काल तक पंजाब प्रांत में रहकरअपनीअसाधारण ज्योति प्रदान करते रहे | अपनी देव-वाणी तथा लेखनी के द्वारा उन्होंने मनुष्य-जगत मेंजो हलचल उत्पन्न की, वह आजतक स्मरणीय है | उनके उपदेशों तथा वक्तव्योंमें असाधारण उच्च प्रेरणाएं तथा प्रभाव हैं| बड़े बड़े डाक्टर और बैरिस्टर आजतक भी उनके उपदेशों तथा वक्तव्यों कोस्मरण करके उनके सम्बन्ध में अपने प्रशंसनीय भावों का प्रकाश करते हैं | एक डाक्टर और बैरिस्टर ने मुझे बताया कि भगवान् देवात्मा अपने देव-आश्रम में जब बोलते थे, तो हमें अनारकली(अनारकली- लाहौरनगर में एक स्थान का नाम है ) केदूरकेफासले तक भीउनकी ध्वनि की गूँज सुनाई देती थी,तब उनके बोलने से दीवरें हिल जाया करती थीं | शायद ही कोईऐसाजन होगा जिसका हृदय उनके देव-प्रभावों से हिल न जाता हो ! सैकड़ों और हज़ारों के सामने ऐसे दृश्य भी उत्पन्न हो जाते थे किअधिकारी जन आंसू बहातेहुए देखे जाते थे | अपने पापों को स्वीकार करने के लिए खड़े हो जाते थे, कई अपने जीवनों को उनके श्री चरणों में अर्पण करने के लिए तैयार हो जाते थे | उनके उपदेशों तथा वक्तव्यों को चमत्कारी उपदेश तथा वक्तव्य बताया जाता था | देवात्मा से जुड़े हुए जनों के जीवनों में अनोखा परिवर्तन होना आरम्भ हो जाता था| फिर भी, इन साक्षात घटनाओं का वर्णन सुनते हुए भी हज़ारों ऐसे जन भी वर्तमान थे, जो उनकी महिमा गाने में मुसीबत अनुभव करते थे |

प्रश्न:-     ऐसा क्यों ?

उत्तर:-    इसके दो कारण हैं, एक तो हजारों और लाखों मनुष्य उच्च-जीवन की महिमा हीदेखने के अयोग्य उत्पन्न होते हैं | जो जन इर्ष्या, द्वेष, घमंड और घृणा आदि भावों के दास होते हैं, यह भाव उनको किसी की भी महिमा देखने के योग्य ही नहीं रखते | ऐसे जन अपने गुरु आप होते हैं, और अन्धकार में रहने और मरने के लिए ही उत्पन्न हुए होतेहैं | दूसरे मनुष्य वह हैं, जो प्रकृति (अर्थातजन्मजात-स्वभाव) तो अच्छा लेकर उत्पन्न हुए होते हैं, परन्तु जिन हालात में उन्होंने पालन-पोषण लाभ किया होता है, उन हालातमे उनमेभगवान् देवात्मा के सम्बन्ध में दूसरे आम लोगों से अश्रद्धाकी बातें सुन सुन कर उनकी महिमा देखने और उनके श्रद्धावन बनने के योग्यता नहीं रहती, इसलिए वह भगवान् देवात्मा की महिमा नहीं देख सके और उनके दर से दूर ही रहे |

प्रश्न:-     जो जन भगवान् देवात्मा के दरबार में आये, भलाउनका क्या हाल है? क्या वह सभीदेवात्मा के अनुरागी-शिष्य बन गए ?

उत्तर:-    जी नहीं | किसी स्कूल में दाखिल होकर सभी लड़केप्रथम श्रेणी में नहीं आ       जाते|बहुत थोड़े लड़के प्रथम श्रेणी में उतीर्ण होते हैं | संख्या में उनसे कुछ अधिक द्वीतिय श्रेणी में आते हैं | पास शुदा लड़कों की बहुत सारी संख्या तृतीय श्रेणी की होती है | बाकी एक एक यूनिवर्सिटी की परीक्षा में जितने लड़केपास होते हैं, प्राय: उनसे अधिक लड़के फेल होते हैं | इसी प्रकार एक एक खेल में बहुत सारे खिलाड़ी भाग लेते हैं | परन्तु सभी मशहूर नहीं हो जाते | कोई कैप्टन बनजाता है, परन्तु बहुत सारी संख्या में खिलाड़ी किसी बड़ी टीम में लिए जाने के अधिकारी नहीं समझे जाते | एक एक व्यापार में सैंकड़ों और हज़ारों जन लग जाते हैं, परन्तु कोई कोई धनवान हो जाता है | मेरे नगर में शुरू में बहुत सारे जनों के द्वारा  टूटी हुई बाइसिकलों की मुरम्मत करने वाली दुकाने खोली गईं, उनमे से केवल एक ही जन ऐसा निकला, जो बहुत बड़ा रईस बन गया औरजिसने कई लाख रूपये दान किये |पंजाब में इंजिनियर थोड़े तो उत्पन्न नहीं हुए, लेकिन सर गंगा राम इंजिनियर ने इतनी उन्नति क्यों लाभ की ? उन्होंने एक असाधारण सफलता लाभ की, इतना धन कमाया कि जिनमे से पच्चास लाख रूपये दान भी किये, इसलिए वह पंजाब के शिरोमणि दानी माने जाते हैं | एक ही हालात में सब मनुष्य एक ही प्रकार का लाभ नहीं उठा सकते |

भगवान् देवात्मा के दरबार में जो भीजन आते हैं, वह बहुत सौभाग्यवान हैं | वह तो एकमात्र सच्चे आध्यात्मिक-जगत के देव-सूर्य की शरण में आ जाते हैं | उनकी ज्योति-किरणों को लाभ करना शुरू कर देते हैं | ऐसे जनों का अधिकार तो उन राजाओं-महाराजाओं से भी बढ़कर है जो राजे-महाराजे भगवान् देवात्मा के श्रीचरणों में नहीं आये या नहीं आ सके | लेकिनअधिकार मिलना एक अलगबात है और उसको सफल करना दूसरी बात है | इसलिएभगवान् देवात्मा के दरबार में जो भी जन आयेगा, वह एक महा श्रेष्ठ आधिकार तो अवश्य पायेगा | परन्तु कहां तक वह इस महोच्च अधिकार को सफल करेगा, इसका उत्तर तो उसका स्वभाव ही दे सकता है| भगवान् देवात्मा से तो प्रत्येक अधिकारी जन को उच्च-भावों और धर्म-जीवन का दान मिलता है| जो जन भी भगवान् देवात्मा के श्री चरणों में आता है, वह पहले से अवश्य बेहतर बन जाता है, उसके आत्म-विकास का दरवाज़ा तो सदा के लिए खुला रहता है, परन्तु वह जन दरवाज़ा खुला पाकर कहां तक अपने लक्ष्य को सिद्ध करेगा, यह अलग प्रश्न है |

अंतत: आप स्वयं ही देखते हैं कि सूर्य की ज्योति में वास करते करते भी कई जन अपनी आंखें खो देते हैं, जो आंखें बिलकुल नहीं खो देते, उनमे से कई जनों की आंखें कमज़ोर हो जाती हैं, और काली ऐनक लगाकर अपना गुज़ारा करते हैं | यदिआंखें दर्द करती हैं,तो सूर्य को ही त्याग देते हैं | कुछ ही जन ऐसे होते हैं कि जिनकी मरते दम तक आँखों की ज्योति ठीक रहती है | इसलिए वह ज्योति के प्रेमकभीरहते हैं |इसी प्रकार मनुष्य आत्माओं का हालहै, जो जन आंखें(अर्थात आन्तरिक आंखें)रख करभगवान् देवात्मा की देव-ज्योति में निरंतर वास करते हैं, उनके सौभाग्य की कोई सीमानहीं| परन्तु यह उनकी आगामी काल की अवस्था बताएगी कि वह भगवान् देवात्मा की ज्योति में रहते हैं, या सारीआयु अँधेरे में ही गुज़ार देते हैं, और कभी कभी भगवान्देवात्मा से उनके लेखों या सतसंग के द्वारा आध्यात्मिक-ज्योति में आंखें खोलते हैं | भगवान् देवत्मा का सेवक बनने से कोई जन उनका सच्चा शिष्य नहीं हो जाता | कभी कभी देव-ज्योति में अपनी असल हालत को देख कर और उससे बेचैन होकर अपने जीवन की चिन्ता में पड़जाना एक बात है, परन्तु ऐसी आध्यात्मिक-ज्योति का प्रबल आकांक्षी या प्रेमक बनना दूसरी बात है |

ठीक इसीप्रकार भगवान् देवात्मा के देव-तेज को पाना औरउसे पाकर मोटेआठपापों से मुक्ति पाना और कुछ मोह-बंधनों से बाहरनिकल आनाएक बात है, परन्तुदेव-तेज के लिए प्रबल आकांक्षा या अनुराग अनुभव करना बिलकुल दूसरी बात है | एक एक अधिकारी आत्मा देव-ज्योति और देव-तेज को पाकर धन्य धन्य हो जाता है, क्योंकि इन बरक़तों के द्वारा उसके कुछ पाप झड़ गए, जो उसको सताते और तड़पाते थे | उसके कुछ मिथ्या विश्वास चले गए, जिनमे बड़े बड़े विद्वान् जन भी फंसे हुए हैं | उसके हृदय में चारों जगतों की कुछ न कुछसेवा करने का भाव जागने लगा तथा ऐसा उच्च परिवर्तन भी उसको आश्चर्य में डालने लगता है, जबकि वह अपने चारों तरफ महा स्वार्थी मनुष्यों की भीड़ देखता है | ऐसे महा स्वार्थी जनों की तुलना में उसको अपना जीवन बहुत बदला हुआ अनुभव होने लगता है | ऐसे बदले हुए जन इतने से उच्च परिवर्तन से ही संतुष्ट हो जाते हैं | अपने सौभाग्य को देखकर धन्य धन्य होते रहते हैं | लेकिन उनके सामने यह प्रश्न उत्पन्न नहीं होता कि मुझे जो दान मिला है,उसकेबदले में मैंने अपने सद्गुरु के लिए क्या किया ? क्या मेरे भीतर भगवान् देवात्मा के सम्बन्ध में हित-परिशोध अथवाकृतज्ञता का कुछ भाव उत्पन्नहोताहैयानहीं?  क्या मैं अपने सद्गुरु के लिए कोई सच्चा त्याग करता हूँ, क्या मेरे भीतर कृतज्ञताकी कोई भाव-शक्ति दिखाई देने लगी है ? यह प्रकृति का नियम है कि यदिउपकारपाकर कोई जन अपने भीतर कृतज्ञता का भाव उत्पन्न न कर सके, तोउसके भीतर स्वार्थ का भाव स्वत: ही बढ़ता जाएगा | यदि उपकार पाकर दीनता का भाव नहीं बढ़ायेगातो घमंडी बनता जाएगा | इसी तरह यदि किसी की सच्ची महिमा सुन या देख कर कोई जन उसके प्रति श्रद्धा न बढ़ाएगा, तो इर्ष्या (इर्ष्या जो घमंड के बढ़ने का ही फल है)बढ़ने लगेगी और बढ़ती जायेगी |दुनिया में चारों ओर जो इतना स्वार्थ फैला हुआ है, वह इसलिए कि एक एक जन विश्व में असंख्य उपकार पाकर कृतज्ञता का भाव नहीं बढ़ापाता,क्योंकि चारों ओर स्वार्थ का वतावरण भरापड़ाहै, तथा कृतज्ञ बनने काप्रशिक्षण कहीं नहीं दिया जाता |दुनिया में कोई सफलता पाकर उस सफलता काश्रेय किसी उपकारी का नहीं समझता, बल्कि अपनी योग्यता मानता है, और इस प्रकार धन्यवाद के भाव से नहीं बल्कि घमंड से भर जाता है |एक एक अच्छा तथा ऊंचा पद पाकर, उस पद के कर्तव्यों को अनुभव करके दीननहीं बनता, अपितुऊंचे पद के नशे में खौफनाक तौर पर घमंडी तथा ज़ालिम हो जाता है | वहीलाभ प्राप्त करके एक जन पहले से बेहतर हो जाता है, जबकि वही बरक़तें पाकर दूसराजन अकड़ता फिरता है |इसी प्रकार देवात्मा के देव-प्रभावों को पाकर एक एक जन अपने आप में ही मस्त रहताहै, अपने स्वाथ्य, अपनी आर्थिक अवस्था,अपनेपारिवरिक-जीवन, अपनी पोज़ीशन में बेहतरी देख कर उनके नशे में धन्य धन्य रहताहै | तथा अपने परम गुरु को केवल शब्दों में याद करता है, लेकिन उच्च-कर्मों से नहीं | अर्थातदेवात्मा के मिशन के लिए अपनीओर से धन आदि के द्वारा भीकुछ योगदान नहीं देना चाहता | ऐसा एक एक बुद्धिमान मनुष्य जो केवल शब्दों में ही देवात्मा की महिमा गाता है, और कर्मों से कुछ साथ नहीं देना चाहता है, वह इस अधोगति को पहुँच जाता है कि फिरवह अपना नियत दान (अर्थातवर्ष भर के लिए साधारण सी फीस) भी नहीं देना चाहता | अब दूध में जितनी चीनी डालोगे, उतना ही मीठा होगा,इसके विपरीत नमक डालने से दूध मीठा न होगा | इसी प्रकार गुरु के दरबार में कुछ अर्पण से संकोच करने वाले जन बेहतर जीवन तो नहीं पा सकते |जो उपकार पाकर प्रति-उपकार न कर सकें अर्थात गुरु की सेवा भीमें कुछ भेंट न देना चाहें,ऐसे जन सच्चे शिष्य नहीं कहलासकते तथा नहीं हो सकते | वह तो नीच-अनुराग शक्तियों और उनसांसारिक-अस्तित्वों के गुलाम हैं, जिनके लिए भाग भाग कर कुरबानियां करते फिरतेहैं | कहावत है कि ‘बिनसेवा नहीं प्रीती जागे– औरबिन प्रीती नहीं अपनत्व भागे|’ जब तक अपनत्व(अर्थात निपट स्वार्थ)रहेगा,तबतक कोई जन सच्चा-शिष्यबनने की योग्यता लाभन करसकेगा| कबीर साहब ने इस विषय में बिलकुल ठीक फरमाया है:

‘जब मैं थातब गुरु नाहीं – जब गुरु हैं मैं नाहीं;   

                   प्रेम गली अति सांकरी – ता में दो न समाहि|’

इसलिएभगवान् देवात्मा के जो सेवक उनसे सत्य-धर्म का महान दान पाकर भी अपनत्व को ही बढ़ाते रहेंगे, वह सच्चे शिष्य बनने की योग्यता (यदि कोई है) तो उसे खोते जायेंगे | इसलिए आप समझ सकते हैं कि आठ पाप छोड़ने से (आठमोटे पापों से सम्बंधित प्रतिज्ञायें, जो किसी जन को भगवान् देवात्मा के मिशन का सदस्य बनने से पूर्व पूरी करनी पड़ती हैं) कोई जन उनके मिशन का सदस्य हो सकता है,वहभगवान् देवात्मा का सेवक भी होता है और है, परन्तु उनका शिष्य नहीं |इसलिए परम उपास्य भगवान् देवात्मा का सच्चा-शिष्य बनने की योग्यता किसी किसी जन में ही पाईजाती है | और कोई कोई जन ही अपने इस महोच्च-अधिकार को सफल कर सकता है |

प्रश्न:-     भगवान् देवात्मा का अनुरागी-शिष्य बनने के सम्बन्ध में क्या कोई नियम हैं?

उत्तर:-    जीहां,अवश्यहैं|भगवान् देवात्मा से जोसत्य-धर्म का दान मिलता है, उस दान के पाने के लिए किसी जन में बढ़ती हुई आकांक्षा शिष्य बनने के लिए बहुत आवश्यक है | देवात्मा से जो देव-प्रभावों का दान मिलता है, उसकोपाने के लिए जो जन सच्चे अर्थों में आकांक्षी बनेंगे, वहीदेवात्मा के साथ अपना सम्बन्ध घनिष्ट करने का सच्चा प्रयास करेंगे | वह संग्राम में पड़ जायेंगे | देव-प्रभावों की आवश्यकता को बोध करके, उनकोपाने की गहरी आकांक्षा उत्पन्न करेंगे | यह सत्य है कि देव-प्रभावोंको पाने से किसी जन के वासना-मूलक नीच-भाव दबने तथा घटने शुरू हो जाते हैं | यदिकिसी जन का देव-प्रभावों को पाते रहने का यहक्रमनिरंतर चलता रह सके,तो धीरे धीरे उसके नीच-भावों से उसे थोड़ीसी मोक्ष भी मिल सकती है, तथा वह अपनी बदलती हुई उच्च-अवस्था में संतुष्ट रहना और उसी का बार बार वर्णन करना अपना सौभाग्य अनुभव करने लगता है | लेकिन ऐसी अवस्था में ठहर जाना तथा केवल उसी का वर्णन करते रहना देव-प्रभावों को पाने की आकांक्षा का प्रकाश नहीं है |देव-प्रभावों को आत्मा के लिए जीवन का सच्चा आहार बोध करने से हीदेवात्मा के प्रति गहरी आकांक्षा उत्पन्न होनासम्भव है| शारीरिक दुनिया में मनुष्य अन्न, पानी और ज्योति को जीवन का आहार बोध करके उन्हें पाने के लिए बेचैन रहता है, यदिइसी प्रकार की बेचैनीभगवान् देवात्मा के सम्बन्ध में उत्पन्न हो जाए, तब और तब ही कोई अधिकारी-जन भगवान् देवात्मा केसाथजीवन्त-सम्बन्धस्थापनकरनेकेसंग्राममेंपड़सकता है|और जब तक इस जीवन्त-सम्बन्ध का बोध मनुष्य में उत्पन्न न होगा, तब तक उसके भीतरअनुरागी-शिष्य बनने की अवस्था भी उत्पन्न न होगी | भगवान् देवात्मा का अनुरागी-शिष्यबनने के लिए उनके देव-प्रभावों का प्रबल आकर्षणबहुत आवश्यक है |

प्रश्न:-     यह तो आपने बिलकुलनई तथा कड़ी शर्त लगाई है |

उत्तर:-    यह शर्त तो प्रकृति की ही लगाई हुई है, जो अटल है | अत:इसे कोई नहीं बदल सकता | आपको पता है कि प्रत्येक जीवित अस्तित्व के लिए यह नियम है कि वह तब तक ही जीवित रहेगा, जब तक पौष्टिक खाना खाएगा, शुद्ध पानी पिएगा, स्वच्छवायुऔर खुली रोशनी में वासकरेगा | अब यह नियम शरीर के लिए प्रकृति ने ही स्थिर किया हुआ है | यदि मनुष्य के वश में होता, तो वह इसे बदल डालता | बंगाल के दुर्भिक्ष में जो लाखों जन भूखे मर गए, वह कभी न मरते, यदि मरने और जीने के नियम मनुष्य के हाथ में होते | फिर तो हम बिना भोजन किये ही जीवित रह सकते | निर्धनता मनुष्य को क्यों तंग करती है ? इसके यही अर्थ हैं कि किसी को भर पेट भोजन प्राप्त न हो, रहने के लिए खुलारौशनीसे भरपूर तथा हवादार मकान न मिले | आदि आदि |भारत के सच्चे हमदर्द अपने देश की दुर्दशा से क्यों दुखी हैं ? वह इसीलिए कि उनके अनुसार लाखों जनों को सारे दिन में केवल एक बार भोजन मिलता है | तीन चीज़ें मनुष्य के शरीर के लिए आवश्यक समझी गई हैं- एक भोजन, दूसरी शिक्षा तथा तीसरी स्वस्थ सम्बन्धी सहायता | यदि मनुष्य के वश में होता, तो वह तीनों चीज़ों की आवश्यकता को हटा देता | परन्तु प्रकृति ने अपने अटल नियम अपने ही हाथ में रक्खे हैं | उसने अन्धकार को मिटाने के लिए ज्ञान-प्राप्ति को आवश्यक रक्खा है | ठीक इसी प्रकार मनुष्य-आत्मा के अस्तित्व को स्थिर तथा सुरक्षित रखने तथा उसकी आत्मिक-उन्नति के लिए प्रकृति ने देव-प्रभाव दायक खुराक आवश्यक रक्खी है,इसअटल नियम को कोई कभी बदल नहीं सकता |प्रत्येकअधिकारी-जन को प्रकृति की इस परम आवश्यक शर्त के सन्मुख अपना सिर झुकाना पड़ेगा| जो ऐसा नहीं करेगा, वह एक न एक दिन आत्मिक-मृत्यु को अवश्य प्राप्त होगा | यह शब्द मेरे नहीं, यह तो प्रकृति का फ़तवा( अर्थातCode of Conduct  by Natue) है|जो जन आंखें(आन्तरिक-आंखें)रखते हैं, वहप्रकृति के इस शास्वत-सत्य को अच्छी तरह देख सकते हैं | इसलिए जबतक किसी अधिकारी जन की यह अवस्था न हो जाए कि वह देव-प्रभावों के सम्बन्ध में अपने भीतर बोध उत्पन्न करे और उनके पाने की प्रबल भूख अनुभव करे, और उनके देने वाले के लिए अपने हृदय में सच्ची व्याकुलता उत्पन्न करे, तब तक उसे संतुष्ट न रहना चाहिए | अनाज के ढेरों के सन्मुख खड़ा हो जाना काफी नहीं, उनके सम्बन्ध में ज्ञान, बोध तथा भूख का होना भी बहुतआवश्यक है | मैं समझता हूँ कि अब आपके सन्मुख कुछ न कुछ सच्चाई अवश्य खुल गई होगी |

प्रश्न:-     जीहां, अवश्य| परन्तु मेरे भीतर कुछ और प्रश्न भी उत्पन्न हुए हैं ?

उत्तर:-    निस्संदेह! अवश्य पूछें, और मैं यथा सम्भव  अवश्य उत्तर दूंगा |

  1. प्रश्न:-     आपने जो कुछ बताया है, क्या उसकी पोषकता भगवान् देवात्मा की देव-वाणी से भी होती है ?उत्तर:-    जीहां| भगवान् देवात्मा की देव-वाणी एक स्थान परइस तरह लिखी हुई है:-“देव-धर्म प्रवर्तककी जिस महान और सर्वोच्च ज्योति(अर्थातदेव-ज्योति)को पाकर कोई मनुष्य अपनी किसी नीच-गति कोउसकेहानिकारक और घृणित रूप में देख सकता है, और उनके देव-तेज को पाकर उससे मोक्ष पाने का आकांक्षी बन सकता है, और धर्म विषयक किसी उच्च-भाव के सौन्दर्य को देख कर उसके लाभ करने के लिए इच्छुक हो सकता है, वह दुर्लभ देव-ज्योति और देव-तेज अथवाउनके देव-प्रभाव तब ही किसी जन को लाभ हो सकते हैं, कि जब वह उनसे उनकी प्राप्ति का अभिलाषी और उनके पाने के योग्य हो |”आप इस देव-वाणी को अच्छी तरह से सुन कर उस पर विचार करें,तथाभगवान् देवात्मा की उन अमूल्य सच्चाइयों को अनुभव करें कि जिन्हें उन्होंने फरमाया है, कि देव-प्रभावों को पाने के लिए दो नियम पूरे करने की आवश्यकता है, एक तो ऐसे देव-प्रभावों का अभिलाषी बनना है, दूसरा उनके पाने के लिए योग्य होना है |प्रश्न:-     मैं आपकी बात को समझ गया हूँ,किभगवान् देवात्मा ने अपनी देव-ज्योति में जो कुछ प्रगट किया है, उसके आधार पर ही आपनेथोड़े से शब्दों में मुझे कुछ सत्य बताने की कृपा की है | अब आप कृपया यह बताएं कि देवसमाज सबसे बड़ा और मुख्य उपदेश क्या देती है ?

    उत्तर:-    मैं फिर देव-वाणी के आधार पर ही यहांदेवसमाज का उद्देश्यउद्धृत करता हूँ कि जो भगवान्का सबसे बड़ा और मुख्य उपदेश है |

    “देवसमाज का सबसे बड़ा और मुख्य उपदेश यही है कि पहले तुम देवधर्म प्रवर्तक के साथ अपने सम्बन्ध कोजीवन्त-रूप से स्थापन करने की आवश्यकता को अनुभव करो और उसके अभिलाषी बनो | ऐसी अभिलाषा को पूर्ण करने के लिए तुम्हें जिस जिस ज्ञान की आवश्यकता है, जिस जिस साधन की आवश्यकता है उसको जानने, सीखने और पूरा करने की कामना करो | क्योंकि किसी मनुष्य में ऐसी आकांक्षा और कामना के जागने पर हीउनके सम्बन्ध में शिष्य-विषयकयोग्यता लाभ करने की आशा हो सकती है |”

    प्रश्न:-     यह विचित्र देव-वाणी तो आंखें(अर्थात आन्तरिक आंखें) खोलनेवाली है | इसदेव-वाणी के आधार पर आप मुझे यह बताने की कृपा करें कि कौन कौन से नीच-भाव हैं,जो इस योग्यता के बढ़ानेमें रुकावट बनते हैं, या इस योग्यता को नष्ट करने काहेतु बनते हैं ?

    उत्तर:-    सुनो! मैंइन नीच-भावों का वर्णन भी देवात्मा की देव-वाणी के द्वारा ही करना चाहता हूँ, वहदेव-वाणी यह है:-

    “इस योग्यता के लाभ करने में और कईबातोंके भिन्न जो बड़े बड़े निकृष्ट भाव रुकावट बते हैं, वह यह हैं:-

    १.        अहंकार भाव| “यह भाव जिस ‘मनुष्य-आत्मा’ में जितना अधिक हो, वह उतना ही उसके विष से अधिक पागल होता है | और अपने पागलपन की मात्रा के अनुसार सत्य को मिथ्या, और मिथ्या को सत्यके रूप में देखता है | और सत्य को त्याग कर मिथ्या को ग्रहण करता है, और अपने हृदय को अधिक से अधिक विकृत करके अपने-आप को उस ज्योति की प्राप्ति के अयोग्य बनाता है कि जिसे पाकर ही वह अपने बुरे रूप वअपने किसी पाप व अपराध को प्रकृत-रूप(अर्थातवास्तविक -रूप)में देख सकता था |इस अहंकार के वश होकर केवल यही नहींकी कोई मनुष्य अपने किसी नीच गति दायक पाप या मोह या अपराध आदि को घृणित रूप में नहींदेख सकता, किन्तु उसके विरुद्ध अपने किसी दोष व अपराध व पाप के विषय में कोई बात सुनते ही जल उठता है, औरसत्य को असत्य, और असत्य को सत्य के रूप में देखता है | अर्थात जिसे कुछ देर पहले वह अपने से महान देखता था, उसी को अपने इस महा-निकृष्ट भाव से उत्तेजित होकर हीन और तुच्छ देखता है | जिसके साथ पहले कुछ निकटता सी अनुभव करता था, उसी से अब दूर हो जाता है | जिसको पहले अपना हितकारी अनुभव करता थ, अबउसी को अपना अहितकारी अनुभव करने लगता है | और यदि इस अहं के साथ साथ उसके भीतर द्वेष और प्रतिशोध का महा विनाशकारी भाव भी यथेष्ट रूप में वर्तमान हो, तो उसके उत्तेजित हो जाने से वह अपने हितकर्ता को उलटाहानिपहुंचाने के लिए तत्पर हो जाता है, और अराधना के स्थान में उसकी निन्दा करने में ही तृप्ति लाभ करता है |”

    प्रश्न:-     यह तो बड़ा भयानक भाव है !

    उत्तर:-    जीहां| यह भाव मनुष्य की होश मारदेता है | यदि कोई ज्योति उसके भीतर वर्तमान हो, तो वह उसको मिटा देता है | ज्योति के बुझने से इस भाव का दाससत्य को असत्य, और असत्य को सत्यसमझता है |

    प्रश्न:-     ऐसा क्यों होता है कि अहं का दाससत्य को असत्य, और असत्य को सत्यसमझता है ? पाप और अपराध की पोषकता क्यों करता है, अपने हितकर्ता को शत्रु क्यों समझता है, उसकीमहिमा के बदले निन्दा क्यों करता है ?

    उत्तर:-    यह सब इसलिए कि अहंकारमनुष्य को आन्तरिक तौर पर अंधा बना देताहै |

    प्रश्न:-     अनमेल की जो आग घर घर जल रही है, उसके भड़काने तथाबढ़ानेमें क्या इसी भाव का हाथ है ?

    उत्तर:-    जीहां| एक एक निकट का सम्बन्ध अहं-भाव के कारण टूट जाता है, क्योंकि इस भाव के दास अपने आपको पूर्णत: ठीक तथा औरों को पूरी तरह ग़लत समझते हैं | लाखों तलाक़ इस भाव ने कराये, लाखों मुकद्दमे इस भाव ने कराए,क्योंकि प्रत्येक लड़ने वाला जन ख़ुदठीक और दूसरे को ग़लत समझता है | घमंडी समझौता करना ही नहीं जानता| सास-बहु के झगड़े में भी अधिकतरयही भावकाम करता है | मेरा यह कटु अनुभव रहाहै कि यह भाव सबसे अधिक नारकीय-भाव है | प्रत्येकअहंकारीयह चाहता है कि मुझे सभी प्यार करें, मुझे सभीअच्छा समझें; परन्तु यदि उसको उसका कोई बड़े से बड़ा हितकारी भी कोई उचित रोक-टोक भी कर दे, तो वह जल उठता है,आंखें तरेर लेता है | इसनारकीय-भाव्के विषय में भगवान् देवात्मा ने और किसी स्थान पर भी बहुत सुन्दर देव-वाणी प्रकाशित की है | अपनी विरोधिता का उल्लेख करते हुएभगवान् देवात्मा ने अपनी आत्म-कथानामक अनोखी पुस्तक में यह फरमाया है:-

    जीवन-व्रत ग्रहण करने से पहले भी कितने ही लोग मेरे बहुत विरोधी थे, परन्तु व्रत ग्रहण करने के अनन्तर तो मानों चारों ओर आग हीजल उठी, कि जो समय के साथ साथ अधिक से अधिक प्रचण्ड होने लगी | इस विरोधिता की अग्नि के प्रज्वलित होने का कारण क्या ? कारण, मनुष्य में अहं-प्रियता (अर्थात घमण्ड-भाव)की प्रबलता का होना है | अहं-प्रियता क्या ?अपने संस्कार, अपने मत, अपने स्वभाव, अपनी रूचि, अपनीवासना, अपनी इच्छा आदि का प्यार, चाहे उनमे से कोई एक व प्रत्येक ही उसके और अन्य अस्तित्वों के लिए कैसी ही बुरी, कैसीही अपराध व पाप-मूलक और कैसी ही हानिकारक क्यों न हो | साधारण मनुष्य अपने किसी मिथ्या से मिथ्या संस्कार, व मत व विश्वास और बुरे से बुरे स्वाभाव व आचार के विरुद्ध कुछ सुनना पसंद नहीं करता, और अपनी नीच से नीच और बुरी से बुरी और पापी से पापी और मिथ्या से मिथ्या गति को इतना प्यार करता है, कि उस पर और तो और अनेक बार अपने किसी सच्चे हितकर्ता की ओर से भीकोई चोट पहुँचने पर बिलबिला उठता है, कोप से जल उठता है, आंखें बदल लेता है, मुंह फेर लेता है, घृणा से भर जाता है, और उसे श्रद्धा और सन्मान की दृष्टि से देखने के स्थान में अश्रद्धा और शत्रु की निगाह से देखता है, और यदि इसके भिन्न वह अपने हृदय में द्वेष व परिशोध का प्रबल भाव भी रखता हो, तोफिर कृत्घन और उत्पीड़नकारी बनकर उसे तरह तरह से सताने और हानि पहुंचाने के लिए तैयार हो जाता है |”

    यह सब भगवान् देवात्मा का अपने जीवन का निजीअनुभव है, जिसे कोई भी सच्चाहितकर्ता अपने अनुभव से देख सकता है | हर समय किसी को अपनी मन-मर्जी पूरी करनी हो, और उच्च नियमों की अवहेलना करके दूसरों को खुश करने का ही बीड़ा उठाया हो, तो फिर कोई उससे नाराज़ क्यों हों ? मनुष्य को अपनी “मन-मर्जी” अच्छी लगती है, जो जन उसकी तारीफ में लग जाएंगे, चाहे वजह कैसेही पापी हों,वह उनका हो जाएगा | उस को रोकने और टोकने वाला उसका कैसा ही उपकारी और हितकारी हो, वह उसका शत्रु बन जाता है | मैंने भी दुनिया में ऐसी कितनी ही घटनाएं देखी हैं, जहां कहीं मित्रता का सम्बन्ध बहुत गहरा है, वहां तो एक बार रोकने-टोकने से मनुष्यअपनाएकजानी-दुश्मनपैदाकरलेताहै, क्योंकि साधारण मनुष्यों में अहं तथा प्रतिशोध-भाव बहुत बड़ी मात्र में वर्तमान है| ऐसा जन न केवल शत्रु बन जाता है, किन्तु कृतघ्न भी हो जाता है| एक महापुरुष ने सत्य ही कहा है:-

    कंचन तजनासहज है, सहजत्रिया का नेह;

    मान, बड़ाई, इर्षा, दुर्लभ तजनी ऐह|”

     

    मान, बड़ाई तथा इर्ष्या‘ अहं-प्रियता’ के बच्चे हैं, इसलिए यदि कोई उच्च-भाव किसी के भीतर उत्पन्न न हो जाए, तोआज या कल वहसम्बन्ध टूट जाएगा | खून का रिश्ता थोड़ा बहुत चल सकता है, विवाह-बन्धन कुछ रिश्तों को मजबूत कर देता है | इन दोनों सम्बन्धों  में अल्प या अधिक स्थिरता है, लेकिन जहां यह दोनों सम्बन्ध न हों, तथा कोई मित्रता का सम्बन्ध भी न हो, वहां तो सम्बन्ध बहुत संवेदनशील होता है | ऐसी हालत में यदि किसी के हृदय में श्रद्धा का भाव उत्पन्न न हो गया हो, तो केवल मत को लेकर वह सम्बन्ध स्थिर (अथवामजबूत)नहीं रह सकता |सम्बन्ध के सूत्र, खून के सूत्र, विवाह के सूत्र, तथा बिरादरी के सूत्र तो सदियों से अपना अधिकार बनाए हुए हैं | लड़-झगड़ कर भी मनुष्य एक-दूसरे के साथ इन सूत्रों से जुड़े रहते हैं तथा एक-दूसरे से चाह कर भीसम्बन्ध विच्छेद नहीं कर सकते| बाकी जहां एक-दूसरे के हित कोलेकर सम्बन्ध हो, वहां तो उच्च तथा हितकर भावों के सम्बन्ध-सूत्रों की बहुतबड़ी आवश्यकता होती है | जबकि किसी मनुष्य में आत्म-हित तथा अहित-बोध उत्पन्न न हुआ हो, तथा उसमे सत्य तथा असत्य का बोध न जागा हो, तब तक आत्मिक-सम्बन्ध स्थिर तथा शक्तिशाली नहीं हो सकता |

    प्रश्न:-     क्याइस अहं भाव के अतिरिक्तकोई और भाव भीहैं, जो शिष्य बनने की योग्यता को नष्ट कर देते हैं ?

    उत्तर:-    जी हां | शिष्य बनने के योग्यता को नष्ट करने वाले तीन और भाव भी हैं | यथाइर्ष्या,द्वेष तथा मिथ्या का अनुराग |

    प्रश्न:-     क्याआप कृपा करके इर्ष्या के सम्बन्ध में देवात्मा की देव-वाणी का विस्तार से वर्णन करेंगे ?

    उत्तर:     जी हाँ, अवश्य| इस विषय में भगवान् देवात्मा फरमाते हैं:-

    “जिन मनुष्योंमेइर्ष्या का महाहानिकारक भाव वर्तमान होता है, वह किसी जन के किसी ऐसे उच्च-भाव व उसके सद्गुण की प्रशंसा सुनकर, जो उनमे न हो, जल उठते हैं, तथा उससे अपने हृदय में बहुत क्लेश अनुभव करतेहैं |औरकईबार उसके सम्बन्ध में बहुत बुरी बुरी कामनाएं करते हैं | यह अति निकृष्टभाव जिस जन में जितना अधिक हो, उतना ही वह सत्य और हित विषयक विविध उच्च भावों की महिमा कोदेखने और उनके प्रति सच्चा श्रद्धावन बनने के अयोग्य होता है | तथा उसके विष से पागल होकर एक व दूसरे उच्च भावधारी आत्मा के किसी ऐसे उच्च रूप को या तो मूल से ही स्वीकार नहीं करता, या उससे भीबढ़कर उसे उसके उलट रूप में प्रगट करता है |”

    प्रश्न:-     यह तो बड़ा हानिकारक भाव है ?

    उत्तर:-    जी हां | ईर्ष्या-भाव तो मनुष्य को ख़त्म कर देता है, यह भाव तो प्रकृति के विकास-क्रमके नियम के ही उल्ट है |प्रकृति के विकास-क्रममें नई से नई और अच्छी से अच्छी हस्तियाँ उत्पन्न होती जायेंगी, तथा उनके उत्पन्न होने का क्रम कभी बन्द न होगा, क्योंकिविकास-क्रम का अर्थ ही आगे से आगे बढ़ते जाना है| उनके चाहने तथा उनका गुण गाने वाले  भी उत्पन्न होते रहेंगे | फिर आप विचार करें कि ईर्ष्या-परायण जनोंका क्या हाल होगा?उच्च-गुणधारीजन उत्पन्न होते रहेंगे, तथा इर्ष्या-परायण जन जलते रहेंगे,जबकि उनके अन्य साथी मनुष्य गुण गायेंगे | अर्थात कोई किसी की महिमा गायेगा, तथा इर्ष्या-परायण जन अपना सिर पीटेगा |

    एक जन ऐसा था कि जो किसी मत के गुरु के सम्बन्ध में इर्ष्या-भाव रखता था |वह प्राय: हर समय जलता-कुढ़ता रहता था, उसके जलने कुढ़ने की यहां तक नौबत पहुँच जाती थी कि ज्योंहिकिसी ने उस गुरु की महिमा गई,त्यों ही वह अपनी छाती पीटने लग जाता था | वह अपनी छाती को पीटता और अपने आत्मा को कोढ़ी बनाता बनाता मृत्यु को प्राप्त हुआ | ओह! इर्ष्या-परायण जन को कैसी भयानक सज़ा !! इर्ष्या-परायण जन औरों की उन्नति का शत्रु होताहै,तथा वह इस नीच-भाव के वशीभूत बहुत सीचालें भीचलता है | तथा यदि वह किसी गुणधारी जन की किसी और इर्ष्या-परायण जन के सन्मुख कोई प्रशंसा भी करता है– तो वह इसलिए नहीं कि उसे किसी के कोई उच्च-गुण दिखाई देते हैं | बल्कि उसकी प्रशंसा भी पाप-मूलक भाव रख कर करता है, ताकि जिसके सन्मुख किसी की प्रशंसा की जाए, उसकी हेठी अथवाअपमान हो | मुझे तो बहुत सारे अनुभवों में से गुज़रना पडा है | एक बार कालेज की नीति-कक्षा में प्रिन्सिपल ने किसी लडके की महिमा गई, तो एक और लड़का खड़ा होकर यह कहने लगा कि प्रिन्सिपल साहब,आपइसकी क्या महिमा गाते हैं, इसकी तुलना में तो अमुक लड़का ज़्यादाअच्छा है | यदि किसी और अवसर पर मैं किसी दूसरे लड़केकी महिमा गाता हूँ, तो यह इर्ष्या-परायण लड़का इर्ष्या-भाव से परिचालित होकर किसी और तीसरे लड़के की महिमा गाने लगता है, जिससे दूसरे लड़के का अपमान हो | अर्थातऐसे जन महिमा गाते हैं तो किसी की निन्दा करने के लिए | इर्ष्या-परायण जन किसी की निन्दा और हानि में प्रसन्न होता है, अन्यथा जलता भुनताही रहता है तथा अपनी उन्नति के मार्ग को स्वयं ही बन्द कर लेता है |

    प्रश्न:-     क्याआपद्वेष-भावके सम्बन्ध में भी देव-वाणी का पाठ करेंगे?

    उत्तर:-    जीहां, अवश्य| इसविषय में भगवान् देवात्मा फरमाते हैं:-

    “जिस जन में यह निकृष्ट भाव जितना अधिक होता है, उतना ही वह अपनी किसी अनुचित वासना की तृप्ति में किसी और को रोक पाकर उसे यथासाध्य सब प्रकार की हानि पहुंचाने के लिए तैयार हो जाता है, यहां तक कि किसी से बड़े बड़े उपकार पाकर भी उसकी अनुचित हानि करके अपने इस अति निकृष्ट भाव को तृप्त करता है | तथा जिस जन में यह भाव बहुत प्रबल हो, वह न केवल उस जन को, जिस के द्वारा उसकी अनुचित वासना की तृप्ति कोरोक लगी हो, किन्तु उसके सम्बन्धियों  को भी हानि पहुंचाने की चेष्टा करता है, तथा किसी किसी अवस्था में यहां तक कामना करता है कि यथासम्भव उसके वंशधर भी उसकी न्याईं उस जन व उसके सम्बन्धियोंसे वही प्रतिशोध लेते रहें |”

    प्रश्न:-     बदला या प्रतिशोध लेने का भाव तो महा हिंसक भाव है ?

    उत्तर:-    जी हां | एकबार एक नौकर की एक घटना अख़बारों में निकली थी, जिसने सारे पाठकों के रौंगटे खड़े कर दिए थे | उसके मालिक ने नौकर को किसी बात पर डांट दिया | इस डांटने से नौकर इस प्रकार उत्तेजित हो गया कि उसने सोये हुए मालिक के सारे परिवार को, यहां तक कि छोटे छोटे बच्चोंतक को भी क़त्ल कर दिया |

    प्रश्न:-     क्या कोई जन देव-प्रभावों में रहकरऐसा कर सकता है ?

    उत्तर:-    जी नहीं | परन्तु बदला लेने का यह नीच-भाव कई सूरतों में मनुष्य के भीतर छुपा रहता है | भगवान् देवात्मा का एक उपकृत सेवक, जो24वर्ष तक उनसे अनगिनतउपकार पाकर भी चोट खाने पर इस हालत में पहुँच गया कि उसने महीनों तक अपनी नीच-प्रकृति से उत्तेजित होकर भगवान् देवात्मा की पवित्र हस्ती के सम्बन्ध में इतना अशिष्टतथा अनैतिक प्रलाप किया कि वह देवसमाज के इतिहास में वहमहा पिशाच और महा कृतघ्न मशहूर हो गया |यदि कोई बड़े से बड़ा अपराध हो सकता है, तो वह कृतघ्नता का है | और यदि एक एक उपकृत-जन अपने उपकारी से बदला लेने के लिए तैयार हो जाता है, तो उसकी अधोगति की कोई सीमा नहीं रहती | मनुष्यअपनी इसअधम-प्रकृति से डरता रहे तो ही अच्छा है |एक एक नीच-भाव जल्दी से मनुष्य का पीछा नहीं छोड़ता| उसकेनीच-भाव ‘देव-प्रभाद दायक मण्डल’ मेंइस तरह दबे रहते हैं, जिस प्रकार फासफोरस पानी में तो बचा रहता है, लेकिन ज्यों ही उसे पानी से बाहर निकाला जाए- उसमेसेधुआं उठना तथा वह जलना आरम्भ हो जाता है | अत: जब तक एक एक नीच-भाव पर देव-प्रभावों की किरणें वर्षों तक निरंतर न पड़ती रहें, तब तक वह दुर्बलअथवा नष्ट नहीं होता, विशेषकरअहं, इर्ष्या, द्वेष तथा नीच-घृणा-भाव|

    प्रश्न:-     आप सत्य कहते हैं, परन्तु दुनिया में चारों तरफ तो इन चारों भावों का हीराज्य फैला हुआ दिखाई देता है | उनसे उत्पन्न भयानक फल घर घर और गली गली में दिखाई देते हैं | फिर भी मनुष्य उनसे मोक्ष पाने के आकांक्षी नहीं देखे जाते, बल्किउनके प्रेमक बने हुए हैं | ऐसा क्यों ?

    उतर:-         वह इसलिए कि इन भावों की तृप्ति में मनुष्य को सुख मिलता है | औरों के ऐसे नीच-भाव तो सबको नज़र आ जाते हैं, लेकिनअपने नीच-भाव किसी को दिखाई नहीं देते, बल्किउनकी अपनी नज़रों से छुपे रहते हैं | औरों के नीच-भाव तो इसलिए नज़र आतें हैं क्योंकि उनके देखने और दूसरों को नीचा दिखाने में मनुष्य को सुख मिलता है | अपने इसलिए नज़र नहीं आते क्योंकि मनुष्य सत्य का प्रेमक नहीं है | मनुष्य का सोच-विचार और निर्णय लेने का सूत्र सुख का प्रेम और दुःख से घृणा ही है| अत: उसके लिए वह भाव अच्छा है, जो उसे सुख देता हो, और वह भाव बुरा है, जो उसे दुःख देता हो |औरों से अपने लिए नीच-भावों के कड़वे फल चख कर एक एक मनुष्य दुखी होता है,इसलिए दूसरों के इन बुरेभावों को कोसता रहता है |इन चारों शक्तियों (अर्थात नीच-भावों) केवास्तविक रूप को नहीं देख पाता, यदि ऐसा कर पाता तो अपने भीतर वर्तमान इन नीच-भावों के घृणित रूप को पहले ही देख लेता | मनो-विज्ञान यह बताता है कि जब किसी नीच-भाव से कोई मनुष्य अपने आपछुटकारा नहीं पा सकता, तो अपने आपको कोसने की बजाये वह औरों में ही इन भावों को देखता और कोसता है |एक बहुत बड़े जज साहब के बारे में मशहूर है कि वह बदचलन जन को बहुत बड़ी सज़ा देता था | विशेषतया उन जनों को जिन के बुरे आचरण से कोई निर्दोष और अविवाहित स्त्री गर्भवती हो जाती थी | उसके ही सम्बन्ध में यह एक सच्ची घटना है कि एक स्त्री उससे गर्भित हो गई | वह स्त्री यह नहीं जानती थीकि यह जन जज है | उस स्त्री ने नालिश की कि अमुक जन से मैंगर्भित हो गई हूँ |स्त्री ने जो नाम लिया वह उस जज का नाम नहींथा | जबवह अदालत में आकर खड़ी हुई, तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही, क्योंकि उसने उस जज को पहचान लिया था कि यही तो मेरा चाहने वाला है, और इस उलझनमें पड़ गई कि जो कुछ मैं देख रही हूँ, क्या वह सत्य है ? उस स्त्री ने एक पत्र लिख कर उस जज को सौंपदिया| कहा जाता है कि जज अदालत से उठकर अपने घर चला गया और उस स्त्री को अपने घर बुला लिया | उस स्त्री ने मुकद्दमावापिस ले लिया |इसप्रकार की कई घटनाएँ मनोविज्ञानिकों ने एकत्रित की हैं, तथा मनुष्य की इस दुर्बलता को Projectionके तौर पर स्मरण करते हैं |इसका अर्थ यह हैकि जो दोष अपने भीतर है,औरजिस से मनुष्य बाहर नहीं निकल सकता, उस दोष को वह औरों में कोसने लगता है, तथा अपने सम्बन्ध में मनुष्य का कुछ ज़ोर नहीं चलता | इसलिए औरोंपर इस दुर्बलता के लिए फटकार डालता है तथा स्वयं अँधेरे में ही रहता है | परन्तु इतना सत्य है कि मनुष्यसुख देने वाले भावों का (चाहे वह कितने ही पाप-मूलक नीच भाव हों) प्रेमक बना हुआ है | इसके विपरीत वहदुःख देनेवाले  सब भावों का (चाहे वह कैसे ही हितकर क्यों न हों)दुश्मन बन हुआ है |

    प्रश्न:-     मैंआपका बहुतकृतज्ञहूँ कि मुझे आपने यह अमूल्य ज्योति प्रदान की | मिथ्या-अनुराग के सम्बन्ध में भी कृपया भगवान् देवात्मा की देव-वाणी का कुछ उल्लेख करें |

    उत्तर:-    इस विषय में विस्तार-पूर्वक उल्लेख अगले अध्याय में वर्णित किया जाएगा |

प्रश्न:-     भगवान् देवात्मा का अनुरागी-शिष्य बनने में जोजोरुकावटें हैं, आपनेउनका कुछ तो वर्णन कियाहै | आपने यह फरमाया था कि मिथ्या-अनुराग-भाव भी भगवान् देवात्मा के देवरूप का अनुरागी बनने में बहुत बड़ी रुकावट है | क्या आप उसके सम्बन्ध में भी कुच्छ बताने की कृपा करेंगे ?

उत्तर:-    इस नीच-भाव के सम्बन्ध में भगवान् देवात्माकी देव-वाणी यह है:-

“जिस जन में यह नीच-भाव (अर्थातमिथ्या-अनुराग-भाव) जितना अधिक हो, उतना ही उसका हृदय सत्य की तुलना में मिथ्या के ग्रहण करने में बहुधा अधिक तृप्ति पाता है | ऐसा मनुष्य अपने किसी भी शुभ सम्बन्ध में भरोसे के योग्य नहीं हो सकता | वर्षों तक उसने जिस जन के किसी शुभ गुण की परीक्षा की हो, उसी के विरुद्ध किसी दिन किसी और से किसीझूठे कलंक को सुन कर झट उसे सत्य मान लेता है, और पहले जन से पूर्णत: कट जाता है, अथवाउस पर मिथ्या संदेह आरोपण करता है |”

यह महा नीच-भाव अपना सानी आप ही है | इस प्रकार का स्वभाव रखने वाले  जनों से दुनिया भरी पड़ी है | उनके लिए यह कह जाता हैकि वह अपनी कोई समझ नहीं रखते, वह तो औरों की समझ के हवाले  होते हैं | उन जनों के होते हुए ठगी का बाज़ार बहुत  गर्म रहता है | प्रतिदिन हजारों घटनाएँ उत्पन्न होती रहती हैं, जिनसे स्पष्ट मालूम होता हैकि अपनी समझ से खाली शून्य रहने वाले जनों ने अपने आपको लुटा लिया | राजनैतिक-जगत में तो नौजवानों को तबाह करने के लिए और उनको अपना गर्वीदा (अर्थात चाहवान)बनाने के लिए कई नेता स्पष्ट तौर पर पूर्णतय: झूठी बातें फ़ैला कर और उनकी घृणा-शक्ति को उत्तेजित करके फसाद (अर्थात दंगे) खड़े करवा देते हैं | ऐसी दुर्बल प्रकृति रखने वाले जो बेचारे अपनी समझ नहीं रखते, वह तो अपनी भी रक्षा नहीं कर सकते | ऐसी घटनाएँ तो अनगिनत हैं|

एक लड़की ने एक बार बताया कि एकचालाक जन ने मेरे कान में यह बात डाल दी कि वह बहुत बड़ा साहूकार है, और मुझसे शादी करना चाहता है | मुहे यह भी कहा, “तुम्हारा पिता तुम्हरा शत्रु है, वह तो तुम्हें एक जन को बेचना चाहता है | तुम यदि मेरे साथ भाग चलो, तो मैं तुम्हें अपने घर की रानी बना कर रक्खूँगा |” मैंने कहा, कि मेरा पिता तो ऐसा नहीं है, वह तो देने वाला है, मुझसे कुछ लेने वाला नहीं है | उस जन ने फिर कहा, कि तुम उसे नहींजानती | तुम्हारे पिता ने मुझसे रूपये मांगे थे, मैं तो उसे रूपये देने को तैयार था, लेकिन एक और जन ने अधिक रूपये देने चाहे, जो मेरी तुलना में बहुत निर्धन है | तात्पर्य,एक-दो औरऐसीही बातें बता कर और एक व दूसरा उपहार देकर उस जन ने लड़की को अपने पिता के सम्बन्ध में बेवफा बना दिया | इस प्रकार उस लड़की की जो तबाही हुई, वह उसको सारी आयु याद करती और रोतीरही |एक और चालाक जन ने कुछ जनों से यह कह दिया कि जो तुम्हारा अफसर है, वह तुम्हारा शत्रु है, वह मेरे साथ आपलोगों का नाम लेकरऐसीबातें करता रहा है कि मैंइन्हें छोडूंगा नहीं | वह जन मानगए, तथा अपने अफसर के प्रतिघृणा से भर कर कुछ ऐसी बातें कर बैठे जिससे उनको बहुत हानि उठानी पड़ी |

एक एक बच्चा जो माता पिता से किसी बात के कारण रूठ जाता है, उसको पडोसी-जन माता-पिता से यह कह कर फाड़ डालते हैं कि तुम्हारेमाता-पिता तो तुम्हारे दुश्मन हैं | मूर्ख बच्चे कई बार यह समझते नहीं किमाता-पिता से बढ़कर बच्चों का कौनसच्चा हितकारी और मित्र है ?एक बार भगवान् देवात्मा ने यह फरमाया था कि,“यदि कोई स्त्री किसी दूसरे के बच्चे से यह कह दे कि मैं तुम्हें तुम्हारी माता से अधिक प्यार करती हूँ, तो उस स्त्री को डायन समझो | जितना प्यार एक एक माता को अपने बच्चे के लिए है,उसकी कोई सीमा नहीं है | वह तो अपने बच्चों के ऊपर न्योछावर हो जाती है, परन्तु लाखों बच्चे ऐसी जननी से, औरों के बहकाने पर, गुमराह (पथ-भ्रष्ट) हो जाते हैं | किसीजन में शक़ पैदा करना जितना आसान है,भरोसा पैदा करना उतना ही कठिन है | अपनी समझ न रखने वाले जन करोड़ों की संख्या में हैं; जो साक्षात परोपकारियों को भी औरों के बहकाने पर भूल जाते हैं | यह सब इसलिए है कि मिथ्या का अनुराग उनमे कूट-कूट कर भरा हुआ है | भगवान्देवात्मा के कृतघ्नों के देवसमाज में रहने के दिनों के भाव-प्रकाश पढ़ें, और समाज से निकल जाने के बाद के पढ़ें |एक ऐसे बेवफा जन ने यह लिखा था, कि देवसमाज में पापी-जन भरे हुए हैं | उसनेऐसाक्यों कहा, क्योकिंवास्तविकता यह है कि कई जन भगवान् देवात्मा की देव-ज्योति को पाकर अपनी नीच-प्रकृति को भयानक रूप में देखते हैं और उसको स्वीकार करते हैं | उनकेस्वीकार करने के पश्चात तो हृदय की शुद्धि होनी आरम्भ होती है, इस स्वीकृति के पश्चात बेहतर होकर और जनों की भी कायापलटनी आरम्भ हो गई | परन्तु इस कृतघ्न जन ने अपने जैसी प्रकृति रखने वाले जनों को एकत्रित करके यह बताना (अर्थातभड़काना) शुरू किया कि देवसमाज तोजरायम-पेशों(अर्थातअपराध-मूलक व्यवसाय करने वालों)का समूह है | यह कैसी दुष्टता ! यह जन ऐसा झूठ लिखने के लिए इतनाउत्तेजित क्यों हुआ ? यह इसलिए कि वह समझता था कि लाखों जन तो मिथ्या बातोंको झट सत्य मान लेते हैं | मैंने उसके लेख का उत्तर देते समय यह पूछा था कि तुम 35 वर्ष से भी अधिक तक देवसमाज में रहे, तुम ख़ुद ही बताओ कि तुमने कौन कौनसीअपराध-मूलक व्यवसाय करनेवाली बातें सीखीं, तुम्हारी शादी भी देवसमाज में हुई, तुमने विवाहित पत्नी के भीतर किन विशेष जुर्मों की वर्तमानता देखी थी, जिन पर तुम मोहित हो गए | तुमने अपने सारे बच्चों को देवसमाज के स्कूलों में पढ़ाया, वह बेचारे स्कूलों में क्या क्याजुर्म करना सीखे | फिर जब तुम देवसमाज से अलग हुए, उसके बाद भी तुमने अपने एक बच्चे को देवसमाज के ही स्कूल में कौनसा अपराध सीखने के लिए भेजा था? वह बेचारा इसकाक्याउत्तर दे सकता था ? परन्तु क्या वह जन कभी अपनेदुष्कर्मोंके लिए शर्मिंदा हुआ ? क्या उसने कभी यह देखा कि उसने झूठे आरोप लगाकर अपने आपको कितना पतित बना लिया ? वह अच्छी तरह जानता था कि देवसमाज पाप छुडवाने का काम करती है न कि पाप बढ़ाने का | मिथ्या-अनुरागऐसी भयानक बीमारी है कि जो मनुष्य के भीतर सत्य को देखने और ग्रहण करने की योग्यता नहीं छोड़ती| अब यदि किसी मनुष्य का पेट इस हालत में हो कि जो कुछ वह खाए उसे उलटी के द्वारा निकाल दे, तो क्या ऐसा जन ज़िंदा रह सकता है ? इसी प्रकार जो आत्मा सत्य को ग्रहण न करे, उसे दूर फैंक दे, और मिथ्या को ग्रहण करे, तो क्या उसके आत्मा का कभी भला होसकता है ?क्या वह जन अपने आत्मा के भले के संग्राम में कभी लग सकता है ? क्या वह सच्चे सदगुरु का शिष्य होकर रह सकता है ? क्या ऐसा जन भगवान् देवात्मा के साथ सम्बन्ध रखने के योग्य भी है ?भगवान् देवात्मा तो सत्य के पूर्ण अनुरागी हैं – और यह मिथ्या का अनुरागी है; क्या कभी दोनों का मेल हो सकता है ? कभी नहीं, कभी नहीं | इसलिए मिथ्या अनुरागी जन भगवान् देवात्मा का अनुरागी शिष्य कभी बन ही नहीं सकता | यह भी कहना मुश्किल है कि वहभगवान् देवात्मा का सेवक होकर और सेवक रहकर ही मरेगा |

प्रश्न:-     क्या मिथ्या-अनुरागी किसी के सम्बन्ध में विश्वास के योग्य भी हो सकता है ?

उत्तर:-    नब्बेप्रतिशत हालत में नहीं | बाकी दस प्रतिशत भी बहुत मुश्किल है | मिथ्या पर कोई भवन खड़ा नहीं हो सकता | इसलिए मिथ्या पर कोई सम्बन्ध स्थापन नहीं हो सकता | मिथ्या-अनुरागी अपने वर्षों के अनुभव के बाद भी किसी के कहने या बहकाने से अपनी पत्नी से फट जाता है | किसी के बहकावे सेएक एक बहुत अच्छे और उपकारी भाई से फट जाता है |मैंने एक भाई के सम्बन्धमें पढ़ा है कि जो अपने बड़े भाई को प्यार करता था और उसके लिए अपनी जान देने को तैयार रहता था | बड़े भाई को छोटे भाई के इस व्यवहार का वर्षों का अनुभवथा | परन्तु ज्यों ही बड़े भाई ने शादी की, त्यों ही अपनी पत्नी के बहकावे में आकर अपने छोटे भाई से बहुत फट गया और उसको अपने से अलग कर दिया | छोटा भाई बहुतरोया कि मुझे अपने से जुदा न करो, मेरी दृष्टि आपके सम्बन्ध में नहीं बदली, परन्तु बड़े भाई ने उसकी एक न सुनी |दोनों का जुदा होना था कि दोनों पर आफतें आन पड़ीं | कई वर्षों के दुःख सहने के बाद बड़े भाई को होश आई | मिथ्या-अनुराग प्रत्येक सम्बन्ध में एक बहुत बड़ी मुसीबत है | परन्तु धर्म-जगत में तो यह सत्यानाश करने वाली हार्दिकनीच-शक्ति है |

प्रश्न:-     मिथ्या-अनुरागियों को क्या हो जाता है, वह ऐसा क्यों करते हैं ?

उत्तर:-    उन पर मिथ्या का अधिकार हो जाताहै, या यह कहो कि उन पर बुरीतरह आत्म-अन्धकार छा जाता है, मानो उनकी आँखों में मोतिया बिन्द का रोग हो गया हो |

प्रश्न:-     जब एक बार ऐसा जन ज्योति पाताहै, और अन्धकार को अन्धकार के रूप में देखता है, तब अन्धकार को सदा के लिए त्याग क्यों नहीं देता ?

उत्तर:-    क्योंकि वह स्वभाव से हीअन्धकार-प्रिय है, इसलिए वह अन्धकार से नहीं बचता तथाउल्लू की तरह अन्धकार-प्रिय हीरहताहै | आपने उस कैदी की कथा तो अवश्य सुनी होगी, जो70-80 वर्ष की आयु तक जेल में रहा | ज्योंहिनए बादशाह के राज्य संभालने की ख़ुशी में सारे कैदियों के साथ उस जन को भी स्वतन्त्र किया गया, और वह जिस समय जेल की अँधेरी बन्द कोठरी से बाहर निकला गया,त्योंहि वह ज्योतिमय आभा को देख कर बुरी तरह डर गया | वर्षो से अँधेरे का अभ्यस्त होने के कारण वह बाहर की ज्योति को सहन नहीं कर सका| एक दिन जब उसको पता चला कि बादशाह आज यहां से गुज़रेगा, तो वह सड़क के किनारे खड़ा हो गया | ज्योंहिनया बादशाह वहां आया,त्योंहि वह कैदी उसके चरणों में गिर कर गिड़गिड़ाने लगा कि मुझे मेरी उसी अँधेरी कोठरी में वपिस भेज दिया जाये | “हाय मेरी अँधेरी कोठरी,हाय मेरी अँधेरी कोठरी”के शब्द पुकारता रहा | बादशाहनेउसकीसारीकथासुनीतथाउसेअँधेरीकोठरीमेंवपिसभेजदिया, जहांपहुँचकरवहशान्तहोगया|

मैंने देवसमाज में आये हुए एक एक जन के सम्बन्ध में सुना है कि जब वह दुर्भाग्यवशसमाज से कट गया, तो उसने पहला क़दम यह उठाया कि जाकर मांस खाया कि जिसको देवसमाज में आने पर वह छोड़ चुका था | एक कृत्घन जन के लिए कहा जाता है कि उसने जाकर हुक्का पीना शुरू किया, क्योंकि देवसमाज में आने से पहले वह हुक्का पीने का अभ्यासी था | एक कैदी ने मेरे मित्र को बताया कि वह छ: वर्ष जेल में रहा, जहां उसे तम्बाकू पीना नसीब नहीं होता था | वह ज्योही जेल से बाहर आया, त्योंहि उसने सबसे पहला काम तम्बाकू पीने का ही किया | एक एक जन एक एक मिथ्या या बुराईका प्रेमी होता है, इसलिए वह उससे जुदा हो ही नहीं सकता, या जुदा होना नहीं चाहता, या जुदा रहकर भी उसी के पीछे भागता रहता है | एक जन ने मेरे आगे हाथ जोड्ते हुएकहा कि खुदा के लिए ईश्वर या खुदा के बारे मुझे कुछ न कहना, क्योंकि मुझे विश्वास है कि आपकी दलीलों के कारण खुदा या ईश्वर से मेरा विश्वास उड़ जाएगा | मैंइसविश्वास कोक़ायमरखना चाहता हूँ, क्योंकि इसके बिना मेरा गुज़ारा नहीं होगा |

शेख चिल्लीकी कहानी तो बहुत प्रसिद्द है – जब उसके सिर से घी का बर्तन गिर गया और मालिक ने उसे बहुत डांटाकि तुमने मेरा घी नष्ट कर दिया, तभीशेख़ चिल्ली ने कहा कि तुम्हारा तो दो रूपये का घी नष्ट हुआ है, मेरा तो बना बनाया परिवारही बरबाद हो गया है | उसका बना बनाया परिवारक्या था; एक मिथ्या तथा स्वप्न-वतभवन था, जिसका कोई अस्तित्व न था, फिर भी शेख़ चिल्ली के लिए वह वास्तविकता थी | एक जन ने मुझसे कहा कि ईश्वरहमारे सब अपराध और पाप क्षमा कर देता है,इस क्षमा केमिलनेके विश्वास से मुझे बहुत शान्ति मिलती है | परन्तु तब मुझे बहुत कष्ट होता है जब कोई इस विषय के विरुद्ध बोलता है |

एक जन मेरे पास आया तथा आत्मा के सम्बन्ध में बातचीत करता रहा | जब मैंने उसे बताया कि शरीर के बिना आत्मा जीवित नहीं रह सकता, तथाकिसी निराकार अस्तित्व का होना ही असम्भव है, तब उसने बड़ी चोट खाई,तथाकहने लगा कि क्या मरने के बाद हमारा आत्मा सितारों और सूर्यों में सैर नहींकरता रहेगा? मैंने उत्तर दिया, नहीं| एक तो कोई निराकार हस्तीहै ही नहीं, दूसरामृत्यु के पश्चात सारे विश्व में सैर करने का विश्वास एक मिथ्या कल्पना है | यह शेख़ चिल्ली के स्वप्न से भी रद्दी स्वप्न है | वह मुझसेबिना जाने ‘कि आत्मा बिना शरीर के जीवित क्योंनहीं रह सकती’,  नाराज़ होकर चला गया | यह भी जानने का प्रयास नहीं किया कि निराकार अस्तित्व का जीवित रहना या जीवित होना क्यों असम्भव है? मिथ्या अनुराग के कारण मनुष्य सत्य का दर्शन नहीं करना चाहता | किसी अस्तित्व से घृणा करना अनुचित समझाजाता है, परन्तुसत्य से घृणा करना तो महा विनाशकारी हार्दिक-अवस्था है| एक एक मिथ्या विश्वास के सम्बन्ध में मनुष्य का यह हाल है,कि वह किसी मिथ्या कल्पना के विरुद्ध कुछ सुनना ही नहीं चाहता, तो ऐसा जन सत्य-अनुरागी भगवान् देवात्मा का शिष्यकैसेबनेगा, जबकिभगवान् देवात्मा तो कुल मिथ्या-विश्वासों को नष्ट करना चाहते हैं, और कुल मिथ्याओं के पूर्णशत्रु हैं ? इसलिए मिथ्या अनुरागी जन उनका पुजारी नहीं हो सकता | और जो जन मिथ्या अनुरागी है, वह सत्यकेप्रेमी होने की अभिलाषा कभी नहीं करेगा | इसलिएप्रत्येकआत्म-हित आकांक्षी जन के लिए यह परम आवश्यक है कि वह घमंड, इर्ष्याऔरद्वेष से बाहर निकले, और मिथ्याअनुराग केमहापतनकारीभाव से भी सत्य मोक्ष लाभ करे, अन्यथावहदेव जीवनधारी भगवान् देवात्मा  का साधारण शिष्य भी न बन सकेगा, अनुरागी शिष्य बनना तो बहुत दूर की बात है |

देव-वाणी यह है कि “एक ओर जबतक इन महा अनिष्टकारी भावों के अधिकार से किसी जन में परित्राण पाने की आकांक्षा और दूसरी ओर ‘उच्च-जीवन गठनकारी अंगों’ के प्रति यथेष्ट श्रद्धा व आकर्षण जाग्रत न हो, तबतक वह धर्म के पूर्णांग अवतार भगवान् देवात्मा के साथ कोई आत्मिक स्थाईतथाउच्च सम्बन्ध स्थापित नहीं कर सकता |”

प्रश्न:-     भगवान् देवात्मा की देव-वाणी में दो बातें बताई गई हैं | एक तो शिष्य बनने की आकांक्षा रखनेवाला जन उन चारों नीच भावों से छुटकारापानेकीआकांक्षा अनुभव करे और दूसरी ओर वह उच्च-जीवन के अंगों के प्रति श्रद्धा और प्रेम के भाव उत्पन्न करे | क्या इस प्रकार की श्रद्धा लाभ करने और उच्च भावों को उत्पन्न करने के कोई प्राकृतिकनियम हैं ?

उत्तर:-    जीहां, अवश्य हैं |भगवान् देवात्मा की देव-वाणी सुनो तो आपको पता लग जाएगा कि सत्य-धर्म में अटकल-पच्चू (अर्थात अनियमित) कोई बात नही |विज्ञान-मूलक धर्म में अटलनियमों का ही समादर है | भगवान् देवात्मा फरमाते हैं “याद रखो, सत्य-धर्म कोई ऐसी वस्तु नहीं कि जिस के देने या पाने के सम्बन्ध में कोई नियम न हो | देव-धर्म विज्ञान-मूलक धर्म है| विज्ञान में अटल नियमों का पूर्ण समादर है; इसीलिएइस विज्ञान-मूलकसत्य-धर्म की जो जन शिक्षा पाना चाहते हों, उनके लिए आवश्यक है कि वह उसे अटकल-पच्चू की वस्तु न समझें, किन्तु उसे नियम के ज्ञान और उसके साधन के द्वारा ही लाभ करने की वस्तु जानें| जिस प्रकार वायु को तुम अपने शरीर के भीतर नियम के द्वारा ही ले जा सकते हो, और नियम के द्वारा ही उसे अपने लिए स्वास्थ्यकर और विविध खाद्य-पदार्थों को नियम के द्वारा ही अपने आहार के योग्य बना सकते हो, उसी प्रकार नियम के द्वारा ही तुम देव-धर्म प्रवर्तक से उच्च-ज्ञान और उच्च-बोध उत्पादक ज्योति और शक्ति लाभ कर सकते हो, इसके बिना कदापि नहीं |”

प्रश्न:-     वह नियम क्या हैं ?

उत्तर:-    वह नियम यह हैं कि चार प्रकार की सात्विक-शक्तियों से जुड़ कर एक एक अधिकारी मनुष्य भगवान् देवात्मा के देव-ज्योति और देव-तेज संपन्न देव-प्रभावों को लाभ कर सकता है, अन्यथा नहीं |

प्रश्न:-     वह चार प्रकार के सात्विक-भाव क्या हैं ?

उत्तर:-    वह चार प्रकार के सात्विक-भाव हैं –भगवान् देवात्मा के देवरूप के प्रति अटल  कृतज्ञता, अटल श्रद्धा, अटल विश्वास,तथादेव-रूप के प्रति प्रेम व आकर्षण |

प्रश्न:-     नियम के जानने और पूरा करने के लिए भावों के भिन्न मनुष्य के लिए क्याविद्वान् होना भी ज़रूरी है ?

उत्तर:-    जीहां| भगवान् देवात्मा ने स्वयं फरमाया है कि “देव-धर्म के साथ साथ मूर्खता के दूर करने तथा विद्या और विज्ञान के लाभ करने की भी आवश्यकता है |”

इसलिएभगवान् देवात्मा अपने कार्य के लिए उच्च हार्दिक अवस्था रखने के भिन्न उच्च कोटि की मानसिक-शक्तियां रखने वालों की भी आवश्यकता बताते हैं |

प्रश्न:-     मैं फिर आपसे एक और प्रश्न करना चाहता हूँ, आपने जहां आकांक्षा और अभिलाषा का उल्लेख किया है, और यह भी बताया है कि अनुरागी-शिष्य बनने के लिए यह आवश्यक है कि अधिकारी ‘मनुष्य-आत्मा’ में ऐसा बनने की आकांक्षा वर्तमान हो, वहां आपने यह भी कहा था कि आकांक्षा के भिन्न उसमे योग्यता भी वर्तमान हो | आपने उस योग्यता के सम्बन्ध में मुझे अभी तक कुछ नहीं बताया | कृप्या यह बताएं कि ऐसे कौन कौनसे लक्ष्ण हैं कि जिनसे हम पहचान सकें कि किस प्रकार की योग्यता रखनेवाला जन अनुरागी-शिष्य बन सकता है ?

उत्तर:-    भगवान् देवात्मा ने ऐसे लक्षणों का अपनी देव-वाणी के द्वारा जो ज्ञान प्रदान किया है, उसका सारांश नीचे उद्धृत किया जाता है:-

१.        “जोजनआत्मिक-गठन और जीवन के सम्बन्ध में भगवान् देवात्मा की शिक्षा व उपदेश आदि को पढ़ व सुनकर सत्य और असत्य विषयक कुछ विवेक लाभ कर सकते हों,” वह अनुरागी शिष्य बनने के मार्ग की ओर गमन कर सकते हैं|

अब जो जन ‘आत्मा’ के सम्बन्ध में सत्य और असत्य विषयक ज्ञान के सम्बन्ध में कोई विवेक लाभ नहीं कर सकता, वह भला असत्य को क्यों छोड़ेगा, और सत्य की तरफ क्यों आकृष्ट होगा ? इसलिए इस प्रकार का विवेक बहुत ही मूल्यवन विवेक है, जिसे लाभ करना अति आवश्यक है |

प्रश्न:-     सत्य है | जहां विवेक नहीं, वहां पहचान क्या ? जहां पहचान नहीं,वहां आकांक्षा क्या ? और जहाँ आकांक्षा नहीं वहांतलाश क्या? जहां तलाश नहीं, वहांलाभ करना क्या ? इसलिए मैं इस देव-वाणी की सत्यता को बहुतसन्मान की दृष्टि से देखता हूँ | आप कुछ औरआगे बताने की कृपा करें |

उत्तर:-    भगवान् देवात्मा नेअपनीदेव-वाणी के द्वारा दूसरा लक्ष्ण यह प्रगट किया है:-

२.        “जोजनउपरोक्त प्रकार के शिक्षा विषयक लेखों व उपदेशों का बार बार पाठ करसकते हों, और उनमे जो नानाप्रकार के सत्य निहित हैं, उन्हें बार बार पाठ-विचार और जिज्ञासा के द्वारा अधिक से अधिक संख्या और उज्जवल रूप में देखने और ग्रहण करने की योग्यता रखते हों,”वह अनुरागी शिष्य बनने के मार्ग पर आगे कदम बढ़ासकते हैं |

प्रश्न:-     क्याइस प्रकार की योग्यता साधारण मनुष्यों में पाईजाती है?

उत्तर:-    जीनहीं| साधारण मनुष्य तो किसी उच्च लेख या उपदेश को पढ़ना ही नहीं चाहता, उसको तो किसी गूढ़-तत्वों से भरी हुई पुस्तक को हाथ लगाना भी मुसीबत अनुभव होती है | बाकी यदि किसी पुस्तक को पढ़ भी ले तो उसमे छुपे हुए तत्वों तथा सत्यों का दर्शन भी नहीं कर पाता | यदि दर्शन कर भी ले तो उसके हृदय पर कोई विशेष उच्च-प्रभाव नहीं पड़ते | अत: वह कुछ क्षणों के लिए भी इन सत्यों पर विचार करना एक दुसाध्य कार्य समझ कर थोड़ी सी देर में ही हारमान लेताहै | साधारण जन इस बात में ही तृप्त हो जाते हैं कि उन्होंने किसी धार्मिक-पुस्तक का पाठकर लिया, और बस | क्या इस पाठ के द्वारा किसी सत्य का दर्शन भी किया या नहीं ? यह जाने उनकी बला |

यह भी सत्य है कि यदिएक एक अधिकारीजन भगवान् देवात्मा की पुस्तकों की एक लाइन को भीपढ़ ले,तोउसकी सत्यता से वहइतना पकड़ा जाता है, कि सारा दिन उस सच्चाई का उसके दिलो-दिमाग पर बहुत गहरा प्रभावरहता है |ऐसे जन इस प्रकार की अवस्था रख कर और उसको गहरा करके उच्च-स्तर के विचारक तथा लेखक बन सकते हैं | यह समझना बहुत भारी भूल है कि मनुष्य के पास मानसिक-ज्योति है, इसलिएवहभगवान् देवात्मा प्रदत्त सत्यों का दर्शन कर लेगा और उनसे गहरे तौर पर प्रभावित हो जाएगा | उच्च-जीवन के सत्य और तत्व तो देव-ज्योति में ही दिखाई देते हैं | जो जन ऐसे तत्वों का दर्शन नहीं कर सकते, वह अपने हृदयों को बड़ा धोखा देते हैं | यदि वह यह समझते हैं कि अमुक जन जो उच्च तत्वों के सम्बन्ध में या जीवन की सच्चाइयों के सम्बन्धमेंमुझ से अधिक रखताहै, वह केवल अपनी मानसिक-शक्तियों के द्वारा पाता है, यहउसका बहुत बड़ा भ्रमहै|‘हार्दिक-सत्य’ देव-ज्योति में ही दिखाई दे सकते हैं | इन सत्यों के प्रभावों की गहराई, मनुष्य की निज की हार्दिक योग्यता पर निर्भर करती है | यह निज की योग्यता उनके पूर्वजों का जन्म के समय दिया हुआ दान है, तथाभगवान् देवात्मा ने इस प्रकार की निज की योग्यता के बारे भी शिक्षा दी है | जब उन्होंने अपनीदेव-वाणी मेंयह प्रकाश किया, कि पाठ करने वाला सेवक इन्हीं सत्यों का बार बार पाठ और विचार कर सकता हो, तथा उनको वास्तविक  रूप में देखने और ग्रहण करने की योग्या रखता हो, तो ऐसी क्षमता ही उसकी निज की योग्यता होती है |

प्रश्न:-     क्या आपका यह कहना है कि जिस हृदय में अधिक से अधिक सत्यों को जानने और उनको उज्जवल रूप में देखने और ग्रहण करने की योग्यता अच्छे रूप में नहीं, वह अनुरागी-शिष्य नहीं बन सकता ?

उत्तर:-    जीहां|

प्रश्न:-     क्याआप किसी और लक्ष्ण का वर्णन करने की भी कृपा करेंगे ?

उत्तर:-    जीहां| भगवान् देवात्मा ने अपनीदेव-वाणी में जिस तीसरे लक्ष्ण का वर्णन फरमाया है, वह यह है:-

३.        “जोजनभगवान् देवात्मा के इस प्रकार के शिक्षा विषयक तत्व-ज्ञान से उपकृत होकर अपने नाना नीच-अनुरागों और नीच-घृणाओं के विनाशकारी अधिकार से मोक्ष और विकासकारी धर्म व सात्विक-भावों की प्राप्ति केलिएआकांक्षीबन सकते हों,”वह अनुरागी शिष्य बनने के मार्ग परआगेबढ़सकते हैं |

प्रश्न:-     ऐसी आकांक्षा तो देवताओं की आकांक्षा है !

उत्तर:-    जी हां | भगवान् देवात्मा तो देवता पैदा करने के लिए ही आये हैं | मनुष्य नीच-रागों और नीच-घृणाओं केकारण ही नारकीय बना हुआ है | अपहरणकारी होकर औरों के सम्बन्ध में हानिकारक बन जाता है | इसके विपरीत यह आकांक्षा कैसी महा सुन्दर,जिससेपरिचालित होकर एक एक अधिकारी मनुष्य यह चाहे कि मैं दूसरों के लिए हानिकारक न बनूँ और न रहूँ | जिस हृदय से यह पद निकले थे, वह हृदय कितना सुन्दर था, जब उन्होंने यह गीत गाया था:-

“पाप का बोध मैं पाऊँ, न पर हानि कभी चाहूँ;

मैं हितकर जीव बन जाऊं, यही हो कामना मेरी |”

प्रश्न:-     यह तो किसी देवता ने कामना की है !

उत्तर:-    भगवान् देवात्मा के देव-प्रभावों से प्रभावित होकर उच्च हृदय से यह कामना निकली है |यह गीत देवसमाज में सैंकड़ों जन गाते रहते हैं | हमारे विद्यालयों में यह तथा इस प्रकार के और कितने ही सुन्दर गीत अक्सरगाये जाते हैं |

प्रश्न:-     जो जन इन पदों की सत्यता को जानकर सरल भाव से और सच्चे दिल से यह कामना करते हैं, वह धन्य हैं, बारम्बार धन्य है !

उत्तर:-    आपका हृदय भी धन्य है जो आप इसबात की प्रशंसा करते हैं |

प्रश्न:-     मैं तो अनेकों घरों में जाता हूँ, सैंकड़ों जनों के संपर्क में आता हूँ | मैं दुकानदारों, नौकरी-पेशा, वकीलों, डाक्टरों, और जजों को मिला हूँ, लेकिन मुझे कोई जन ऐसान मिला कि जो उक्त प्रकार का गीत गाता हो, और ऐसी कामना करता हो !

उत्तर:-    ऐसे जन आपको कहां मिलेंगे, जो यह गीतगाते हों, बल्कि इसके उलट लाखों करोड़ों मनुष्य अपने अपने जीवनों से इस प्रकारका गीत गाते अवश्यमिलेंगे:-

“न पाप का बोध मैं पाऊँ, सदा पर-हानि मैं चाहूँ |”

आपदेखें जब दुकानदार दूकान पर बैठताहै तो क्या कामना करता है, और उसकाआचरण कैसा होता है ? वह औरों को ठग कर ही तृप्ति पाता है | एक एक नौकरी-पेशा रिश्वत के द्वारा दूसरों के पैसे लूटकरतृप्ति पाता है | लाखों और करोड़ों जन यदि चिढ़ते हैं– तो दयानतदार (अर्थात इमानदार) व्यक्ति से | उनके सन्मुख यदि कोई मूर्ख है, तो वह है दयानतदार, पवित्र या परोपकारी जन | जब कोई जन परोपकार के लिए जीवन भेंट करता है, तो पाप-अग्नि से झुलसे हुए हज़ारों मनुष्य ऐसे जन को मूर्ख बता कर अपने अपनेपापी हृदयों को ठंडा करते हैं |इर्ष्या के दास जो करोड़ों की संख्या में हैं – वह जलते हैं तो औरों की बेहतरी से, खुश रहते हैं – तो औरों की हानि से | ऐसे संसार में पूर्ण हित-अनुरागी का पैदा होना एक अति-विचित्र घटना नहीं तो और क्या है ? इसलिए ऐसे नीच-रागों और नीच-घृणाओं के प्रेमक, अद्वितीय सत्य और शुभ-अनुरागी देवात्मा के शिष्य बन ही नहीं सकते, अनुरागी शिष्य तो कहां बनना था? चार प्रकार की नीच-शक्तियों के दास तो भगवान् देवात्मा के दरबार में आकर भी सकुशल नहीं हैं |

प्रश्न:-     वहचारोंभाव-शक्तियां कौनकौनसी हैं ?

उत्तर:-    वह शक्तियां निम्न प्रकार की हैं;

स्वार्थ अनुराग, घमंड अनुराग, स्वेच्छाचारिता अनुराग एवं नीच-घृणा |

प्रश्न:-     संसार तो इन नीच-भाव शक्तियों वाले मनुष्यों से भरा पड़ा है !

उत्तर:-    जीहां| इसीलिए दुनिया का यह बुरा हाल है, कि मामूली परोपकारी जन के लिए भी ऐसे जनों में वासकरना बहुत बड़ी मुसीबत बनी हुई है| ऐसी प्रकृति रखने वाले मनुष्यों में भगवान् देवात्मा ने किस तरह अपना जीवन व्यतीत किया, यह एक अचम्भेमें डालने वाली  बात है |

प्रश्न:-     सत्य है | नीच-अनुरागी और नीच-घृणाकारी जनों में कोई साधारण उच्च बोध रखने वाला जन भी जीवन व्यतीत करना महा कठिन बातमानता है| एकएक मामूली भद्र-जन के हृदय पर भीकठोर और पापी जनों के वर्ताव का बहुत दुखदाई प्रभाव पड़ता है | सत्यहै ऐसे संसार में भगवान् देवात्मा का प्रगट होना विकास-क्रमकी एक अति-विचित्र घटना है | परन्तु उन्होंने जिस तरह इस धरती पर जीवन व्यतीत किया, वह तो मेरे जैसा एक मामूली जन भी बहुत अनोखी लीला समझता है !

उत्तर:-    प्रकृति ने जब भगवान् देवात्मा को देव-शक्तियां देकर इस धरती पर आविर्भूत किया, तब उनके साथ वह देव-बलभी उनको प्रदान किया, जो सब प्रकार के विघ्नों पर विजयी हों |वह तो सारे मनुष्य-जगत पर जय पाने वाले अजेयदेवात्मा हैं | हम इसीलिए उनके झण्डे को “विजय-पताका” के नाम से स्मरण करतेहैं| जोजोजनभगवान् देवात्मा केदेव-प्रभावोंकोअपनेहृदयपरअधिकारदेंगे, वह पिशाचत्व (अर्थात नरकीय) के जीवन से निकल कर धर्म-जीवन के स्वामी बनते जायेंगे | वही सच्चे हृदय से यह गीत गायेंगे:-

“पाप का बोध मैं पाऊँ, न पर हानि कभी चाहूँ;

मैं हितकर जीव बन जाऊं, यही हो कामना मेरी |”

प्रश्न:-     काश! यह कामना कुल मनुष्य-मात्र के हृदयों कीआकांक्षा बन जाये !

उत्तर:-    प्रकृति के विकास-क्रममें यह निहित है कि “भगवान् देवात्मा की कृपा से किसी न किसी ज़माने में यह कामना मनुष्य-मात्र कीहार्दिक-आकांक्षाअवश्यबनजायेगी |

प्रश्न:-     ऐसे समय में जीना उन अधिकारी मनुष्यों के लिए जो उस समय पैदा होंगे,बहुत बड़े सौभाग्य का विषय होगा | हम तो हिंसक, दरिन्दे और अपहरणकारी करोड़ोंमनुष्य रुपी भेड़ियोंसे घिरे हुए हैं !

उत्तर:-    आपकोविश्वास से भर कर रहना चाहिए कि उचितसमय के आने पर यह हिंसक, दरिन्दे और अपहरणकारी प्रकृति रखने वाले मनुष्य रुपी भेड़िये इस तरह मिट जायेंगे, जिस तरह हिंसक जानवरों से भरी हुई इस धरती से कितनी ही हिंसक प्रजातियाँ विनाश-क्रममें नष्ट हो गईं | फिर सात्विक-मनुष्य पैदा होते और बढ़ते जायेंगे | तथा धरती पर सच्चा सतयुग होगा |

प्रश्न:-     आपनेभगवान् देवात्मा के बताए हुए तीन लक्षणों का तो वर्णन किया है, इस विषय को कुछऔर आगेबढ़ानेकी कृपा करें |

उत्तर:-    भगवान्देवात्मा ने अपनी पवित्र देव-वाणी के द्वारा जिस चौथे लक्ष्ण का वर्णन किया है, वह यह है:-

४.        “जोभगवान् देवात्मा के उच्च सेवकों के उच्च-प्रभावदायक साधनों में योग देने और उनसे उपकृत होने की अभिलाषा रखते हैं,”वह अनुरागी शिष्य बनने के मार्ग परआगेबढ़ सकते हैं |

प्रश्न:-     क्या कोई ऐसे अभागे जन भी हो सकते हैं कि जो भगवान् देवात्मा के उच्च-सेवकों के उच्च-प्रभाव् दायक साधनों में योग देने से कतराते हों, और उनके साधनों से लाभ उठाने से जी चुराते हों ?

उत्तर:-    जीहां| नीच गतियों और नीच प्रभावों में पड़ कर एक एक जन किनफलों को प्राप्त होता है, उसका ब्यान ‘विज्ञान-मूलक तत्व शिक्षा” नामक पुस्तक के पृष्ट ४२ तथा ४३ पर इस तरह दिया हुआ है;

(१) “ऐसा जन किसी उच्च-आत्मा से उच्च-प्रभावों को पाने की योग्यता को खोता जाता है |

(२) उच्च-जीवन की किसी उच्च-शक्ति की महिमा को अनुभव करने की शक्ति को खोता जाता है |

(३) किसी उच्च-आत्मा की संगत या उसके साथ कोई सम्बन्ध स्थापन करने के लिए अपने हृदय में कोई आकर्षण अनुभव नहीं करता, या इससे भी बढ़कर विकर्षणया घृणा अनुभव करता है |

(४) अपने आत्मिक-बल को दिनों दिन् क्षयकरता रहता है, और अपने किसी सुख या मोह या हानिकारक अभ्यास या पाप आदि से एक एक बार मुक्त होने की आकांक्षा करके भी उससे बाहर निकलने की कोई शक्ति नहीं रखता और आत्मिक-दृष्टि से दिनों दिन रोगी और दुर्बल बनता जाता है, तथा उनके कारण नाना प्रकार के वृथा दुःख और क्लेश पाता है | तथा अपने आत्मिक-बल को क्षय करते करते एक दिन पूर्णत: नष्ट हो जाता है |”

अब मैं आपका ध्यान उपरोक्त पहली तीन बातों की ओर फेरता हूँ, यहतीनों बातें चौथे लक्ष्ण की पोषकता में हैं | वह नीच-भाव तथा नीच-गतियाँ क्या हुईंकि जो उच्च-जनों की उच्च-शक्तियों के सम्बन्ध में किसी जन को अन्धान बना दें,उनके लिए नीच-घृणापैदा नकर दें, और ऐसी शक्तियों से विभूषित जनों को घृणा करने से रोक सकें|

प्रश्न:-     यह तो मनुष्यों की बहुत बड़ी दुर्गति है !

उत्तर:-    जी हां | नीच-गतियाँ और उच्च-गतियाँ भिन्न भिन्न गतियाँ हैं, उनके फल भी जुदा जुदा हैं | इसलिए प्रकृति के विश्वव्यापीअटल नियमों के अनुसार दो प्रकार की श्रेणियों की विभिन्न गतियाँ एक ही प्रकार के फल पैदा नहीं कर सकतीं | अर्थात प्रेम तथा घृणा की गतियाँ एक ही प्रकार के फल नहीं ला सकतीं | नीच-गतियों का प्रेम उच्च-गतियों के प्रति विकर्षणपैदा कर देगा, औरउसी प्रकार उच्च-गतियों का प्रेम नीच-गतियों के प्रति विकर्षण पैदा कर देगा |नीच-जीवनधारी जनयदि आकृष्ट होंगे, तो अपने जैसी प्रकृति रखने वाले जनों के प्रति ही| तथा यदि विकर्षण रखेंगे तो उच्च अर्थात सात्विक-भावों के रखने वाले जनों के प्रति |इसलिए जिस जन के भीतर किसी उच्च जीवनधारी उच्च आत्माओं के प्रभावों से लाभ उठाने की आकांक्षा ही नहीं, वह जन भला देवात्मा की ओर किस तरह आकृष्ट होग़ा? यदिदेवात्मा के उच्च-पदधारी उच्च-सेवकों से किसी ने लाभ नहीं उठाया, तोभगवान्देवात्मा के देव-प्रभावों से वह कब लाभ उठाएगा ?

खाने का भूखा खाना चाहता है और खाना मांगता है | वह यह नहीं पूछता कि अनाज कीखेती करने वाला कौन था, औरअनाज के व्यापारी कौन थे ? उसे तो केवल खाने से मतलब है, न कि इधर उधर की बातों से | इसी तरह जीवन दायक प्रभावों के आकांक्षी जन उन सब जनों से लाभ उठाने की आकांक्षा रखेंगे कि जो उस तक देव-प्रभाव पहुंचाने की क्षमता रखते हैं | अर्थातआकांक्षी जन देव-प्रभाव दायकमंडलको ढूँढने का प्रयास करेंगे | यदिकिसीजन में देव-प्रभावों की भूख ही न हो, जैसा कि नीच-संगतीवालों का हाल है, तब ऐसा आत्मा उच्च-संगत की ज़रुरत अनुभव नहीं करेगा |

प्रश्न:-     इसप्रकार की सच्चाई की घटनाएँ तो प्रतिदिन होती रहती हैं | प्रत्येक सत्संग के अवसर पर जब उच्च-मण्डल पैदा हो जाता है, तब एक एक पापी जन यह बताने के लिए मजबूर हो जाता है कि हाय ! मैं तो पहले सत्संग में आने से जी चुराता था | मैंने तो फैसला हीकर लिया था कि मैं इनकी संगत में न आऊंगा, मैं कैसा धोखा खाता यदि संगत में न आता | हाय! मैं अपनी पत्नी और बच्चों को सतसंग में क्यों नहीं लाया ? हाय मैं ख़ुद इच्छुक न होकर अपने साथियों को भी यहां आने से रोकता रहा, इसलिए मेरे मित्र भी संगत में न आ सके |

उत्तर:-    जीहां| सत्संग के अवसरों पर प्रायअधिकारी जन अपनी अवस्था को देखते और लगभगऐसे हीभावों का प्रकाश करते रहते हैं |

प्रश्न:-     अपने“आत्म-निरिक्षण”कीयह तो बहुत अच्छी अवस्था है | क्या ऐसे जन आगामी कालके लिए ऐसे वतावरण में फिर से आने के इच्छुक रहते हैं ?

उत्तर:-    अधिकतर अवस्था में नहीं, कारण यह था कि उनके यह भाव उस उच्च प्रभाव दायक मण्डल की देनथे | ऐसे जन जब फिरघर वपिस आते हैं, तो अपने उन्हीं नीच अनुरागी मित्रों तथासम्बन्धियों के वतावरण में वासकरने के कारण उनकी आत्मिक-अवस्था फिर पहले जैसी ही हो जातीहै| अर्थात देव-प्रभाव प्राप्ति की उनकी उच्च आकांक्षा ढीली पड़ने लगती है | वह ज़हर ही क्या जो मनुष्य को मदहोश न कर दे ? वह नीच भाव क्या जो किसी की सुध-बुध न मार दे और उच्च-जनों की संगती से उदासीन न कर दे |

प्रश्न:-     तब यदि ऐसे जनों के आत्मा के हित लिए संग्रामन कियाजा सके, तोवहउच्च-संगत के साथ अपना गहरा सम्बन्ध किस प्रकार रख सकेंगे ?

उत्तर:-    कई जन तो लगातार उच्च संगत से सदा के लिए कट जाते हैं | ऐसे जनों को होश में रखने के लिए तथा उन तक उच्च-प्रभाव पहुंचाने का लगातार प्रयास करते रहने के लिए सतसंग के कई अवसर रखेजाते हैं, तथा कई उपाय ग्रहण किये जातेहैं | एक तो उनके पास देवसमाज के पत्र-पत्रिकाओं तथा पुस्तकों के द्वारा धर्म-भावों को पहुँचाया जाता है, दूसरे ऐसे  उत्सव रखे जाते हैं कि जिनके कारण धर्म-आकांक्षी जन एक स्थान पर एकत्रित हो सकें और अपनी सम्मिलित शुभ-आकांक्षाओं से वहां का वतावरण ऐसा बना दें, कि आये हुए जनों के हृदय देव-प्रभावों से ओत-प्रोत हो जाएँ, और वह सब आत्मिक-बेहोशी की गहरी नींद से जाग जाएँ तथा अपने अमूल्य जीवन की फ़िकर में लग जाएँ | ऐसा एक एक अवसर कई जनों के हृदय के उच्च-भावों को उभार देता है, जिनके कारण वह देर तक अच्छी अवस्था में रहते हैं | कई हिताकांक्षी जन अपनी शुभ-कामनाओं के द्वारा उनकी रक्षा करते रहते हैं | इस बहुत सारे संग्राम के द्वारा वह एक एक धर्माकांक्षी-जन की रक्षा करते हैं |जब तक किसी जन की आंतरिक आंखें उच्च-जनों के सम्बन्ध में खुली न रहेंगी, तब तक उनकी खैर नहीं | जिस वस्तु का किसी जन को दर्शन नहीं होता, उस वस्तु के सम्बन्ध उस जन में कोई आकर्षण भी उत्पन्न नहीं होता | जब कोई जन उच्च-जनों की महिमा का बोध पायेगा, तभी उनको सराहने की कोशिश कर सकता है | ज्योंहिवह उच्च-जनों के सम्बन्ध में बेसुध हो जाएगा,त्योंहि उनकी महिमा उसकी आँखों से छुप जायेगी |

प्रश्न:-     तब क्या आपका यह तात्पर्य है कि यदि किसी जन को एक बार उच्च-ज्योति मिल जाए, तो यह ज़रूरी नहीं है कि वह उच्च-ज्योति सदा के लिए उसके पास रहे ?

उत्तर:-    जी हां | उच्च-जनों की ज्योति उनकी अपनी ज्योति नहीं | साधारण मनुष्यों के भीतर जो भाव-शक्तियां वर्तमान हैं, वह इस ज्योति की शत्रु हैं, इसलिएवह आत्म-अन्धकार तथागहरी आत्मिक-बेसुधी उत्पन्न करती हैं | यहतोपरम पूजनीय भगवान् देवात्मा की अथाह कृपा और शक्ति है कि वह ऐसी उलटी प्रकृति रखने वाले जनों में उनकी इच्छा से नहीं, किन्तु कई सूरतों में उनकी इच्छा के विरुद्ध अपने देव-प्रभाव पहुंचा देते हैं | देव-ज्योति की यह विशेषता है कि उसके मिलने से आत्मिक-अन्धेरा दूर होता है | तेज की यह विशेषता है कि दुर्बलता, पाप और मिथ्या नष्ट होता है | इसलिएज्योंहिदेव-ज्योति तथा देव-तेज सम्पनदेव-प्रभाव किसी जन को प्राप्त होने लगते हैं,त्योंहि वह आत्मिक-बेहोशी की अवस्था से निकल कर होश की अवस्था में आंखें खोलता है |अन्धकार की गहरी खाई से निकल कर ज्योति की दुनिया में प्रवेश करता है, तथा अपनी बुरी अवस्था को बुरे रूप में देखता है | रोता चिल्लाता और पछताता है तथा अपने आत्म-शुद्धि के साधनों में लग जाता है |

प्रश्न:-     ऐसी अच्छी अवस्था को पाकर क्या वह फिर से बेहोश हो सकता है ?

उत्तर:-    जी हां | यह तो सारा भाव-शक्तियों का खेल है | ज्योति में अपना मैलातथा कुत्सित रूप नज़र आता है, अँधेरे में नहीं | ज्योति में भय तथा खतरे नज़र आते हैं, अँधेरे में नहीं | ज्योति में लुटा हुआ जीवन नज़र आता है, अँधेरे में नहीं | इसलिए ज्योति की जो लीला है, वह अँधेरे में उत्पन्न नहीं हो सकती | ज्योंहिज्योति आँखों से गायब हुई,त्योंहि उसकी लीला भी बन्द हो गई | किये हुए पाप देव-ज्योति में बुरे लगते हैं, आत्मिक-अन्धकार में नहीं|बाहर की दुनिया में यह यही सच्चाई काम करती है | एक जन शराब में बेसुध हो गया, अपनी मदहोशी में उसने अपनी बहुत प्यारी पत्नी का क़त्ल कर दिया | वह पोलिस के द्वारा गिरफ्तार किया जाकर जेल में डाल